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सफेद चंदन की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

सफेद चंदन
Written by bheru lal gaderi

सफेद चंदन (White sandalwood) का वानस्पतिक नाम सन्तालूम अलबम है तथा यह सेंटालेसी परिवार का पौधा है।

परिचय:-

सफेद चंदन सदाहरित 30 से 40 फीट ऊंचा, अर्द्ध मूल पराश्रयी वृक्ष है। इसकी छाल बाहर से धूसर कृष्णाभ और भीतर से रक्ताभ भंगुर होती हैं, जिस पर लंबे चीरे होते हैं। बाहरी कष्ट श्वेत निर्गन्ध होती हैं, परन्तु भीतरी कठोर धूसर सुगन्धित व तेल युक्त होती है।

सफेद चंदन

 

पत्ते 1 से 2 इंच लंबे अंडाकार या लटवाकार होते हैं। पुष्प छोटे छोटे गुच्छों में पीताभ बैंगनी निर्गन्ध होते हैं। चंदन का वृक्ष 50 वर्षों के बाद परिपक्व होता है। इस पर जून से सितंबर और फिर नवंबर से फरवरी तक पुष्प और फल लगते हैं।

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चंदन के भेद:-

निधण्टुकारों ने चन्दन के पांच-छह भेद बताए हैं। इन सब को रसवीर्य में सामान कहां है। इनके परस्पर अंतर को भेद का मानदंड सुगंध बताया है, जबकि सुगंध केवल सफेद चंदन में ही पाई जाती है।

भावमिश्र के अनुसार चंदन चार प्रकार के बताए हैं:-

  1. सफेद चंदन (Santalum album)
  2. पित चंदन (हरिश्चंद्रन कलियक)
  3. रक्त चंदन (शूद्र चन्दन) pterocapus santalinus
  4. कुचंदन (पतंग) Caesalpinia sappan)

ये चरों चंदन प्राय: दक्षिण भारत विशेषकर पश्चिमी घाट क्षेत्र के जंगलों में में व समीपवर्ती क्षेत्रों की वनौषधियाँ है।

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रासायनिक घटक:-

चंदन की जड़ों में तेल अधिक होता है, जिसे परिस्त्रवण विधि से प्राप्त किया जाता है। प्रायः 1 किलो चंदन की लकड़ी से सौ ग्राम तेल निकलता है। इसमें सेण्टलोल नामक तत्व 90% होता है।

बीजों से 50 से 7% लाल रंग का गाढ़ा स्थिर तेल प्राप्त होता है। जबकि जड़ों से प्राप्त तेल पीताभ, गाढ़ा, तीक्ष्ण गन्ध एवं कटुतिक्त स्वाद वाला होता है। इसमें रालूटेनिक एसिड पाया जाता है।

सफेद चंदन का उपयोग:-

सफेद चंदन कष्ट, तिक्त, शीत व अवसादक होता है। इसका तेल श्लेष्मधरा कला के ऊपर संकोचनी शक्ति पैदा करता है। इस तेल का सेवन करने से मुख शुष्कता, अतीतृष्णा, शुलवत वेदना एवं कटी प्रदेश में गुरुत्व अनुभव होता है।

तीव्र ज्वर में रोगी के शरीर में वेदना रहने पर चंदन का प्रलेप किया जाता है। गुलाब जल व कपूर के साथ इसका प्रलेप मस्तक पीड़ा व दाहयुक्त अंग व चार्म रोग युक्त त्वचा पर लगाया जाता है।

इसका तेल धारक मूमल, कफ निस्सारक और उष्ण वात, कास,मूत्राशय व वृक्क प्रदाह में व पुराने अतिसार में उपयोगी है।  सौंदर्य प्रसाधन एवं इत्र उद्योग में भी यह उपयोग में लाया जाता है।

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व्यापार:-

चंदन का अनेक दवाइयों में उपयोग एवं निरंतर घटती उपज के कारण इसकी मांग बनी रहने की संभावना है। इसकी विदेशों में भी निरंतर मांग बनी रहती है। इसके अलावा इस की मांग सौंदर्य प्रसाधन एवं इत्र उद्योग में रहती हैं।

कृषि तकनीक:-

चंदन हिंदेशिया का पौधा है तथा भारत में उत्तर में धारवाड़ से दक्षिण में नीलगिरी पहाड़ियों तथा पूर्व में कुप्पम से लेकर पश्चिम में कुर्ग तक पाया जाता है। इस समय चंदन बिहार, गुजरात, मणिपुर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिसा तथा पश्चिमी बंगाल में पाया जाता है। कर्नाटक एवं तमिलनाडु में चन्दन के पौधे बड़े पैमाने पर उगाये जाते है।

