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सरसों की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

सरसों
Written by bheru lal gaderi

सरसों एवं राइ की गिनती भारत की प्रमुख तीन तीलहनी फसलों (मूंगफली,सरसों,सोयाबीन) में होती है जो देश में आई “पीली क्रांति” के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। जिसके कारन भारत द्वारा तेलों के आयात में न केवल आशातीत कटौती हुई बल्कि निर्यात की संभावनाए भी बढ़ी है।

सरसों

सरसों की खेती सिंचित एवं असिंचित दोनों अवस्थाओं में सफलतापूर्वक ली जा सकती है। उत्पादन तकनीक के सबसे महत्वपूर्ण पहलु क्षेत्र विशेष के लिए उपयुक्त किस्म का चुनाव एवं उचित सस्य तकनीक होता है।

खेत की तैयारी

सरसों की फसल लेने के लिए दोमट व हल्की दोमट मृदाएं सर्वोत्तम रहती है, जिनमे उचित जल निकासी की व्यवस्था हो। इसको हल्की ऊसर भूमि में भी बोया जा सकता है। सरसों का बीज छोटा होने के कारण खेत की तैयारी के समय ढेले व मृदा जल की कमी नहीं होनी चाहिए वरना अंकुरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

बारानी खेती के लिए भूमि को खरीफ में पडत छोड़ कर समय-समय पर 4-6  बार जुताई करनी चाहिए। जिससे मृदा में नमी बनी रहे। जबकि सिंचित खेत्रों में भूमि की तैयारी खरीफ की फसल कटने के बाद प्रारम्भ की जा सकती है। भूमि की जुताई के बाद पता अवश्य लगाए ताकि मृदा में प्रयाप्त नमी की मात्रा बानी रहे।

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दीमक एवं अन्य कीट नियंत्रण

यदि खेत में दीमक एवं अन्य कीटों का प्रकोप अधिक हो तो इसके नियंत्रण के लिए अंतिम जुताई के समय क्यूनॉलफॉस 1.5% या मिथाईल पैराथियान 2% चूर्ण 25किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। साथ ही उत्पादन बढ़ने के लिए एजोटोबेक्टर एवं पी.सी.बी. कल्चर को 50 किग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट में मिलाकर अंतिम जुताई से पूर्व खेत में डालना चाहिए।

बीज की मात्रा

सदैव प्रमाणित बीज काम में लेंवे एवं सरसों की शुष्क  क्षेत्रों में बुवाई हेतु 4-5 किग्रा./हेक्टेयर एवं  सिंचित क्षेत्रों में बुवाई के लिए 3-4 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की दर उपयुक्त रहती है।

बीज उपचार एवं बुवाई

बुवाई से पूर्व मेंकोजेब या थाइरम (2-2.5 ग्राम/किग्रा. बीज ) आदि कवकनाशी से बीज उपचार करना चाहिए। यदि सफ़ेद रोली का प्रकोप अधिक होता है तो बीजों को एप्रोन 35 एस. डी. 6 ग्राम/किग्रा.  बीज की दर से उपचारित कर बोना चाहिए। खड़ी फसल में बुवाई के 30-40 दिन बाद मेंकोजेब का 0.2% या जाइनेब  का 0.25% का छिड़काव करें।

