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सल्फर का प्रयोग कपास की फसल में जरूरी

सल्फर का प्रयोग कपास की फसल में
Written by bheru lal gaderi

कपास भारत की प्रमुख नकदी फसलों में गिनी जाती हैं। क्षेत्रफल की दृष्टि से देखा जाये तो भारत विश्व में सर्वाधिक कपास उगाने वाला देश हैं और उत्पादन की दृष्टि से देखा जाए तो चीन के बाद दूसरे नंबर पर आते हैं। लेकिन एक यह भी सच हैं की हम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से विश्व में 33 वें स्थान पर आते हैं। यह तक की हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान की औसत उपज हमारे भारत से ज्यादा हैं। हमारे देश में कपास का उत्पादन 517 किलो प्रति हेक्टेयर हैं जो दूसरे देशों की तुलना में काफी कम हैं। TSI, IFA, FAI  सर्वेक्षण के अनुसार राजस्थान की भूमि में सल्फर की कमी पाई गई हैं जो की लगभग 21-50% तक हैं जो की कम पैदावार का प्रमुख कारक हैं।

सल्फर की कमी की वजह से कपास की फसल में जड़ों का समुचित विकास नहीं हो पाता, सीधा असर फसल के वृद्धि विकास पर जाता हैं। फसल कमजोर रहती हैं। पत्तों में क्लोरोफिल कम बनता हैं। जिसके कारण पौधा सम्पूर्ण भोजन ग्रहण नहीं कर पाता तथा फसल में पीलापन रहता हैं जिससे बाद में पैदावार बहुत ही कम आती हैं नजीजा किसानों की आय भी कम हो जाती हैं। तो किसान भाई सल्फर की पूर्ति के लिए विश्व के सर्वाधिक किसानों द्वारा उपयोग में लाया जाने वाला सल्फर खाद कोसावेट फर्टिस का प्रयोग अपनी कपास की फसल में अवश्य करना चाहिये।

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सल्फर का प्रयोग कपास की फसल में

कपास की फसल में संतुलित खादों का प्रयोग

पंजाब, हरियाणा और गुजरात की औसत उपज राजस्थान से बहुत ज्यादा हैं। संतुलित खादों का प्रयोग करते हुए उन्नत ढंग से खेती की जाये तो कपास की पैदावार को दो से तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता हैं। कम पैदावार के कई कारण हैं जैसे अच्छी किस्में, संतुलित खाद, खरपतवार, कीट, बीमारियां आदि लेकिन संतुलित खास सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं। किसान भाई यूरिया, डी. ए. पी. (D.A.P.) और पोटाश खाद का प्रयोग अपनी कपास की फसल में करते हैं, लेकिन चौथा जरूरी खाद सल्फर की पूर्ति नहीं कर पाते हैं। संतुलित खाद परियोजना के तहत भारत सरकार ने सल्फर को चौथा जरूरी पोषक तत्व के रूप में शामिल किया हैं।

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सल्फर खाद के लाभ

Partical Size-24 Micro की होती हैं। जिसके कारण यह पानी में शीघ्रता से घुलनशील होती हैं तथा यह जमीन में फैलती हैं। जिससे पौधों की जड़ों तक आसानी से पहुच जाती हैं। सल्फर तत्व भी नाइट्रोजन (यूरिया) और फास्फोरस की तरह ही एक जरूरी पोषक तत्व हैं। सल्फर तत्व पौधों, एमिनो एसिड्स प्रोटीन और एन्जाइम्स का निर्माण करने में सहायता होते हैं जो की पौधों में वृद्धि विकास के लिए बहुत जरूरी हैं। सल्फर तत्वसे भूमि का पी.एच. मान सामान्य रहता हैं। सल्फर तत्व जड़ों का बेहतर फैलाव करता हैं। जड़ें गहराई तक जाती हैं तथा Secondary Root Development  होता हैं जिससे जड़े जमीन में पड़े अन्य पोषक तत्वों को भी आसानी सी ग्रहण करती हैं।

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फसल में हरापन ज्यादा रहता

सल्फर तत्व प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में भी मुख्य भूमिका निभाता हैं। हरित लवक (पत्तियों का हरा भाग) ज्यादा बनता हैं। जिससे फसल में हरापन ज्यादा रहता हैं। पौधों में शाखाए ज्यादा निकलती हैं, पत्तिया ज्यादा आती हैं जिससे पौधों की अच्छी वृद्धि विकास होता हैं। फसल को सल्फर देने से पौधा मजबूत लम्बा तथा ज्यादा हरा भरा रहता हैं। फलस्वरूप फूलों, डेड़ु की संख्या ज्यादा आती हैं। टिण्डों का आकर बड़ा और वजनदार, अच्छी किस्म की कपास में (रेशा) आता हैं, फूल कम गिरते हैं और अंत में ज्यादा पैदावार और अच्छी गुणवत्ता वाला रेशा प्राप्त होता हैं। जिसका बाजार भाव भी किसान भाइयों को ज्यादा मिलता हैं और किसानों की आय में वृद्धि होती हैं। कोसोवेट फर्टिस के प्रयोग से पैदावार में 20-30% की वृद्धि संभव हैं।

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प्रयोग का तरीका

कोसावेट फर्टिस (सल्फर ) का प्रयोग फसल की बुवाई से 30-40 दिन तक यूरिया के साथ करें तथा दोबारा 70-75 दिन पर 3-6 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से करना चाहिये।

सल्फर तत्व का प्रयोग नाइट्रोजन की प्रत्येक 6 यूनिट के साथ सल्फर की 1 यूनिट का प्रयोग जरूरी हैं। अर्थात किसी फसल में यदि 6 किलो नाइट्रोजन (13 किलो यूरिया) का प्रयोग किया जाता हैं तो उसमे 1 किलो सल्फर का प्रयोग जरूरी हैं। केसावेट फर्टिस को गीली रेत अथवा यूरिया के साथ मिलाकर इस्तेमाल करें।

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