सोयाबीन की आधुनिक तकनीक से खेती

By | 2017-06-28

सोयाबीन विश्व की सबसे महत्वपूर्ण तिलहनी व ग्रंथिफुल फसल हें. यह एक बहूद्धेशीय व एक वर्षीय पोधे की फसल हें. यह भारत की नंबर वन तिलहनी फसल हें सोयाबीन का वानस्पतिक नाम गलाइसीन मैक्स हे इसका कुल लेग्युमिनेसी के रूप में बहुत कम उपयोग किया जाता हें. सोयाबीन का उद्गम स्थान अमेरिका हें इसका उत्पादन चीन, भारत आदि देश में हें. सोयाबीन की खेती सम्पूर्ण भारत में की जाती हें लेकिन देश में प्रथम मध्य्प्रधेश दूसरा महाराष्ट्र तीसरा राजस्थान राज्य हें।

सोयाबीन की खेती

सोयाबीन

हमारे देश में लगभग 108.834 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की खेती की जाती हें और सोयाबीन का विशव उत्पादन में भारत का पाँचवा स्थान हें. इस फसल का पित क्रांति में भी विशेष योगदान रहा हें. सोयाबीन में 40 से 42% प्रोटीन पाया जाता हें. 20 से 22% तेल 20 से 21% कार्बोहाइड्रेट तथा लगभग 5% मिनरल पाया जाता हें. सोयाबीन तेल से अनेक ओद्धयोगिक पदार्थ जेसे:- प्लाइवुड का सामान,विटामिन, कागज, रबड़, टाइपराइटर का रिबन, साबुन, वार्निश, कीटनाशक रसायन, विस्फ़ोटक पदार्थ, मोमबत्ती, स्याही तथा सोन्दर्य प्रसाधन सामग्री का निर्माण किया जाता हें एवं सोयाबीन से भोज्य पदार्थ जेसे दूध, दही, मक्खन, पनीर आदि बनाये जाते हे।

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जलवायु

सोयाबीन की फसल साधारण शीत से लेकर साधारण उष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में आसानी से उगे जा सकती हें।

तापमान

सोयाबीन के बिज को 60 डिग्री फ़ॉरेनहाइट या फुल तापमान में अच्छा अंकुरित होने से 7-10 दिन लगते हें. जबकि 70-90 डिग्री फ़ॉरेनहाइट तापमान पर ये केवल 3-4 दिन में ही अंकुरित हो जाते हे. 50 डिग्री फ़ॉरेनहाइट तापमान पर पोधे की वृद्धि बहुत ही कम होती हे. सोयाबिन के फुल आने के समय तापमान का विशेष प्रभाव पड़ता हें. 75 से 77 डिग्री फ़ॉरेनहाइट तक प्रती 10 डिग्री की वृद्धि होने पर फूलने का समय 2-3 दिन बढ़ जाता हें. बहुत अधिक तापमान 100 डिग्री फ़ॉरेनहाइट से अधिक हने पर भी सोयाबीन की वृद्धि विकास एवं बीजं के गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हें. तापमान कम होने पर तेल की मात्र घट जाती हे.

सोयाबीन की अधिकांश किस्मों में दिन व राते लम्बी होने पर ही फुल आता हे. फूलने तक की अवधि फलने की फलियाँ लगने तक की अवधि पकने की अवधि गाठों की संख्या तथा पोधो की ऊंचाई पर दिन की लम्बाई का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता हें दिन बड़े होने पर उपरोक्त सभी अवस्थाओं की अवधि में वृद्धि हो जाती हे. सोयाबीन में फुल तब तभी आता हे. जबकि दिन की लम्बाई एक क्रांतिक अवधि से कम हो इसलिए इसको अल्प प्रकाश पक्षी पोधा भी कहते हे।

