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वेस्ट डी कंपोजर निर्माण विधि व उपयोग एवं महत्व

वेस्ट डी कंपोजर
Written by bheru lal gaderi

वेस्ट डी कंपोजर परिचय:-

भारत में प्रतिवर्ष 6 करोड़ 20 लाख टन कचरे का उत्पादन होता है। न केवल कचरे के उत्पादन में वृद्धि हुई है बल्कि एक अवधि में कचरे की प्रकृति में काफी बदलाव आया है। भारतीय शहरों में प्रति व्यक्ति कचरे का प्रतिदिन उत्पादन 200 ग्राम से लेकर 600 ग्राम तक होता है। हालाँकि प्रत्येक गांव में औसतन 300-400 परिवार प्रतिदिन लगभग 2 लाख टन कचरा पैदा करते हैं, जो बड़े पैमाने पर गाय के गोबर, गाय बांधने के स्थान का कचरा, और फसल अवशेष (भूसा, कचरा, बायोमास, डंठल आदि) से उत्पन्न होता है। इसके अलावा यह भी पाया गया है कि प्रतिवर्ष गौशालाओं में 1 करोड़ टन गोबर का उत्पादन होता है।

वेस्ट डी कंपोजर

वेस्ट डी कंपोजर

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इसके अतिरिक्त, लगभग 11 लाख टन प्रतिवर्ष उच्च कोटि का कचरा चीनी उद्योग से उत्पन्न होता है। विकासशील देशों में ग्रामीण आबादी वाले क्षेत्रों में कृषि और शहरी ठोस कचरे का प्रबंधन चिंता का मुख्य कारण है। वर्तमान में इससे कचरे को आमतौर से जला दिया जाता है यह उन्हें सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए, गाजियाबाद में राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र के कचरा अपघटक (वेस्ट डी कंपोजर) नामक एक उत्पाद विकसित किया। यह कुछ लाभकारी सूक्ष्मजीवों से निर्मित किया गया है। जिनमें पॉलिकिएड्स और अल्केन्स शामिल है। यह रोगाणुरोधी चयापचयों जो कि किसी खेत में बीमारियों की संख्या को नियंत्रित करता है, मैं सहायक होता है। इसके अलावा, यह ग्लुकेनेस और β-1,2, भी पैदा करता है, जो पौधों में रक्षातंत्र को सहायता देता है।

कचरा अपघटक(वेस्ट डी कंपोजर) की विशेषताएं:-

  • सरल और विश्वसनीय
  • उपयोग करने के लिए पूर्णतया तैयार
  • लम्बे समय तक सुरक्षित रहता हैं (शेल्फ जीवन 3 वर्ष)
  • सभी फसलों के लिए प्रयोग किया जा सकता हैं
  • फसलों पर बेहतर प्रभाव
  • स्वच्छ भारत अभियान के लिए जीव-कचरे को जैविक खाद में परिवर्तित करके एक अत्यधिक प्रभावकारी अपघटक के रूप में कार्य करता हैं
  • कम लागत (केवल 20 रूपये प्रति बोतल)
  • किसानों द्वारा एक बोतल के प्रयोग से प्रति वर्ष एक लाख मीट्रिक टन से अधिक जैविक खाद का उत्पादन किया जा सकता हैं।

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एक बोतल वेस्ट डीकम्पोजर से और अधिक डिकम्पोजर का निर्माण:-

वेस्ट डी कंपोजर किसानों का छोटी सी बोतलों में किया जाता हैं और वे खुद किसी भी अत्यधिक तकनीक का उपयोग किए बिना इससे और अधिक वेस्ट डी कंपोजर तैयार किया जा सकता हैं।

कचरा अपघटक के अन्य उयपोग:-

कचरा अपघटक (वेस्ट डी कंपोजर) न केवल बायो-कचरे को समाप्त कर देता हैं, बल्कि इसे कई अन्य प्रकार से भी प्रयोग किया जा सकता हैं।