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सरसों की उन्नत किस्में

किस्म

पकने की अवधि (दिन) औसत उपज (क्वीन./है.) तेल की मात्रा

विशेष गुण

(A) उचित समय पर बोन वाली किस्में :-

पूसा बोल्ड 130-140 15-18 38-40 प्रतिशत फलियां मोटी व हरी तथा पकने पर सुनहरी भूरे रंग की हो जाती हैं।
आए.एच.-30 130-135 18-20 38-39 प्रतिशत सिंचित एवं असिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त यह किस्म फली छिटकने से प्रतिरोधी क्षमता रखती हैं।
पी.आर.-15 125-135 15-18 40 प्रतिशत सिंचित एवं असिंचित क्षेत्रों में बुवाई के लिए उपयुक्त यह किस्म तुलसिता व सफेद रोली रोधक तथा पीला के लिए प्रति अधिक सहनशील हैं।
टी-59 (वरुणा) 135-140 15-18 36-38 प्रतिशत सिंचित एवं असिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त यह किस्म सफेद रोली से ग्रहणशील हैं तथा इसमें मोयला कम लगता हैं।
पी.सी.आर.-7
130-135 18-20 38 प्रतिशत इस किस्म में फली छिटकने व फसल गिरने से बचाव की क्षमता होती हैं।
पूसा जय किसान (बायो-902 ) 130-135 18-20 38 प्रतिशत सफेद रोली, मुर्झान व तुलसिता रोगों का प्रकोप कम होता हैं। इसके तेल में असंतृप्त वसीय अम्ल होता हैं, इसलिए इसका तेल खाने के लिए अधिक उपयुक्त होता हैं।
लक्ष्मी (आर.एच.-8812) 140-145 20-22 40 प्रतिशत समय पर बुवाई एवं सिंचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त इस किस्म की फलिया मोती एवं पकने पर चटकती नहीं हैं।
जगन्नाथ

(वी. एस. एल.-5)

125-130 20-22 39-40 प्रतिशत सिंचित एवं समय पर बुवाई के लिए उपयुक्त यह किस्म पत्ती धब्बा रोग तथा सफेद रोली से मध्यम प्रतिरोधी हैं।

माया (आर.के.-9902)

130-135 20-25 39-40 प्रतिशत यह किस्म सिंचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त हैं। फलिया पकने पर भूरी व दानो में उभारयुक्त एवं खुली तरह की होती हैं।
वसुंधरा (आर.एच.-9304) 130-135 22-25 38-40 सिंचित क्षेत्र में बोने के लिए उपयुक्त यह किस्म सफेद रोली से मध्यम प्रतिरोधी तथा फली छिटकने से प्रतिरोधी हैं।
अरावली (आर. एन.-393) 135-140 22-25 42 फली 4-5 से.मी. लम्बी तथा उसकी नोक छोटी एवं सुई जैसी होती हैं। बीज गहरे भूरे एवं मध्यम आकार के होते हैं।
आर. जी. एन.-73 125-130 20-22 40-41 सिंचित क्षेत्र में बोने के लिए उपयुक्त यह किस्म पत्ती धब्बा रोग तथा सफेद रोली से सहनशील हैं। यह किस्म बुवाई के समय उच्च ताप से प्रतिरोधी हैं।
सी. एस.-52 135-145 14-15 41 क्षारीय मृदाओं के लिए अनुमोदित इस किस्म में क्षारीय सहनशीलता होती हैं।
सी. एस.-54 140-147 14-15 39-41 यह किस्म लम्बी शाखाओं वाला एवं शीघ्र पकने वाली हैं तथा पाले के प्रति मध्यम सहनशील हैं।

(B)सरसों की देरी से बोने वाली किस्मे

स्वर्ण ज्योति

आर.एच.-9802

125-130 13-15 39-42 यह किस्म सिचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त हैं। फसल गिरने एवं फली छिटकने से प्रतिरोधी तथा पाले के प्रति मध्यम सहनशील हैं।
आर्शीवाद (आर.के.-01-03) 120-130 13-15 39-42 देरी से बुवाई के लिए उपयुक्त यह किस्म फली छिटकने से प्रतिरोधी एवं पाले से मध्यम प्रतिरोधी हैं।

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फसल ज्यामिति एवं बुवाई का समय

बारानी क्षेत्रों में सरसों की बुवाई 15 सितम्बर से 15 अक्टुम्बर तक एवं सिंचित क्षेत्रों में 10 से 25 अक्टुम्बर तक कर लेनी चाहिए। यदि फसल को देरी से बोया जाता हैं तो पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं साथ ही चैंपा एवं सफेद रोली आदि के अधिक प्रकोप की संभावनाए रहती हैं।

सरसों की बुवाई निम्न प्रकार से करें

पंक्ति से पंक्ति की दुरी 30-45 से.मी.