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नमी

सोयाबीन में पोधों के अच्छे अंकुरण के लिए अधिक नमी तथा लगातार कम नमी की दोनों ही दिशाए हानिकारक हे. अंकुरण के पशचात कुछ समय तक अधिक या कम पोधों पर कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नही पड़ता हे. अच्छी फसल के लिए कम से कम 60-75 से. मी. वर्षा की आवश्यकता होती हे यदि पुष्पीय कलिया विकसित होने से 2 से 4 सप्ताह पूर्व पानी की कमी हो जाये तो इसमे पोधों की वानस्पतिक वृधि घट जाती हे. परिणामस्वरूप बहुत अधिक संख्या में फुल तथा फलियाँ गिर जाती हे. फलियों के पकते समय वर्षा होने पर फलियों पर अनेक बीमारियाँ लग जाती हे जिससे वे सड़ जाती हे तथा बिज की उत्पादकता भी घट जाती हे. अत: फलियों के पकने के समय वर्षा का होना.  सोयाबीन के लिए हानिकारक होता हें।

बिज का अंकुरण परीक्षण

बिज का अंकुरण परीक्षण करना अत्यंत आवश्यक हें. अंकुरण परीक्षण हेतु पानी से भीगे टाट के टुकड़े में बिज के 100 दानों को लाईनों में अथवा अख़बार की दो पत्तों को लेकर उसके आधे भाग को गिला कर बिज के 100 दाने लाईन में रखकर उसी से ढक के तथा रोजाना पानी का छिडकाव करें जिससे नमी बनी रहे.उक्त कार्य को 2-3 बार अलग-अलग टाट की बोरी पर करें. 6-8 दिन बाद उपरी परत को उठाकर अंकुरित दाने की संख्या को गिन ले. अंकुरित दानें का प्रतिशत 70 या इससे अधिक होने पर ही बिज के रूप में उपयोग करें कम अंकुरण % पाये जाने पर बिज की मात्रा की गणना निम्नानुसार हेक्टेयर में करें।

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किसानों के लिए सोयाबीन का बहुत अधिक महत्व हे क्योंकि:-
  1. यह कम उर्वरक देने पर भी लाभदायक नगदी फसल हे.
  2. फसल चक्र पद्धति में भी यह उपयुक्त हे.
  3. इसकी फसल आवश्यकता से भी अधिक मृदा उर्वरकता बढ़ती हे. सोयाबीन भूमि में वायुमंडलीय नत्रजन का जमाव करती हें और अगली फसल के लिए 90 किलोग्राम प्रति हे\क्तेयर नत्रजन छोडती हें।

लाभकारी अंतरवर्तीय फसलें:-

  1. सोयाबीन+मक्का (चार कतार : दो कतार)
  2. सोयाबीन + अरहर (चार कतार : दो कतार)
  3. सोयाबीन + ज्वर (चार कतार : दो कतार)
  4.  कपास + सोयाबीन (चार कतार : दो कतार)

लाभकारी फसल चक्र

  1.  गेहूँ – सोयाबीन
  2. अलसी – सोयाबीन
  3. चना – सोयाबीन
  4. आर्किल मटर – सोयाबीन

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मृदा

सोयाबीन की खेती सभी प्रकार की मृदाओ में अति अम्लीय, क्षारीय व रेतीली मृदाओ को छोड़कर की जा सकती हे. मृदा में अच्छा जल निकास होना चाहिए तथा जेविक कार्बन की भाषा भी अच्छी होनी चाहिए. यह मृदा मुख्य रूप से सही हे. जेसे:- दोमट, मटीयाद व काफी मिट्टी से सोयाबीन का उत्पादन सफलता पूर्वक किया जा सकता हे।

मिट्टी को कटाव से बचाए

भूमि को कटाव से बचाने के लिए मिट्टी, पत्थर, गेवियट सरचना से मेड बनाए व जल निकास की व्यवस्था करें. खेत के आस पास मेड के स्थान पर नालिया बनाए . ये नालिया भूमि में संवर्धन के साथ ही खेत से बहकर जाने वाली मिट्टी को इकट्ठा करने में सहायक होती है।

