सूरजमुखी की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

By | 2017-04-21

सूरजमुखी एक तिलहनी फसल हैं। देश में मूंगफली, तोरिया- सरसों एवं सोयाबीन के बाद यह चौथी महत्वपूर्ण फसल हैं। देश में सूरजमुखी को सभी मौसमों में उगाया जा सकता हैं। उतरी भारत में इसे जायद में उगाया जाता हैं। खरीफ में धान एवं रबी में गेहू की वजह से खेत खाली नहीं मिलते हैं। इसके अतिरिक्त खरीफ मौसम में अधिक वर्षा की वजह से कीड़े व बीमारिया भी ज्यादा लगती हैं। इन सब बीमारियों की वजह से सूरजमुखी को जायद में आसानी से उगाया जा सकता हैं।

सूरजमुखी के तेल में कैलोस्टरॉल कम होता हैं। अतः इसका तेल खाने के लिए उपयुक्त माना गया हैं। सूरजमुखी का उत्पादन बढाकर तिलहनों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता हैं, जिससे तिलहन के उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त की जा सकती हैं। सूरजमुखी को उगाकर किसान भाई 10-105 दिन में रु. 20000-25000/प्रति हेक्टेयर लाभ कमा सकते हैं।

सूरजमुखी की उन्नत खेती

सूरजमुखी की उन्नत प्रजातियां

सूरजमुखी की सुपर ज्वालामुखी, एम.एस.एफ.एच.-8 एवं 17, के. बी.एस.एच. 1 एवं 50 एवं पी.ए.सी.-1091 आदि संकर प्रजातियों के बीज बाजार में उपलब्ध हैं, जिन्हे वसंत ऋतू एवं रबी मौसम में उगाकर अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती हैं। ये प्रजातियां 90-105 दिन में तैयार हो जाती हैं। इसमें तेल की मात्रा लगभग 40-42% तक होती हैं। इसके अतिरिक्त इन प्रजातियों में मुण्डक भी निचे की तरफ झुकने वाले होते हैं। जिससे तोते द्वारा नुकसान कम होता हैं।  पूर्वी उत्तरप्रदेश में “मार्डन” प्रजाति जायद में अधिक लोकप्रिय हैं। यह प्रजाति 80 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। इसमें तेल की मात्रा 38-39% होती हैं।

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बीज एवं बीज शोधन

बुवाई से पूर्व बीजो को दवाइयों से शोधित अवश्य कर ले। थीरम या केप्टान की 3.0 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज को शोधित करे बीज शोधन से मृदा जनित रोगो से बीज सड़ता नहीं हैं और जमाव अच्छा होता हैं। संकर किस्मो का 2.0-2.5 किग्रा. एवं सामन्य किस्मो का 3.0-3.5 किग्रा. बीज प्रति एकड़ की दर से बोना चाहिए। यदि खेत में नमी न हो तो बीज की दर 15% बढ़ाकर बोनी चाहिए या फिर बीज को 5-6 घण्टे पानी में भिगोकर एवं बाद में छाया में सुखाकर बोना चाहिए।

बुवाई का समय

जायद में सूरजमुखी को फरवरी के प्रथम सप्ताह से मध्य तक बोना सबसे अच्छा होता हैं वैसे इसे फरवरी के अंतिम सप्ताह तक भी बोया जा सकता हैं देर से बोने से फसल देर से पकती  हैं। कभी- कभी मानसूनी वर्षा से फसल कटाई में समस्या होती हैं। अतः फसल को फरवरी के अंत तक अवश्य बो देना चाहिए।

बुवाई की विधि

फसल को 45 या 60 सेमी. की दुरी पर बनी लाइनों में 25-30 सेमी. बीज से बीज की दुरी पर बोना चाहिए। बुवाई सीडड्रिल या लाइनों में करे। जमाव के बाद यदि पोधो की संख्या अधिक हैं तब पौधे से पौधे की दुरी अतिरिक्त पोधो को उखाड़ कर 25-30 से.मी. कर लेना चाहिए।

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सिंचाई

बसंतकालीन सूरजमुखी में सामान्यतः 5-6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती हैं सामान्यतः इसमें 20 दिन के अंतराल में सिंचाई करते रहना चाहिए। कली बनते समय, फूल खिलते समय एवं मुण्डक में दाने भरते समय नमी की कमी होने पर उपज में कमी आती हैं। ध्यान रखे की उपयुक्त फसल अवस्थाओं में सिंचाई अवशय करे।

