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सूक्ष्मजीव से कीटों एवं रोगों का नियंत्रण

सूक्ष्मजीव
Written by bheru lal gaderi

आजकल किसान ज्यादा उत्पादन की चाह में अत्यधिक रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग कर रहा है। पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा मिला है व इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। प्रकृति में बहुत से ऐसे सूक्ष्मजीव(Microorganism) हैं जैसे- विषाणु, जीवाणु, एवं फफूंद जो शत्रु कीटों में रोग उत्पन्न कर उन्हें नष्ट कर देते हैं। इन्ही विषाणु, जीवाणु, एवं फफूंद आदि को वैज्ञानिकों ने पहचान कर प्रयोगशाला में इनका बहुगुणन किया तथा प्रयोग हेतु उपलब्ध करा रहे हैं। जिनका प्रयोग कर किसान लाभ ले सकते हैं।

सूक्ष्मजीव जैविक कीटनाशक (बैक्टीरिया)

 1. जीवाणु (बैक्टीरिया)

मित्र जीवाणु प्रकृति में स्वतंत्र रुप से मृदा में पाए  जाते हैं जो कीटों  की रोकथाम के लिए उपयोगी पाए गए हैं। परंतु इन सूक्ष्मजीव का उपयोग सरल बनाने के लिए इन्हें कृत्रिम रूप से प्रयोगशाला में उनकी सीफियू को बढ़ाकर बाजार में पहुंचाया जाता है, जिसका प्रयोग खेतों में मुख्यतया लेपिडोप्टेरा वर्ग के कीड़ों की रोकथाम के लिए करते हैं।

बेसिलस थुरिनजेनेसिस (बीटी)

सूक्ष्मजीव

Image Credit – The University of Tennessee, Knoxville

यह एक बैक्टीरिया है जिसका, उपयोग जैविक कीटनाशक के रूप में किया जाता है। इसके प्रोटीन निर्मित क्रिस्टल क्राई प्रोटीन में कीटाणु नाशक गुण पाए जाते हैं, जो कीटों के लिए घातक जहर हैं।

यह एक विकल्पी  बैक्टीरिया है, जो फसलों में नुकसान पहुंचाने वाले कीटों जैसे चने की सुंडी, तम्बाकू की सुंडी, सेमीलूपर, लाल बालदार सुंडी, सैनिक कीट एवं  डायमंड बैक मोथ आदि की रोकथाम के लिए एक किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करने पर अच्छे परिणाम मिलते हैं।

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व्यापारिक नाम:-

बाजार में बॉयो लेप, बायॉ अस्प, डियो पेल, डेल्फिन, बॉयो बिट, हाल्ट आदि नामो से मिलते हैं।

2. वायरस

न्यूक्लिअर पाली हैड्रोसिस वायरस (एन.पी.वी.)

सूक्ष्मजीव

Image Credit – nu.nl

यह सूक्ष्मजीवी जो केवल न्यूक्लिक एसिड एवं प्रोटीन के बने होते हैं, वायरस कहलाते हैं। इन वायरसों से प्रभावित पत्ती को खाने से सुंडी  सर्वप्रथम संक्रमित सुंडी सुस्त हो जाती है। खाना छोड़ देती है एवं सफेद रंग में परिवर्तित होती हैं और बाद में काले रंग में बदल जाती है तथा पत्ती पर उल्टी लटक जाती हैं और 6-7 दिन के अंतराल में मर जाती है। इस जैविक उत्पाद को 250 एल.ई. प्रति हेक्टर की मात्रा से आवश्यक पानी में मिलाकर फसल में छिड़काव करें।

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व्यापारिक नाम:-

यह बाजार में हेलीसाइड, बायो वायरस-एच, हेलिओसेल, बायो-वायरस-एस, स्पोडो-साइड,  प्रोडक्ट के नाम से उपलब्ध है।

ग्रेनुलोसिस वायरस (जी.वी.)

