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किसानों के चेहरे पर रंग लाई स्ट्रॉबेरी की खेती

स्ट्राबेरी
Written by bheru lal gaderi

ठंडे क्षेत्रों में होने वाली स्ट्रॉबेरी(Strawberry) झालावाड़ की किसानों को रास आ रही है। जिले के करीब एक दर्जन किसानों ने स्ट्रॉबेरी की खेती में रुचि दिखाई और उन्हें इस की पैदावार में भी सफलता मिल रही है। करीब एक लाख पौधों से होने वाले फल उत्पादन से किसानों की आर्थिक स्थिति भी सुधर रही हैं।

स्ट्राबेरी

  • एक लाख पौधों से लाखों रुपए की कमाई।
  • झालावाड़ के काश्तकारों को मिली सफलता।
  • कोटा कृषि विश्वविद्यालय के उद्यान कॉलेज ने किया था शोध।
  • 200 रु. किलो तक भाव।

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स्ट्रॉबेरी की खेती

स्ट्रॉबेरी की खेती भंडारण और परिवहन में काफी सावधानी की जरूरत होती है। इसके बावजूद जिले के किसानों का रुझान स्ट्रॉबेरी की खेती की ओर बढ़ रहा है। खेती में अच्छा मुनाफ़ा मिलने और जिले के अनुकूल जलवायु इसके कारण है। बालमुकुंद दांगी बताते हैं कि उन्होंने स्ट्रॉबेरी के 2500 पौधे लगाए जिस में अच्छे मीठे फल आए हैं।

किसान मनमीत सिंह बताते हैं कि स्ट्रॉबेरी का एक पौधा 10 से 15 रूपये का पड़ता है। वह पूना नर्सरी से 70 हजार पौधे लेकर आए थे। करीब 10000 पौधे परिवहन में खराब हो गए। उन्होंने इसकी विंटर डॉन किस्म 14 बीघा में लगा रखी है। रोजाना करीब 1 क्विंटल फूल का उत्पादन हो रहा है। शुरुआत में 200 रूपये प्रति किलो के भाव मिल रहे हैं। हालांकि पूरा खर्चा निकलने के बाद अप्रैल में ही पता चलेगा कि उन्हें कितना लाभ हुआ है।

इनका कहना

झालावाड़ जिले में स्ट्राबेरी की फसल किसानों के लिए बहुत ही फायदेमंद साबित हो सकती हैं। जिले में किसानों ने 100000 पौधे लगाए हैं और पैदावार ले रहे हैं। किसानों को संतरे के बगीचे में अंतराशस्य फसल प्रणाली से स्ट्रॉबेरी की फसल लेनी चाहिए। प्रोजेक्ट के परिणामों से प्रेरित होकर प्रथम वर्ष में 10 किसानों के खेतों पर 2500-2500 पौधे लगाए गए हैं, जिसके अच्छे परिणाम आ रहे हैं।

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डॉ. आईबी मौर्य ,प्रोफेसर

उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय,

कृषि विश्वविद्यालय

कोटा (राज.)

चुनौतियों को भी कर रहे  दरकिनार

बेहतर पैदावार के बावजूद स्ट्रॉबेरी ले रहे किसानों के सामने कई तरह की चुनौतियां आ रही हैं। किसानों का कहना है कि खराब सड़कों से ले जाते समय फुल को नुकसान पहुंचता है। इसे जयपुर जोधपुर आदि स्थानों पर बिक्री के लिए भेजते हैं। नाजुक फल होने के कारण इसकी अच्छे से पैकिंग करनी पड़ती है। जिले में पैदावार कम है इसलिए परिवहन महंगा भी पढ़ रहा है। इसके लिए बाजार भी  आसानी से नहीं मिलता और भंडारण की माकूल व्यवस्था नहीं होने से इसके खराब होने का डर बना रहता है।

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अनुसंधान कर तलाशी संभावनाएं

जिले में स्ट्राबेरी उत्पादन की संभावनाएं तलाशने के लिए कोटा कृषि विश्वविद्यालय के उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय की ओर से शोध किया गया था। इसमें पाया गया था कि जिले के वातावरण के अनुसार यहां स्ट्रॉबेरी की किस्म विंटर डॉन उगाई जा सकती हैं। जिस की खेती खुले खेत में भी की जा सकती हैं।

ऐसे होती है स्ट्रॉबेरी की खेती

स्ट्रॉबेरी की फसल ड्रिप मल्चिंग तकनीक पर ली जाती है, इसके रोपाई सितंबर अक्टुम्बर में की जाती है। जिसकी पैदावार 15 दिसंबर से मार्च के अंत तक मिलती हैं। इसके लिए न्यूनतम 10 डिग्री के आसपास तापमान चाहिए होता है तभी इस में फल आप आते हैं। जिले में सर्दी के मौसम में 10 डिग्री के मध्य तापमान रहता है यहां आसानी से स्ट्रॉबेरी की पैदावार ली जा सकती है।

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लेखक:-

हरिसिंग गुर्जर पत्रकार

झालावाड़

स्रोत:-

एग्रोटेक

राजस्थान पत्रिका

 

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