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सब्जियों की फसल में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी व उपचार

सूक्ष्म पोषक तत्वों
Written by bheru lal gaderi

सभी पौधों को उचित वृद्धि एवं विकास के लिए 16 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। पोषक तत्व का आशय है कि किसी तत्व विशेष की कमी पूर्ति उसी तत्व से हो सकती है और अन्य तत्व द्वारा उसकी कमी की पूर्ति नहीं हो सकती है। प्रत्येक पोषक तत्व के पौधों के जीवन चक्र में अपना-अपना विशेष योगदान रहता है। कुल 16 पोषक तत्वों में 07 तत्वों को सूक्ष्म पोषक तत्वों की श्रेणी में रखा गया है। जो मुख्य पोषक तत्वों की अपेक्षा पौधों को बहुत ही कम/सूक्ष्म मात्रा में आवश्यक होते है। लेकिन ये तत्व भी पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए उतने ही आवश्यक हैं जितने की मुख्य पोषक तत्व। सब्जियों में इन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी का उत्पादन एवं गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है।

सूक्ष्म पोषक तत्वों

किसी एक तत्व का अभाव होने पर पौधा अपना जीवन चक्र पूरा नहीं कर सकता है। अतः अच्छे उत्पादन के लिए यह आवश्यक है की सभी तत्वों की समुचित मात्रा, उपयुक्त समय पर पोशों को दी जाये तथा सब्जियों के पौधों में होने वाली कमी के लक्षणों को पहचाना जाए ताकि कमी होने पर उनकी आपूर्ति की जा सके।

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सूक्ष्म पोषक तत्वों के मुख्य कार्य और कमी के लक्षण

सूक्ष्म पोषक तत्वों

प्रत्येक पोषक तत्व को पौधे के अंदर कुछ विशेष कार्य करने होते हैं। एक पोषक तत्व दूसरे का कार्य नहीं कर सकता है। किसी एक तत्व की सांद्रता जब निश्चित क्रांतिक स्तर से नीचे आ जाती है तो उस पौधे में उस तत्व की कमी हो जाती है। इससे पौधे की जीवन क्रिया में बाधा पड़ती है। अतः ये सूक्ष्म पोषक तत्त्व सब्जियों की खेती में विशेष महत्व रखते है।

जिंक

पत्तियों का मुंडन, छोटा अर्थात लिटिल लीफ जिंक की कमी का मुख्य लक्षण है। नई तथा पुराणी पत्तियों पर इसके लक्षण पौधे पर एक साथ दिखाई देते है। इसके आभाव में पौधे की वृद्धि कम होना, कलियों का जड़ना एवं बीज उत्पादन का कम होना आदि लक्षण दिखाई देते है। फूलों का निर्माण व् फलों का विकास प्रायः कम और देर से होता है। जिंक (जस्ते)की कमी मुख्य रूप से मक्का, गेंहू, मटर, सेम, टमाटर, आलू पर अधिक होती है।

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उपचार

जिनक की आपूर्ति के लिए सामान्यतः 20-25  किलो ग्राम जिनक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करते हैं। इसको अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिलाना चाहिये। अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ जिंक सल्फेट मिलाकर देने से अधिक लाभ होता हैं। खड़ी फसलों में जिंक की कमी के लक्षण पौधों पर दिखाई देने पर 0.5% जिंक सल्फेट तथा 0.25% बुझा हुआ चुना का घोल बनाकर छिड़काव करते हैं। इसके लिए 100 लीटर पानी में 250 ग्राम बुझा हुआ चुना घोल-कर फिर इसमें 500 ग्राम जिंक सल्फेट मिलाकर घोल तैयार कर खड़ी फसल की पत्तियों पर इसका छिड़काव करें।

लोहा (आयरन)

लोहे की कमी के लक्षण मुख्यतया छोटी अवस्था की पत्तियों पर प्रकट होते हैं। इसके अभाव में सब्जियों की पत्तियों में हरितमा हीनता या क्लोरोसिस हो जाती हैं, जिससे पत्तियों की शिराओं का रंग हरा बना रहता हैं, परन्तु मध्य भाग पीला पड़ जाता हैं। लोहे की अधिक कमी होने पर पत्तियों के अग्रभागों तक किनारों की मृत्यु हो जाती हैं इसका प्रभाव टमाटर पर अधिक लक्षण दिखाई देते हैं।

उपचार

उपचार खेत की मिट्टी में लोहे की कमी होने पर 10-20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर फेरस सल्फेट, खेत की आखिरी जुताई के समय मिलाना चाहिए। खड़ी फसल में लोहा तत्व की कमी के लक्षण दिखाई देने पर 0.5% फेरस सल्फेट (हराकसीस) तथा 0.10% साइट्रिक एसिड का घोल बनाकर पर्णीय छिड़काव करना चाहिये।

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मैंगनीज

यह तत्व भी सब्जियों के लिए बहुत आवश्यक हैं। इसके अभाव में पौधों की पत्तियों में क्लोराफिल का निर्माण ठीक प्रकार से नहीं हो पाता, पौधे की पत्तियों का रंग हल्का पड़ जाता हैं तथा उनकी चमक धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। इस तत्व की अधिक कमी होने पर पौधों की नयी पत्तियाँ भूरे तथा पिले रंग की हो जाती हैं। इस तत्व की कमी के लक्षण टमाटर, आलू, पालक, गोभी, सेम, मटर, प्याज व शक़्करकन्द आदि फसलों पर देखा गया हैं।

