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सब्जियों की जैविक विधि से उन्नत खेती

सब्जियों की जैविक विधि से उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

सब्जियों की जैविक उत्पादन

जैविक सब्जियों(Organic farming of vegetables) की मांग बाजार में तथा निर्यात के लिए निरंतर बढ़ती ही जा रही हैं तथा लघु सीमांत किसान अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए सब्जियों की खेती के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। जैविक खेती से मृदा में जैविक क्रियाओं को बढ़ावा मिलता है। मृदा, जल एवं वायु प्रदूषण कम होता है तथा मृदा की उर्वरा शक्ति बनी रहती हैं।

सब्जियों-की-जैविक-खेती

 

जैविक खेती से सब्जियों की गुणवत्ता भी बनी रहती हैं। जैविक सब्जियों की स्थानीय बाजार तथा निर्यात की संभावनाओं को देखते हुए इनकी जैविक विधि द्वारा उन्नत खेती की विधियों को विकसित करना आज की आवश्यकता है। राजस्थान में टमाटर बैंगन लोकी एवं टिंडा की सफल खेती की जाती हैं और आसपास के राज्यों में भी इन सब्जियों की पूर्ति प्रदेश से प्राप्त होती हैं तथा राज्य का किसान लाभान्वित होता है।

भूमि का चयन

टमाटर, बैंगन, लोकी तथा टिंडा की खेती के लिए सभी प्रकार की मृदा उपयुक्त हैं परंतु इनकी व्यवहारिक खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट एवं अधो चिकनी बलुई दोमट मिट्टी अच्छी होती हैं। टमाटर की पैदावार के लिए चिकनी दोमट एवं शिल्प दोमट मृदा भी अच्छी होती हैं। इन सब्जियों को अधिक क्षारीय अम्लीय भूमि में नहीं उगना चाहिए। इसलिए रोपाई से पहले मिट्टी पानी का परीक्षण अवश्य करा लेवें।

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सब्जियों की उन्नत किस्में

इन सब्जियों की उन्नत किस्मों का चयन अति आवश्यक है इनकी कुछ उन्नत प्रजातियां निम्न प्रकार हैं।

टमाटर :-  पूसा रूबी, पूसा अर्लीडवार्फ, पंजाब छुआरा, पंत बाहर एवं रश्मि।

बैंगन :- पंत ऋतुराज, पूसा पर्पल राउंड, डी बी एस आर- 44, पंजाब केसरी, पूसा हा.6 स।

लौकी :-  पी एस सी एल, पूसा नवीन।

टिंडा :-  बीकानेरी ग्रीन, अर्का टिंडा, हिसार सलेक्षन-1।

नर्सरी में सब्जियों की पौध तैयार करना

टमाटर तथा बैंगन की पहले नर्सरी तैयार की जाती हैं। पौधे की ऊंचाई जब 15-20 सेंटीमीटर हो तब 30 से 40 दिन बाद इनकी खेत में रोपाई की जाती है। लौकी तथा टिंडा की रोपाई नालियों में की जाती है। नर्सरी में लगाने से पूर्व ट्राइकोडर्मा से बीजोपचार करें। नर्सरी में भी जैविक खाद का ही प्रयोग करें तथा रोग नाशक कीटनाशी रसायनों का उपयोग ना करें। उनकी जगह नीम की खली जैविक उत्पादकों का ही प्रयोग करें।

ट्राइकोडर्मा कल्चर (जैविक नियंत्रण हेतु उत्तम जैविक संवर्ध)

मृदा जनित कवच व्याधियों के नियंत्रण के लिए सब्जियों की फसलों में ट्राइकोडर्मा कल्चर का उपयोग करना चाहिए।

