agriculture Horticulture

संकर आम की उन्नत बागवानी एवं प्रबंधन

संकर आम की उन्नत बागवानी
Written by bheru lal gaderi

आम (Anacardiaceae) परिवार का बहुवर्षीय फलदार पौधा है। भारत में आम की बागवानी मुख्य फल-फसल के रूप में की जाती है। आम के उत्पादन में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। देश में 2309 हजार हेक्टर क्षेत्र में आम की खेती की जा रही है। जिससे 12750 हजार मीट्रिक टन आम का उत्पादन होता है। विश्व में कुल आम उत्पादन का 42.2% भारत में होता है।

संकर आम की उन्नत बागवानी

भारत में मुख्य आम उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, गुजरात, तमिलनाडु है।  उत्तर प्रदेश में आम का सर्वाधिक उत्पादन होता है। आधुनिक तकनीक व आम की संकर प्रजातियों का उपयोग कर किसान अपने आम के बागों से अधिक मुनाफा व  गुणवत्तायुक्त उत्पादन लम्बे समय तक ले सकते हैं।

आम की संकर किस्म के पौधे शीघ्र ही फल देना शुरु कर देते हैं और इनका फैलाव भी कम होता है। इस कारण इन्हें सघन बाग़वानी में भी लगाया जा सकता है। संकर किस्म में नियमित फलत होती है, जबकि देश में उगाई जाने वाली पुरानी किस्मों में 3 साल में फलत होती हैं।

Read also – केसर और अमेरिकन केसर के नाम पर कुसुम की खेती

जलवायु

आम की खेती शीतोष्ण एवं समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में अच्छी प्रकार की जाती है। 600 मीटर की ऊंचाई तक आम के बाग व्यवसायिक रूप में लगाए जा सकते हैं। आम के लिए 23.8 से 26.6 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उत्तम होता है। फूल आने के समय अगर बरसात हो जाए तो फल कम सेट होते हैं और कीट व बीमारी भी फसल को अधिक हानि पहुंचाते है।

संकर आम किस्में

आम्रपाली

दशहरा और नीलम के क्रॉस से बनी संकर प्रजाति है। यह नियमित रूप से फलने वाली बोनी किस्म है। इसके फल जुलाई के अंतिम सप्ताह में पकने लगते हैं। फल गूदेदार एवं छोटी घुटली वाले होते है। आम्रपाली ग्रह वाटिका में लगाने के लिए सबसे उपयुक्त आम की प्रजाति है। एक हेक्टर में इसके 1600 पौधे उगाए जा सकते हैं।

मल्लिका

यह नीलम और दशहरी किस्म के क्रॉस से तैयार किस्म है। फल बड़े आकार के व मोटा गुदा स्वादिष्ट होते हैं। फल मध्य जुलाई में पकना शुरू होते हैं। इस किस्म की खेती दक्षिण भारत में अधिक की जाती है। भारत से इस किस्म का निर्यात अमेरिका तथा खाड़ी देशों में किया जाता है।

पूसा अरुणिमा

इसके फल बड़े आकार के लालिमा लिए आकर्षक होते हैं। यह देर से पकने वाली किस्म है। इसके फल अगस्त के पहले सप्ताह में तोड़े जाते हैं। फलों में माध्यम मिठास होती है। पक्के फलों को कमरे के सामान्य तापक्रम पर 10 से 12 दिन तक आसानी से रखा जा सकता है।

Read also – रजनीगंधा की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

पूसा लालिमा

यह नियमित फ़्लान और शीघ्र पकने वाली किस्म है। इसके लाल रंग के फल बहुत ही आकर्षक होते हैं। इसके फल जून के पहले सप्ताह में पकने शुरू हो जाते हैं।

पूसा प्रतिभा

यह हर वर्ष फल देने वाली किस्म है। इसके फल जुलाई के पहले सप्ताह में पकने शुरू हो जाते हैं। फलों में अच्छी सुगंध एवं गुदा लाल रंग का होता है।

पूसा लालिमा

यह नियमित फ़्लान और शीघ्र पकने वाली किस्म है। इसके लाल रंग के फल बहुत ही आकर्षक होते हैं। इसके फल जून के पहले सप्ताह में पकने शुरू हो जाते हैं।

पूसा प्रतिभा

यह हर वर्ष फल देने वाली किस्म है। इसके फल जुलाई के पहले सप्ताह में पकने शुरू हो जाते हैं। इसके फल आकर्षक सुगंध एवं लाल रंग  लिए लम्बाकार होते है। जिनमें 20.3% घुलनशील पदार्थ होता है।