खरपतवार नियंत्रण

सामन्यतः दो निराई- गुड़ाई 20 दिन एवं 35 दिन बाद कर देनी चाहिए खरपतवारनाशी में पेण्डीमेंथलीन के 1.25 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी में घोल कर बुवाई के 1-2 दिन बाद छिड़क देना चाहिए। यदि आवश्यकता पड़े 30-35 दिन बाद एक गुड़ाई करें। इस समय पौधों के दोनों तरफ मिट्टी भी चढ़ा देनी चाहिए,जिससे पौधें हवा में गिरने से बच जाते है।

खाद एवं उर्वरक

अच्छी उपज के लिए 120 किलोग्राम नत्रजन 60 किलोग्राम फॉस्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर आवश्यकता पड़ती है। नत्रजन की 2/3मात्रा एवं फॉस्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा बातें समय डालना चाहिए शेष नत्रजन की मात्रा पहली सिंचाई के समय डालनी चाहिए। फॉस्फोरस को सिंगलसुपर फास्फेट के द्वारा देना चहिए, क्योकि सिंगलसुपर फॉस्फेट में रहता है जो की पोधो को मिल जाता है। सल्फर से तेल की मात्रा बढ़ जाती है।

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प्रमुख कीट

दीमक

दीमक के श्रमिक फसल को नुकसान पहुंचाते है। यह जड़ एवं तने को खाकर सूखा देतें। बुवाई से पूर्व इस कीट के नियत्रण हेतु 2.5 किलोग्राम विवेरिया वेशियाना, 1 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद के साथ खेत में बिखेरकर खेत में मिला देना चाहिए। खड़ी फसल में प्रकोप होने पर सिंचाई के पानी के साथ क्लोरपाइरीफास 20 ई.सी. 2-3 लीटर दवा प्रति हैक्टेयर प्रयोग करनी चाहिए।

हरे फुदके

हरे फुदके एवं इस कीट के प्रौढ़ तथा शिशु दोनों पौधों की कोमल पत्तियों से रस चूस कर हानि पहुँचातें है। इससे पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते है। इसके नियंत्रण हेतु डाइमेथोएट 30 ई.सी. एक लीटर दवा 600-800 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए।

डस्की बग

इस कीट के छोटे-छोटे बग पत्तियों, डंठलों एवं मुंडक की निचली सतह से रस चूस कर हानि पहुंचते है इसका अधिक प्रकोप होने पर उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके नियंत्रण के लिए इमिडा क्लोरोपिड 0.3 मिली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

फली छेदक

इस कीट की सूडियां मुंडक में विकसित हो रहे बीजो को खाकर काफी क्षति पहुंचती है। इस कीट के सर्वेक्षण हेतु 10-12 फेरोमोन ट्रेप प्रति हैक्टेयर  की दर से लगाना चाहिए। 5-6 प्रौढ़ कीट प्रति ट्रेप आने पर एच. एन. पी. वी. 250-300 सुडी समतुल्य को 500-600 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए।

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बीमारियाँ

फसल के स्केलेरेशियम, कालर राट, वनः सड़न, तना सडन एवं राइजोफॉस, मुण्डक मुख्य बीमारियाँ है। इसकी रोकथाम हेतु 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा से बीज को उपचारित करके बोना चाहिए। खड़ी फसल में 0.1 प्रतिशत कार्बोडाजिम एवं 0.2 प्रतिशत मेंकोजेव के 2-3 छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए। मुंडक के दाने भरते समय 0.2 प्रतिशत कॉपर आक्सी क्लोराइड का के दो छिड़काव करने चाहिए।

पक्षियों से फसल सुरक्षा

दाने बनते समय तोता फसल को भारी नुकसान पहुँचता है। इसके लिए 20-25 दिन फसल को बचाना पड़ता है। बाजार में चिड़िया भागने वाले लाल-चमकीले रंग के फीते उपलब्ध है, जिनको खेत में लगाकर चिड़ियों से फसल को बचाया जा सकता है। आजकल बाजार  में उपलब्ध अधिकांश संकर प्रजातियों के मुंडक निचे झुकने वाले है, जिससे तोतो से नुकसान कम होता है।

उपज एवं लाभ

सूरजमुखी 10 से 105 पक जाती है उपयुक्त विधि से फसल उगाने पर कम से कम 20-25 क्विंटल/हैक्टेयर उपज मिलती है। सूरजमुखी  का दाना बाजार में 1500-1800 रुपये/ क्विंटल बिक जाता है। मात्र 90-105 दिनों में किसानो को 20000-25000रुपये/हैक्टेयर का लाभ मिल जाता है।

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