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स्टीविया की उन्नत खेती और उत्पादन तकनीक

स्टीविया
Written by bheru lal gaderi

स्टीविया एक औषधीय पौधा हैं। बाजार में खूब मांग के कारण किसान इसे उगाकर धनार्जन कर सकते हैं, लेकिन कैसे?

स्टीविया एक अत्यधिक मिठास युक्त बहुवर्षीय कोमल पौधा हैं। यह मीठे का एक अति उत्तम विकल्प माना जाता हैं। विशेषतः मधुमेह के रोगियों के लिए इसकी पत्तियों में सामान्य (टेबल शुगर) से 250 गुना ज्यादा मीठापन होता हैं तथा सुक्रोज से 300 गुना वाले पदार्थ जैसे सेक्रीन, सम्पाटर्म, एम्पाटर्म, एसलफोम इत्यादि का यह एक बेहतर विकल्प हैं। इसका वानस्पतिक नाम स्टीविया रिबर्डियाना हैं जो की एस्ट्रेसी कुल का सदस्य हैं।

औषधीय उपयोग

स्टीविया (medicinal-properties-of-stivea) से प्राप्त स्टीवियोसाइड व रूबर्डियोसाइड दूसरे कम कैलोरी वाले मिठास के विपरीत 100 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान तथा 3-9 पी.एच. तक स्थिर रहता हैं। यह कैलोरी रहित मीठा हैं और इसका किण्वन नहीं होता हैं। स्टीविया का उपयोग व्यापक स्तर पर च्विंगम, टूथपेस्ट, माउथवॉश, धूम्रपान प्रतिरोधक टिकियों आदि के रूप में अन्य मीठे कारकों एवं स्वाद पेय के उपयोग में लाया जा रहा हैं। जापान, चीन, कोरिया, इजराइल, ब्राजील और पैरागुआ जैसे देशों में स्टीवियोसाइड का उपयोग विभिन्न आहारों, पेय पदार्थों जैसे कॉफी, चाय, दूध आदि में मिठास के रूप में किया जाता हैं। इसमें जीवाणु रोधी गुण पाए जाते हैं तथा इसके अनेक औषधीय उपयोग भी हैं। ह्रदय रोग सम्बन्धी समस्याओं के लिए इसे उपयोगी पाया गया हैं। यह शक़्कर के लिए बहुत ही लाभकारी हैं क्योंकि यह शरीर के शर्करा स्तर को चीनी के समान प्रभावित नहीं करता हैं।

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रासायनिक संगठन

इसमें दो मुख्य ग्लाइकोसाइड स्टीवियोसाईड 3-12 डी.से. तथा रिबोडियोसाइड-1 एक पाए जाते हैं जिसमे इंसुलिन संतुलन के गुण पाए जाते हैं। स्टीवियोसाइड क्लोरी रहित, खमिकीकरण रहित और वसा रहित मीठा योगिक हैं जो की 200 डिग्री सेंटीग्रेट तक के तापमान को सहन कर सकता हैं।

जलवायु एवं मृदा

स्टीविया को उष्ण कटिबंधीय शिवालिक क्षेत्रों एवं हिमालय की तलहटियों में और मध्य भारत के मैदानी शीतोष्ण क्षेत्रों में बहुवर्षीय फसल के रूप में उगाया जा सकता हैं। उत्तर एवं मध्य भारत में ग्रीष्म ऋतू का अधिक तापमान एवं गर्म हवाये इसकी वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। स्टीविया एक लघु दिवसीय पौधा हैं। लम्बे दिनों के कारण इसके पत्तों में मिठास की सांद्रता बढ़ जाती हैं। फसल की वृद्धिकाल के दौरान औसत तापमान 10-35 डिग्री सेंटीग्रेट तक होना चाहिए। इस फसल के लिए औसतन वार्षिक 1200-1400 मि.मि. तक उत्तम होती हैं। 65-80% तक की आर्द्रता होने पर फसल का विकास अच्छा होता हैं। स्टीविया की फसल वर्षा को सहन कर लेती हैं। लेकिन उच्चित जल निकास आवश्यक हैं। कृषिकरण अनुभवों के अनुसार स्टीविया फसल पर पाले का दुष्प्रभाव पड़ने के बावजूद बसंत के मौसम में पुनः नये कल्ले अंकुरित हो जाते हैं।

स्टीविया को सभीप्रकार की मिट्टी जैसे लाल दोमट और रेतीली मिट्टी में भी आसानी से उगाया जा सकता हैं, परन्तु रेतीली दोमट नम दोमट मिट्टी का पि.एच. 6.5-7.5 तक हो एवं पानी निकास की उचित व्यवस्था अत्यावश्यक हैं। क्षारीय भूमियों में इसकी खेती सफल नहीं हैं। यह जलभराव के प्रति भी अत्यधिक संवेदनशील हैं। अतः दलहनी भूमि में यह नहीं पनपता हैं।

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खेती की तैयारी

स्टीविया की फसल को कम से कम पांच वर्षों तक खेत में रखना होता हैं। अतः खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक हैं। इसके लिए सर्वप्रथम दो बार आदि तिरछी गहरी जुताई करके खेत में पर्याप्त मात्रा में 8 से 10 ट्रॉली गोबर अथवा कम्पोस्ट खाद मिले जाती हैं।

प्रबंधन

स्टीविया का प्रवर्धन बीज द्वारा किया जा सकता हैं साथ ही उत्तक संवर्धन द्वारा भी इसकी पौध प्राप्त की सकती हैं।

