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समन्वित कीट प्रबंधन के अवयव एवं रोकथाम

समन्वित कीट प्रबंधन के अवयव एवं रोकथाम
Written by bheru lal gaderi

कीट प्रबंधन के सांस्कृतिक तरीकों में ऐसे समाधान शामिल है जिनमें कीट प्रबंधन के लिए नियमित रूप से की जाने वाली खेती के दौरान यहां तो कीटों को नष्ट कर दिया जाता था यहां उन से फसल को होने वाले आर्थिक नुकसान से बचा जाता था

समन्वित कीट प्रबंधन के अवयव एवं रोकथाम

Image Credit-Andhra Pradesh – Allbiz

इन विभिन्न सांस्कृतिक तरीकों को निम्नानुसार प्रयोग किया जाता था।

  • नर्सरी तैयार करना या खरपतवार को खेत से हटाकर, बांधों को छोटा करने से, मिट्टी को बेहतर बना कर और जल से गहराई तक खुदाई करने से भी कीटों का सफाया किया जा सकता है। खेती में नालियों की उचित व्यवस्था भी अपनाई जानी चाहिए।
  • मिट्टी के पोषक तत्वों की कमी की जांच करना ताकि उसके हिसाब से उर्वरकों का प्रयोग किया जा सके। बुवाई से पहले साफ और प्रमाणित बीजों का चुनाव करना और उन्हें फंगीसाइड या बायोपेस्टिसाइड द्वारा बुआई के अनुकूल बनाना जिससे कि बीजों द्वारा उत्पन्न होने वाले रोगों पर नियंत्रण पाया जा सके। कीट प्रबंधन के लिए कीट प्रतिरोधी बीजों का चुनाव करना जिनसे कीट प्रबंधन में काफी सहायता मिलती है। जिन मौसम में कीटों का अधिक खतरा रहता है, उन फसलों में बीज बोने या और समय में फेरबदल कर उस समय खेती करने से बचाना। फसलों को बोने के क्रम में गैर-मेजबान फसलों को शामिल करना। इससे मिट्टी जनित रोगों को कम करने में सहायता मिलती है। पौधों के बीज पर्याप्त दूरी रखना जिससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और कीटों के लिए आसान शिकार नहीं बन पाते। उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग किया जाना चाहिए। एफवाईएम बायो फ़र्टिलाइज़र के प्रयोग को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
  • उचित जल प्रबंधन (पानी के ठहराव से बचने के लिए वैकल्पिक रूप से गिला करना व सुखना) क्योंकि मिट्टी में अधिक समय तक रहने वाली नमी कीटों के विकास में सहायक होती है विशेषकर मिट्टी से होने वाले रोगों के लिए।
  • जंगली घास को हटाने का उपयुक्त प्रबंध किया जाना चाहिए। यह जाना-माना तथ्य है कि जंगली घास फसलों के माइक्रोन्यूट्रीयंस को तो कम करती ही है, साथ ही कीटों का अच्छा ठिकाना भी होती है।
  • सफेद मक्खियों और अपहाइड्स के लिए येलोस्टिकी ट्रैप को ऊंचाई पर लगाना।
  • उचित क्रम से बुबाई करना। यहां, समुदाय की कोशिश यह होती है कि फसलों की बुवाई एक बड़े क्षेत्र में एक ही समय पर की जाए जिससे कि कीटों को विकास के लिए विभिन्न तरीके से उगी हुई फसलें ना मिल सके। अधिकृत फसलों को नुकसान पहुंचाते हुए दिखाई देते हैं तो सारे खेतों में नियंत्रण की कार्यवाही की जा सकती है।
  • खेतों के मुहाने और किनारों पर ग्रोइंग ट्रेप फसलें यानी ऐसी फसलें उगाने लगाना जो कीटों की खेतों के किनारे पर ही पकड़ ले। ऐसी कई फसलें हैं जिन्हें किन्ही खास कीटों से नुकसान पहुंचाने की आशंका रहती है। इन्हीं पर कीट सबसे अधिक हमला बोलते हैं। ऐसी फसलों को खेतों के किनारे लगाकर कीटों को वहीं पर रोका जा सकता है और इन्हें समाप्त किया जा सकता है। इन्हें या तो कीटनाशकों द्वारा मारा जा सकता है या अपने प्राकृतिक दुश्मनो के शिकार बन सकते हैं।
  • कीट प्रबंधन के लिए कीट प्रभावित क्षेत्रों में सीडलिंग उपचार करना।
  • जहां भी संभव हो वहां पर इंटर क्रॉपिंग या मल्टीपल क्रॉपिंग करना। ऐसा कोई भी एक कीट सभी प्रकार की फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाता और ऐसी फसलें निरोधक का काम भी करती है, इस प्रकार कीटों को उनकी पसंदीदा फसलों से दूर रखने से भी कीटों पर काबू पाया जा सकता है।
  • भूमि स्तर के अत्यधिक करीब तक छटाई करना। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि कुछ कीटों के विकास अधिकतर पौधे के ऊपरी हिस्से पर ही होता है, जिससे कि अगली फसल में कीटों के विकास की संभावना बढ़ जाती है। इस प्रकार यदि पौधे के उस हिस्से को काट दिया जाएगा तो अगली फसल में कीटों के विकास को रोका जा सकेगा।
  • पौधे लगाने से पहले नर्सरी पौधों पर छिड़काव किया जा सकता है। उन्हें कॉपर फंगीसाइड या बायोपेस्टिसाइड में भिगोया जा सकता है। इससे पौधों को मिट्टी से होने वाले रोगों से बचाया जा सकेगा।
  • फलों के पेड़ों की छंटाई करते समय घनी/टूटी हुई/ बीमार शाखाओं को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए। इन्हें बाद में इकट्ठा नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से कीटों का अपना एक ठिकाना मिल जाएगा।
  • यदि छटाई के समय पेड़ को अधिक नुकसान हुआ है और उस टूटे हुए हिस्से को बोरड़ीओक्स पेस्ट या पेंट से ढकना चाहिए, ताकि पौधों को कीटों के आक्रमण से बचाया जा सके।
  • फलों की उत्कृष्ट फसल के लिए, पॉलीनाइजर कल्टीवर्स के बुके को रखने से बेहतर पोलीनेशन और फलों का उत्पादन होता है।
  • मधुमक्खी के छत्ते को या पॉलीनाइजर कल्टीवर्स के बुके को रखने से बेहतर पोलीनेशन और फलों का उत्पादन होता है।

