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श्री पद्धति (एस. आर. आई.) धान उत्पादन की नवीनतम तकनीक

श्री पद्धति
Written by bheru lal gaderi

भारत में धान की फसल खरीफ ऋतु में ली जाने वाली महत्वपूर्ण फसल है। धान की खेती लगभग 44.6 मिलियन हेक्टेयर में की जाती है। जिसका प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 3 टन है। वहीं अन्य देशों में धान का उत्पादन भारत की तुलना में अधिक है। क्योंकि भारत में उक्त फसल की खेती परंपरागत ढंग से करते हैं। जिसके कारण प्रजाति के वास्तविक उत्पादन क्षमता के अनुरूप उत्पादन पाना संभव नहीं है। इस समस्या के समाधान हेतु धान उत्पादन की नवीनतम तकनीक श्री पद्धति प्रचलित है।

श्री पद्धति

Image Credit – जैविक खेती – Blogger

इस विधि को सिस्टम ऑफ इंटेसिफिकेशन या धान की सघन पद्धति या एस आर आई पद्धति के नाम से जाना जाता है। धान की श्री पद्धति को अपनाने से उत्पादन में वृद्धि, जल मांग में कमी, समय में कमी, श्रम शक्ति में कमी ला सकते हैं। जो कि धान की खेती के लिए बहुत उपयोगी है।

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धान की खेती में कृषक महिलाओं का योगदान:-

धान की खेती में कृषक महिलाओं का योगदान कृषकों की तुलना में अधिक है। क्योंकि धान की खेती से संबंधित सभी कार्य जैसे कि रोपा की तैयारी, बीज की तैयारी, रोपा डालना, रोपा निकालना, रोपा  लगाना आदि कार्य महिला कृषकों के द्वारा किए जाते हैं।

महिलाओं को सबसे अधिक श्रम तैयार खेत में रोपा लगाने में लगता है। क्योंकि कृषक महिलाओं को रोपा लगाने हेतु दिन भर झुक कर  कार्य करना पड़ता है।

जो की शारीरिक थकावट होने का प्रमुख कारण है। जिससे श्रम शक्ति व अधिक एवं कार्य क्षमता कम हो जाती है। महिलाओं के द्वारा रोपाई की विधि अनियमित व कम कम क्षेत्रफल में अधिक पौधे होने के कारण अधिक श्रम शक्ति व पौधे को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व नहीं मिल पाते है। जिसके कारण उत्पादन कम हो जाता है, साथ ही प्रत्येक पौधे की बढ़वार पर्याप्त रूप से नहीं हो पाती हैं।

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श्री विधि से महिला कृषकों को लाभ:-

महिला कृषकों को धान की खेती में खेत में रोपे की रोपाई करने में अधिक से अधिक मेहनत एवं कष्ट का सामना करना पड़ता है। क्योंकि दिन भर होने वाले इस कार्य में अनियमित ढंग से रोपाई होने के कारण पौध संख्या में अधिक एवं उत्पादन की दृष्टि से कम होता है।

श्री विधि से पौध संख्या नियमित होने के कारण पौध संख्या में आवश्यकता के अनुसार होते हैं। पौध नियमित व समान दूरी पर होने के कारण पौध की वृद्धि एवं विकास पूर्ण रूप से होता है। क्योंकि दिया जाने वाला खाद एवं उर्वरक पौधों को सही रूप में प्राप्त होता है।

पौध से पौध की दूरी समान होने के कारण खरपतवारनाशी यंत्र का प्रयोग (कोनोवीडर) किया जा सकता है। जो कि कम समय में ज्यादा क्षेत्रफल में खरपतवार निकालने का कार्य कार्य होने के कारण शारीरिक श्रम एवं ऊर्जा की बचत होती हैं।

जिसका उपयोग कृषक महिलाओं के द्वारा अन्य किसी कृषि कार्य में किया जा सकता है। निकालने के लिए मजदूर एवं प्रयोग किया जाता है।

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श्री पद्धति से कृषकों को आर्थिक लाभ:-