उपयुक्त भूमि:-

सफेद चंदन के पौधे राजस्थान की बलुई मिट्टी से लेकर महाराष्ट्र की काली मिट्टी तक उगाए जा सकते हैं। लेकिन काली चिकनी मिट्टी जिसका पीएच मान 5 से 6 तक होता है व पानी भरा रहता हो, वहां पौधों की वृद्धि कम होती है।

पौधे कि उत्तम वृद्धि के लिए जमीन का पीएच मान 6-7.5 सर्वश्रेष्ट है। वैसे इसके पौधे पीएच मान 5-8 तक लगाए जा सकते हैं। पथरीली जमीन, जिस जमीन की सतह कड़ी हो,  ऊसर व क्षारीय भूमि इसके लिए उत्तम नहीं है।

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जलवायु:-

यह पौधा समुद्र तल से 1350 मीटर ऊंचाई तक आसानी से उगाया जा सकता है। 600 मीटर से 900 मीटर तक की ऊंचाई पर अच्छा उत्पादन देता है। साधारणतया ठंडी जलवायु 850 मि.मी. से 1200 मि.मी. वर्षा वाले क्षेत्र में इसका उत्पादन अच्छी गुणवत्ता का होता है। अधिकतम प्रकाश की उपयोगिता उत्पादन को बढ़ावा देती है।

बीज प्लांटिंग मटेरियल:-

सफेद चंदन एक जड़ परजीवी पौधा है। चंदन का प्रबंधन बीज से, प्राकृतिक पौधे प्राप्त करके एवं कटिंग से होता है। जड़ परजीवी पौधा होने के कारण अरहर, आइरोसिन, केशिया श्यामा व यूकेलिप्टस (सफेदा) के साथ लगाया जाता है।

यूकेलिप्टस के पौधों के साथ लगाने से पौधे स्वस्थ रहते हैं। यह 300 प्रजातियों पर जड़ परजीवी के रूप में भोजन लेता है। अनुसंधानों से पता चला है कि कैल्शियम तथा पोटाश चन्दन जमीन में अपनी जड़ से लेता है तथा नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस परजीवी के रूप में अन्य पौधों से लेता है।

प्लांटिंग मटेरियल प्राप्ति स्थल:-

  • संचालक केंद्रीय औषधीय एवं सुगंधीय पौध संस्था (सीमेप) पोस्ट सीमेप। कुकरैल पिकनिक स्पॉट के पास लखनऊ उत्तर प्रदेश
  • वन विभाग बैंगलोर, कर्नाटक
  • उत्थान सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट एंड पावर्टी एलिवेशन, 18 ए, आकलैंड रोड, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)
  • के. के. इम्पैक्स (हर्बल डिवीजन) 5- ए 19, आर.सी. व्यास कॉलोनी भीलवाड़ा
  • जयपुर हर्बल सेंटर, बिजनेस प्लाजा, मोतीलाल अटल रोड जयपुर।

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भूमि की तैयारी:-

अप्रैल-मई में जमीन की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल (डिस्कप्लाऊ) करनी चाहिए। १ माह तक खेत को खुला रहने देना चाहिए। इसके बाद पांच से छह हकाई हीरो से करें। खेत में तैयारी के समय पुरानी फसलों के अवशेष, पत्थर, लकड़ी आदि निकाल दे। अंतिम जुताई के बाद खेत को पाटा लगा कर समतल कर दे।

मई-जून में खेत को समतल करने के उपरांत 4X4 मीटर की दूरी पर 50X 50X 50 सेंटीमीटर खड्डे खोद ले। खुदाई के बाद 1 सप्ताह तक खड्डों को सूखने दे। बाद में 12 किलोग्राम वर्मी कंपोस्ट व 2 किलों नीम की खली मिट्टी में मिलकर खड्डों में भर दे। खड्डों को हल्का खाली छोड़ दे अथवा उसके केंद्र में एक लकड़ी गाड़ दे, ताकि पौध लगते समय खड्डे का ध्यान रहें।

खाद:-

राजस्थान में प्रत्येक खड्डे में 12 किलोग्राम वर्मी कल्चर एवं 3 किलो नीम की खली की आवश्यकता होगी। खड्डा भरने से पूर्व 100 ग्राम यूरिया, 300 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 100 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश, 50 ग्राम थाइमेट डाल सकते हैं।