पूसा सूर्य

इसके फल मध्यम आकार के पिले रंग पर लाल रंग की आभा लिए होते है। फल मीठे (19.5) कुल घुलनशील पदार्थ व मनमोहक सुगंध वाले होते है। फलों का गुदा मोटा होता है। फल 15 जुलाई से पकना आरंभ हो जाते हैं। यह हर साल फल देने वाली प्रजाति है। इस किस्म के फल की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बहुत मांग है।

Read also – अमरूद की सघन एवं मीडो बागवानी पद्धति

पूसा पीताम्बर

फल माध्यम आकार के व पकने पर मनमोहक पिले रंग के हो जाते है। इस किस्म में गुच्छ रंग कम लगता है।

ये सभी किस्में  भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली ने तैयार की है।

अर्का अरुणा

यह अलफांसों और जनार्धन पसंद के क्रॉस से तैयार की गई किस्म है    जिसमें फल सुनहरे पीले रंग के लंबाकार होते हैं। फलों में मध्यम मिठास 19% कुल घुलनशील पदार्थ होता है। इसमें फल प्रति वर्ष आता हैं। यह किस्म सघन बागवानी के लिए उपयुक्त हैं।

अर्का नील किरण

आम कि यह किस्म अलफांसों व नीलम के संकरण से विकसित की गई है। फल का गूदा गहरे पीले रंग का होता है, इस किस्म के फल अंडाकार व 270 से 280 ग्राम वजन के होते हैं। पकने पर फल सुनहरे पीले रंग के हो जाते हैं।

अर्का पुनीत

यह किस्म अलफांसों व बंगनपल्ली के संकरण से तैयार की गई है। इसके फल पकने पर पीले रंग के लिए होते हैं। फल मीठे 21% कुल घुलनशील पदार्थ व रेशा रहित अंडाकार होते हैं।

यह सभी भारतीय कृषि अनुसंधान बेंगलुरु द्वारा संस्तुत की गई है।

अरुणिका

इस किस्म के फल मध्यम आकर के आकर्षक लाल रंग लिए होते हैं। फल मीठे 24.6 प्रतिशत कुल घुलनशील पदार्थ व गुदा नारंगी पीले रंग का होता है। यह आम्रपाली व वनराज के संकरण से तैयार नियमित फल देने वाली प्रजाति है।

Read also – ग्लेडियोलस की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अंबिका

यह किस्म आम्रपाली व जनार्धन पसंद के संकरण से विकसित की गई है। फल बहुत ही आकर्षक पीले रंग की लालिमा लिए होते हैं। यह नियमित व देर से पकने वाली प्रजाति हैं। इस किस्म के फल लम्बोत्तर अंडाकार 300 से 350 ग्राम वजन के होते हैं। फलों में 21 प्रतिशत कुल घुलनशील पदार्थ पाया जाता है।

सी.ई.एस.एच.एम.- 2

यह किस्म दशहरी व चोसा के संकरण से विकसित की गई है। इसके फल चिकने व पकने पर पीले हरे हो जाते हैं। गुदा पीले रंग का 23% कुल घुलनशील पदार्थ होता है। फल देखने में दशहरी जेसे होते हैं, परंतु इसके 15 दिन बाद पकते है।

ये किस्में केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान लखनऊ उत्तर प्रदेश द्वारा तैयार की गई है।

सिंधु

यह नियमित फल देने वाली किस्म है। इसके फलों में गुठली बहुत पतली व छोटी होती हैं। फल मध्यम आकार के रेशा रहित होते हैं।

रत्ता

आम की इस किस्म को नीलम व अल्फांसो के संकरण से तैयार किया गया है। इसके फल आकर्षित व स्पंजी टिशू रहित होते हैं।  यह प्रजातियां कोकण कृषी विद्यापीठ महाराष्ट्र द्वारा जारी की गई है।

Read also – अमरूद की फसल में कीट एवं व्याधि प्रबंधन

गड्ढों की तैयारी

आम के पौधे लगाने के लिए मई महीने में एक 1X1X1 मीटर आकार के गड्ढे खोद ले। अगर मिट्टी उपजाऊ हो तो 60x60x60 से.मी. आकार के गड्ढे पर्याप्त होते हैं। गड्ढों में 30 से 40 किलोग्राम गोबर की खाद, 100 किलोग्राम एनपीके (12:32:16 मिश्रण) को मिट्टी के साथ अच्छी तरह मिलाकर भर दे। पानी में 2 मिलीलीटर क्लोरोपायरीफॉस व 2 ग्राम बेविस्टीन 20 प्रति लीटर मिलाकर सिंचाई कर दें ताकि दीमक व फफूंदी जनित बीमारी ना फैले। गड्ढे से गड्ढे की दूरी 8.9 मीटर रखें परंतु आम्रपाली किस्म के लिए यह दूरी 2.5 मीटर से अधिक ना रखें।