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कीट प्रबंधन के यांत्रिक तरीके

  • कीट प्रबंधन के लिए अण्डो, लार्वा, संक्रमक कीटों के प्यूपा और वयस्कों और जहां भी संभव हो पौधों के रोगग्रस्त हिस्सों को नष्ट कर देना।
  • खेतों में बांस के पिंजरे और चिड़ियों के बैठने की जगह बनाना और उनके अंदर पेरसिटाइज्ड अंडों को डालना, जिससे की प्राकृतिक दुश्मनों को जन्म हो सके और जहां भी संभव हो सके कीटों पर काबू पाया जा सके।
  • लाइट ट्रैप्स का प्रयोग करना और उनसे फसने वाले कीटों को नष्ट करना।
  • खेतों में चिड़ियों के बैठने के लिए स्थान बनाना और वहां पर उनके आने के लिए कीड़े और उनके अविकसित अंडे लार्वा और प्यूपा रखना।
  • कीड़ों के जन्म की प्रक्रिया में रुकावट डालने, कीड़ों के स्तर पर निगरानी रखने और मास ट्रेपिंग के लिए फेरोमोन का प्रयोग करना।

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अनुवांशिक तरीके 

उचित उपज दर के साथ अपेक्षाकृत कीट प्रतिरोधी/सहनशील किस्मों का चुनाव करना।

नियामक कारवाई

इस प्रक्रिया में, नियामक नियम सरकार द्वारा तैयार किए गए हैं इनके अंतर्गत बीजों और रोग वाले पौधों का देश में आना या देश के एक भाग से दूसरे भाग में ले जाना निषेध है। इन्हें संगरोध तरीके कहा जाता है और यह दो प्रकार के होते हैं एक घरेलू और दूसरा विदेशी संगरोध

कीट प्रबंधन के जैविक तरीके

कीट प्रबंधन और रोग का नियंत्रण जैविक तरीकों से करने का अर्थ ही आईपीएम का सबसे महत्वपूर्ण अवयव। व्यापक अर्थ में, बायोकंट्रोल का अर्थ जीवित जीवों का प्रयोग कर फसलों को कीटों से नुकसान होने से बचाना।