लेकिन जैविक उत्पादन लेना है तो नहीं डाले। जून के आखिरी सप्ताह में प्रतिवर्ष 12 किलोग्राम वर्मी कंपोस्ट 2 किलो नीम की खली देते रहना चाहिए।

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नर्सरी तकनीक:-

  1. जहां पर सफेद चंदन के वृक्ष हो वहां उनके नीचे वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से पौधे उगाते हैं। आप उन्हें पानी देकर सुरक्षित रख कर एवं उनके पास 5-6 दाने अरहर के डालकर इन पौधों को रोपण हेतु तैयार कर सकते हैं।
  2. बीजों से प्रवर्धन हेतु 12X30 से.मी. की पॉलीथिन की थैलियों में खाद, चिकनी मिट्टी, बालू मिट्टी 1:1:1 के अनुपात में मिश्रण बना लेते हैं अथवा वर्मी कल्चर को बालू मिट्टी (अधिक जीवांश) 1:2 के अनुपात में मिश्रण बनाकर थैलियों में भर देते हैं। फरवरी माह में थैलियों में 5-6 दाने अरहर व कटिंग आइरेसिन अथवा 2-3 बीज केशिया शामा के प्लास्टिक की शैलियों में बो देते हैं एवं एक बीज वहां का लगा देते हैं। जब पौधा 10 से 15 से.मी. का हो जाए उस समय जुलाई माह में गड्ढों में रोपित कर दिया जाता है।
  3. कलम द्वारा प्रवर्धन करने पर खाद मिट्टी बालू के मिश्रण 111 के अनुपात में मिलाकर क्यारियों में जुलाई अगस्त माह में नई शाखाओं के कोमल भाग की 15 से 20 सेंटीमीटर लंबी कलम लगा देते हैं यह स्थान छाया में हो एवं अधिकतर नमी बनी रहती हो, जब कलम 25 से 40 सेंटीमीटर की हो जाए तो इन्हें पॉलिथीन की थैलियों में स्थांतरित कर देते हैं।
  4. थैली में अरहर या केशिया श्यामा या सफेदा यूकेलिप्टस के 5-6 बीज भी डाल देते हैं। इनमें समय-समय पर पानी देना अति आवश्यक है। नमी बनाए रखें जब पौधे 75 से 100 सेंटीमीटर के हो जाए तो खेत में गड्डों में रोपण कर देना चाहिए। यह विधि अभी पूर्ण रुप से विकसित नहीं हो पाई है अभी सफलता 50% ही मिली है।
  5. टिश्यू कल्चर से विकसित किए गए पौधें 8वे वर्ष में उत्पादन देना शुरू कर देते हैं।

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रोपाई का समय एवं रोपण विधि:-

सफेद चंदन के पौधे की रोपाई का समय मई से अक्टूबर तक है। लेकिन जुलाई-अगस्त में की गई रोपाई श्रेष्ट हैं, क्योंकि वर्षा ऋतु में पौधे को किसी प्रकार की हानि नहीं होती है। पौधशाला से पौध रोपण करते समय स्वस्थ व एक शाखा वाला पौधा ही प्रयोग में लाएं।

पौधा सांयकाल के समय लगाया जाना चाहिए एवं अधिक पतियों को तोड़ देना चाहिए। पौधा लगाते समय 10 लीटर पानी 200 मिलीलीटर गोमूत्र के साथ मिलाकर डाल देना चाहिए। साथ ही अरहर, सफेदा/सुबबूल के 5-6 बीज गड्डें में डाल देना चाहिए।

सिंचाई:-

अच्छी वृद्धि के लिए समयनुसार सिंचाई आवश्यक है। रोपण के 1 वर्ष तक गर्मियों में सप्ताह में एक बार तथा ठंड में 2 सप्ताह में एक बार सिंचाई करें। सिंचाई हल्की की जानी चाहिए एवं जहां तक संभव हो सके सिंचाई का पानी मुख्य तने से दूर रहें। इसके बचाव हेतु तने के चारों ओर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

सिंचाई का पानी खारा नहीं होना चाहिए अन्यथा पौधे की वृद्धि नहीं होगी और पानी ज्यादा खारा है तो वह मर जाएगा। वर्षा ऋतु में जल निकासी की उचित व्यवस्था करें। अधिक पानी का भराव नहीं होना चाहिए।

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निंदाई-गुड़ाई:-

सफेद चंदन के थालों की निराई गुड़ाई अत्यंत आवश्यक है। पहले वर्ष में वर्षा ऋतु में 15 से 20 दिन के अंतराल में निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। सिंचाई एवं गुड़ाई के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि साथ में उनके पोषक पौधों को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचे।

