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हरिमन शर्मा किसान वैज्ञानिक उनकी कहानी उनकी जुबानी

हरिमन शर्मा किसान वैज्ञानिक
Written by bheru lal gaderi

तपती धरती पर सेब उत्पादन के लिए तैयार किया पौधा

हिमाचलप्रदेश के बिलासपुर जिले की घुमारवीं तहसील के गांव- गलासी (डाकघर- दाभला) में मेरा(हरिमन शर्मा) जन्म 4 अप्रेल, 1956  को हुआ। पिता दयाराम जी की लघु कृषक थे। जन्म के तीसरे दिन माँ नहीं रही। अगले दिन घुमारवीं तहसील के ही गांव – पनियाला (डाकघर – कोठी) के रिडकुराम जी ने गोद ले लिया। उनके तीन लड़किया थी। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसलिए दसवीं कक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर पढ़ाई छोड़ दी।

हरिमन शर्मा किसान वैज्ञानिक

पंद्रह वर्ष की आयु में 1971  में वन विभाग में मजदूरी करने लगा। सत्रह का ही था मेरा(हरिमन शर्मा) विवाह हो गया कमला देवी से। दिहाड़ी 4 रूपये 25  पैसे। 1982  में मजदूरी छोड़ पत्थर तोडना शुरू किया। यह काम 1990  तक परिवार का पेट पालने के लिए चलता रहा। इस बिच 1973  से 1983  के बिच दो लड़को और दो लड़कियों का जन्म हुआ। जैसे-तैसे सबकी शादी 2005  तक कर दी। छोटा लड़का सुनील चंडीगढ़ में ट्रेक- महिंद्रा में नेटवर्क इंजिनियर हैं। बड़े लड़के पवन की खाद बीज की दुकान हैं। खेती के काम में भी हाथ बंटाता हैं।

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खेती की और

बुजुर्गों के समय पथरीली जमीन थी। इस पर गेहू, मक्की की फसल लेते थे।  कुल 21  बीघा 20  बिस्वा जमीन। 80% पत्थर, 20% मिट्टी। सिंचाई का कोई साधन नहीं। 1990  में पत्थर तोड़ते बाजु टूट गई। आय का कोई साधन बच नहीं। इसलिए नगदी फसल लेने की सोची। वर्षा के जल संग्रहण के लिए एक बड़ा टेंक बनवाया। 1992  में कृषि विभाग के सहयोग से हिमाचल प्रदेश का पहला पोली हॉउस बनवाया। उसमे मौसमी पनीरी पौध ले पॉलीथिन बेग में बेचनी शुरू की। 1996  में एक बीघा क्षेत्र में टमाटर लगाया। 42  हजार की कमाई हुई। बड़ी संख्या में लोग टमाटर की फसल देखने आते। मिडिया में खूब चर्चा हुई। 1997  में आम का बगीचा लगाया। नर्सरी आम का लाइसेंस लिया।

हरिमन शर्मा का सेब में नवाचार

1999 में एक बीज से सेब का पौधा तैयार किया। पहले प्लम की ग्राफ्टिंग की। सफलता के बाद सेब की पौध (पाला) पर ग्राफ्टिंग की। आकार, गुणवत्ता और स्वाद में पूरी तरह परम्परागत सेब की तरह। किसी ने नहीं सोचा था की बर्फीली पहाड़ियों पर तैयार होने साला सेब निचले हिमाचल प्रदेश में आम और अनार के साथ पैदा हो सकता हैं। यह जगह समुद्र तल से 700 मीटर ऊँचा था। तापमान 40 से 46 डिग्री होता हैं। हिमाचल प्रदेश सरकार में 1965 में इसके लिए सरमोर में नाहन के पास अनुसंधान केंद्र बनाया। सफलता नहीं मिलने पर 1975 में यह परियोजना बंद कर दी गई।

हरिमन शर्मा किसान वैज्ञानिक

हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्रों की तपती धरती पर अत्यधिक कोहरा पड़ता है। 2006 में पूरी सफलता मिलने पर नर्सरी तैयार ताल आम जनता को पौधे देने लगा।

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भारतीय अनुसन्धान संस्थान (अमरतारा, शिमला), डॉ वाई. एस. परमार उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय (सोलन) और अनुसन्धान केंद्र मशोबरा व भोटा (हमीरपुर) ने इस पर शोध किया। मेरी(हरिमन शर्मा) सेब वेराइटी को भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान (अमरतारा, शिमला) ने निचले हिमाचल प्रदेश के लिए अनुमोदित किया।

