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वर्षा जल संग्रहण द्वारा सब्जी एवं फसल उत्पादन

Written by bheru lal gaderi

हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि एवं बागवानी पर आधारित हैं। यहाँ विभिन्न प्रकार की मिट्टी एवं फसलोत्पादन के अनुरूप उपयुक्त जलवायु एवं मेहनतकश लोग हैं। खासकर बेमौसमी सब्जियों के लिए यहाँ की जलवायु अत्यंत लाभकारी हैं। प्रदेश में लगभग 80% कृषि वर्षा पर आधारित हैं। इस वर्षा का 80% भाग 15 जून से 15 सितम्बर तक हो जाता हैं तथा 20% भाग शेष 9 महीनों में होता हैं। वर्षा के इस प्रकार के बटवारें से खरीफ एवं रबी फसलों की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध नहीं होता हैं। फलस्वरूप सभी फसलों की पैदावार बहुत कम होती हैं। पानी की समस्या को मद्देनजर रखते हुये यदि हम वर्षा जल संग्रहण करके उसका सदुपयोग करें तो सब्जियों एवं फसलों के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता हैं।

वर्षा जल संग्रहण

वर्षा जल संग्रहण से अभिप्राय हैं वर्षा जल संग्रहण(Rainwater harvesting) करना व उसकी उत्पादन क्षमता बढ़ाना जो किसी भी क्षेत्र में हो सकती हैं। इस जल का एकत्रीकरण किसी भी स्त्रोत से किया जा सकता हैं। जैसे नदी, नाले, कुहल, झरना व छत का पानी इत्यादि। वर्षा जल संग्रहण किसी भी क्षेत्र में किया जा सकता हैं चाहे वह अधिक वर्षा या कम वर्षा जल क्षेत्र हो, पहाड़ी क्षेत्र हो या मैदानी क्षेत्र इन सभी क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण का विशेष महत्व हैं।

प्रायः वर्षा जल संग्रहण दो तरह से किया जा सकता हैं।

वर्षा जल संग्रहण

  1. जलागम आधारित
  2. व्यक्तिगत किसान आधारित

जलागम आधारित

वर्षा जल संग्रहण

जलागम आधारित वर्षा जल संग्रहण में पुरे जलागम का पानी बड़े-बड़े तालाबों में इकट्ठा किया जाता हैं तथा उसका उपयोग उस जलागम में रहने वाले सभी लोग करते हैं। इस विधि में जलागम में रहने वाले सभी लोग करते हैं। इस विधि में जलागम में रहने वाले लोगों के अतिरिक्त कई सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं की भागीदारी अनिवार्य हैं। इस जलागम का क्षेत्रफल कुछ हेक्टेयर से लेकर कई किलोमीटर तक हो सकता हैं। परन्तु कृषि का क्षेत्रफल कुछ हेक्टेयर से लेकर कई किलोमीटर तक हो सकता हैं। परन्तु कृषि प्रधान जलागम प्रायः 500 हेक्टेयर तक ही किये जाते हैं। इस विधि की सफलता प्रत्येक भागीदारी की कार्यक्षमता, ईमानदारी व रूचि पर निर्भर करती हैं।

व्यक्तिगत किसान आधारित

वर्षा जल संग्रहण

व्यक्तिगत किसान आधारित जल संग्रहण में एक ही किसान परिवार अपने ही परिवार अपने ही खेत में वर्षा जल इकट्ठा करता हैं तथा उसका कृषि उत्पादन में प्रयोग करता हैं। इस विधि में वर्षा जल छोटे-छोटे तालाबों में इकट्ठा किया जाता हैं। इस विधि की सिफारिश प्रायः उन पहाड़ी क्षेत्रों में करते हैं जहां किसानों के पास कृषि योग्य भूमि कम होती हैं। इस विधि से पानी इकट्ठा करने में लागत भी कम आती हैं और इसकी सफलता की संभावनाए भी अधिक होती हैं।