प्रथम वर्ष में तीन गुड़ाई करना चाहिए। परंतु ज्यादा गहरी नहीं करनी चाहिए वरना पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।

सफेद चंदन में लगने वाले रोगों से बचाव हेतु स्पीक का नीम गोल्ड 600 मि.ली. 200 से 250 पानी में मिलाकर प्रति एकड़ 40 से 45 दिन में स्प्रे करते रहना चाहिए।

पौधों की कटाई-छंटाई:-

सफेद चंदन के पौधों की आवश्यकता अनुसार छंटाई करते रहना चाहिए। प्रारंभिक अवस्था में 3 से 4 मीटर की ऊंचाई तक मुख्य तने की सभी शाखाओं को काट देना चाहिए। शाखाये जैसे ही आए उसे उसी समय हाथ अथवा कैंची/कटर से हटाए। 3 से 4 मीटर की ऊंचाई के बाद शाखाएं नहीं काटे। सुखी एवं रोगग्रस्त टहनियों को हटा दें। पौधों की जानवरों से सुरक्षा करना भी आवश्यक है।

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अंतरशस्य फसलें:-

प्रारंभिक अवस्था में पौधों के बीच में इस जलवायु व भूमि में होने वाली सभी फसलें ली जा सकती हैं। यह फसलें कम ऊंचाई की होनी चाहिए। उनकी शस्य क्रियाएं भी चंदन से मिलती जुलती हो। 10 वर्ष बाद छाया अधिक हो जाती है। अतः इन फसलों की पैदावार पर फर्क पड़ता है, व उत्पादन कम हो जाता है।

10 वर्ष बाद इस क्षेत्र में अंतर शस्य फसल के रूप में सफेद मुसली की फसल ली जा सकती हैं। नर्सरी के उपयोग हेतु वर्मी कल्चर उत्पादन हेतु इस क्षेत्र का उपयोग किया जा सकता है।

चंदन के फूल का बीज बनना:-

सफेद चंदन के पेड़ों पर 3 से 4 वर्ष बाद ही फूल आना एवं बीज बनना प्रारंभ हो जाता है लेकिन 20 वर्ष पुराने पौधे से बीज इकट्ठा करना ठीक रहता है। चंदन के पौधे पर फरवरी से अप्रैल तक फूल व जुलाई से सितंबर तक बीज आते हैं। कभी-कभी नवंबर से फरवरी तक भी बीज बनते हैं। इसके पौधों पर अत्यधिक मात्रा में बीज आते हैं।

फसल की कटाई:-

मुख्य रूप से इसका तेल अंदर की पाकी लकड़ी (अन्तः काष्ठ) कम मात्रा में प्राप्त करते हैं। इसके पेड़ को जड़ सहित ही निकालते हैं। जिससे जड़ का प्रत्येक भाग जमीन से निकल आए। ऊपर की लकड़ी जिसे रस दारू कहते हैं, आसानी से अलग कर लेते हैं। अन्तः काष्ठ औसतन 2% ही होती हैं।

पौधों की कटाई 20 वर्ष बाद की जा सकती है। लेकिन अन्तः काष्ठ कम मात्रा में उपलब्ध होता है। अधिक मात्रा में 30 से 60 वर्ष की उम्र में प्राप्त होता है। 40 से 60 सेंटीमीटर से अधिक मोटाई वाले पौधे से अन्तः काष्ठ अधिक मात्रा में प्राप्त होता है। गवर्मेंट एम्पोरियम में अन्तः काष्ठ का भाव 250 रूपये किलोग्राम है।

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तेल की प्राप्ति:-

तेल निकालने के लिए सफेद चंदन के अन्तः काष्ठ एवं जड़ों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है तथा इन टुकड़ों को तांबे के बर्तनों में भर कर 24 घंटे के लिए पानी में भिगो देते हैं। भिगोने के बाद बर्तनों को धीरे-धीरे गर्म किया जाता है।

यह संपूर्ण प्रक्रिया 48 से 72 घंटे में पूर्ण हो जाती है। वाष्प को एक बर्तन में कंडेनसर द्वारा इकट्ठा कर लिया जाता है। इसमें नीचे पानी ऊपर तेल होता है जिसे निथार कर इक्क्ठा कर लिया जाता है, व कंटेनर में भरकर बिक्री हेतु भेज दिया जाता है।

प्रस्तुति:-

वैज्ञानिक ब्यूरों विश्व कृषि संचार

वर्ष -20, अंक-11, अप्रैल-2018

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन, कोटा (राज.)

ईमेल – vks_2020@yahoo.com

मोब. नो.- 9425081638

 

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