इस पद्धति से धान लगाने पर कृषकों को खेतों में खरपतवारनाशी का छिड़काव नहीं करना पड़ता है क्योंकि कृषि उपकरण (कोनोवीडर) के द्वारा खरपतवार निकालने का कार्य करता है जिससे खरपतवारनाशी खरीदने एवं छिड़काव का किसानों का खर्चा बचता है। कुछ किसान खरपतवारनाशी के स्थान पर मजदूरों/दैनिक भत्ते के द्वारा खरपतवार को निकलवाने का कार्य करवाते हैं जो कि लागत एवं शारीरिक श्रम को बढ़ाते हैं उत्पादन लागत के कारण कृषक महिलाओं का होना मुनाफा कम हो जाता है।

श्री पद्धति के मुख्य सिद्धांत:-

  • श्री पद्धति से 12 से 14 दिन की उम्र की पौध की रोपाई की जाती हैं।
  • पौध से पौध एवं कतार से कतार की दुरी 25×25 से.मी. (10 इंच)।
  • एक स्थान पपर ही रोपाई की मिटटी सहित रोपाई।
  • रोपाई के 10 से 12 दिन के अंतर पर 2 से 3 बार कोनोवीडर से गुड़ाई।
  • अधिकतम जल प्रबंधन 1 से 5 इंच।
  • जैविक खाद का अधिक से अधिक प्रयोग।

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धान की उन्नत किस्में:-

क्र.

प्रजाति

पकने की अवधि

उपज (क्वी./है.)

विशेष गुणधर्म

1. पूसा बासमती- 1 135-140 45-50 झुलसा रोग के प्रति अवरोधी
2. पूसा बासमती- 1460 135-140 50-60 झुलसा रोग के प्रति अवरोधी
3. पूसा- 1121 (पूसा सुगंधा-4) 140-145 45-50 झुलसा रोग के प्रति अवरोधी
4. जवाहर धान हाइब्रिड- 8 105-110 70-75 सुखा एवं तना प्रतीरोधी

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परम्परागत एवं श्री पद्धति की तुलना:-

विवरण

परम्परागत विधि

श्री पद्धति

बिज दर/हेक्टेयर 12-15 की.ग्रा. 5 की.ग्रा.
नर्सरी क्षेत्र/हेक्टेयर 1000-1200 वर्ग मी. 100 वर्ग मी.
रोपाई हेतु अवधि 30-35 दिन 12-14 दिन
पोध अन्तरण अनियमित से.मी.
पोध संख्या/वर्ग मी. 66 16
पोध संख्या/हिल 2-3 1

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रासायनिक उर्वरकों की मात्रा:-

समूह-1 मात्रा/हेक्टेयर

समूह-2 मात्रा/हेक्टेयर

डी.ए.पी.- 87 की.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट- 250 की.ग्रा.
यूरिया- 140 की.ग्रा. युरिया-  175 की.ग्रा.
म्यूरेट ऑफ़ पोटाश- 50 की.ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश- 50 की.ग्रा.
जिंक सल्फेट- 25 की.ग्रा. जिंक सल्फेट- 25 की.ग्रा.

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रासायनिक उर्वरकों के उपयोग का समय:-

अवस्था

उर्वरक मात्रा

मचाई के समय डी.ए.पी.- 87 की.ग्रा.+ पोटाश- 50 की.ग्रा.+

जिंक- 25 की.ग्रा.

रोपाई के समय यूरिया- 30 की.ग्रा.
कल्ले फूटते समय यूरिया- 70 की.ग्रा.
गभोट अवस्था यूरिया- 40 की.ग्रा.

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धान में रोग नियंत्रण:-

रोग

नियंत्रण

ब्लास्ट (झोंका)

शीथ ब्लाइट

1. ट्राईसाइक्लोजोल 75% पूर्ण 300 ग्राम/हेक्टेयर
2. आइसोप्रोथियोलेन 40% ई.सी. 750 मि.ली./हेक्टेयर
 

शीथ ब्लाइट

3. आई.बी.पी. 48% ई.सी. 500 मि.ली./हेक्टेयर
1. प्रोपिकोनाजोल 25% ई.सी. 500 मि.ली./हेक्टेयर
2. हेक्साकोनाजोल 5% ई.सी. 1 ली./हेक्टेयर
बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट कॉपर ऑक्सीक्लोराइड- 500 ग्राम/हेक्टेयर + स्ट्रेप्टोसाइक्लिन- 25 ग्राम/हेक्टेयर
खैरा रोग जिंक सल्फेट 20-25 की.ग्रा./हेक्टेयर (रोपाई पूर्व)