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छोटे तालाबों में पानी इकट्ठा करने हेतु निम्न बातों को ध्यान में रखना अति आवश्यक हैं।

  1. उचित स्थान का चुनाव
  2. तालाब का आकार
  3. क्षमता

उचित स्थान का चुनाव

यह तालाब ऊँचे स्थान परर होना चाहिए ताकि इकट्ठा किया गया वर्षा का जल निचले क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण से ही फसल की सिंचाई के लिए प्रयोग किया जा सकें। यह ध्यान रहें की तालाब के ऊपरी भाग में वर्षा दोहन क्षेत्र काफी हो। यदि तालाब के ऊपरी भाग में घरों का समूह हो या पक्का रास्ता हो तो वह सोने पर सुहागे के समान होगा। इन तालाबों का लाभ उन क्षेत्रों में भी अधिक हैं जहां सरकार द्वारा उठाऊ जल परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं। तालाब बनाते समय इस बात का ध्यान रखें की तालाब में दीवारों की ढलान 1;1 के अनुपात में हो।

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तालाब का आकार

एक कनाल जमीन के लिए लगभग 100-200 घन मीटर क्षमता का टेंक होना चाहिए। कच्चे तालाबों में पानी का रिसाव अत्यधिक होता हैं। इस रिसाव को रोकने के लिए जल अवरोधक पदार्थ का प्रयोग अति आवश्यक हैं। यह पदार्थ विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं जैसे चिकनी मिट्टी, कोलतार, सीमेंट, कंकरीट व पॉलीथिन शीट इत्यादि। चौ.स.कु.ही.प्र.कृ.वि.वि. में हुए शोध के अनुसार नीली पॉलीथिन शीट (सिलपालिन) का प्रयोग अति उत्तम हैं। इस शीट पर सूर्य की किरणों का कम प्रभाव पड़ता हैं। इसलिए यह बिना ढ़के भी 5-6 वर्ष तक खराब नहीं होती। इस शीट की कीमत लगभग 60 रूपये/वर्ग मीटर हैं।

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क्षमता

यदि इस पॉलीथिन शीट वाला 100 घन मीटर क्षमता का टैंक बनाना हो तो उसके लिए लगभग 13000 से 15000 रूपये तक खर्चा आता हैं अर्थात एक घन मीटर पानी इकट्ठा करने के लिए लगभग 130-150 रूपये खर्च होंगे।

छोटे तालाबों में इकट्ठे किये गये वर्षा जल संग्रहण का प्रयोग किसानों को अधिकतर सब्जी उत्पादन के लिए करना चाहिए। इसका प्रयोग खाद्द्य फसलों में बिजाई से पहले या फसल सूखने से बचाने के लिए सिंचाई के रूप में उपयोग किया जा सकता हैं। इस पानी के प्रयोग से एक साल में सब्जियों की चार फसलें उगाई जा सकती हैं।

प्रायः देखा गया हैं की किसान पानी को सिंचाई के लिए कच्ची नालियों द्वारा ले जाकर खेत में खुला छोड़ देते हैं जिसे फ्लड इरिगेशन कहां जाता हैं इस विधि से पानी उपयोग क्षमता लगभग 40 से 50% तक रह जाती हैं और शेष पानी व्यर्थ चला जाता हैं। परन्तु सिंचाई की नई विधियों से जैसे फुव्वारा व ड्रिप सिंचाई प्रणाली और व्यर्थ वनस्पति पदार्थ का आवरण के रूप में प्रयोग करने से जल उपयोग क्षमता लगभग 85 से 90% तक बधाई जा सकती हैं।

इसके अतिरिक्त खेत में छोटी-छोटी नालियां बना कर उनमे सब्जियों की बिजाई/रोपाई करने वाली विधि भी बड़ी कारगर सिद्ध हुयी हैं। हमारा किसान भाइयों से अनुरोध हैं की वे पानी की एक बून्द भी व्यर्थ न गवाएं और इसका प्रयोग उन्ही तरीकों से करें जिनमे पानी की उपयोग क्षमता से अधिक बढ़ सकें।

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