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हल्दी की उन्नत खेती एवं बीज संरक्षण,प्रक्रियाकरण(क्योरिंग)

हल्दी
Written by bheru lal gaderi

इसकी मूल जड़ में अदरक के सामान कन्द होते हे जिसे हल्दी कहते हैं। हल्दी एक बहुवर्षीय शाकीय पौधा हैं इसका  वानस्पतिक नाम कुरकुमा लोंगा हैं एवं जिंजिवरेंसी कुल का सदस्य हैं। हल्दी का मूल स्थान भारत ही माना जाता हैं। इसका पौधा भारत में प्रत्येक स्थान पर पाया जाता हैं। भारत की विभिन्न मसाले फसलों में हल्दी को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं। इसका उत्पादन घरेलु तथा व्यापारिक उपयोग की दृष्टि से चीन, कोस्टा, राइका, पेरू, पाकिस्तान तथा भारत देशो में हल्दी की खेती की जाती हैं।

हल्दी

हल्दी की खेती

भारत में आंध्रप्रदेश व् तमिलनाडु में मुख्य रूप से खेती की जाती हैं, साथ ही उड़ीसा, बिहार, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश में भी खेती की जाती हैं। श्रीलंका, दाक्षिण अफ्रीका, जापान, सयुक्त राज अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, लीबिया एवं सिंगापूर आदि देशो को निर्यात किया जाता हैं। मिनरल वाटर 13.1%, प्रोटीन 6.3%, वसा 5.1%, कार्बोहाइड्रेड 69.4%, राख 3.5% , रेशा 2.6% आदि पोषण तत्व हल्दी में पाए जाते हैं। इसके आलावा ऐसे  औषधि के रूप में जोड़ो के दर्द, खासी, चोट, रक्त शोधक, एंटीसेप्टिक, पीलिया आदि बीमारियों में प्रयोग की जाती हैं। हल्दी का पीला रंग उसमे पाए जाने वाले रसायन करक्यूमिन के कारण होता हैं। भारत में प्रत्येक स्थान पर पाया जाता हैं।

जलवायु :-

हल्दी मुख्यतया उष्णकटिबंधीय देशो में उगाई जाती हैं। हल्दी की खेती के लिए गर्म आद्रता वाली जलवायु की आवशयकता होती हैं। हल्दी की बुवाई, अंकुरण एवं जमाव के समय अपेक्षाकृत कम वर्षा एवं पोधो की वृद्धि के समय अधिक वर्षा उपयुक्त रहती हैं। इसकी खेती के 20 से 25 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान एवं समुद्र ताल से 1200 से 1500 मीटर की उचाई तक के सथानो पर भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। इसकी पैदावार 125- 200 से. मी. वर्षा वाले क्षेत्रो में अच्छी होती हैं।

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भूमि

वैसे तो हल्दी सभी प्रकार की मृदाओं में उगाई जा सकती है। जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो , हल्दी की फसल के लिए उपयुक्त है परन्तु अच्छी खेती के लिए सबसे अधिक उपयुक्त मिट्टी बलुई ,दोमट ,कछारी,रेतीली व मटियार दोमट सर्वोत्तम रहती है जो काफी उपजाऊ हो और भूमि का पी. एच. मान 5 से 7 के बिच होना चाहिए तथा भूमि की सतह कड़ी होना चाहिए। क्षारीय मृदा इसके लिए उपयुक्त नहीं होती हैं।

भूमि की तैयारी

खेत की तैयारी के समय 30-35 टन गोबर की अच्छी तरह से तैयार खाद एक एकड़ के हिसाब से मिला दें। फिर एक बार मिटटी पलटने वाले हल से और 3-4 बार देशी हल से या हैरो से जुताई करें। 2-3 बार गहरी करके पाटा चला कर खेत को समतल (मिटटी को भुरभुरा) बना लेना चाहिए जिससे गाठों का विकास अच्छा हो सकें।

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उन्नत किस्में

हल्दी की पांच प्रजातियाँ पाई जाती है। हल्दी (कुरकुमा लोंगा),काली हल्दी (कुरकुमा कंसिया), आमा हल्दी (कुरकुमा ऐरोमेटिका),कचूर (कुरकुमा जीडोरिया),एवं तीखुर (कुरकुमा एंग्सिटीफोलिया) इन सभी की कृषि तकनीक समान है। हल्दी की अन्य किस्में है जैसे: अमलापुरम (सी. ए.-73), दिन्द्रोग्रेमे (सी. ए.-79),बालगा, गौत्तम, सोनी, पेरुनादन,टेकुरपेट, आरमुर माईडयुकर,सुदर्शन, सुरोमा आदि है।

प्रगतिशील जातियाँ

हल्दी उन्नत किस्मों का क्षेत्रीय, अवधि तथा उत्पादन क्षमताओं का विवरण निम्नलिखित है।