अब तक लगाए पौधे _HRMN-99

निजी पहल से सात गर्म जिलों बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा, उन्ना, मंडी और सोलन में अभी तक 1 लाख 90 हजार पौधे रोपित करवाये। 6 हजार किसानों ने इसे अपनाया। 2014-15 में 50 पौधे राष्ट्रपति  भवन में लगाये। वहां पर मेरे सेब जाते है। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी अपने चुनाव क्षेत्र पीलीभीत में मेरे द्वारा विकसित किस्म “एचआरएमएन – 99” की ब्रांड एम्बेसडर है। दो वर्षों में इन. आई. एफ. ने 29 राज्यों में 8 हजार पौधे लगवाए। कर्नाटक के बेंगलुरु और बेलग्राम, हरियाणा के सिरसा, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, मणिपुर आदि के साथ, विदेश में जर्मनी तक फल दे रहे है। देश में  सवा दो लाख सेब के पौधे लगवाये। हजारों किसान और विशेषज्ञ मेरा फार्म देख चुके है।

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इस मांग का कारण यह हैं की परम्परागत सेब जुलाई से सितम्बर तक मिलता हैं, जबकि गर्म इलाके में मेरा(हरिमन शर्मा) सेब जून में तैयार हो जाता हैं। सलिए दाम अच्छे मिलते हैं। निचे पहाड़ी क्षेत्रों और 29 प्रदेशों में जहां सेब का पौधा नहीं होता था, किसानों कृषि वैविध्य का अच्छा मौका मिलता हैं। देश के सभी गर्म खेत्रों को में सेब युक्त बनाना चाहता हु।

कॉफी के पौधे

2009 में कृषि- भ्रमण के लिए गोवा गया तो वहां से नारियल, काजू, सुपारी और कॉफी के दो पौधे बच गये। इस बार 6-7 की.ग्रा. बीज (फल) लगे। अर्थात हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में भी कॉफी पैदा हो सकती हैं। इसमें जुटा हुं।

कोहरे से बचाने की तकनीक

हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा आदि में सर्दी के मौसम में अत्यधिक कोहरे से बड़े-बड़े पेड़ नष्ट हो जाते हैं। विशेषज्ञ रोजाना रात को बचाव हेतु ऐसे बगीचों में घास फुस जलाने को कहते थे। इतनी घास फुस होती नहीं। मेने(हरिमन शर्मा) स्थाई समाधान निकाला। कोहरा रात को तीन बजे बाद ही होता हैं। फव्वारा सिंचाई पर 80% अनुदान हैं।

फव्वारा सिंचाई से पौधों को बचाया जा सकता हैं। मेने आम के एक छोटे पौधे पर छोटे-छोटे फव्वारे फ़ीट किये। रात तीन बजे दो मिनट के लिए चलाया। आम के सारे पौधे गीले हो गये। कोहरा गीली वस्तु पर नहीं जमता। दुबारा सुबह दो मिनट फव्वारों को चलाया। अगर कही मामूली सा असर पौधों पर पड़ा तो साफ हो गया। इसके लिए विद्द्युत मोटर स्टार्टर में ‘टाइमर’ का उपयोग कर सकते हैं, जिससे सुबह नींद खराब नहीं हो।

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हरिमन शर्मा ने बनाया छोटा ट्रैक्टर

हिमाचल परेश के पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे-छोटे खेत हैं। 3% किसानों के पास भी बेल  ही। ट्रेक्टर उतारने के लिए एक खेत की दीवार (डंगा) तोड़ते हैं तो ननीचले खेत से ऊपर खेत को जाने के लिए तैयारी में 8-10 फ़ीट खेत बर्बाद। ऊपर भी डंगे की दीवार 5-10 फ़ीट जगह रोक लेती हैं। बरसात का पानी वहां से मिट्टी बहाकर ले जाता हैं। बागवानी अपनाने वाले किसान भी परेशान हैं।

समाधान के लिए मेने(हरिमन शर्मा) 46 किलो वजन का छोटा ट्रेक्टर बनाया, जिसे दो व्यक्ति आसानी से एक दूसरे के खेत में ले जा सकते हैं। चौड़ाई दो फ़ीट। इसमें 18 हल हैं। अगर एक फ़ीट खेत्र में बुवाई करनी हो या पौधों के तौलिए बनाने हो तो इससे छः हल खुल जाते हैं। 2 से 3 फ़ीट लम्बाई पर इसके छः हल आसानी से खुल जाते हैं। ऊपर निचे का सिस्टम लगाया गया हैं।