खेत की तेयारी

सोयाबीन के लिए चिकनी भारी उपजाऊ, अच्छे जल निकास वाली तथा उसर रहित मिट्ठी उप्यिक्त रहती है . फसल की अच्छी वृधि के लिए खेत को भली भांति तेयार करना चाहिए . गरमी के मोसम में एक गहरी जुताई करनी चाहिए . जिससे भूमि में उपस्थित कीड़े, रोग एवं खरपतवार के बीजों की संख्या में कमी होती है तथा जल धारण की क्षमता में वृद्धि होती है . खेत से पूर्व बोई गई फसल के अवशेष व जड़े निकाल देनी चाहिए एवं गोबर की अच्छी तरह से सदी हुई खाद या कम्पोस्ट मिला दें . उसके बाद दो बार कल्टीवेटर से जुताई कर भूमि को भुर भूरी कर खेत को समतल कर ले .खेत की अच्छी तेयारी अधिक अंकुरण के लिए आवश्यक है ।

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बुवाई का समय एवं अवधि

सोयाबीन की बुवाई मानसून आने के साथ ही करनी चाहिए. बुवाई के समय भूमि के अन्दर कम से कम 10 सेमी. की गहरे तक पर्याप्त नमी होनी चाहिए. सोयाबीन की बुवाई का समय जून महीने के तीसरे सप्ताह से जुलाई माह के प्रथम सप्ताह सबसे अधिक उपयुक्त समय हें. बुवाई सिद ड्रिल या हल के साथ नायला बंधकर पंक्तियों में 30 से 45 सेमी. की दुरी पर करें तथा पोधों की संख्या 4.50 लाख प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए. अच्छे अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी का होना अत्यंत आवश्यक हे. सोयाबीन की फसल की अवधि लगभग 100 से 120 दिनों की होती हें।

बीज दर

उचित अंकुरण के लिए छोटे एवं माध्यम दाने वाली किस्मों का 80 किलो बीज प्रति हेक्टेयर एवं मोटे दाने वाली किस्मों का 100 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करनी चाहिए।

बीज उपचार

सोयाबीन रोग ग्रसित बीज द्वारा उत्पन्न रोगों के नियंत्रण के लिए बीज को बोने से पूर्व फफून्दनाशक दवाओ से बीजोपचार अवश्य करें . बीजोपचार रोग नियंत्रण का एक सस्ता व सरल उपाय हे . इस क्रिया में बीजों का अंकुरण अच्छा शीघ्र एवं एक समान होता हे . पोधे स्वस्थ एवं अच्छी वृद्धि करते हे. जिससे बिज उपज में भी वृद्धि होती हे . बिज उपचार में निम्न प्रकार की दवाइयों का उपयोग किया जा सकता हे . इसके लिए बिज को थाइरम या कार्बेन्डाजिम, मेटालेजिल, कार्बोक्सिन, मेंकोबेज, प्रोपिकोनाजॉल, ट्राईसाइक्लोजाव आदि का 3 ग्राम प्रति किलो बीज उपचार करने से इन रोगों से बचाव होता हे . जेसे:- बीज विगलन, पोध अंगमारी मायरोथिसियम एवं पत्ती धब्बा रोग में उपचारित किया जा सकता हे .

जीवाणु कल्चर से बीज उपचार

इसके पश्चात बीजों को जीवाणु कल्चर से  बीजों को उपचारित करना आवश्यक हे . इस हेतु एक लिटर गर्म पानी में 250 ग्राम गुड का घोल बनाये एवं ठंडा करने के बाद 500 ग्राम राइजोबियम कल्चर एवं 500 ग्राम पी.एस.वी. कल्चर प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाये . कल्चर मिले घोल को बीजों में हलके हाथ से मिलाये फिर छाया में सुखाकर तत्काल बो देना चाहिए . इसमे लगभग 10 किलो नत्रजन एवं 20 किलो फास्फेट की बचत होती हें।