बुवाई का समय

देश के विभिन्न हिस्सों में हल्दी की बुवाई अलग-अलग समय में की जाती है। जलवायु किस्म एवं सिंचाई की सुविधानुसार हल्दी के राज्यों में हल्दी की बुवाई मार्च अप्रेल में की जाती है।अल्प अवधि वाली किस्मों (200 दिन)को बोने का समय मई का महीना, मध्यम अवधि  वाली (250 दिन)प्रजातियों के लिए जून का महीना तथा दीर्घ अवधि (270 दिन से अधिक) के लिए जून-जुलाई के महीने सर्वोत्तम रहते है।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार

इसकी फसल की बुवाई करने के लिए कन्दो एवं बाजु कंदो को भूमि में दबाया जाता है। मातृकन्द से उगाई गई फसलों की उपज बहुत ही संतोषजनक पाई गई है।मातृकन्द का वजन 30-35 ग्राम का तथा बाजु कन्द का वजन 15-20 ग्राम होना स्वस्थ फसल के लिए बहुत ही आवशयक हैं। इस प्रकार औसतन 20-25 कविंटल/हेक्टेयर बीज की आवशयकता होती हैं। बीज की गाठों को मेंकोबेन्ज 75% कार्बेन्डाजिम 50% व् मेटलेजिल 4%, +मेंकोजेब 64% (3 ग्राम प्रति लीटर पानी) तथा 10 मिली. मेलार्थियों व् क्लोरोपायरीफास के घोल में आधा घंटे तक डुबोकर रखे। सुखाने के बाद ही बुवाई के काम में ले।

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बुवाई की विधि:-

हल्दी की बुवाई 2 प्रकार की विधियों से की जाती हैं।

 समतल भूमि विधि:-

हल्दी को समतल भूमि में लगाने के लिए 4 से 8 मि. लम्बी एवं 2 से 4 मीटर चौड़ी क्यारिया बननी चाहिए। इस विधि में पंक्ति से पंक्ति की दुरी 45-60 सेमी. एवं कंद से कंद की दुरी 25 सेमी. रखनी चाहिए।

 मेड़ विधि:-

इस विधि में भूमि के प्रकार को ध्यान में रखते हुए पंक्ति से पंक्ति की दुरी कम से कम 45×60 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दुरी 25 सेमी. रखना चाहिए।

ध्यान रखें:-

हल्दी की गांठे लगाते समय मुख्य रूप से ध्यान रखने की बात यह हैं की गांठ आडी रखी जाए एवं उसकी आँख ऊपर की तरफ मुँह किए हुए हो। साथ ही हर कंद 4-5 सेमी. की गहराई पर लगाया जाना चाहिए तथा यह मिटटी से ढका हुआ होना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक:-

इसकी फसल भूमि से काफी मात्रा में पोषक तत्वों को खींचती हैं। खेत की तैयारी के समय भूमि में 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद व् कम्पोस्ट खाद एक समान रूप से फैलाकर उसे मिटटी पलटने वाले हल से मिला देना चाहिए। हलकी भूमि में 300 किलो नाइट्रोजन 125 किलो फास्फोरस, 175 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवशयकता होती हैं। नत्रजन की आधी मात्रा एवं पोटाश तथा फॉस्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय दे । तथा नत्रजन की शेष आधी मात्रा 2 हिस्सों में बुवाई के 60 दिन एवं 90 दिन बाद पोधो के चारो और कतरो के बिच में देकर सिंचाई करना चाहिए। खाद देने से पौधा का वानस्पतिक विकास जल्दी होता हैं और पैदावार में वृद्धि होती हैं।

अन्तरवर्ती फसलें:-

हल्दी की फसल छाया में अच्छी वृद्धि प्रदर्शित करती हैं। अतः इसके लिए ऐसी फसले खेत में उगाई जाती हैं जो शीघ्र वृद्धि करने वाली एवं छायादार हो। मक्का, ज्वर, अरहर, अरंडी आदि की फसल हल्दी के साथ बोई जाती हैं।

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निराई- गुड़ाई:-

खरपतवारो को नष्ट करने के लिए फसल की बुवाई के लगभग 30-35 दिन बाद खेत की निराई- गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए एवं दूसरी निराई लगभग 80-90 दिन पर निराई गुड़ाई करके पौधो पर मिटटी चढ़ाये।

सिचाई:-

हल्दी की फसल 7-9 महीने लम्बी अवधि वाली होने के कारण पौधो के समुचित विकास तथा देहिकी क्रियाओ के सम्पादन हेतु नमी का संचार भूमि में होना बहुत ही आवशयक हैं हल्दी में पहली सिचाई बुवाई के तुरंत बाद कर देना चाहिए एवं फसल में वर्षा के पूर्व आवशयकता अनुसार 6-7 दिनों के अंतराल से सिचाई करे वर्षा न होतो फसल की स्थिति देखकर सिचाई करनी चाहिए। शीतकाल ऋतू में सिचाई 10- 12 दिन के अंतराल पर करे हल्दी के खेत में 60- 70 % नमी मिटटी में होने पर सिचाई करना उपयुक्त होता हैं।