पौधे से पौधे की दुरी 10-15 से.मी.

बीज की गहराई 4-5 से.मी.

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

सरसों की फसल प्रारम्भिक अवस्था में अधिक तेजी से वृद्धि करती हैं। अतः इस फसल के द्वारा शीघ्रता से पोषक तत्व ग्रहण किये जाते हैं। इसलिए सिंचित फसल के लिए 8-10 टन सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के लिए 3-4 सप्ताह पूर्व खेत में डालकर खेत की तैयारी करें एवं बारानी क्षेत्र में वर्षा से पूर्व 4-5 टन सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर खेत में डाल देवे।

एक दो वर्षा के बाद खेत में समान रूप से फैलाकर जुताई करें। सिंचित क्षेत्रों में 80 की.ग्रा. नत्रजन, 30-40 की.ग्रा. फास्फोरस एवं 375 की.ग्रा. जिप्सम या 60 की.ग्रा. गंधक चूर्ण प्रति हेक्टेयर की दर से डाले। नत्रजन की आधी व फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय देवे। शेष आधी मात्रा (नत्रजन) प्रथम सिंचाई क्षेत्रों से आधी मात्रा से उर्वरक बुवाई के समय देवे।

सिंचाई

सरसों की फसल में सही समय पर सिंचाई देने पर पैदावार में बढ़ोतरी होती हैं। यदि वर्षा अधिक होती हैं तो फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती हैं, परन्तु यदि वर्षा समय पर न हो तो 2 सिंचाई आवश्यक हैं।

सरसों की उन्नत खेती

प्रथम सिंचाई बुवाई के 30-40 दिन बाद (फूल आने से पहले) एवं द्वितीय सिंचाई 70-80 दिन की अवस्था में करें। यदि फसल की कमी हो तो एक सिंचाई 40-50 दिन की फसल में करें।

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निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण

सरसों की फसल में प्रारम्भिक अवस्था में खरपतवार नियंत्रण परम् आवश्यक हैं। यदि फसल में पौध संख्या अधिक हो तो बुवाई के 20-25 दिन बाद निराई-गुड़ाई के साथ-साथ पौधे निकालकर पौधे से पौधे की दुरी 10-15 से.मी. रखें। प्रथम सिंचाई से पूर्व निराई-गुड़ाई करना लाभप्रद रहता हैं। इससे पोधो की बढ़वार अच्छी होती हैं। रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण हेतु पलेवा करके फ्लूक्लोरेलिन एक लीटर सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में मिलाकर बुवाई कर देनी चाहिए। सुखी बुवाई की स्थिति में पहले फसल की बुवाई करें उसके उपरांत फ्लूक्लोरेलिन का छिड़काव कर सिंचाई करें।

फसल की कटाई

सरसों की फसल 120-150 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। इस फसल में उचित समय पर कतई करना अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि यदि समय पर कटाई नहीं की जाती हैं तो फलिया चटकने लगती हैं एवं उपज में 5-10% की कमी आ जाती हैं। जैसे ही पौधे की पतियों एवं फलियों का रंग पीला पड़ने लगे कटाई कर लेनी चाहिए।

सरसों की उन्नत खेती

कटाई के समय इस बात का विशेष ध्यान रखे की सत्यनाशी खरपतवार का बीज, फसल के साथ न मिलने पाये नहीं तो इस फसल के दूषित तेल से मनुष्य में “ड्रोप्सी” नामक बीमारी हो जायेगी। सरसों में केवल टहनियों को काटकर बंडलों में बांधकर खलियान में पहुंचा देवे एवं कुछ दिन तक फसल को सूखने के पश्चात थ्रेसर से निकाल लेवे फिर बीज को फर्श पर सुखाने के बाद उचित नमी की अवस्था में आने पर बोरियों में भरकर भंडारगृह में पहुंचा देना चाहिए।

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