इस सूक्ष्मजीव वायरस का प्रयोग गन्ना का तनाछेदक, गोभी की सुंडी आदि की रोकथाम के लिए किया जाता है।

प्रयोग-

एक किलोग्राम पावडर को 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

3. फफूंदी-

ब्यूवेरिया बसियाना-

इस फफूंदी का प्रयोग लेपिडोप्टेरा वर्ग की सुंडियों जैसे- चने की सुंडी, लाल बालदार सुंडी, वुली एफिड, सफेद मक्खी एवं स्पाइडर माइट आदि  की रोकथाम के लिए किया जाता है।

व्यापारिक नाम-

यह बाजार में बायो रिन, लार्वो सील,दमन एवं अनमोल बोस के नाम से उपलब्ध है।

मेटारिजियम एनीसोपाली-

एक उपयोगी जैविक फफूंदी है, इसका प्रयोग दीमक, ग्रास होपर, प्लांट हॉपर, वुली एफिड, एवं बीटल की रोकथाम के लिए करते है।

मित्र फफूंदियों को प्रयोग करने की विधि:-

मित्र फफूंदियों की 50 ग्राम मात्रा को स्टिकर एजेंट के साथ 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ क्षेत्र में सुबह शाम के समय छिड़काव करें।

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सूक्ष्मजीव जैविक रोग नाशक

ट्राइकोडर्मा-

ट्राइकोडर्मा एक मित्र फफूंदी है, जो फसल को नुकसान पहुंचाने वाले हानिकारक फफूंदी को नष्ट करती है।  ट्राइकोडर्मा का प्रयोग मृदा  जनित रोगों जैसे- उकठा, जड़ गलन, कॉलर सड़न आदि के लिए विभिन्न प्रकार की दलहनी, तिलहनी, सब्जियों एवं कपास में प्रयोग किया जाता है। ट्राइकोडर्मा की विभिन्न प्रजातियों में ट्राइकोडर्मा विरडी और ट्राइकोडर्मा हर्जियानम का प्रयोग अधिक किया जाता है।

व्यापारिक  नाम:-

यह बाजार में बायोडर्मा, निपरोट, अनमोलडर्मा  के नाम से उपलब्ध है।

2. स्युडोमोनास फ्लोरोसेंस

सूक्ष्मजीव

Image Credit – JGI Genome Portal

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यह एक सूक्ष्मजीव है, जिसका प्रयोग गन्ना में लाल सड़न, ज्वार में कोलर सड़न एवं अन्य मृदा जनित रोगों की रोकथाम के लिए किया जाता है।

प्रयोग विधि-

बीज शोधन-

बीजोपचार के लिए 5-10 ग्राम पाउडर प्रति किलो बीज में मिलाया जाता है। परंतु सब्जियों के बीज के लिए यह मात्रा 5 ग्राम प्रति 100 ग्राम बीज के हिसाब से उपयोग में लाई जाती है।

भूमि शोधन-

एक किलोग्राम पाउडर को 25 किलोग्राम कंपोस्ट खाद में मिलाकर 1 सप्ताह तक छायादार स्थान पर रखकर उसे गीली बोरी इसे ढका जाता है ताकि स्पोर अंकुरित हो जाय। फिर इस कंपोस्ट को एक एकड़ खेत में मिलाकर फसल की बुवाई की जाती है।

खड़ी फसल पर छिड़काव-

पौधों में रोग के लक्षण दिखाई पड़ने पर बीमारी की प्रारंभिक अवस्था में ही 5 से 10 ग्राम पाउडर को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने पर अच्छा परिणाम दिखाई देता है।

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स्रोत :-

कृषि भारती

वर्ष- 8, अंक- 02, 16/11/2017

जयपुर

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Mob.-09983353511

लेखक :-

पुरुषोत्तम शर्मा, रतनलाल शर्मा एवं सुरेश वर्मा

जयपुर

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