जैविक कीटनाशक और जीव उर्वरक के रूप में:-

तरल कचरा डिकम्पोजर कल्चर को 1:40 के रूप में पानी के साथ पतला कर के कीट और बिमारियों को नियंत्रित करने के लिए पत्तियों पर छिड़काव द्वारा प्रयोग किय जाता हैं। यह सभी प्रकार की मिट्टी से उत्पन्न रोगों, पत्तियों के रोग, कीड़े और पेस्ट को नियंत्रित करने का कार्य कर सकता हैं।

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फसल अवशेषों की कम्पोस्टिंग:-

फसल कटाई के बाद पानी भरे खेत में फसल के डंठल पर घोल का छिड़काव करने के बाद कुछ दिनों तक छोड़ दिया जाता हैं।

जल की कमी वाले खेतों में फसल अवशेषों पर डिकम्पोजर घोल छिड़कते हैं और जब किसान खेत में सिंचाई करता हैं, तो विघटन की प्रकिया शुरू हो जाती हैं।

200 लीटर घोल को एक एकड़ खेत में फसल-अवशेषों पर इन-सीटू कम्पोस्टिंग के लिए प्रयोग किया जा सकता हैं।

ड्रिप सिंचाई:-

मिट्टी के स्वास्थ्य के पुनरुद्धार और फसल के लिए जैव-उर्वरक के रूप में तैयार किए गए वेस्ट डी कंपोजर घोल को पानी के साथ मिलाकर खेत में सिंचाई के दौरान इसका उपयोग किया जा सकता हैं। एक एकड़ जमीन के लिए कचरा डिकम्पोजर घोल की 200 लीटर मात्रा पर्याप्त हैं।

बीज उपचार:-

किसी भी प्रकार के बीज पर समान रूप से कचरा डी कंपोजर घोल का छिड़काव करें और 30 मिनट के लिए छाया के नीचे छोड़ दें। 30 मिनट के बाद बीज बुवाई के लिए तैयार हो जाते हैं। विभिन्न बीज जनित रोगों को कचरा डी कंपोजर द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

पत्तों पर छिड़काव:-

तैयार किए गए तरल वेस्ट डी कंपोजर का कल्चर पानी के साथ 1:40 के अनुपात में पतला करके और किट और रोगों को नियंत्रित करने के लिए पत्तों पर छिड़काव के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

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वेस्ट डी कंपोजर की बहू-दक्ष क्षमता:-

रोग प्रबंधन:-

कचरा अपघटक(वेस्ट डी कंपोजर) में विभिन्न फसलों में प्रभावी रूप से विभिन्न प्रकार के कवक, जीवाणु और वायरस संबंधी बीमारियों को नियंत्रित करने की बहुत संभावनाएं हैं। हम मिर्च, टमाटर, बैंगन, आलू, सोयाबीन, मक्का, गोभी आदि में रोग को दूर कर सकते हैं। अदरक, प्याज, आदि में राइजोम स्त्राव रोग भी नियंत्रित किया जा सकता है। इसी तरह नींबू, मेथी, बरसीम, अन्नानास आदि में जड़ सड़न रोग, केले, कपास, मिर्च, टमाटर, बैंगन, आलू, मुगफली, काली मिर्च, कॉफी, लीची आदि में विल्ट रोग, चावल, मक्का में शीथ ब्लाइट आदि रोग नियंत्रित किए जा सकते हैं।

उपरोक्त के अतिरिक्त, किसानों ने सूचित किया है कि डीकंपोजर के नियमित अंतराल पर छिड़काव के कारण और सिंचाई के पानी के साथ घोल के प्रयोग करने से किसी भी कीट और बीमारियों का उनकी फसलों पर कोई आक्रमण नहीं होता है। इसलिए किसान अच्छी पैदावार के कारण और फसलों की अच्छी बढ़ोतरी से खुश हैं।

फसल की गुणवत्ता और उपज:-

दुनियाभर में हर किसान/उत्पादक फसल की अच्छी गुणवत्ता और उच्च पैदावार की प्रयास करता है। वेस्ट डी कंपोजर फसलों की अच्छी गुणवत्ता और उच्च पैदावार के लिए एक आशाजनक विधि हैं। किसानों द्वारा यह सूचित किया गया है कि उनके खेतों में अपशिष्ट अपघटक के उपयोग से फसल की पैदावार में वृद्धि हुई है।