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उपयोग विधि

  • ट्राइकोडर्मा कल्चर 4 से 8 ग्राम प्रति किलो की दर बीज में मिला देवें तथा बीज में थोड़े से पानी के छींटे देवे बीज को अच्छी तरह उलट पलट देवे तथा देखें कि कल्चर की एक समान परैत बीज के चारों और चिपक गई हैं और बीज की बुवाई कर दें।
  • नर्सरी उपचार- प्रत्यारोपित की जाने वाली सब्जियों की नर्सरी में प्रति वर्ग मीटर में 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा सवंर्ध की मात्रा बुवाई से पूर्व नर्सरी की क्यारियों में अच्छी तरह मिला देवें।
  • प्रत्यारोपित करने वाले पौधों को हेतु एक बर्तन में 5 लीटर पानी ले तथा उसमें पांच पैकेट ट्राइकोडर्मा संवर्धन अच्छी तरह गोल ले। इस गोल में पौधों की जड़ों को 20-30 मिनट डुबो कर ही प्रत्यारोपित करें।
  • बीजोपचार पश्चात जडोपचार पश्चात् बची कल्चर की मात्रा को एक तगारी गोबर की खाद के साथ भली-भांति मिलाकर समान रूप से मिट्टी में मिला देवें।

बीज की मात्रा बुवाई का समय व दूरी

सब्जियों की फसलों को वर्ष में दो या तीन बार लिया जा सकता है ताकि वर्ष भर बढ़िया सब्जी मिलती रहे।

नाम

बीज की मात्रा पौधरोपण/

बुवाई का समय

दूरी

(कतारX पौधा)

टमाटर

150-200 ग्राम

फरवरी-मार्च

सितम्बर-अक्टुम्बर

90×45 सें.मी.

बैंगन

400-500 ग्राम

मार्च-अप्रैल

जुलाई-अगस्त

70×60 सें.मी.

लोकी

4-5   की.ग्रा.

फरवरी-मार्च

जून-जुलाई

2.5 मी.x75 सें.मी.

टिंडा

4-5  की.ग्रा.

फरवरी-मार्च

जून-जुलाई

1.5 मी.x75 सें.मी.

 

नियोम (न्यूट्रियेन्टरिच ऑर्गेनिक मेन्योर)

राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों तथा राज्य सरकार के प्रयत्नों से वैज्ञानिक तरीके से सब्जियों की जैविक खेती की उन्नत विधि विकसित की गई हैं। इसको बनाने के लिए कृषि कचरे खरपतवारों फुल व बीज बनने से पहले, मवेशी चारे का कचरा, रसोई का कचरा एवं गोबर का ढेर बना लिया जाता है।

सब को मिलाकर इसमें रॉक फास्फेट 3% तथा जिप्सम 2% तक मिलाकर 20-25 दिन तक जब तक इस कचरे का तापमान घट जाए व सामान्य तापमान आ जाए करना चाहिए। इस सामान्य तापमान वाली सड़ी सामग्री में केंचुए, जीवाणु खाद जैसे एजोटोबैक्टर, पीएसबी आदि का प्रयोग करते हैं। केंचुए इस में तेजी से बढ़ते हैं और इसे 70 से 80 दिन में काली दानेदार वर्मी कंपोस्ट में बदल देते हैं। इसमें नीम या अरंडी की खली मिलाने से यह न्यूट्रियेन्टरिच बन जाता है।

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नियोम के पोषक तत्वों की मात्रा

पोषक तत्व

इकाई प्रचलित देशी खाद

नियोम का खाद

नत्रजन

% 0.50

2.30

फास्फोरस

% 0.30 3.30

पोटाश

% 0.60 1.60
कैल्शियम % 2.10

82.00

गंधक % 0.13

290.00

जस्ता

पी.पी.एम. 52.00 35.00

मैंग्नीज

पी.पी.एम. 140.00 290.00

तांबा

पी.पी.एम. 16.00

35.00

लोहा पी.पी.एम. 6080.00

9400.00

नमी % 25.30

26.00

 

सावधानियां

  1. नियोम को हमेशा छांव में बनाना चाहिए ताकि नमी की कमी ना हो। इसे गर्मी सर्दी और अधिक बरसात व पक्षियों एवं परभक्षी कीटों से बचाना चाहिए।
  2. ढेर को एक से 1.5 फुट से अधिक ऊंचा नहीं करना चाहिए तथा खाद को 15 से 20 दिन में अच्छी तरह पलट दे।
  3. कृषि कचरे में यदि खरपतवार मिलाएं तो इन्हें फूल आने से पहले ही प्रयोग ले।
  4. गोबर व कचरे का तापमान घटने पर 20 से 25 दिन बाद ही के जीवाणु खाद का प्रयोग करना चाहिए।

