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समन्वित पौध व्याधि प्रबंधन

समन्वित पौध व्याधि प्रबंधन
Written by bheru lal gaderi

समन्वित पौध व्याधि प्रबंधन में अधिकतर रासायनिक दवाओं का प्रयोग किया जाता रहा है। आज इसका प्रचलन इतना बढ़ गया है कि भूमि, वायु, जल आदि में उनका समावेश खतरे के निशान से कहीं ऊपर पहुंच गया है साथ ही प्रकृति में उपस्थित जैविकी और संतुलन में भी वृद्धि हो गई है। रासायनिक दवाओं के निरंतर प्रयोग से हानिकारक जीवाणुओं के साथ-साथ लाभकारी जीवाणु का नाश हुआ है। इसके कारण रोग प्रतिरोधक में भी कमी आंकी गई है।

समन्वित पौध व्याधि प्रबंधन

नई-नई जीवाणुओं द्वारा तथा फफूंद द्वारा नई-नई बीमारियों का प्रकोप निरंतर बढ़ता जा रहा है। नतीजन करोड़ों रुपयों के फफूंदनाशको का प्रयोग करने से भूमि की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। समन्वित पौध व्याधि प्रबंधन में यांत्रिक, जैविक एवं रासायनिक तरीके एक दूसरे के पूरक के रूप में काम में लिए जाते हैं। इसके द्वारा पौधों समन्वित पौध व्याधि प्रबंधन पर नियंत्रण कर उन्हें आर्थिक नुकसान से बचाया जा सकता है।

समन्वित पौध व्याधि प्रबंधन के मुख्य बिंदु

प्रतिरोधी किस्में

समन्वित पौध व्याधि प्रबंधन हेतु समय- समय पर विकसित रोग रोधी किस्मों का चुनाव कर ज्यादा से ज्यादा प्रयोग में लेना चाहिए। जैसे- बाजरे में जोगिया या हरित बाली रोधक किस्में- आई.सी.एम.एच.-356, राज- 171, एच.एम.बी.- 67 आर.एच.बी.-90, मक्का में तुलसिता एवं तना सड़न रोग रोधक किस्मे -अरावली मक्का, प्रताप मक्का-3 एवं प्रताप मक्का-5 सोयाबीन में पत्ती धब्बा रोग तथा वायरस जनित रोग रोधक किस्मे में एन.आर.सी.- 37 एवं प्रताप सोया-2, कपास में चित्तीदार सुंडी,  अमेरिकन एवं गुलाबी सुंडी के प्रति बीटी कपास की अवरोधी किस्में एम.आर.सी.एच.-6025(बीजी-1), आर.सी.एच.-134(बीजी-1), एवं एम.आर.सी.-7017(बीजी-2), तथा गेहूं में रोली रोधक में रोधक किस्मे राज-3037, राज-3065, राज-3777, जौ में रोली रोधक किस्में आर.डी.2052, आर.डी.2053, आर.डी.2058

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शस्य क्रियायें

जैसे गर्मी में गहरी जुताई, फसलों में अवशेष को नष्ट करना, उचित समय पर बीजों की बुवाई, फसल चक्र अपनाना, समय पर खरपतवारों को निकाल कर नष्ट करना आदि क्रियाएं अपनानी चाहिए। उदाहरण के लिए गर्मी में गहरी जुताई कर मिट्टी को खोल लिया जावे तो सूत्रकृमि जनित एवं अन्य भूमि जनित रोगों से फसलों को बचाया जा सकता है। इसी प्रकार यदि मूंगफली की बुआई 15 दिन पहले कभी जावे तो गुच्छा रोग में कमी आती है। मई- जून के महीने में गेहूं के बीजों को सौर उपचार द्वारा अनावृत कण्डवा रोग से बचाया जा सकता है।