आलू के उत्पादको ने बताया है कि उन्होंने आलू को नंगे हाथों से खोदा है, क्योंकि कचरा अपघटक (वेस्ट डी कंपोजर) के उपयोग के कारण मिट्टी नरम और मुलायम बन गई है। अनार उत्पादको ने सूचित किया है कि पिछले वर्षों की तुलना में बेहतर गुणवत्ता वाले और चमकदार अनार का उत्पादन हो रहा है। चमक के लिए मोम लगाने की जरूरत नहीं होती।

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रासायनिक उर्वरक की जरूरत नहीं:-

जैविक खेतों में कचरा डी कंपोजर प्रयोग करने पर कोई रासायनिक उर्वरक (जैसे यूरिया, डीएपी, एमपी आदि) फसलों के लिए आवश्यक नहीं है। कचरा डी कंपोजर टेक्नोलॉजी सभी रासायनिक उर्वरकों का विकल्प है, वास्तव में, अपशिष्ट डी कंपोजर उन्हें निष्क्रिय कर देते हैं। अपशिष्ट डी कंपोजर मिट्टी में सूक्ष्मजीव की वृद्धि करने में मदद करता है और एंजाइमों और  कार्बनिक अम्लों को मुक्त करके खेत में पौधे/फसल अवशेषों को कमजोर करके पोषक तत्वों को मुक्त करने के लिए अनुकूल पर्यावरण का निर्माण करता है।

रासायनिक खेती के मामले में, किसान कचरा डी कंपोजर के उपयोग से 60% इनपुट (रासायनिक उर्वरक) लागत को बचा सकता है। रासायनिक उर्वरक का उपयोग कचरा डी कंपोजर के प्रयोग करने पर 60% तक कम हो सकता है। इसका मतलब यह कि जब वेस्ट डिकंपोजर को रासायनिक खेती में प्रयोग किया जाता है, तो केवल 40% यूरिया, 40% डीएपी और 40% एमओपी की मात्रा आवश्यक होती है, क्योंकि अपशिष्ट विघटनकर्ता फसल के अवशेष को विघटित करता है, जिसके परिणाम स्वरुप जैविक कार्बन की वृद्धि होती है, और यह अच्छी तरह मालूम है कि 0.1 प्रतिशत जैविक कार्बन की मौजूदगी से अवशोषण क्षमता 60% बढ़ जाता है। इसलिए, उर्वरक उपयोग दक्षता (एफ़यूई) 60% से 80% तक बढ़ जाती है।

कोई पेस्टिसाइड/ कवकनाशी/ कीटनाशक की आवश्यकता नहीं:-

किसान अपशिष्ट डी कंपोजर टेक्नोलॉजी का उपयोग शुरू करने पर कीटनाशक/ कवकनाशी/पेस्टनाशी की खरीद से संबंधित अपने पूरे निवेश को बचा सकते हैं। डी कंपोजर का उपयोग सभी कीटनाशकों/ बुरकनाशक/ पेस्टनाशी की आवश्यकता को समाप्त कर देता है, क्योंकि यह जड़ के चारों ओर के रोगों और ऊपरी भाग के रोगों को नियंत्रित करता है। इसके अलावा, खड़ी फसल पर कचरा डिकम्पोजर के नियमित स्प्रे, और सिंचाई के साथ उपयोग करने पर पौधों को सभी प्रकार के रोगों के हमले से बचाया जा सकता है। इस प्रकार, कोई कीटनाशक/ कवकनाशक/ पेस्टनाशी को प्रयोग नहीं करना पड़ता है।

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मिट्टी पर कचरा डी कंपोजर का प्रभाव:-