पौधारोपण

पौधों को मध्य जुलाई से अगस्त महीने में पहले से तैयार गड्ढे के बीच में लगाएं। यदि गड्ढे पहले से तैयार नहीं भी किए हैं तो सीधे खेत में नक्शे के अनुसार निशान लगाकर पौधे रोपित कर सकते हैं। पौधे साय काल में लगाए व लगाने के बाद हल्की सिंचाई करें। जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहां पौधारोपण बरसात के आखिरी या सितंबर में करें।

खाद व उर्वरक

आम का उद्यान लगाने के 1 साल बाद प्रति पौधा 200 ग्राम यूरिया, 300 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 200 ग्राम पोटेशियम सल्फेट व 25 किग्रा गोबर की खाद जुलाई में पेड़ के चारों तरफ बनाए गए थालों में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिए। 10 साल की उम्र तक प्रति वर्ष उम्र के गुणांक में नाइट्रोजन तथा फास्फोरस अक्टूबर महीने तक दे देनी चाहिए। 10 वर्ष का पेड़ होने पर यह मात्र 2.0 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट, 3.0 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट, 2.0 पौटेशिय सल्फेट व 25 किग्रा. गोबर की खाद देनी चाहिए। 10 साल बाद यह मात्रा स्थिर कर देनी चाहिए। इसके बाद यही मात्रा प्रति वर्ष दे। आम के पेड़ों पर फूल आने से पहले व फल बन जाने के बाद सूक्ष्म पोषक तत्व 3.4 मिली लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

Read also – नींबू वर्गीय फलों की खेती समस्या एवं समाधान

सिंचाई

आम के पौधे को गर्मी के मौसम में 4 से 5 दिन के बाद सिंचाई करें। सर्दियों में पाले से बचाने हेतु 8 से 10 दिन के अंतराल में सिंचाई करें। अक्टूबर महीने के बाद मिट्टी में अधिक नमी पैदा होने से फूल कम पैदा होते हैं और वनस्पति वृद्धि ज्यादा इसलिए फल देने वाले पौधों में अक्टूबर से जनवरी तक सिंचाई नहीं करनी चाहिए।

पाले एवं ठण्ड से बचाव

आम के पौधों को पाले से बचाव हेतु 25 दिसंबर से 30 जनवरी तक पुराली या पॉलिथीन चादर से ढक कर रखें। पूरब दिशा से खोल कर रखे ताकि प्रातः काल सूर्य का प्रकाश पौधों को मिल सके।

कटाई-छटाई

रूट स्टॉक से निकलने वाली सभी शाखाओं को काट देना चाहिए। ऐसी शाखाएं जो जमीन के संपर्क में हो, रोग ग्रसित हो, सुखी हुई, अधिक घनी एक दूसरे पर चढ़ी हो तो काटकर अलग कर देना चाहिए। कटे हुए भाग पर कॉपर सल्फेट का पेस्ट बनाकर लेप कर दे।

खरपतवार नियंत्रण

आम के बाग को साफ रखने के लिए निराई-गुड़ाई तथा जुताई करते रहना चाहिए। इससे खरपतवार तथा भूमिगत कीट नष्ट हो जाते हैं। जुताई  अधिक ना करें। इससे पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।

बाग में खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्लेफोसेट खरपतवारनाशी 5-6 मि.ली. व 50 ग्राम यूरिया प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं। इस बात का ध्यान रखें कि छिड़काव आम के छोटे पौधों पर न गिरे। खरपतवारनाशी छिड़कने से पहले छोटे पौधों को पॉलीथिन की चादर से ढक दें।

Read also – गुलाब की उन्नत खेती तथा पौध संरक्षण उपाय

फलों का झड़ना

आम के फलों का छोटी अवस्था में पौधे से टूट कर गिर जाना एक बड़ी समस्या है इसकी रोकथाम के लिए इसकी रोकथाम के लिए जब फल मटर के दाने के आकार के हो जाएं तो एन.ए.ए. का 40-50 पीपीएम का पानी (40-50 मिलीग्राम/लीटर)  में घोल बनाकर छिड़काव करें।

रोग और नियंत्रण

चूर्णिल आसिता

इस रोग से सबसे अधिक नुकसान फुल अवस्था पर होता है। फूल और पतियों पर सफेद रंग का पाउडर दिखाई देता है, जिससे फूल खराब हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए ब्लैकटॉक्स (50) 3.4 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर फूल खिलने से पहले व बाद 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करे।

एन्थ्रेकनोज

इस रोग का संक्रमण होने पर फूल-फल व नई शाखाओं पर गहरे काले रंग के चकते दिखाई देते हैं। संक्रमित भाग टूट जाता है। इसके नियंत्रण के लिए कार्बेंडाजिम 1.2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

