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हरी खाद का जैविक खेती में उपयोग एवं महत्व

हरी खाद
Written by bheru lal gaderi

वर्तमान समय में खेती का यंत्रीकरण होने के कारण पशुपालन कम हो रहा है जिससे गोबर की खाद एवं कम्पोस्ट जैसे कार्बनिक स्रोतों की सीमित आपूर्ति के कारण हरी खाद का प्रयोग करके ही मृदा उर्वरकता एवं उत्पादकता में टिकाऊपन लाया जा सकता है । सघन कृषि पद्धति तथा अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग के कारण वर्तमान में मृदा में पोषक तत्वों की कमी आ रही है इस कारण आज उत्पादन व मृदा स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आ रही है और उपजाऊ भूमि बंजर भूमि परिवर्तित हो रही है। अतः जैविक पदार्थो के उपयोग से ही इन दुष्प्रभावों से बच जा सकता है।

हरी खाद

हरी खाद किसे कहते है

हरे पौधों को उनके वानस्पतिक वृद्धि काल में उपयुक्त समय पर जुताई करके मृदा में दबा देना तथा इस पर हरे पदार्थ से सड़ने के बाद भूमि को पोषक तत्व प्रदान करने को हरी खाद कहते है।

हरी खाद की फसलों की औसत क्षमता
क्रं.सं. फसल बुवाई का समय हरे पदार्थ की मात्रा

टन/हैक्टेयर

प्राप्य नत्रजन

कि.ग्रा./ हैक्टेयर

1. सनई खरीफ 30 100
2. ढैंचा खरीफ 30 120
3. मूँग खरीफ 15 50
4. लोबिया खरीफ 20 90
5. ग्वार खरीफ 25 70
6. ज्वार खरीफ 25 60
7. बरसीम रबी 20 50
8. सेंजी रबी 25 50

 

हरी खाद का मतलब उन पत्तीदार फसलों से है जिनकी वृद्धि शीघ्र व काफी मात्रा में हो। फसल के बड़ी होने पर फूल आने से पहले ही उन्हें जोतकर मिट्टी में दबा दिया जाता है।  यह फसलें मिट्टी में जीवाणुओं से विच्छेदित होकर पौधों के पोषक तत्वों की मात्रा में वृद्धि करती है। शस्य प्रणाली  में इसे “हरी खाद देना” (Green manure) कहते है।

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हरी खाद देने के तरीके

हरी खाद देने के मुख्यतया दो तरीके है जो कि मृदा जलवायु एवं पानी की उपलब्धता पर निर्भर करते है।

हरी खाद की स्थानीय विधि

इस विधि में हरी खाद की फसल को उसी खेत में उगाया जाता है जिसमे हरी खाद देनी है। हरी खाद की फसल का शुद्ध अथवा मिश्रित रूप में मुख्य फसल के साथ उगाते है। फसल को उचित समय में खेत में जोत देते है। इस विधि में सनई, ढैंचा, ग्वार, उड़द, मूँग, लोबिया, बरसीम, लूसर्न, सैंजी आदि फसलों को उगाया जाता है।

हरी पत्तियों की खाद

इस विधि में विशेष कारणवश जब हरी खाद की फसल को उसी खेत में नहीं उगाया जा सकता है तो उसे अन्य खेत में उगाकर फिर उचित समय पर काटकर अन्य खेत में बिखेरकर मिट्टी पलटने वाले हल से मिला दिया जाता है।

हरी खाद की फसल के आवश्यक गुण

  1. शीघ्र व अधिक बढ़वार वाली फसल होनी चाहिए।
  2. फसल खूब पत्तियों व शाखाओं वाली होनी चाहिए ताकि अधिक कार्बनिक पदार्थ मिट्टी में मिलाया जा सके।
  3. फसल की पत्तियाँ व शाखाएँ मुलायम हो ताकि शीघ्र मिट्टी में सड़ सके।
  4. इसकी फसल यदि फलीदार हो तो अधिक अच्छा है। क्योंकि फलीदार फसल की जड़ों में स्थित गांठों में सहजीवी वायुमंडल की नत्रजन को मृदा में स्थिर करते है।
  5.  सस्ते और आसानी से मिलने वाले बीज की फसल बोनी चाहिए।
  6. फसल की जड़ नीचे गहरी जाने वाली हो ताकि मिट्टी भुरभुरी बना सके तथा नीचे के पोषक तत्वों को ऊपर ले आये।
  7. कम उपजाऊ भूमि पर भी आसानी से उगाई जा सके।
  8. फसल कीट व रोग रोधी हो।
  9. फसल चक्र में हरी खाद वाली फसल का उचित स्थान हो।
  10. फसल को कम तैयारी, प्रबंधन व कम देखरेख की आवश्यकता हो।
  11. प्रतिकूल जलवायु परीस्थिति को सहन कर सके।
  12.  फसल को बढ़वार के लिए खाद-उर्वरकों की आवश्यकता न हो।
  13.  फसल मिट्टी में विघटन पश्चात् अधिक उपयोगी अवशेष छोड़े।
  14. हरी खाद के साथ-साथ फसल के अन्य उपयोग भी हो।                                                                                                                     You may like also – Career in Indian Agriculture field