मृदा के भौतिक- रासायनिक और जैविक गुण:-

वेस्ट डी कंपोजर मिट्टी के जैविक और भौतिक रासायनिक गुणों को बदल देता है, जिससे मिट्टी पौधे की वृद्धि के लिए अनुकूल हो जाती है।  मिटटी के जैविक गुणों में लाभकारी माइक्रो मिट्ठी जीव में वृद्धि के रूप में काफी बदलाव आता है।

जैसा कि पहले भी उल्लेख किया गया है, कचरा अपघटक (वेस्ट डी कंपोजर) की पांच सिंचाई से खेत में करीब 4 लाख  केंचुओं की मात्रा में बढ़ोतरी देखी जा सकती हैं। मिट्टी की बनावट और संरचना  में बदलाव आता है, जो पौधों के विकास में सहायता देता है। साथ ही किसानों ने बताया कि घास के वृद्धि तंत्र में धीरे-धीरे गिरावट देखी गई। यह भी पाया जाता है कि अपशिष्ट अपघटक सूक्ष्मजीवों में अतिरिक्त सेल्युलाईट एंजाइमों का उत्पादन करने की क्षमता होती है, जो मिट्टी से उत्पन्न रोगाणुओं को विकसित नहीं होने देते हैं।  अपशिष्ट अपघटक (वेस्ट डी कंपोजर) द्वारा जैविक नियंत्रण को विभिन्न तंत्रों के संयोजन के रूप में जाना जाता हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण हैं-

  1. पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा
  2. पौधों की जड़ों और जड़ों के बाल के लिए सहायक अस्थिर और गैर वाष्पशील एंटीबायोटिक यौगिकों का निर्माण

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मिट्टी की लवणता:-

मृदा लवणता जड़ की मिट्टी की नमी में घुलनशील लवण की उच्च सांद्रता की उपस्थिति से संबंधित है। घुलनशील लवण की यह सांद्रता अपने उच्च ऑस्मोसिस दबाव के कारण जड़ों द्वारा पानी सोखने में रूकावट के कारण पौधों के विकास को प्रभावित करती हैं। सभी पौधे इस प्रभाव के अधीन हैं, लेकिन उच्च ऑस्मोसिस संवेदनशीलता दबावों की संवेंदनशीलता पौधों की प्रजातियों के बीच व्यापक रूप से भिन्न होती हैं।

लवणता भी पौधे की वृद्धि को प्रभावित करती हैं, क्योंकि मिट्टी के घोल में लवण की कुछ सांद्रता पौधों द्वारा आवश्यक पौष्टिक आयनों के संतुलित और शोषण में हस्तक्षेप करते हैं। पौधे की वृद्धि और फसल उत्पादन पर लवण का मुख्य प्रभाव होता है।

कृषि मिट्टी में पौधे पर रोगजनक कवक का फैलाव, जिसके कारण आद्रपतन रोग, पौधों का कुम्हला जाना (विल्ट रोग) और जड़ सड़न रोग, बीज का धीमा और अपर्याप्त अंकुरण, फिजियोलॉजीक  सूखा और पौधों का सूखापन रोग, अवरुद्ध विकास, छोटे पत्ते, छोटे तने और शाखाएं, नीली-हरी पत्ती का रंग, मन्द फूल विकास, कम फूल बांझपन और छोटे बीज, नमक सहिष्णु या हेलो फाइल पौधों की वृद्धि।

इन सभी प्रतिकूल कारकों के परिणाम स्वरुप बीज की उपज पर प्रभाव और पौधे के अन्य भागों की कम बढ़त होती हैं, और इसलिए समय की आवश्यकता है, कि पर्यावरण के अनुकूल बायो कंट्रोल एजेंट का चयन होना चाहिए जो उपर्युक्त्त समस्याओं को हल कर सके।

वेस्ट डी कंपोजर में लाइनिंग एंजाइम की श्रंखला तैयार करने की अपनी क्षमता होती है, ताकि सबट्रेटर्स का अपक्षय किया जा सके और सूक्ष्म जैविक अवरोधकों के लिए उच्च प्रतिरोध प्राप्त करने हेतु पोषक तत्वों, स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करके एंटीबायोटिक के उत्पादन के साथ-साथ पौधों की प्रणाली की प्रतिरोध को उत्प्रेरित करके पादपरोगजन का विरोध कर सके।