कीट प्रबंधन के लिए कुछ बायोकंट्रोल एजेंट्स इस प्रकार हैं

पेरसिटोईड्स

ये एसे जीव है जो अपने अंडे उनके होस्ट्स के शरीर में या उनके ऊपर रखते हैं और होस्ट के शरीर में ही अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं परिणामस्वरुप, होस्ट की मृत्यु हो जाती है। एक पेरसिटोईड्स दूसरे प्रकार का हो सकता है, यह उसके विकास चक्र पर निर्भर करता है, जिसके आधार पर वह अपना जीवन चक्र पूरा करता है। उदाहरण के लिए अंडा, लार्वा, प्यूपा, अंडों को लार्वल प्यूपल पेरसिटोईड्स।उदाहरण ट्राइकोगर्मा, अपेंटल्स, बेराकॉन, चेलनस, ब्राकेमेरिया, सुडोगोनोटोपस जिव आदि की विभिन्न प्रजातिया हैं।

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प्रिडेटर्स

ये स्वतंत्र रूप से रहने वाले जिव होते हैं जो कि भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं। उदाहरण मकड़ियां, ड्रैगन मक्खियां, डेमसेल मक्खी, लेडी बर्ड, भृंग, क्राइसोपा प्रजातियां, पक्षी आदि।

रोगाणु

यह माइक्रो-जीव होते हैं जो दूसरे जीवों में रोग का संचार कर देते हैं, परिणामस्वरुप दूसरे जीव मर जाते हैं। रोगाणु के बड़े समूह, फंगी, वायरस और बैक्टीरिया होते हैं। कुछ संक्रामक कीटों में कुछ नेमाटोड्स रोग पैदा कर देते हैं।

  • फंगी के महत्वपूर्ण उदाहरण: हरसुटेल, ब्यवेरिया, नोम्यूरेन और मेटारहिजअम।
  • वायरसों में सबसे महत्वपूर्ण न्यूक्लियर पोलिहेड्रोसिस वायरस है।
  • बैक्टीरिया में सबसे सामान्य उदाहरण बेसिलस थुरिगिनसिस (बी.टी.) बी पोपीले हैं।

बायोकंट्रोल के तरीके

कीटों में बीमारी पैदा करने वाले एजेंट को प्रयोगशाला में कम लागत पर द्रव या पाउडर फार्मूलेशन में बढ़ाया जा सकता है। इन दोनों को बायोपेस्टिसाइड कहा जाता है। इन्हें किसी भी सामान्य रसायन कीटनाशक की तरह छिड़का जा सकता है। बायोकंट्रोल के तरीकों की अन्य प्रकार निम्नानुसार है:

परिचय

इस प्रक्रिया में एक नई प्रजाति के बायोएजेंट को उसके क्षेत्र में उसके होस्ट के सामने विकसित करने के लिए प्रस्तुत किया जाता है। यह घन प्रयोगशाला प्रशिक्षण के बाद किया जाता है और संतुष्टि के लिए खेतों में इसका प्रयोग भी किया जाता है।

विस्तार

इस प्रक्रिया में क्षेत्र में पहले से मौजूद प्राकृतिक विरोधियों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है। ऐसा या तो प्रयोगशाला में पाले गए बायोजेंट्स द्वारा किया जाता है या क्षेत्र से जमा किए गए बायोएजेंट्स द्वारा। छोड़े गए बायोजेंट्स इतनी संख्या में छोड़े जाते हैं जितने कि उस क्षेत्र के कीटों को समाप्त करने के लिए आवश्यक होते हैं।

