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सोहराई पर्व झारखंड में मनाया जानेवाला प्रमुख पर्व

सोहराई पर्व झारखंड में मनाया जानेवाला प्रमुख पर्व

आज झारखंड मे सोहराई पर्व (SOHRAI FESTIVAL) मनाया जा रहा है । जिस तरह तमिल समाज मे जलिकाटू का पर्व पशुधन के खुसहाली के लिए समर्पित है उसी तरह “सोहराय ” संताल जनजाति एव क्षारखड के लोगों का सबसे बड़ा त्योहार है , जिसमे गो-पूजन किये जाने का रिवाज है। सोहराई गाय और भैंस जैसे घरेलू जानवरों की देखभाल के लिए जाना जाता है। चूंकि इन जानवरों की भूमिका एक कृषि समाज में महत्वपूर्ण हैं, उनकी देखभाल की महत्वपूर्ण रस्म के रूप में मनाया जाता है।

झारखंड के ग्रामीण एलाके जो की जंगल से भरा पारा है , प्रत्येक घर मे कोई न कोई पशुधन जरूर मिलता है । ये इनके जीविकोपार्जन का जरिया है । ईस संस्कृति मे पशुधन संगरक्षन की परंपरा हमे आज के पशुधन वज्ञानिको को बिबस कर देती है सोचने के लिए । यह परब मकर -सक्रांति के ठीक पहले भिन्न -भिन्न गावों में अपनी सुविधा के अनुसार भिन्न -भिन्न दिनों में होता है । इस महापर्ब में पाँच दिनों तक गावों भर में नाच -गान की धूम रहती है।

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लोककथा:-

संताली लोककथा के आनुसार “हासिल ” ने दो अंडे दिये । जिससे दो मानव शिशु का जन्म हुआ । तब , “ठाकुर जेऊ ” को चिन्ता हुई कि उन दोनों मानव -शिशु के लिए आहार का प्रबन्ध किया जाय । उस समय स्वर्गपुरी में “आईनी -बाईनी कपिला ” गाये थी । “ठाकुर जेऊ ” ने “मरांग बुरु ” को अपने पास बुलाकर कहा कि उन गायों को धरती पर ले जाए । इसके बाद “मरांग -बुरु ” नर -मादा “आईनी -बाईनी “कपिला ” गायों को पृथ्वी पर ले आये और उन्हें जंगल में रखा । इसके बाद “मारंग बुरु ” ने कुछ मोटे अनाजों के बीज़ धरती पर जहा -तहा छीटक दिए । इसके बाद समय गुजरने के साथ -साथ “पिल्चु-दंपति ” तथा ” कपिला गायों ” की वंश -वृद्धि हो गई । मानव – संताने, हाथों से चालित हलों से जमीन जोतकर अनाज़ उपजाना सीख चुकी थी ।

“मरांगबुरु ” ने लोगों से कहा ,”हस्त चलित हलों से कब तक जमीन जोतते रहोगे ? जाओ , जंगल से नर -मादा कपिला गायों को ले आओ । उनमे से नर कपिला से हल चलाया करना और मादा गायों के दूध खाया -पीया करना ।” इसके बाद वे लोग गायों की खोज में जंगल गए । जंगल में उनलोगों को गायों का झुण्ड मिला । इसके बाद वे लोग गायों को अपने यहाँ ले आए।

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इसके बाद उन पशुओ के सींगों में तेल -सिन्दूर लगाकर उनका स्वागत किया गया ,उनका परिछन किया गया और उन्हें “गोहाल ” (मवेशी -घर ) में रखा गया । दूसरे दिन उन मवेशियों को ‘गोहाल ‘ से निकालकर चरने के लिए , “चरवाहों ” के साथ बाहर भेज दिया गया और ‘गोहालों ‘ को साफ़ करके पूजा की गई ।

दिनभर गायों को चराने के बाद , सांझ हो जाने पर सभी चारवाहो गायों को लेकर वापस गोहाल में आ गए । तब , धूप -दीपों के साथ उन मवेशियों का परिछन किया गया साथ ही ,नाच -गान के साथ उस दिन रात्रि -जागरण किया गया । इसके बाद तीसरे दिन, बैलों को अपने -अपने दरवाजे पर निकालकर , उन्हें सजा -धजाकर जमीन पर गाड़े गए खूटो में बांधकर उसकाते हुए ‘खेल -कूद ‘ किया जाता है ।

चौथे दिन घर -घर से कुछ अन्न -पान माँगकर सहभोज किया गया और पाँचवे दिन “बोझा तुय ” का दिन कहलाता है । संताल लोग “सोहराई” पर्ब को प्रत्येक साल बहुत धूम -धाम से मनाते है ।

यह संथालो का सबसे बडा पर्व है।यह पूस महीने मे नये फसल के साथ मनाया जाता है,यह पर्व किसी खास तारीक या तिथि को नहीं मनाया जाता है।इस पर्व को मनाने के लिए मंझी हाडाम द्वारा बैठक बुलाया जाता है,तथा गाँव में सभी व्यक्ति के कुशल-मंगल होने पर ही पर्व मनाने का निर्नय लिया जाता है।