इसके अलावा पौधे के विकास के अणुओं के उत्पादन के माध्यम से पौधे की वृद्धि और विकास को बढ़ावा देता है। इसलिए 400 लीटर प्रति एकड़ सिंचाई द्वारा मिट्टी में कचरा-अपघटक (वेस्ट डी कंपोजर) के पांच बार उपयोग के बाद पौधे की वृद्धि शुरू हो जाती है।

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बीज अंकुरण पर प्रभाव:-

वेस्ट डी कंपोजर द्वारा बीज उपचार बीजों के ऊपर की एक आधुनिक तकनीक है, जिसमें बीज के सतह पर लाभकारी सूक्ष्मजीवों का उपयोग होता है। जिसके बाद इस जलयोजन होता है। बीज उपचार बीज और मिट्टी से उत्पन्न होने वाले रोगों को नियंत्रित करने के लिए एक बार पारिस्थितिक प्रबंधन प्रणाली है, जो रसायनिक उपचार का विकल्प है।

बीज उपचार से बेहतर बीज अंकुरण द्वारा यह पौधे के विकास कि प्रारंभिक स्थिति को बेहतर बनता है। और बीजों के उगने से पहले सुरक्षा प्रदान करता है। बीज विकास रासायनिक पदार्थों के प्रयोग की तुलना में कम से कम 4 दिन पहले देखा जा सकता है।

कुछ किसानों ने कचरा घटक (वेस्ट डी कंपोजर) द्वारा उपचारित बीजों की बुवाई के बाद 98% बीज अंकुरण की सूचना दी है। रोपाई और बीज अंकुरण पर नमक स्ट्रेस कम करने में इसका उल्लेखनीय प्रभाव दिखा है।

वेस्ट डी कंपोजर द्वारा बीज उपचार मिट्टी से उत्पन्न बीमारियों को नियंत्रित करने में मदद करता है और इससे पौधे की वृद्धि और उपज भी बढ़ जाती है, क्योंकि इसके बायोटिक रोगों (बीज अंकुरण रोग, मिट्टी से उत्पन्न रोगजनको) और गेर बायोटिक रोगों (परासरणीय, लवणता, दूरतशीतन या गर्मी झटका) को कम करने की क्षमता मिलती है। इसके अलावा कचरा अपघटक(वेस्ट डी कंपोजर) फिजीयोलाजिकल स्ट्रेस (बीज एजिंग के कारण खराब बीज गुणवत्ता) को दूर करने की क्षमता रखता है।

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नीलगाय (ब्लू बेल) वेस्ट डी कंपोजर सोल्यूशन से डूबे पौधों को नहीं खाते है।

फरीदाबाद क्षेत्र के किसानों ने बताया है, कि उनके क्षेत्र की फसल पौधों को जिन पर वेस्ट डी कंपोजर को छिड़का गया था। उन्हें नीलगाय ने नहीं खाया। वेस्ट डी कंपोजर के बारे में यह तथ्य रुचिकर है, परंतु इस संबंध में कोई वैज्ञानिक ज्ञान मौजूद नहीं है। लेकिन किसान खुशी की फसल को जानवर छतिग्रस्त नहीं कर रहे हैं।

स्वच्छ भारत अभियान के लिए प्रभावित तकनीक:-

वेस्ट डी कंपोजर माननीय प्रधानमंत्री के अग्रणी कार्यक्रम स्वच्छ भारत अभियान में एक प्रमुख हथियार बन गया है, क्योंकि वेस्ट डी कंपोजर की एक बोतल में एक लाख मीट्रिक टन से अधिक जैव-कचरे को परिवर्तित करने की क्षमता है।

परिणाम स्वरुप, यह स्वच्छता पखवाड़े में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया जो 16 से 31 मई 2017 तक आयोजित किया गया था। जो पूरे भारत में 64 मंडियों 16 मॉडल मंडियों सहित में अपशिष्ट डीकंपोजर तकनीक का प्रदर्शन किया गया और इस पहल से कंपोस्टिंग ने गति पकड़ ली है।