एक बार गहरी खुदाई के बाद बीज बोन के लिए हां के बजाए रोटावेक्टर लगाए गए हैं। समान्य ट्रेक्टर एक तरफ ही हल से खुदाई करता हैं। वापसी में बिनाई जुताई हल, ऊपर उस खेत के दूसरे छोर पर आता हैं। मगर हमारा हल मात्रा एक फ़ीट में गुम जाता हैं। दोनों तरफ जुताई करता हैं। हमारे यहां सभी किसानों को एक साथ बीज बिजना होता हैं। इसमें यह सहायक रहा। इसकी लागत 70-75 हजार रूपये हैं। आसानी से ख़रीदा जा सकता हैं।

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बिना अतिरिक्त ईंधन गर्म जल

हमारे घर में आठ सदस्य हैं। मेहमान भी आते हैं। सुबह-सुबह ही पर्याप्त गर्म पानी चाहिए। बिजली महंगी। समस्या के निदान के लिए मेने ऐसी तकनीक बनाई की बिना अतिरिक्त ईंधन गर्म जल और खाना बनाने में ईंधन काम खर्च होना।

जहां मिट्टी कंकड़ आदि भरते हैं, वहां मेने लोहे की 22 गेज की चादर का बॉक्स बनवाया। इसे 20 से 100 लीटर की उपलब्ध जगह पर जरूरत के अनुसार बना सकते हैं। बॉक्स के साथ डेढ़ इंच x डेढ़ इंच की जाली लगा दी। बॉक्स और जाली के बिच रेट भर, गीली मिट्टी की परत चढ़ा दी। दाहिनी तरह पानी की टंकी और दूसरी तरह बाई और बॉक्स से ही बाथरूम तक आधा इंच की जी.आई. पाइप सीधी ऊपर लगा दी।

जैसे ही खाने, चाय के लिए ईंधन जलाया जाएगा, बॉक्स का पानी गर्म होकर बाथरूम के नल में चला जाएगा। जितना जल निकालेंगे, उतना ही जल्दी दाहिनी और बॉक्स में आता रहेगा। खाने, चाय आदि के साथ बिना अतिरिक्त ईंधन या समय के नहाने और अन्य सभी जरूरतों के लिए गर्म जल मुहैया। बिजली की बचत होगी, बिजली का बिल घटेगा।

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पतलो- दोनों से तुरत फुरत मुक्ति

शादी-समारोहों में पतलो-दोने गंदगी फैलाते हैं। समाधान निकाला। समारोह स्थल या बस्ती से दो फलांग दुरी पर तारकोल या खली द्राम रख देते हैं। उसमे भूमि की सतह से एक फ़ीट ऊपर हवा निकालने के लिए 2-3 सुराख़ करते हैं। उसमे 2-3 मोटी लकडिया जला देते हैं। किसी समारोह में पतल-दोने एक ही स्थान पर एकत्रित नहीं होते। जैसे-जैसे लोग खाना खाते हैं, उनके द्वारा उपयुक्त पतल-दोने ड्रम में डालते रहते हैं। ये नष्ट हो जाते हैं, गंदगी नहीं फैलती। घर में रोजाना के कूड़े-कचरे को नष्ट करने के लिए इसे अपनाया जा सकता हैं।

दर्जनों सम्मान

हरिमन शर्मा को निरंतर मिल रहे सम्मान। हिमाचल प्रदेश में 2008 की 15 अगस्त को  ‘राजस्तरीय उत्कृष्ट पुरस्कार’ और 2009 में ‘प्रेरणास्त्रोत सम्मान’ मिला। ‘कृषि पंडित’ सम्मान मिला। 2011 में ऊना में सफल सेब उत्पादन के लिए सम्मानित किया गया। 2016 में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल ने सेब उत्पादन के लिए सम्मानित किया। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिहं ने दिल्ली में आईसीएआर पूसा संस्थान में 21 मार्च, 2016 को सम्मानित किया।

हिमाचल पदेश में डॉ.वाई.एस. परमार विश्वविद्यालय, अनेक सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं एवं संगठनों में सदस्य और पदाधिकारी बनाया।

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कर्मशील बने

देश, समाज, खुद को आगे बढ़ाने के लिए कर्मशील हो। मंजिल पाने के लिए सतत् प्रयत्नशील होना चाहिए। असफलता को चुनौती समझ, कमी तलाश, बेहतर कोशिश करें। बिना कुछ किये जग में जय-जयकार नहीं होती।

मेने नवचारों को साझा करने के लिए, सम्पर्क कर सकते हैं-

हरिमन शर्मा, पनियाला,

डाकघर- कोठी, तहसील -घुमारवीं-174021,

जिला- बिलासपुर (हिमाचल प्रदेश),

ईमेल- sharmaharimanfarm@gmail. Com

मोबाईल-9418876209, 9817284251

Author:-

डॉ. महेंद्र मधुप

स्रोत :-
शरद कृषि पत्रिका

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