खड़ी फसल में- जिंक सल्फेट 5 की.ग्रा./हेक्टेयर +2.5 ग्राम/हेक्टेयर बिना बुझा चूना + 25 की.ग्रा. यूरिया 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर।

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नर्सरी तैयार करना:-

नर्सरी हेतु चुने गए खेत की दो से तीन बार जुताई कर बखर चलाकर मिट्टी भुरभुरी बना कर 1 मीटर चौड़ी, 10 मीटर लंबी व जमीन से 15 से.मी. ऊँची उठी हुई क्यारिया बनाएं क्यारिया तैयार होने पर 50 से 60 किलो नाडेप खाद या गोबर की खाद डालें। लगभग प्रति क्यारी 500 ग्राम बीज की मात्रा नर्सरी में डालें। नर्सरी में बोनी के बाद प्रथम सिंचाई झारे से करें व इसके बाद रोपनी के दोनों तरफ उपलब्ध सिंचाई नाली के माध्यम से करें।

बीज छंटाई

बाल्टी में पानी लेकर नमक का 17% गोल बनाकर गोल में धान के बीज डाले व जब बीज ऊपर उठने लगे उसे छानकर बाहर निकाल दे। बचे हुए स्वस्थ बीज को साफ पानी से धोए। साफ पानी से धुले उबले हुए बीज को जूट की बोरी में बांधकर 24 से 36 घंटे के लिए पानी में डालकर रखें। उसके पश्चात धान के बीज को निकालकर ठंडे एवं छायादार स्थान पर हल्की सी नमी कर अंकुरण के लिए रख दें।

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पौधों से खेत तक ले जाना:-

श्री पद्धति के लिए तैयार को 8 से 12 दिन के बीच की दो पत्तियां आने की अवस्था पर रोपाई के लिए उपयुक्त माना जाता है। श्री पद्धति से पौध की रोपाई करने के लिए पौध को जड़ की मिट्टी सहित सावधानीपूर्वक उठाएं व चौड़े बर्तन में रखकर खेत में ले जाया जाता है। पौध को नर्सरी से निकालने के लगभग आधा से 1 घंटे के अंदर खेत में लगाना चाहिए।

खेत की मचाई एवं रोपाई:-

रोपाई वाले खेत को जोत कर भुरभुरा बना ले एवं पाटा लगाकर खेत को समतल बना ले। रोपाई वाले खेत को मचाई के लिए पड़ी पडलर, कल्टीवेटर या रोटावेटर का उपयोग कर मचाई करें और मचाई के बाद खेत का पानी कम ले। धान की परंपरागत पद्धति में धान की रोपाई 30-35 दिन पुराणी पौध से की जाती है। जबकि धान की श्री पद्धति में पौध की उम्र 12 से 14 दिन या अधिकतम 15 दिन की पौध रोपाई खेतों में की जाती हैं। इस विधि में कृषक में महिलाओं को यह ध्यान रखना आवश्यक है पौध को पौधशाला से निकालने के उपरांत शीघ्र ही खेत में रोपाई करना आवश्यक है ताकि जड़े मजबूत बनी रहे इस विधि से रोपाई करने से काफी संख्या में कल्ले निकलते हैं एवं मजबूत जड़ों का विकास होता है जो कि अच्छे उत्पादन के लिए जरूरी है।

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पौध संख्या एवं अंतरण:-

धान की श्री पद्धति में पंक्ति एवं पौध की बीच की दूरी 25×25 से.मी रखते हैं। इस प्रकार की वर्गाकार रोपाई में एक स्थान पर एक ही पौधा लगाते हैं। इस प्रकार पौधों की जड़ों के विकास के लिए समुचित व्यवस्था जैसे कि धूप, पानी, खाद व उर्वरक पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं। अनुकूल दशाओं की प्राप्ति के कारण पौधे में जड़ों का विकास अधिक होता हैं जो की उत्पादन को बढ़ाने में प्रभावी भूमिका निभाते हैं।

जल प्रबंधन:-

  1. खेत में समुचित नमी बनी रहना चाहिए, खेत में पानी का जमाव अत्यधिक ना हो ऐसी व्यवस्था करें।
  2. धान की फसल में कंसे निकलते समय कुछ दिनों तक खेत का पानी कम कर हल्की सी दरार पड़ने की अवस्था लावे व बाद में खेत में उचित नमी की व्यवस्था करें।
  3. धान की क्रांतिक अवस्थाओं, कल्ले फूटते समय, गभोट अवस्था, फूल निकलते समय व दाना भरते समय पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है।