डाई बैक

इस रोग से ग्रसित पौधा ऊपर से नीचे की तरफ सुखना शुरु हो जाता है।और धीरे-धीरे पौधा मर जाता है। रोगी शाखाओं की कटाई रोगी स्थान से 15 सेंटीमीटर नीचे से करें। कटे हुए भाग पर नीले थोते व चुने का पेस्ट बनाकर लेप कर दें।

Read also  – गेंदे की उन्नत एवं व्यवसायिक खेती से अधिक आय

भुनगा फुदका कीट

यह भूरे रंग का कीड़ा होता है जो आम के फूलों एवं नई पत्तियों से  रस चुस्त है। इसकी रोकथाम के लिए क्लोरोपायरीफॉस 2 मिली/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

मिलीबग

इस कीट का प्रकोप फरवरी से मई तक अधिक होता है। ये नई टहनियों व फूलों के डंठलों से चिपके रहते हैं और रस चूसते रहते हैं। सफेद रंग की मादा अप्रैल-मई में पौधों से उतरकर मिट्टी में अंडे देती हैं। अंडे से बच्चे निकलकर जनवरी के पहले सप्ताह में पेड़ों पर चढ़ना शुरू कर देते हैं।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण के लिए अक्टुंबर-नवंबर महीने में बाग की जुताई कर क्लोरोपायरीफॉस चूर्ण  200 ग्राम प्रति पेड़ तने के चारों ओर मिट्टी में मिला दे। दिसंबर के आखरी सप्ताह में तने पर पॉलीथिन की 25 से.मी. चौड़ी पट्टी मिट्टी से 1-15 फुट की ऊंचाई पर बांध दे एवं दोनों किनारो पर ग्रीस लगा दे। यदि कीट पेड़ पर चढ़ गए हो तो इमिडाक्लोरपिड 0.3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर जनवरी माह में 2 छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।

Read also – राष्ट्रीय बागवानी मिशन – योजना एवं अनुदान…

तना छेदक

इस कीट की गिडार /सुंडी आम के बड़े पौधों में सुराख बनाकर तने के अंदर घुस जाती हैं और तने को खाकर खोखला कर देती हैं। जिससे पौधा धीरे-धीरे सूखने लगता है।

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिए प्रभावित शाखाओं को कीड़े सहित काटकर अलग कर देना चाहिए और सुराखों में एल्यूमीनियम फास्फाइड की गोली डाल कर ग्रीस से बंद कर देना चाहिए या क्लोरोपायरीफॉस से उपचारित करें। खुले भाग पर कॉपर सल्फेट व चुने का पेस्ट बनाकर लगाएं।

फल मक्खी

जब फल पकने वाले होते है, तो यह मक्खी फल के अंदर अंडे दे देती है।  जिससे लार्वा निकल कर गूदे को खाने लगता है और फल सड़ कर जमीन पर गिर जाते है।  इन सभी ख़राब फलों को जमीन के अंदर दबा देना चाहिए।रोकथाम

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिए मिथाइलयूजीनाल ट्रेप का प्रयोग करें। ट्रेप मई के प्रथम सप्ताह में लटका दे तथा दो माह बाद बदल दे। मेलाथियान कीटनाशी 2 मि.ली.  प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर नियंत्रण पाया जा सकता है।

Read also – गुलदाउदी की व्यवसायिक उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

फलों की तुड़ाई

आम की परिपक्व फलों की तुड़ाई 8 से 10 मी.मी. डंठल के साथ करनी चाहिए। जिससे फलों पर स्टेम रॉट बीमारी लगने का खतरा नहीं रहता है। तुड़ाई के समय फलों को चोट, खरोच न लगने दे तथा मिट्टी के संपर्क से बचाए।

उपज

संकर आम के पौधे 3 साल बाद फल देना शुरू कर देते है। तीसरे वर्ष 5-6 फल मिल जाते है। 6-7 साल बाद व्यवसायिक उत्पादन मिलाना शुरू हो जाता है। दस साल बाद 300 से 400 फल प्रति पेड़ से मिलना शुरू हो जाते है।

Read also – जरबेरा की पॉलीहाउस में व्यावसायिक खेती

लेखक:-

डॉ. संजय सिरोही, डॉ. मनीष श्रीवास्तव

फल एवं उद्यानिकी प्रौद्योगिकी संभाग

भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान

नई दिल्ली

स्रोत :-

कृषि विश्व संचार

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन

कोटा (राज.)

Email – vks_2020@yahoo.com

Phone – (0744) 2363066

वर्ष-20, अंक- 11, अप्रैल- 2018

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.