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संरक्षण

  • यह जैविक नियंत्रण का बेहद महत्वपूर्ण अवयव है और यह कीट प्रबंधन में मुख्य भूमिका निभाता है। इस प्रक्रिया में मौजूद प्राकृतिक दुश्मनों को मरने से बचाया जाता है। इन्हे मरने से बचाने के लिए जो विभिन्न प्रक्रियाए आवश्यक होती है।
  • पेरासीटाइज्ड अंडों को एकत्र करना और उन्हें बॉस के पिंजरों में चिड़ियों के बैठने की जगह में डालना, है जिससे की पेरासीटाइज्ड का बचाव किया जा सके और कीट लार्वा पर रोक लगाई जा सके।
  • विभिन्न कीटों और प्रतिरक्षी को में पहचान करने के लिए के लिए जागरुकता फैलाना और खेत में छिड़काव करते समय प्रतिरक्षकों को बचाना।
  • रसायन स्प्रे को एक अंतिम उपाय की तरह प्रयोग करना चाहिए, यह भी तब जब किट प्रतिरक्षा का अनुपात और इकोनॉमिक थ्रेशोल्ड का अवलोकन कर लिया जाए।
  • जहां तक संभव हो कीटनाशकों को उन्ही स्थानों पर इस्तेमाल करें करने का प्रयास करना चाहिए जहां पर वे दिखाई दे।
  • बुवाई के समय में फेरबदल की जा सकती है और कीटों के आक्रमण के अनुकूल मौसम में उनसे बचा जा सकता है।
  • मूल फसल की बुवाई से पहले खेतों के किनारों पर ऐसी फसलें लगाना जिनसे कि वही किनारो पर रह जाए और उनकी  संख्या में बढ़ोत्तरी न हो पाए।
  • गाल मिज प्रवण क्षेत्र में रूट डीप/सीडलिंग ट्रीटमेंट का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  • फसलों को बोने की बारी और इंटर क्रॉपिंग से प्रति रक्षकों के संरक्षण में सहायता मिलती है।
  • यदि कीटनाशकों का प्रयोग किया जाता है तो सिर्फ सुझाई गई मात्रा का प्रयोग करना चाहिए वह भी गोल बनाकर।

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कीट प्रबंधन के लिए केमिकल का प्रयोग

कीट प्रबंधन के लिए जब कीड़ों को समाप्त करने के सारे उपाय खत्म हो जाते हैं तो रासायनिक कीटनाशक की अंतिम उपाय नजर आता है। कीटनाशकों का प्रयोग आवश्यकतानुसार, सावधानी से और इकोनॉमिक थ्रेशोल्ड लेवल (ईटीएल) के मुताबिक होना चाहिए। इस प्रकार सिर्फ कीमत में कमी आती है बल्कि समस्याएं भी कम होती है। जब रासायनिक नियंत्रक की बात आती है तो हमें निम्न बातों का ध्यान रखते हुए अच्छी तरह पता होना चाहिए कि किसका छिड़काव करना है, कितना छिड़काव करना है कहां और कैसे छिड़काव करना है।

  • सुरक्षित कीटनाशकों को इस्तेमाल करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर नीम आधारित और जैवकीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए।
  • अगर कुछ भागों में ही मौजूद है तो सारे खेत में छिड़काव नहीं किया जाना चाहिए।
  • इंटीएल और किट प्रतिरक्षक अनुपात का ध्यान रखना चाहिए।

सब्जियों और फलों में आईपीएम का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि फल और सब्जी इंसानों द्वारा खाई जाती है। जो कीटनाशक ज्यादा जहरीले होते हैं या अपने जहरीले असर के लिए जाने जाते हैं उनकी सिफारिश नहीं की जानी चाहिए। किसान ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए कीटनाशक के असर को खत्म होने को समय नहीं देते और जल्दी फसल को बाजार में बेच देते हैं। इस वजह से कीटनाशकों का जहर उनमें बाकी रह जाता है। कभी-कभी इस वजह से मौत तक हो जाती है। इसलिए फसलों में कीटनाशकों का प्रयोग करते हुए हमें ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।

कीटनाशकों के अधिक उपयोग से संबंधित समस्याएं

इन कीटों के कारण होने वाले नुकसान को कम करने के लिए भिंडी पर कीटनाशक की एक बड़ी मात्रा का प्रयोग किया जाता है।

जो सब्जियां कम अंतराल पर काटी जाती हैं, उनमें टाली ना जा सकने वाले कीटनाशक के अवशेष उच्च स्तर पर बाकी रह सकते हैं जो उपभोक्ताओं के लिए बेहद खतरनाक हो सकते हैं। रसायनों का अत्यधिक निर्भरता से प्रतिरोध, पुर्नत्थान, पर्यावरण प्रदूषण और उपयोगी पशुवर्ग और वनस्पति की तबाही की समस्या जनित हुई है।

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प्रमुख कीट

हरा टिड्डा

युवा तथा वयस्क अवस्था के हल्के हो जाते हैं और तिरछे चलते हैं। प्रभावित पत्तियां पीली पड़ जाती है और मूड जाती है, भारी प्रकोप के मामले में पत्तियां ईँट की तरह लाल हो जाती है और चूर-चूर हो जाती है।