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खरपतवार प्रबंधन:-

धान की श्री पद्धति में जलाक्रांत दशा नहीं होती है। इसलिए खरपतवारों की बढ़वार अधिक होती हैं। श्री पद्धति में खरपतवारों का नियंत्रण रासायनिक विधि की तुलना में यांत्रिक विधि से आसानी व कम खर्च से किया जा सकता है यांत्रिक विधि में कोनोवीडर सबसे अधिक कारगर हैं।

यांत्रिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लाभ:-

  • खरपतवार नष्ट होने से फसलों एवं खरपतवारों के बीच प्रतिस्पर्धा कम होती जाती है।
  • नष्ट हुए खरपतवार के मिट्टी में मिलने के बाद सड़ने से बाद में पौधे को खाद के रुप में प्राप्त होते हैं।
  • पौधों के बीच जगह बनने से एवं यंत्र के मिट्टी में गहरे चलने से वायु संचार बढ़ता है। जो कि पौधे की वृद्धि को बढ़ाते हैं।
  • यांत्रिक विधि से मिट्टी के भौतिक एवं रासायनिक गुणों में वृद्धि होती है।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन:-

धान की श्री पद्धति में खाद एवं उर्वरक प्रबंधन जैविक स्त्रोतों जैसे गोबर खाद, वर्मी कंपोस्ट, हरी खाद एवं अजोला के माध्यम से की जानी चाहिए। यदि जैविक स्त्रोत पर्याप्त उपलब्ध न हो तो निम्न स्त्रोतों के द्वारा खाद एवं उर्वरक प्रबंधन किया जा सकता है।

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धान की श्री पद्धति के लाभ:-

परंपरागत तरीके से धान की खेती की तुलना धान की श्री पद्धति से खेती करने पर उत्पादन में 1.5 से 3.0 गुना अधिक पैदावार होती है।

जलमांग में कमी:-

धान की श्री पद्धति से धान उगाने पर जलमांग में 30 से 50% तक की कमी होती हैं। कम पानी की दशा में धान की श्री पद्धति को अपनाया जा सकता है।

श्रम शक्ति में कमी:-

प्रति हेक्टेयर कम पौधे लगने के कारण रोपाई में लगने वाले श्रम को कम किया जा सकता है।

आर्थिक लाभ:-

खरपतवार नाशी यंत्र के धान की श्री पद्धति में प्रभावी होने के कारण खरपतवार नाशक एवं खरपतवार को निकालने में लगने वाले मजदूरों के खर्चा को कम किया जा सकता है जिससे लागत एवं धान की बचत होती है।

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बीज, खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता:-

धान की श्री पद्धति रोपाई के लिए एक स्थान पर एक ही पौधे की आवश्यकता होती है एवं परंपरागत विधि की तुलना में अधिक अंतर पर लगाया जाता है। कम पौधे लगने के कारण कम बीज, खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता होती है।

उत्पादन लागत में कमी:-

धान की श्री पद्धति में कम लगने के कारण कम बीज, खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता होती है। साथ ही पौधे स्वस्थ होने के कारण कीटों एवं बीमारियों का प्रकोप फसल पर कम होता है जिससे कीट एवं बीमारियों के नियंत्रण के लिए प्रयुक्त रसायनों की कम आवश्यकता होती है। जिससे स्वतः ही फसल उत्पादन लागत में कमी आती है।

मजबूत पौधे का होना:-

धान की श्री पद्धति में खेत में पौधे की रोपाई लगभग 15 दिनों के भीतर की जाती है। जिससे पौधे की जड़ एवं कल्ले काफी मजबूत होते हैं। इसलिए धान की फसल खेत में सीधे खड़ी रहती हैं और गिरती नहीं है।

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प्रस्तुति:-

लक्ष्मी चक्रवर्ती, डॉ. सर्वेश त्रिपाठी, मुकुल कुमार,

रंजीत सिंह राघव, डॉक्टर स्वनिप्ल दुबे,

कृषि विज्ञान केंद्र, रायसेन (मध्य प्रदेश)

स्रोत:-

विश्व कृषि संचार

वर्ष-21,  अंक-01, जून – 2018

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन, कोटा (राज.)

ईमेल – vks_2020@yahoo.com

मोब. नो.- 9425081638

 

 

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