खुदाई:-

सामान्य हल्दी की फसल 8- 9 महीने बाद खुदाई कर ली जाती हैं अर्थात जब पौधे की पत्तिया पीली पड़ जाती हैं तथा तने के आधार तक सुख जाती हैं तब हल्दी की फसल खुदाई के लायक हो जाती हैं। खुदाई करते समय ध्यान रखें की प्रकन्द न कटे, न छिले और नहीं भूमि में रहे। कटाई खुदाई के समय खेत में नमी न होतो हल्की सिंचाई कर दे प्रकंदो को निकालने के बाद ऊपर की पत्तियों आदि  काटकर अलग कर देते हैं व प्रकंदो को पानी से धोकर साफ कर देते हैं।

उपज:-

हल्दी की उपज भूमि की उर्वरा शक्ति हल्दी की किस्म एवं फसल की देखभाल पर निर्भर करती हैं सामान्य अवस्थां में गीली हल्दी की उपज 200-250 कविंटल/हेक्टेयर तक हो जाती हैं। जो सूखने पर 40- 50 कविंटल बच जाती हैं।

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बीज के लिए हल्दी का संरक्षण:-

बीज के लिए इसको कच्ची अवस्था में ऱखना पड़ता हैं इसके सरक्षण की 2 विधिया हैं

गड्डा बनाकर:-

इस विधि में 2×2 मीटर तथा एक मीटर गहरा गड्डा खोद कर उसके चारो तरफ की दीवार के सहारे हल्दी की सुखी पत्तियों को ढककर इसमें हल्दी की गांठे भर दे। ऊपर की तरफ थोड़ी जगह छोड़कर लकड़ी के पतले तख्ते रखे और उसके ऊपर मिटटी से लेप देवे इस प्रकार गांठे 3- 4 माह तक सुरक्षित रहती हैं।

ढेल लगाकर;-

ढेर विधि में गाठो के ऊपर ढेर लगाकर उन्हें घास फुस से ढककर चारो तरफ मिटटी का लेप लगाकर फिर गोबर से लिप देते हैं। यह विधि अधिक उत्तम नहीं हैं।

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हल्दी की प्रक्रियाकरण (क्योरिंग): हल्दी की क्योरिंग के मुख्य चार चरण होते हैं।

 उबालना अथवा पकाना:-

कंदो को धोने के उपरांत अच्छी तरह उबाला जाता हैं। उबलते समय चुने के पानी अथवा सोडियम कार्बोनेट का उपयोग किया जाता हैं। उबलने की क्रिया लगभग 45- 60 मिंट तक की जाती हैं। ( जब तक झाग आना अथवा एक विशेष प्रकार की गंध आना आरंभ न हो जाये) यह ध्यान रखना चाहिए की हल्दी की घंटे पूर्णतया उबल जाये उबली हुई गाठ अंगुलियों से दबाने पूर्णतया दब जाये तो इसका अर्थ हैं की उबलने की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी हैं। उबलने का कार्य फसल की खुदाई के 2- 3 दिन के अंदर सम्पूर्ण कर लिया जाना चाहिए अच्छी तरह उबलने से हल्दी के सूखने की प्रक्रिया 10- 15 दिन में ही सम्पूर्ण हो जाती हैं तथा कंदो के अंदर के रंग में एक रूपता आ जाती हैं

सुखाना:-

उबली हुई गाठो को बॉस की चटाई आदि पर 5-7 सेमि. मोटी परत बनाकर सुखाया जाता हैं। रात्रि के समय कंदो को इकट्ठा कर लेना चाहिए अथवा तिरपाल से ढक दिया जाना चाहिए धुप की स्थिति तथा गहनता के अनुसार ये कंद 10- 15 दिनों में पूर्णतया (6% तक नमि) सुख जाते हैं।

पॉलिशिंग

सुखी हुई हल्दी को आकर्षक बनाने के लिए पॉलिशिंग की आवशयकता पड़ती हैं। इस कार्य हेतु हस्त चलित अथवा पावर घुमावदार ड्रम की आवशयकता पड़ती हैं, जिसमे गाठों को गुमाने से गांठे आपस में घर्षण करती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप इनकी पॉलॉशिंग की प्रक्रिया पूर्ण होती हैं।

रंगाई:-

हल्दी का अच्छा रंग ग्राहकों को आकर्षित करता है। इसके लिए हल्दी की सुखी गांठी में 2. कि. ग्रा./क्विंटल की दर हल्दी का पाउडर मिलाया जाता है।

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प्रमुख कीट एवं व्याधियाँ:-

थ्रिप्स:-

यह पत्तियों को खुरचकर खाता हैं जिसके कारण पौधे कमजोर हो जाते हैं। इसके नियंत्रण हेतु डाइमिथोएट 30 ई. सी. 10 मिली. को 10 लीटर पानी में मिलकर छिड़काव करे एवं आवशयकतानुसार छिड़काव दोहरावे।

पत्ती धब्बा रोग:-

इस रोग के प्रकोप से पत्तियों पर भूरे तथा पिले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए मेंकोबेज का 0.2% का प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए। आवशयकता पड़ने पर 15 दिनों बाद दवाई का छिड़काव दूसरी बार करना चाहिए।

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