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सोयाबीन की किस्में

हमारे खेत में सोयाबीन की खेती का प्रारम्भ काली तुर नामक किस्म से हुआ था जिसके दाने काले रंग के थे . इसके पश्चात पीले दाने वाली टी-9 किस्म प्रकाश में आई इसकी सफलता के बाद अंकुर, अलंकार, शिलाजीत, पंजाब-1 किस्मे किसानों द्वारा पसंद की गई. बाद में गोरव, मोनेटा, एम.ए.सी.एम. 13 (मैक्स-13) मैक्स-58, पूसा-16,20,40 धीरे-धीरे प्रचालन में आई आजकल निम्न प्रकार की किस्में का किसानों द्वारा प्रयोग में ली जा रही हे।

                      सोयाबीन की किस्में

क्र.सं. किस्म उपज अवधि राज्य गुण एवं विशेषताए
1. जे. एस. 335 25-30 क्वी./हे. 90-100दिन म.प्र., गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान 1. बेंगनी रंग के फुल 2. काली नाभिका 3. पिला दाना 4. बेक्टीरियल ब्लाइट, बेक्टीरियल पश्च्युल से प्रतिरोधक 5. तना मक्खी, बड ब्लाइट, सवेदनशील, तेल 17-29% प्रोटीन 40-41% होती हे .
2. एन.आर.सी.-37 35-40 क्वी./हे. 96-101 दिन मध्यप्रदेश पिला दाना, तना मक्खी, सफेद फुल, भूरी नाभिका एवं लीफ माइनर के लिए प्रतिरोधक
3. एम.ए.सी.एस.-124 25-30 क्वी./हे. 90-105 दिन दक्षिणीय क्षेत्र गहरे भूरे नाभिका, बेंगनी फुल, पिला दाना, पानी के जमाव में प्रतिरोधक, अर्द्धपरिभित विकास 15-20%तेल, 35-40% प्रोटीन होता हे .
4. पी.के.- 1029 25-30 क्वी./हे. 90-95 दिन दक्षिणी क्षेत्र गहरे भूरे नाभिका, सफेद फुल, परिमित, विकास, पिला दाना, राजोक्टोनिया और बेक्टीरिया पश्चुल से प्रतिरोधी पिला मोजेक वाइरस के लिए सहनशील होती हें .
5. जे.एस.- 95-60 20-22 क्वी./हे. 80-85 दिन म.प्र., गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान शीघ्र पकने वाली तथा कम पानी वाली किस्म 100 दानों का भार 13-14 ग्राम अर्द्ध बोनी किस्म, ऊँचाई45-50 सेमी. बेंगनी फुल, फलियाँ नही चटकती हे. कई प्रकार के कीटों एवं रोगों से रोधी किस्म
6. जे.एस.- 90-05 20-25 क्वी./हे. 90-95 दिन म.प्र., गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ नुकीले भाले के आकार वाली पत्तियों की किस्म, 100 दानों का भार, 13-15 ग्राम अर्द्ध परिमित वृद्धि वाली किस्म, शीघ्र पकने वाली किस्म, बेंगनी फुल एवं फलियाँ कम चटकने वाली किस्म