लाभ

  • इस जैविक खाद (नियोम) के प्रकोप से सब्जियां उत्पादन में वृद्धि के साथ सब्जियों की गुणवत्ता भी बढ़ती है।
  • इससे पौधों की वृद्धि के लिए मुख्य पोषक तत्व जैसे नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, केल्सियम तथा गंधक और सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे (जिंक, मेगनीज, लोहा व तांबा) मिल जाते हैं।
  • मिट्टी की भौतिक दशा में सुधार होता है तथा जल ग्रहण क्षमता भी बढ़ती हैं।
  • ऊर्जा स्त्रोत के रूप में कार्बन और अन्य पोषक तत्व मिट्टी में विद्यमान जीवाणु की संख्या में वृद्धि करते हैं।
  • पौध परजीवी नियंत्रण तथा भूमि में गोलकृमि की उत्पत्ति में कमी होती है। पौधों में कीट तथा रोग आक्रमण को सहने की क्षमता में वृद्धि होती है।
  • जैविक खाद का प्रयोग पर्यावरण को सुरक्षित रखता है।
  • जैविक उत्पाद का बाजार में अच्छा मूल्य मिलता है और यह मानव व पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी सुरक्षित है।
  • बाजार में ले जाने पूर्व सब्जियों की ग्रेडिंग करें ताकि उनका उचित मूल्य मिले।

तरल कार्बनिक खाद

इसे बनाने के लिए पहले गोबर, नीम की पत्तियां, ग्वारपाठा, धतूरा और तंबाकू को काटकर इसमें जिप्सम, रॉकफास्फेट, सुहागा मिलाते हैं। इनका अनुपात 25:10:5:1:3:1:1:06 अनुपात रखें तथा इन सब के साथ कृषि कचरे को मिलाए (कुल 100 किलो वजन के लिए) इस मिश्रण को सड़ने दें तथा जब इसका तापमान सामान्य हो जाए।

तब इस मिश्रण को वर्मीकंपोस्ट कर लें तथा इसको ही खाद LOM या तरल जैविक खाद बनाने के लिए काम में लेवें। सादा पानी में नीम की पत्तियां डालकर उबाल लें तथा इस पानी को मिश्रण में डालकर 48 घंटे तक रख ले  (1:20 के अनुपात में) अच्छी तरह घोलकर पानी को निथार लेवे इसमें 20% गोमूत्र डालकर 20% की दर से पर्णीय छिड़काव के लिए काम में लेवें।

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तरल जैविक खाद के पोषक तत्वों की औसत मात्रा

पोषक तत्व

इकाई तरल जैविक खाद

नत्रजन

%

0.60

फास्फोरस

%

0.14

पोटाश

%

232.0

कैल्शियम

%

540.0

गंधक

%

2690.0

जस्ता

पी.पी.एम.

70.50

मैंग्नीज

पी.पी.एम. 260.0
तांबा पी.पी.एम.

30.0

लोहा पी.पी.एम.

0.81

लाभ

  1. इसमें सब्जियों की खड़ी फसल में पोषक तत्वों की पूर्ति होती है तथा इसकी अच्छी बढ़वार एवं उत्पादन होता है।
  2. इसके प्रयोग से जो चूषक कीट, लटो, सूत्रकृमि से सब्जी की फसलों में बचाव होता है। यह रोग रोधक का कार्य भी करता है।
  3. सब्जियों की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
  4. यह तकनीक पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाती है तथा इसका मानव व पशु शरीर पर हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है।

सब्जियों की फसलों में दी जाने वाली जैविक खाद (नियोम)

नियोम खाद देने का समय एवं मात्रा

सब्जियां

बुवाई से पूर्व टन./है. खड़ी फसल में
टमाटर 7.5

2.0 टन वर्मीकंपोस्ट

+ 500 किग्रा नीम की खली

 

बैंगन

7.5

लौकी

6.0

टिन्डा

6.0

प्रस्तुति

महेश विजयवर्गीय, जयपुर

सहभार

कृषि भारती

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