गाँव में सभी के कुशल-मंगल होने पर सोहराय पर्व मनाने के लिए दिन तय किया जाता हैं।तब मंझी हाडाम,जोग मंझी को घर-घर जाकर सूचित करने का आदेश देते हैं,तब जोग मंझी घर-घऱ जाकर सूचित करते हैं कि इस दिन को सोहराय पर्व का ऊम(स्नान) है,सभी अपने-अपने रिश्तेदारों को सोहराय पर्व का न्योता दें -दें और पर्व के नाम पर मदिरा तैयार करें।

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पर्व की बिधी –

झारखंड का यह पर्व मवेशियों के सम्मान का पर्व है। इस पर्व में हर मवेशी की पूजा की जाती है, उनका आदर-सम्मान किया जाता है। आदिवासी इसे ‘सोहराई’ कहते हैं। यह मुयत: चार दिनों का पर्व है। पहले दिन काँचा दीया, दूसरे दिन गोरोया, तीसरे दिन बरद भीड़का और अंतिम दिन बुढ़ी बाँधना के रूप में मनाया जाता है। चरवाहा लोग नगाड़ा, ढोल, गाजे-बाजे के साथ लोकगीत गाते हुए अपने-अपने गाँवों के घरों में जाते हैं। यह घूमने की प्रक्रिया गोरोया पूजा तक चलती है। दीपावली के दिन मवेशियों को कार्य से मुति देकर, उन्हें नहला-धुलाकर पूरी साज-सज्जा के साथ उनकी पूजा की जाती है। काँचा दीया में चावल को कूटकर चुन्नी बनाई जाती है। इसी चुन्नी से सने पतले महीन कपडे़ की बा बनाकर प्रत्येक घर के दरवाजे में दीये जलाते हैं। इसके बाद रात में गो माता की पूजा की जाती है।

गोरोया पूजन:-

दूसरे दिन गोरोया पूजा की जाती है। इसमें कोई मिट्टी का पहाड़ बनाता है तो कोई महुआ की लकड़ी का पहाड़ बनाता है। गाय गोरोया के लिए लाल मुरगी की बलि दी जाती है और भैंस के लिए काले रंग की मुरगी की बलि। इसके साथ ही घोरौआ पीठा के साथ गोरोया-पूजा की जाती है। मवेशियों के लौटने के क्रम में महिलाएँ प्रवेश द्वार एवं आँगन को सजा-धजाकर आकर्षक बनाती हैं। दूब घास, फूल, रेंगनी के पौधे, चिरचिरी पत्थर के टुकडे़ का प्रयोग किया जाता है। चुन्नी या चावल के घोल से अल्पना बनाई जाती है।

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बरद-भीड़का:-

इस दिन गाँवों के बीच के रास्ते में मजबूत खूँटा गाड़ा जाता है। उस खूँटे में साँड़ को बाँधा जाता है। घर की महिलाएँ धान, अरवा चावल एवं धूप से चुमावन करती हैं। इसके बाद बैल को नचाने के लिए मृत बैल का चर्म या लाल रंग का कपड़ा दिखाकर उसे भड़काया जाता है।
बूढ़ी बाँधना : इस दिन सभी प्रकार के मवेशियों को खूँटे से बाँधकर भड़काया जाता है। इस पर्व में नर मवेशियों को नहलाकर साफ-सफाई करते हैं तो महिलाएँ घर को लीप-पोतकर साफ करती हैं। दरअसल, सोहराई या बाँधना पर्व पशुधन का त्योहार है। इसके गीतों का एक बड़ा भाग कृषकों के प्रति मवेशी के महव का परिचायक है।

संताली समाज का सोहराय : संताली समाज सोहराय पर्व 12 जनवरी को मनाता है। यह पर्व एक सप्ताह पूर्व ही शुरू हो जाता है। इसमें एक-दूसरे के घर सपरिवार पहुँचकर खान-पान और नाच-गान किया जाता है। इससे पूर्व मवेशियों, पुरखों, खलिहान, सिंगबोंगा आदि की पूजा मुरगा या बकरे की बलि देकर की जाती है। गाँवों में गूँजते माँदर और नगाड़ों के ताल पर थिरकते पाँव इस पर्व की शुरुआत की घोषणा कर देते हैं।

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यह मवेशी पूजा का त्योहार है जिसे मुण्डा समुदाय के लोग ‘‘सोहराई’’ कहते हैं| पशुधन की आराधना गोरेया देवता के साथ की जाती है| गोरेया देवता की प्रतीक महुआ वृक्ष की डाली को गोहाल घर की स्थापित कर उसे पशुधन की सुरक्षा का देवता माना जाता है| इसमें महुआ की डाली को ही स्थापित किया जाता है, इसमें कथा मौजूद है| सोहराई में तीन, पॉंच, सात दिन तक रात्रि जागरण कर पशुधन की वंदना गीत संगीत के द्वारा किया जाता है| सोहराई के दिन मवेशियॉं को स्नान एवं साज श्रृंगार किया जाता है| गाजे बाजे के साथ उनको नचाया, दौड़ाया जाता है| इस अवसर का गाना