                      सोयाबीन की नवीनतम किस्में

1. आर. के.एस.-24 25-30 क्वी./हे. 95-100 दिन म.प्र., राजस्थान, गहरे हरे रंग के चौड़ी पत्तियां, 100 दानों का भार 12-13 ग्राम, सफ़ेद फूल, पीला दाना, कई प्रकार के रोगों एवं कीटों से सहनशील, पत्तियों तने एवं फलियों पर भूरे रोंये।
2. आर. के.एस.-45 25-30 क्वी./हे. 95-100 दिन म.प्र., राजस्थान गहरे हरे रंग के चौड़ी पत्तियां, 100 दानों का भार 12-13 ग्राम, सफ़ेद फूल, पीला दाना, कई प्रकार के रोगों एवं कीटों से सहनशील, पत्तियों तने एवं फलियों पर भूरे रोंये।
3. जे.एस.-20-29 25-30 क्वी./हे. 95-100 दिन म.प्र., राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ नई उन्नत किस्म, 100 दानों का भार 12-14 ग्राम, दाना पीला, अण्डाकार, काली नाभिका, 55-60 से.मी. उचाई की किस्म सफ़ेद फूल, उत्तम अंकुरण,चटकने की समस्या नहीं, कई प्रकार के रोगों एवं कीटों के प्रति सहनशील।
4. जे.एस.-20-34 20-22 क्वी./हे. 95-100 दिन म.प्र., राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ शीघ्र पकने वाली किस्म, 100 दानों का भार 11-12 ग्राम, चमकदार पीला दाना एवं नाभिका काली, पत्तियां गहरी हरी, सफेद फूलों वाली किस्म, फली के चटकने की समस्या नहीं, कई प्रकार के रोगों एवं कीटों के प्रति सहनशील।
5. एन.आर.सी.-37 25-30 क्वी./हे. 100-110 दिन म.प्र., राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ देर से पकने वाली किस्म, 100 दानों का भर 12-15 ग्राम, पीला दाना, पत्तियां चौड़ी एवं गहरी हरी, बैंगनी फूल, फली के चटकने की समस्या नहीं, मानसून के चले जाने के बाद एक सिंचाई की आवश्यकता कई प्रकार के रोगों एवं कीड़ों से सहनशील।

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बुवाई की विधि

सोयाबीन की बुवाई हमेशा कतारों में करनी चाहिए। बीज एवं खाद को अलग-अलग बोना चाहिए जिससे अंकुरण प्रभावित नहीं होगा तथा बीज की गहराई 3-4 से.मी. से अधिक नहीं रखनी चाहिए।

बुवाई की निम्न विधियां है।

१. छिड़कवाँ विधि

कुछ क्षेत्रों में किसान सोयाबीन का बीज एवं खाद मिलाकर छिड़काव करने के बाद डिस्क हीरो चलाकर पाटा देते है। यह सोयाबीन बोने की दोषपूर्ण विधि है। जिसमें निम्न हानियाँ होती है एवं उत्पादन में गिरावट आती है।

  1. बीज की मात्रा अधिक लगती है
  2. वर्षा का जल मिट्टी सोख नहीं पाती है क्योंकि पाटा लगा होने के कारण पानी बाह कर चला जाता है।
  3. निराई-गुड़ाई, कीटनाशक छिड़काव में अवरोध उत्पन होता है
  4. भूमि की सतह से जल बह जाने के कारण मिट्टी की नमी का का सरंक्षण नहीं हो पाता है अतः सूखे के दौरान फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

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कतार से बुवाई विधि

सोयाबीन का बीज हमेशा कतारों में ही बोना चाहिए क्योंकि यह सरल एवं सस्ती और उपयुक्त विधि है इस विधि से निम्न लाभ इस प्रकार है।

  1. बीज सही जगह पर पड़ता है और अंकुरण सही होता है। पौधों की संख्या उचित होती है।
  2. बीज की मात्रा कम लगती है।
  3. खरपतवार नियंत्रण एवं पौध सरंक्षण में सुविधा होती है
  4. कुंड में पानी भरने से मिट्टी नमी सोंख लेती है इस करना लम्बे समय तक वर्षा न होने पर पर फसल पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है

मेड नाली विधि

यह सोयाबीन बोन की सर्वोत्तम विधि है। सोयाबीन की बुवाई को इस विधि में बिजाई मेड़ो पर की जाती है तथा दो मेड़ो के बिच की दुरी १५ से.मि. गहरी नाली बनाई जाती है और मिट्टी को फसल की तारों की तरफ कर दिया जाता है। इस विधि के लाभ निम्न

  1. इस विधि से खरीफ मौसम में फसल को अवर्षा के समय नमी की कमी महसूस नहीं होती है
  2. बीजो की बुवाई मेड़ो पर पर होने के कारण अति वर्षा तथा तेज हवा के समय पौधों के गिरने की संभावना नहीं होती है
  3. अल्प वर्षा, अधिक वर्षा में लम्बे अंतराल होने से सोयाबीन की फसल प्रभावित नहीं होती है।
  4. अति वर्षा के समय अतिरिक्त वर्षा जल इन नालियों से खेत के बाहर निकल जाता है।