हरी खाद में प्रयुक्त होने वाली फसलें

हरी खाद के लिए प्रयोग होने वाली फसलों को दो मुख्य भागो में विभाजित किया जा सकता है।

  1. फलीदार फसलें

  2. बिना फलीदार फसलें

फलीदार फसलें

सनई

अच्छे जलनिकास वाली बलुई या दुमट मृदाओं के लिए यह उत्तम हरी खाद की फसल है। इसकी बुवाई मध्य मई से जुलाई तक वर्षा प्रारम्भ होने पर या सिंचाई करके की जा सकती है। इसकी बीज दर 90 किलो/ हैक्टेयर तथा मिश्रित फसल के रूप में 40 किलो/हैक्टेयर तक रखते है। बिवाई के 4-45 दिनों के बाद इसे हरी खाद हेतु हकाई कर पलट देते है।

ढैंचा

इसे सभी प्रकार की जलवायु व मृदा की दशाओं में उगाया जा सकता  है। यह सूखा सहन करने वाली फसल है। इसे उसर मर्दा सुधर हेतु भी हरी खाद के रूप में उगाया जाता है। इसकी बढ़वार अत्यधिक तेजगति से होती है। इसे 45 दिनों के बाद खेत में पलट कर दबा देते है।

ग्वार

यह खरीफ में बोई जाने वाली मुसला जड़ वाली फसल है।  इसे कम वर्षा व बलुई मिट्टी में भी आसानी से उगाया जा सकता है। इसकी बीज दर 25 किलो/हैक्टेयर तक रखते है।

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मुंग व उड़द

ये दोनों दलहनी फैसले है जिन्हें अच्छे जल निकास वाली हलकी बलुई या दोमट मिट्टी में खरीफ या जायद में उगाया जा सकता है। इसकी फलियाँ पकने की अवस्था तक पत्तियाँ व तने हरे व मुलायम बने रहते है। इसलिए फलियां तोड़ने के साथ ही बीज दर 20 किलो/हेक्टेयर तक रखते हैं। ये अपेक्षाकृत कम हरा पदार्थ मिट्टी में छोड़ती हैं।

लोबिया

रबी तथा खरीफ दोनों में इसकी अच्छी बढ़वार होने के कारण हरी खाद के लिए यह काफी महत्वपूर्ण फसल हैं। इसे मुख्यतया हरे चारें व आंशिक रूप से हरी खाद के लिए उगाया जाता हैं। यह बहुत ही मुलायम होती हैं जिसे अच्छे जलनिकास वाली बलुई दूमट मिट्टियों में उगाया जाता हैं। ऊसर मृदाओं के लिए यह अनुपयुक्त हैं। इसकी बीज दर 35 किलो/हेक्टेयर तक रख सकते हैं। इन सभी के अलावा मोठ, बरसीम, कुल्थी, जंगली नील, सैंजी, खेसारी, मटर आदि भी हरी खाद के लिए उगाई जाती हैं।

बिना फलीदार फसलें

इस खाद के लिए बिना फलीदार फसलें बहुत कम उगाई जाती हैं। ये मिट्टी में नत्रजन स्थिरीकरण नहीं करती पर घुलनशील नत्रजन का संरक्षण अवशय करती हैं। हरी खाद मृदा में जीवांश की मात्रा बढाकर मिट्टी कई दशा में सुधार करती हैं। हरी खाद के लिए बिना फली वाली फसलों में जई, सरसों, तोरिया, सूरजमुखी, ज्वार, शलजम, मक्का, भांग, बाजरा, को कुछ क्षेत्रों में उगाया जाता हैं। हरी खाद के लिए फसल का चुनाव उस स्थान की जलवायु, भूमि की दशा, बुवाई का समय, पलटाई का समय व अवस्था, हरी पलटाई के मुख्य फसल बुवाई के बिच का समय अन्तर आदि बातों पर निर्भर करता हैं।

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हरी खाद की फसल की पलटाई की अवस्था

एक विशेष अवस्था पर पलटाई से जमीन को अधिक जीवांश व नत्रजन प्राप्त होते हैं। यह एक विशेष अवस्था हैं जब फसल हरी व कुछ अपरिपक्व हो और उसमे फूल निकलने शुरू हो गए हो। उसके तने, शखाऍ, पत्ते हरे, कोमल व सरस हो। इस अवस्था में हरी खाद की फसल अवस्था में रस युक्त कार्बनिक पदार्थों की मात्रा सबसे अधिक व कार्बन- नत्रजन अनुपात बहुत कम रहता हैं। इस अवस्था में मिट्टी में दबाने से विघटन जल्दी होता हैं। इसमें अधिक प्रौढ़ अवस्था होने पर फसल कठोर  हो जाती हैं तथा विघटन में भी अधिक समय लगता हैं इसके बाद वाली फल को पोषक तत्वों का लाभ नहीं मिल पाता हें। प्रौढ़ फसल भूमि से पोषक तत्व व पानी भी अधिक मात्रा में खींच लेती हैं।