तना एवं फल छेदक

जब फसल जवान होती है तब लार्वा नरम तने में छेद कर अंदर ही अंदर नीचे की तरफ जाते हैं जो कुम्हला जाते हैं, नीचे गिर जाते हैं और बढ़ने वाले हिस्से मर जाते हैं। फल में लार्वा छेद कर इन में घुस जाते हैं और आंतरिक उत्तको को खाते रहते हैं, आकार विकृत हो जाते हैं और इनका कोई बाजार मूल्य नहीं होता।

लाल मकड़ी

इनके लार्वा और प्यूपा अवस्था हरापन लिए लाल होते हैं जबकि वयस्क रंग में अंडाकार, भूरे लाल होते हैं। घुन पत्तियों की अंदरी सतह खाते हैं और प्रभावित पत्तियां धीरे-धीरे मुड़ना शुरू हो जाती है, झुर्रीदार हो जाती है और टूट कर गिर पड़ती है।

मोजेक रोग

पीली नसों के गुत्थे हुए अंतरजाल के साथ कहीं-कहीं पत्तियों पर हरे उत्तकें के होते हैं। बाद में, पूरे पत्ते पीले हो जाते हैं। सफेद मक्खी द्वारा फैलाया गया यह रोग आर्थिक रुप से सबसे महत्वपूर्ण बीमारी होते हैं।

जड़ गाठा सूत्रकृमि

वर्मीफार्म कीट होते हैं। वे जड़ों को जोरदार तरीके से खाते हैं और जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। प्रभावित  पौधे कमजोर होते हैं और पीले पत्तों के साथ इनका विकास अवरुद्ध हो जाता है।

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एकीकृत कीट प्रबंधन रणनीतियां

  • मोजेक रोग प्रतिरोधी संकर अर्थात मखमली, तुलसी, अनुपमा-1 और सूर्य-40 आदि की बुवाई विशेष रूप से खरीफ की फसल के दौरान।
  • बाड़ों पर व्यस्क तना और फल छेदक के प्रवेश के विरुद्ध अवरोधक/जाल फसल के रुप में मक्का/चारा उगाए।
  • सफेद मक्खी आदि के लिए पीले चिपचिपा और डेल्टा जाल लगाए।
  • खेत में पक्षियों के शिकार को सुविधाजनक बनाने के लिए पक्षियों के बैठने का अड्डा बनाएं।
  • यदि आवश्यकता हो तो लूंफ होपर, सफेद मक्खी, घुन और एफिड्स आदि के लिए बारी-बारी से 5% की दर से नीम की निंबोली सत्व के दो से तीन छिड़काव के साथ कीटनाशकों का छिड़काव करें। यदि टिड्डा निर्धारित संख्या (5 होपर/पौधा) से अधिक हो, तो 17.8 किलो एसएल इमिडाक्लोप्रिडपार का 150 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। यह अन्य चूसने वाले कीटों को नियंत्रित करने में प्रभावी होगा।
  • स्थापित फोरेमोन एअरिस विट्टेल्ला के उद्भव निगरानी के लिए 2 प्रति एकड़ की दर से फोरेमोन जाल लगाए। हर 15-20 दिन के अंतराल पर ललचाने की वस्तुओं को बदले।
  • शूट एवं फ्रूट बोरर के लिए बुवाई के 30-35  दिन बाद से शुरु कर साप्ताहिक अंतराल पर 4-5 बार 1-1.5  लाख प्रति हेक्टेयर की परजीवी का अंडारोधक ट्राइगोग्रामा चीलोनिस डाले। अगर तना और फल छेदक निर्धारित संख्या (5.3% संक्रमण) से अधिक हो, तो  200  ग्राम ए.आई/हेक्टेयर की दर से 25 ई.सी. साइपरमिथ्रेन का छिड़काव करें।
  • मोजेक रोग प्रभावित पौधों को समय-समय पर बाहर करते रहे।
  • छेदक प्रभावित तनो एवं फलों को समय समय पर बाहर करते रहे।
  • टिड्डे, सफेद मक्खियों, बोरर्स एवं घुन पर नियंत्रण के लिए रासायनिक कीटनाशकों का अर्थात इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल, 150 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से साइपरमेथ्रिन 25 ई.सी. 200 ग्राम ए.आई./हैक. (0.05%) की दर से क्विनालफॉस 25 ई.सी. 0.05% या प्रोपागाइड 57 ई.सी. आवश्यकतानुसार प्रयोग करें।

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प्रस्तुति

मुख्य पवन के. टाक, प्रशिक्षक (जैविक डूंगरपुर)

दुर्गापुरा जयपुर (राज)

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