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उर्वरक एवं खाद प्रबंधन

अंतिम बखरनी के समय खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद का कम्पोस्ट ५-१० टन उपलब्धानुसार प्रति हैक्टेयर के मान से मिलाये (मध्यम) उर्वरता वाली भूमि में सोयाबीन की खेती के लिए २० किलो नत्रजन, ६० किलो स्फुर, २० किलो पोटाश, २० किलो सल्फर व सूक्ष्म मात्रा में मेग्नेशियम, जस्ता एवं जैविक खाद की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति निम्न में से किसी एक समूह से की जा सकती है।

सिंचाई एवं जल निकास प्रबंधन

सोयाबीन खरीफ की फसल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। अधिक दिनों तक बरसात नहीं होने पर सिंचाई की आवश्यकता पड़ सकती है।

सोयाबीन में फूल एवं फलियां लगते समय क्रांतिक अवस्था होती है।  इस अवस्था में वर्षा नहीं होने पर सिंचाई आवश्यक होती है। अधिक पानी भी फसल के लिए नुकसानदायक होता है। इसलिए  जल निकास का उचित प्रबंधन करना अति आवश्यक होता है।

खरपतवार प्रबंधन

सोयाबीन का पौधा प्रारंम्भिक अवस्था में मंद गति से वृद्धि करता है।  इसलिए खेत में तीव्र गति से बढ़ने वाले खरपतवार से 25-70 प्रतिशत तक नुकसान होता है। इसलिए बुवाई के 40-45 दिन तक खेत में खरपतवार को बढ़ने रोका जाय। इसके लिए बिवाई के 20 दिन तथा 40 दिन बाद दो बार निराई-गुड़ाई करके खेत से खरपतवार को निकालते रहना चाहिए।

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रसायन विधि से खरपतवार नियंत्रण

  1. बुवाई के पूर्व उपयोग में आने वाले फ्लूक्लोरेलीन 48 ई. सी., 20 लीटर, या ट्रायइफ्यूरोलीन 50 ई. सी., 2 लीटर मात्रा प्रति हैक्टेयर का 700 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
  2. बुवाई के तुरंत बाद व सोयाबीन के अंकुरण के पूर्व में काम में आने वाले एलाक्लोर 4 लीटर या एलाक्लोर 10 जी 20 किलो या मेटालोक्लोर 50 इ.सी. 2 लीटर या पेंडीमेथालिन 30 ई.सी. 25 लीटर प्रति हैक्टेयर 700 लीटर पानी में छिड़काव करना चाहिए।

खड़ी फसल में उपयोग में लिए जाने वाले खरपतवारनाशी

सोयाबीन

  1. सकड़ी पत्ते की निन्दाओं के नियंत्रण के लिए बुवाई के 15-30 दिन के बाद क़्विजालोफॉस इथाइल 5% ई.सी. 1लिटर/हैक्टेयर का कड़ी फसल में 700 लीटर पानी में घोलकर फ्लेट फेन नोजल से स्प्रे करना चाहिए।
  2. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार के नियंत्रण के लिए क्लोरोम्यूरॉन इथाइल 30 ग्राम प्रति हेक्टेयर का स्प्रे बुवाई के 15-20 दिन बाद करें।
  3. दोनों प्रकार के खरपतवारों के नियंत्रण के लिए इमेजाथापायर 10 एसएल. 720 मिली. को 700 लीटर पानी में घोल कर 2-3 पत्ती या 3 इंच खरपतवार की अवस्था में स्प्रे करें। खरपतवारनाशी उपयोग के समय खेत में प्रयाप्त मात्रा में नमी का होना अति आवश्यक है।

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इस तरह आप सोयाबीन की खेती में निम्न तरीके से कृषि कार्य करके अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकते है।

 

 

 

 

 

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