उपचार

इस तत्व की कमी की पूर्ति के लिए बुवाई के पूर्व या खेत की अंतिम जुताई के समय 20 किलोग्राम मेगनीज सल्फेट प्रति हेक्टेयर प्रयोग करते हैं। खड़ी फसल में 0.5 से 1.0% मैगनीज सल्फेट का घोल, बुझे हुए चुने का घोल (0.25 से 1.0%) के साथ पर्णीय छिड़काव करें।

ताम्बा

पौधों में ताम्बे की कमी का मुख्य प्रभाव पत्तियों पर पड़ता हैं, जिससे पत्तियां पतली, लम्बी व पीली हो जाती हैं और पौधे की बढ़वार धीमी पद जाती हैं। प्याज के कंद मुलायम होकर पिले पड़ जाते हैं।

उपचार

इसकी कमी को पूरा करने के लिए कॉपर सल्फेट (नीला थोथा) 5-10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बुवाई से पूर्व खेत की मिट्टी में मिलावें। खड़ी फसल में 0.1% कॉपर सल्फेट घोलकर बुझा हुआ चुना 0.5%  के घोल के साथ अर्थात 100 ग्राम-कॉपर सल्फेट घोलकर बुझा हुआ चुना 0.5% के घोल के साथ अर्थात 100 ग्राम-कॉपर सल्फेट को 100लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

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बोरोन

मिट्टी में बोरोन तत्व की कमी होने पर पौधे की नयी पत्तियां पतली होकर मूड जाती हैं। पौधे के अग्रभाग मरने लगते हैं तथा पौधे छोटे हो जाते हैं। इसके अभाव में फलीदार सब्जियों की जड़ों पर फूलगोभी में फल भूरे और पत्तियों के किनारे पीले और हल्के लाल रंग के होने लगते हैं तथा तना खोखला हो जाता हैं। पत्तागोभी में बोरोन की न्यूनता के कारण पौधों का छोटे कद का होना तथा पत्तियों का फटना और अंत में पत्तियों में सड़ने तथा दुर्गन्ध आना जैसे लक्षण विकसित हो जाते हैं। खीरे में इसके प्रभाव से पहले पत्तियों का रंग गहरा होने लगता हैं तथा बाद में पत्तिया गुच्छे का रूप धारण करना आरम्भ कर देती हैं और अंत में शीर्षस्थ कलिका मर जाती हैं लौकी की सतह मोटी होकर फटने लगती हैं। प्याज, टमाटर, मूली, शक्करकंद, तरबूज आदि पर इसके प्रभाव देखे गये हैं।

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मोलिब्डेनम

पौधों में इसके अभाव से पुरानी पत्तियों के अगले सिरे सुख जाते हैं तथा पत्तियां पतली होकर मुड़ जाती हैं। नयी पत्तियाँ पतली होकर मुड़ जाती हैं इसके अभाव में फूल गोभी में व्हिपेटल नामक बीमारी हो जाती हैं जिससे पत्तियों का उचित विकास न होकर केवल मध्य सिरे का ही विकास होता हैं, टमाटर के पौधे की निचे की पत्तियों में मोल्टिंग में क्रॉसिंग व पत्तियों के किनारे मुड़ जाते हैं। इस सूक्ष्म तत्व की कमी के लक्षण टमाटर, गोभी, पालक, चुकंदर आदि में देखे गये हैं।

उपचार

मोलिब्डेनम की कमी के निवारण के लिए 0.5% सोडियम मोलिब्डेनम (500 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) का घोल बनाकर पौधों की पत्तियों पर पर्णीय छिड़काव करें। छिड़काव सम्भव न हो तो 1.0 से 1.5 किलोग्राम सोडियम मोलिब्डेनम या अमोनियम मोलिब्डेनम का प्रयोग भूमि में करना चाहिए।

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क्लोरीन

पौधों में क्लोरीन की कमी से पत्तियाँ जलकर गिर जाती हैं, टमाटर की गुणवत्ता गिर जाती हैं। चुकंदर, गाजर, गोभी आदि शर्करा बढ़ोतरी हेतु अति आवश्यक तत्व हैं।

उपचार

इस तत्व की कमी की पूर्ति के लिए क्लोरीन युक्त उर्वरकों का प्रयोग किया जाता हैं।

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सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के कारण व निवारण

पौधों को इनकी उपलब्धता बढ़ाने के लिए भूमि में ये सूक्ष्म तत्व लोहा, ताम्बा, मेगनीज, जिंक, बोरोन, मोलिब्डेनम एवं क्लोरीन आदि का प्रयोग किया जाता हैं। क्योंकि सघन खेती करने की वजह से भूमि में वर्तमान इन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होने लगी हैं। जिस तरह आदमी सर्दियों के मौसम में बादाम,  मोगर आदि के लड्डू बनाकर खाता हैं ताकि उसकी उम्र बढ़े व शरीर बलवान रहें व कार्य करने की शक्ति बनी रहें ठीक उसी प्रकार जमीन से फसलों व सब्जियों की बम्पर या अधिक पैदावार हेतु किसानों को उक्त सूक्ष्म पोषक तत्वों को जमीन में मोगर के लड्डू के रूप में खिलाना चाहिये ताकि जमीन की उपजाऊ शक्ति बनी रहे, इसके लिए उक्त सूक्ष्म तत्वों के अतिरिक्त जैविक खाद-वर्मी कम्पोस्ट का अधिकाधिक प्रयोग करें ताकि जमीन में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी न होवे।

हर किसान का सपना होता हैं की उसका खेत हरे-भरे और खुशहाली से लहलहाती रहें। भरपूर फसल ही किसान को अधिक लाभ और खुशहाली दे सकती हैं, जब हर किसान उसके खेत की मृदा जांच कराकर उसकी सिफारिश अनुसार खाद व उर्वरकों का फसल में संतुलित मात्रा में प्रयोग करें।

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