व्याधि सर्वेक्षण

लगातार सर्वेक्षण से मौसम की स्थिति, भिन्न फफूंदों/जीवाणुओं की संख्या, शस्य विधियों को अपनाना, खेती की दशा के बारे में पूर्ण जानकारी होना संभव हो सकता है इसके माध्यम से खेतों में बुवाई से पूर्व या बाद में अपनाए जाने वाली क्रियाओं को आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं तथा व्याधि नियंत्रण में भी सहायता मिल सकती है। फफूंदी जीवाणु के पूरे जीवन चक्र की जानकारी भी मिल जाती है अतः यह संभव हो जाता है कि व्याधि की रोकथाम हेतु कौनसी प्रक्रिया अपनाई जावे ताकि ज्यादा से ज्यादा फसल को राहत मिले।

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जैविक नियंत्रण

बीजोपचार में ट्राइकोडर्मा, राइजोबियम तथा एजेक्टोबेक्टर तथा अन्य जैविक एजेंटों (जीवाणु खाद) करना चाहिए। वर्मीकंपोस्ट खाद तथा गोबर की खाद का इस्तेमाल करना चाहिए। जैसे प्याज के बीजों में ट्राइकोडर्मा द्वारा उपचारित करने पर गंठिया तैयार की जा सकती है। नीम आधारित फफूंदनाशकों का प्रयोग करके फसलों को व्याधियों से बचाया जा सकता है।

सबसे जरूरी है स्थानीय समूह का सहयोग। जिस प्रकार समन्वित प्रबंधन के लिए सभी क्रियाएं जरूरी है उसी प्रकार जो भी प्रयास हो सामूहिक हो ताकि आस- पास के खेतों में बीमारियों का प्रकोप कम हो सके।

ट्राइकोडर्मा से भूमि उपचार

2.5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर को 100 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद (बारीक़ की हुई) में मिलाकर 8 से 10 दिन तक छायादार स्थान पर रखकर की गीले बोरी के टाट से ढक दें एवं 23 दिन के अंतराल पर उलटफेर करते रहे। बुवाई पूर्व तैयार खाद को एक हेक्टेयर में मिला दे।

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समन्वित पौध व्याधि प्रबंधन से लाभ

  • पर्यावरण में प्रदूषण कम होता है एवं मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
  • प्रकृति में जैविक असंतुलन पैदा नहीं होता है.
  • फूल, सब्जियां आदि में रसायनों के अवशेषों के संगुहण से बचाव होता है।
  • मित्र फफूंद/ जीवाणुओं का बचाव होता है।

फफूंदनाशी रसायनों की अन्य कृषि रसायनों के साथ संयोजकता

कभी-कभी रोगों की रोकथाम हेतु विभिन्न रसायनों को मिलाकर भी प्रयोग में लाया जाता है। एक से अधिक रसायनों का मिलकर प्रयोग करना आर्थिक दृष्टि से भी लाभकारी पाया गया है। क्योंकि कभी-कभी एक छिड़काव के बाद दूसरा उपचार छिड़काव तुरंत करना पड़ता है। अतः यह जानना जरूरी है कि रसायन का छिड़काव/ उपचार दूसरे रसायन के छिड़काव/ उपचार को प्रभावित नहीं कर रहा है। उदाहरण के तौर पर कीटनाशक फफूंदनाशक तथा रासायनिक उर्वरकों के साथ काम में लाया जा सकता है परंतु क्षारीय पदार्थ के साथ केप्टान क्रिया कर डिकम्पोज हो जाता है। कुछ एग्रोकेमिकल्स की फफूंदनाशी शक्ति बढ़ जाती है जब उसे दूसरे फफूंदनाशी के साथ काम में लाया जाता है। जैसे कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के साथ जैनब, कैप्टान,सल्फर, थाइरम। हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि मिश्रण एक विशेष अनुपात में मिलाने पर ही प्रभावी होता है।

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प्रस्तुति

सोमेंद्र शर्मा जयपुर

स्त्रोत

कृषि भारती

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