स्वच्छ शौचालय और खराब गंध को कम कर देता है:-

जैव-कचरे से वेस्ट डी कंपोजर द्वारा खाद बनाने की क्षमता के बारे में चर्चा करने के बाद इसकी एक अन्य विशेषता के बारे में भी उल्लेख करना जरूरी है। शौचालय की सफाई और विशेष रूप से गांव में शौचालय/सेप्टिक टैंक से उत्पन्न खराब गंध की कमी में इसकी प्रभावकारिता है।

यह विशेषता बहुत सराहनीय है और गांव के वातावरण को साफ करने में लाभ देकर स्वच्छ भारत अभियान को अधिक प्रभावकारी बनाती है।

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सफलता की कहानियां:-

चूंकि कचरा अपघटक (वेस्ट डी कंपोजर) तकनीकी शुरुआत से लेकर अब तक 20 लाख  से ज्यादा किसानों ने इसका उपयोग किया है और उनके खेत और मिट्टी पुनर्जीवित हुए हैं और उनमें से सभी कीट द्वारा फसल क्षति नहीं देखी है और उन्हें अच्छी पैदावार मिली हैं।

इसलिए अक्सर किसान यह कहते हैं कि इनपुट लागत 0 से कम हो जाती हैं और इसके उपयोग से उनकी आय दोगुनी हो गई है। सफलता की कहानियां डॉक्टर कृष्ण  चंद्र के YouTube चैनल पर देखी जा सकती है।

किसानों के विचार:-

ललित कुमार साहू:-

  •  वेस्ट डी कंपोजर का उपयोग करते हुए किसी इनपुट के उपयोग से मेरी आय में दोगुनी बढ़ोतरी हुई हैं।
  • अपने खेत में अपशिष्ट विगठन कर्ता (डब्लू-डी) के उपयोग के कारण उपज में वृद्धि से खुश हूं।  ललित कुमार साहू (एक किसान) निषधा, रायपुर जिला, छत्तीसगढ़।
  •  वही इनपुट लागत में 40000 प्रति एकड़ की बचत कर रहे हैं, क्योंकि यूरिया, डीएपी और रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करने की कोई जरूरत नहीं है। अधिक जानकारी के लिए देखें –

ओमवीर सिंह जैविक किसान:-

  • पौधों की जड़ में पैदा होने वाली बीमारियों पर नियंत्रण हुआ है।
  • श्री ओमवीर सिंह सहारनपुर जिले के हसनपुर के मूल निवासी हैं, जो जड़ों में पैदा होने वाली बीमारियों से फसल को क्षति पहुंचने से भारी नुकसान उठा चुके थे।
  • जिसके कारण उन्हें जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। वह एक प्रगतिशील जैविक किसान श्री भारत भूषण त्यागी के संपर्क में आए जो उन्हें राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र गाजियाबाद में लेकर आए। बाद में उन्होंने वेस्ट डी कंपोजर प्राप्त किया और अपने खेतों में प्रयोग किया और पाया कि बरसीम, मेथी, और अन्य पौधों में जड़ों में पैदा होने वाली बीमारियां पूरी तरह से नियंत्रण में आ गई। उन्होंने बताया कि 10 से अधिक टिलर केवल वेस्ट डी कंपोजर के प्रयोग से ही प्रकट हुए और उन्होंने अपने खेत में
  • किसी अन्य इनपुट का इस्तेमाल नहीं किया। किसानों द्वारा यह भी सूचित किया गया कि गन्ना के सेट से 35 टिलर तक अधिक उत्पादन हुआ।

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आई. सी. ए. आर. आई. आई. एफ. एस. आर. मोदीपुरम द्वारा कचरा डीकंपोजर की दक्षता संबंधी जांच निष्कर्ष:-