मुण्डारी:-

1. बारो मासो रे हगा हिजु लेना सोहराई उरि गई को सेवा बैलों की सेवा सुश्रुया सुसर नगेन|
2. सोहराई हो सोलो सिंगार सोतोयालंञ जोगओया वरदा के रसि रसिकाना|
3. दोड़ि केदय डुगु गइया कुड़िल केदय बछरू भोगोमानो मेनई कोमोधनु|

हिन्दी:-

1. बारह महिने में भाई आया है सोहराई गाय के लिए|
2. सोहराई है सोलह शृंगार जोगाड़ कर रखेंगे पशुधन की खुशी के लिए|
3. दौड़ी छोटी गाय उछली कुदी बछरू भगवान कामधूनु भी साथ में है|

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इतिहास:-

झारखंड की संस्कृति में सोहराई कला का महत्व सदियों से रहा है। बदलते परिवेश में कथित आधुनिकता के नाम पर लोगों का दुर्भाग्यवश इस कला के प्रति उपेक्षाभाव इसके अस्तित्व पर संकट बनकर आ खड़ा हुआ है।
जिस तरह बिना संरक्षण के कोई भी संस्कृति अक्षुण्ण नहीं रहती, ठीक उसी तरह बिना उसमें आत्मसात हुए सोहराई कला का बचना मुश्किल है।

राय के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सोहराई पर्व के दौरान देसज दुधि माटी से सजे घरों की दीवारों पर महिलाओं के हाथों के हुनर अब बमुश्किल से देखने को मिलते हैं। अब दुधि माटी की जगह चूने ने ले ली है। सोहराई कला एक आदिवासी कला है। इसका प्रचलन हजारीबाग जिले के बादम क्षेत्र में आज से कई वर्ष पूर्व शुरू हुआ था। इस क्षेत्र के इस्को पहाड़ियों की गुफाओं में आज भी इस कला के नमूने देखे जा सकते हैं।
कहा जाता है कि बादम राजाओं ने इस कला को काफी प्रोत्साहित किया था।

जिसकी वजह से यह कला गुफाओं की दीवारों से निकलकर घरों की दीवारों में अपना स्थान बना पाने में सफल हुई थी। उस समय ऐसा कोई घर नहीं था जहां की महिलाएं इस कला से अपने घरों-दीवारों को सजाना नहीं जानती हों। आज स्थिति बदल चुकी है। अब तो इसके कलाकार और इसे जाननेवाले लोगों की संख्या गिनती में रह गई है।

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आदिवासी संस्कृति में इस कला का महत्व जीवन में उन्नति से लगाया गया था, तभी इसका उपयोग दीपावली और शादी-विवाह जैसे अवसरों पर किया जाता था। जिससे कि धन और वंश दोनों की वृध्दि हो सके। इस कला के पीछे एक इतिहास छिपा है।

जिसे अधिकांश लोग जानते तक नहीं हैं। बादम राज में जब किसी युवराज का विवाह होता था और जिस कमरे में युवराज अपनी नवविवाहिता से पहली बार मिलता था उस कमरे की दीवारों पर यादगार के लिए कुछ चिन्ह अंकित किए जाते थे। ये चिन्ह यादातर सफेद मिट्टी, लाल मिट्टी, काली मिट्टी या गोबर से बनाए जाते थे। इस कला में कुछ लिपि का भी इस्तेमाल किया जाता था जिसे वृध्दि मंत्र कहते थे। बाद के दिनों में इस लिपि की जगह कलाकृतियों ने ले ली।

जिसमें फूल, पत्तियां एवं प्रकृति से जुड़ी चीजें शामिल होने लगीं। कालांतर में इन चिन्हों को सोहराई या कोहबर कला के रूप में जाना जाने लगा। धीरे-धीरे यह कला राजाओं के घरों से निकलकर पूरे समाज में फैल गई।

राजाओं ने भी इस वृध्दि कला को घर-घर तक पहुंचाने में काफी मदद की। पर आज मदद तो दूर इस सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए भी कोई आगे नहीं आता। ऐसे में शायद इस कला को गुमनामी की गुफाओं में लुप्त होने से कोई नहीं बचा पाएगा और आनेवाली पीढ़ियां सोहराई को इतिहास के पन्नों में ही ढूंढा करेंगी।

आज जरूरत है की हम ईस सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए आगे आए तथा यहा की आपार पशु सम्पदा को संगरक्षित करे तभी हम झारखंड के गरीब आदिवासी को खुसहाल रख सकते है ।

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About the author

Rajesh Kumar Singh

I am a Veterinary Doctor presently working as vet officer in Jharkhand gov.
, graduated in 2000, from Veterinary College-BHUBANESWAR. Since October-2000 to 20O6 I have worked for Poultry Industry of India. During my job period, I have worked for, VENKYS Group, SAGUNA Group Coimbatore & JAPFA Group.
I work as a freelance consultant for integrated poultry, dairy, sheep n goat farms ... I prepare project reports also for bank loan purpose.
JAMSHEDPUR, JHARKHAND, INDIA
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