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पौधशाला तैयार करना

बीज द्वारा इसका पुर्नउत्पादन बहुत कम होता हैं। नर्सरी उत्पादन के लिए, बीजों को प्लास्टिक-ट्रे या 2-3 क्यारियां बनाकर फरवरी-मार्च में बो देना चाहिए। बीजों का अंकुरण 10 दिन में प्रारम्भ हो जाता हैं। पौधशाला को खुली धुप वाले स्थान पर नहीं बनाया जाना चाहिए। कायिक परवर्धन के अंतर्गत, मातृ पौधों की 10-2सेमी. और 4-5 गाठों वाली कलमों को वर्षा ऋतू के आरम्भ में तैयार क्यारियों में लगा देना चाहिए। एक बात विशेष ध्यान रखी जाए की कलमों का आधा भाग मिटटी के अंदर हो एवं निचे के पत्तों को हटा देना चाहिए। पौधशाला का स्थान अंशिक छायादार एवं उच्च आर्द्रता 70-80% होनी चाहिए। कलमों में 10-15 दिनों में जड़ें निकलने लगती हैं। इन पौधों को करीब 12 दिनों तक फव्वारें से सिंचाई करनी चाहिए तत्पश्चात सप्ताह में 2-3 बार सिंचाई करनी चाहिए।

रोपण

45-60 दिनों पुरानी पौध या जड़युक्त कलमों को तैयार खेत में रोपित कर देना चाहिए। सामान्यतः स्टीविया का रोपण कार्य गर्मी एवं शीतकाल में बचाव करके मार्च-अप्रेल और जुलाई-अगस्त में करना चाहिए। रोपण कार्य से पूर्व खेत को अच्छी तरह से जोतकर तैयार कर लेना चाहिए। खेत में सिंचाई एवं जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए। उच्च और मध्य उपजाऊ भूमि क्रमशः 45×45 से.मी. और 45×30से.मी. दुरी पर रोपित करना चाहिए। इस प्रकार एक हेक्टेयर खेत में 50 हजार पौध लगाये जा सकते हैं।

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खाद और उर्वरक

स्टीविया मध्यम स्तर का पोषक ग्राही पौधा हैं। इसकी अच्छी फसल के लिए 8-10 टन गोबर की अच्छी पकी हुई खाद प्रति एकड़ की दर से खेतों में तैयारी के समय मिलानी चाहिए।

सिंचाई

स्टीविया की फसल सूखे को सहन नहीं कर सकती हैं अतः आवश्यकतानुसार इसकी सिंचाई करते रहना चाहिए। पहली सिंचाई रोपण के तुरंत बाद तथा दूसरी सिंचाई3-4 दिन बाद कर देनी चाहिए। सिंचाई की संख्या भूमि के प्रकार एवं वर्षा पर निर्भर करती हैं।

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निराई-गुड़ाई

स्टीविया की फसल को खरपतवार रहित रखना चाहिए। रोपण के 1 माह बाद पहली निराई की जाती हैं। तत्पश्चात आवश्यकतानुसार 15दिवस से 1 माह के अंदर खेत को खरपतवार से मुक्त करने के लिए निराई की जानी चाहिये। जैविक मल्चिंग को खरपतवार के अंकुरण एवं वृद्धि को नियंत्रित करने में सहायता मिलती हैं।

रोपण एवं निदान

इस पौध में रोग प्रतिरक्षण के गुण भी पाए जाते हैं। इस प्रकार सामान्यतया कोई रोग नहीं लगता हैं परन्तु कभी-कभी बोरोन की कमी से पत्तियों पर धब्बे हो जाते हैं जिसे 6% बोरेक्स का छिड़काव कर दूर किया जा सकता हैं।

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फसल कटाई

स्टीविया की फसल रोपण के तीन महीने पश्चात जून-जुलाई माह में पहली के लिए तैयार हो जाती हैं। इसकी कटाई तने को जमीन से 12-15से.मी. ऊपर तक हिस्सा छोड़ते हुए की जाती हैं जिससे की छोटे हिस्से से पुर्नउत्पादन हो सके। इसके पश्चात् 60-70 दिनों में फसल पुनः कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं यदि कृषकों को स्टीविया की एक ही कटाई लेनी हो तो 4-5 माह बाद पुष्पन कल से पूर्व सितम्बर माह के प्रथम सप्ताह में करनी चाहिए। इस समय पत्तियों में अधिकतम मिठास होती हैं। स्टीविया बहुवर्षीय फसल होने के कारण4-5 वर्षों तक उत्पादकता में रहती हैं।

इस फसल से अधिकतम उपज तीसरे एवं चौथे वर्ष में ली जाती हैं। एक वर्ष में इस प्रकार कम से कम 3 बार फसल की कटाई की जा सकती हैं। स्टीविया की पत्तियां ही व्यापर हेतु उपयोगी हैं। अतः इनका उत्पादन बढ़ाने के लिए फूलों को तोड़कर फेंक दिया जाता हैं। फूलों की तुड़ाई 30, 45, 60, 75और85 दिनों के अंतराल पर की जानी चाहिये। सामान्यतया फूल रोपण के 80 दिन पश्चात् तोड़ देना जरूरी हो जाता हैं।

उत्पादन

स्टीविया की आर्थिकी मुख्यतः पत्तियों के उत्पादन पर निर्भर करती हैं। स्टीविया की अच्छी फसल के प्रथम वर्ष (दो कटाई द्वारा) 3.5 टन सुखी पत्तियां प्राप्त होती हैं, जबकि अग्रिम वर्षों में पांच वर्षों तक प्रतिवर्ष तीन इकाइयों द्वारा 8 टन सुखी पत्तियां प्राप्त होती हैं।

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