आई सी ए आर- आई आई एस ई आर, मोदीपुरम में एक माह के अनुसंधान द्वारा वेस्ट डी कंपोजर की प्रभावकारिता के बारे में अपने निष्कर्ष दिए हैं। डॉ. एन रवि शंकर, डॉ. देवाशीष गुप्ता, वरिष्ठ वैज्ञानिक और अन्य लोगों की टीम ने प्रयोगशाला और पॉट कल्चर तकनीक के साथ गेहूं, चावल और गन्ना अवशेषों का उपचार करके प्रभाव का अध्ययन किया और पाया कि अवशेष केवल एक महीने में विघठित हो जाता है।

डॉ. रवि शंकर ने कहा कि जल्द ही विघठित सामग्री की सभी जैव- रासायनिक संरचनाओं का विश्लेषण करने की प्रक्रिया में है। किसानों के बीच वेस्ट डी कंपोजर की लोकप्रियता के कारण ने स्वयं ही इसकी खरीद की थी।

वेस्ट डी कंपोजर मंगवाने का का पता:-

अपने राज्य एवं क्षेत्र के अनुसार सम्पर्क करें –

* *निदेशक
राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र
सेक्टर 19, हापुड़ रोड़, कमला नेहरू नगर, गाजियाबाद , ( उ. प्र .)
पिन- 201002
फोन नं- 0120-2764906, 2764212,
फैक्स- 0120-2764901,
वेबसाइट: dacnet.nic.in,
ईमेल : nbdc@nic.in ।

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क्षेत्रीय कार्यालयों के पते एवं उनके कार्यक्षेत्र राज्यों की सूची :-

  1. उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली एवं राजस्थान –
    सहायक निदेशक
    क्षेत्रीय जैविक खेती केंद्र
    सेक्टर 19, कमला नेहरू नगर, हापुड़ रोड, गाजियाबाद उ. प्र. पिन- 201002
    फोन नं – 0120-2764906
  2. हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब,जम्मू-कश्मीर
    सहायक निदेशक
    क्षेत्रीय जैविक खेती केंद्र
    किसान भवन, सेक्टर 14,
    पंचकूला ( हरियाणा )
    पिन : 134109
    फोन नं : 0172-2564460
  3. बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल एवं अंडमान निकोबार –
    क्षेत्रीय निदेशक
    क्षेत्रीय जैविक खेती केंद्र ,
    जी ए-114, नीलाद्री विहार, केवी- 4 के पास ,पी ओ- शैलाश्री विहार
    भुवनेश्वर( उड़ीसा ) पिन-751007
    फोन नं : 0674- 2721281
  4. कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, पांडिचेरी तथा लक्षद्वीप –
    क्षेत्रीय निदेशक
    क्षेत्रीय जैविक खेती केंद्र ,
    कन्नामंगला क्रास, व्हाइट फील्ड – होसकोटे रोड, काडुगोड़ी पोस्ट बेंगलूरु ( कर्नाटक )
    पिन- 560067
    फोन नं : +919449112997
  5. असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा तथा सिक्किम-
    क्षेत्रीय निदेशक
    क्षेत्रीय जैविक खेती केंद्र ,
    लांगोल रोड, लैम्फलपेट ,
    इम्फाल ( मणिपुर ) पिन: 795004
    फोन नं: 0385-2413239
  6. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड
    क्षेत्रीय निदेशक
    क्षेत्रीय जैविक खेती केंद्र ,
    हीरा भवन, मकान संख्या 21
    न्यू चुंगी नाका, आधार तल, जबलपुर, ( मध्य प्रदेश )
    पिन : 482004,
    फोन नं: 0761-2460972
    मो. 9893562707
  7. महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, गोआ, दमन एवं दीव, दादर और नगर हवेली –
    क्षेत्रीय निदेशक
    क्षेत्रीय जैविक खेती केंद्र ,
    अमरावती रोड़, राष्ट्रीय राजमार्ग 6, ग्राम- गोंड़खेरी, पोस्ट- वाड़ी, कलमेश्वर, नागपुर- ( महाराष्ट्र )
    पिन : 440023
    फोन नं : 07118-277052

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