हरी खाद को पलटने की विधि व गहराई

खेत में खड़ी हरी खाद की फसल को पाटा लगाकर सही समय पर  गिरा देते हैं फिर मिट्टी पलटने वाले हल या ट्रेक्टर हल से जोतकर दबाया जाता हैं क्योंकि इन मिट्टियों में फसल को कम गहराई तक ही दबाया जाना चाहियें। मुलायम तने वाली फसल अधिक गहराई तक दबाने पर भी सड़ जाती हैं पर कठोर तनों- शाखाओ वाली फसल को कम गहराई तक ही दबाना चाहियें। दबाई हुई फसल ४-६ सप्ताह  में सड़ जाती हैं। फसल सड़ने के लिए मिटटी में अच्छी नमी होना आवश्यक हैं। साधारणतया एक माह बाद दूसरी पलटाई मिट्टी पलटने वाले हल से करते हैं ताकि निचे का पदार्थ ऊपर व ऊपर का पदार्थ निचे जा सके। वर्षा न होतो नमी के लिए सिंचाई करनी चाहियें। दूसरी पलटाई के बाद देशी हल से जुताई करनी चाहियें ताकि हरी खाद सड़कर मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाये।

हरी खाद की फसल को मिट्टी में दबाने के बाद सड़ने तक कई कारक काम करते हैं। इसके लिए मिट्टी के उचित तापक्रम 30- 40 डिग्री पर जीवाणु अधिक क्रियाशील होते हैं, जीवाणुओं के लिए ऑक्सीजन हेतु अच्छा वायु संचार, गर्म व नम जलवायु में विच्छेद तेजी से होता हैं उपजाऊ मिट्टी व चुने की उपस्थिति में सड़न क्रिया तीव्र होती हैं। नरम व सरस हरे पौधे जिनमे कार्बन नत्रजन अनुपात कम होता हैं जल्दी सड़ते हैं।

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हरी खाद के लाभ

  • इसके प्रयोग से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि होती हैं।
  • प्राप्य नत्रजन की मात्रा बढ़ती हैं।
  • गहरी जड़ वाली हरी खाद की फसले निचे वाले भू स्तर से पोषक तत्वों का शोषण करती हैं जो सड़ने के बाद मिट्टी की ऊपरी परत में फसल द्वारा छोड़ दिए जाते हैं।
  • मिट्टी की संरचना सुधरती है।
  • भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती हैं।
  • मृदा में वायु का आवागमन अच्छा होता हैं।
  • भूमि से मृदा जल वाष्पीकरण को रोकती हैं।
  • मिट्टी में सड़ने पर अम्लीयता बढाती हैं।
  • पोषक तत्वों की मात्रा बढाती हैं।
  • हरी खाद की फसल मिट्टी को ढके रखती हैं जिससे वायु व जल कटाव से बचाव होता हैं।
  • अम्लीय मृदा में हरी खाद की फसले जोतने से उनका पी.एच. मान बढ़ता हैं तथा ऊसर मृदा में पी.एच. मान कम होता हैं।
  • शीघ्र बढ़ने वाली फसल होने के कारण खरपतवारों की वृद्धि कम करती हैं।
  • मृदा तापक्रम बनाए रखती हैं।
  • घुलनशील पोषक तत्वों का मृदा के निचली सतह से बहकर जाना कम होता हैं।
  • हरी खाद होने से उर्वरकों की कम आवश्यकता होती हैं।

हरी खाद से हानि

यदि  हरी खाद उचित ढंग से न दी गई हो तथा मौसम प्रतिकूल हो तो हानिकारक परिणाम सामने आते हैं।

  • वर्षा पर निर्भर रहने वाले क्षेत्रों में वर्षा यदि काफी कम रही होतो हरी खाद का मिट्टी में पूरा विछेदन नहीं हो सकेगा। अगली फसल भी ठीक से उग नहीं सकेगी।
  • कभी- कभी हरी खाद की फसल में हानिकारक कीट- व्याधि पनप जाती हैं। जो अगली मुख्य फसल पर आक्रमण की सम्भावना बढ़ा देते हैं।
  • हरी खाद बोने से खरीफ की फसल नहीं ली जा सकती हैं जो आर्थिक रूप से अलाभप्रद होता हैं।
  • इससे प्राप्त नत्रजन का इकाई मूल्य उर्वरक द्वारा दी गई नत्रजन के इकाई मूल्य से अधिक होता हैं।
  • बीज, बुवाई, पलटाई आदि के प्रबंधन खर्चा व समय की आवश्यकता होती हैं।                                                                                 You may like also- कद्दूवर्गीय सब्जियों में कीट एवं रोग नियंत्रण
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