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वनककड़ी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

वनककड़ी की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

यह पौधा पोडोफिल्लेसी कुल का सदस्य है। इसका वानस्पतिक नाम पोडोफाइलम हेक्सेंडम है। वनककड़ी सदृश्य स्वाद एवं गंध होने के कारण इसको जंगली ककड़ी कहते हैं। यह पौधा इंडियन पोडोफाइलम के नाम से भी जाना जाता है। अत्यधिक अविवेकपूर्ण दोहन, अजैविक कारणों, मानव हस्तक्षेप, मूल आवासीय स्थानों का विघटन, बाजार में बढ़ती मांग इत्यादि कारणों की वजह से यह पौधा दुर्लभ प्रजातियों की श्रेणी में सम्मिलित हो चुका है।

वनककड़ी की उन्नत खेती

वानस्पतिक विवरण

यह पौधा सीधा, चक्रण बहुवर्षीय एवं शाकीय स्वभाव का होता है, जिसकी ऊंचाई 1.5 से 3.0 फीट तक होती है। इसमें पीले रंग की प्रकंदी जड़े पाई जाती है। इसकी दो हस्ताकार पत्तियां तीन से चार भागों में विभक्त रहती है। इस पौधे पर मई-जून माह में सफेद वर्ण का एकल प्याला सदृश्य पुष्प खिलता हैं और रक्त वर्ग के अंडाकार मांसल फल में 15 से 20 बीज तक होते हैं।

भौगोलिक विवरण

हिमालय की हिमाद्रि क्षेत्रों व उप-हिमाद्रि क्षेत्रों में कश्मीर से लेकर उत्तरांचल तक 2800 से 4000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। उत्तरांचल प्रदेश में वनककड़ी शीतोष्ण क्षेत्रों में मौरु, खर्सू वनों में नम व छायादार कार्बनिक तत्वों की अधिकता वाले स्थानों पर बुग्याल क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप में पाई जाती है।

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औषधिय उपयोग

इसके गुणों का औषधीय महत्व होता है। ये तिक्त, वीर्य, कटु, वातघ्न, पित्तसारक, संग्रही वामक, रेचक एवं उद्दीपक होती है और कैंसर के रोग के लिए उपयोगी होती है। साथ ही ट्यूमर व चर्म रोगों के लिए भी लाभकारी होती है।

सक्रिय घटक

इसकी जड़ों में पोडोफाइलिन नामक एल्कोलाइड पाया जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें एल्फा-पल्टाटीन, बीटा-पल्टाटीन, बेर्बेरीन, पोडेफिल्किन पोडोफिल्लेटॉक्सिन इत्यादि तत्व विद्यमान होते हैं।

भूमि एवं जलवायु

इसकी खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी जिसमें कार्बनिक तत्वों से भरपूर मात्रा हो, उपयुक्त होती है। इसके लिए नम व आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों जहां वार्षिक वर्षा 800-1300 मी.मी. एवं तापमान 0 डिग्री से 16 डिग्री सेल्सियस तक हो, सर्वोत्तम होते हैं।

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खेत की तैयारी

वनककड़ी की खेती के लिए चयनित खेत में भूमि को हल द्वारा दो से तीन बार जुताई करके आवश्यकतानुसार गोबर की खाद या कंपोस्ट मिला देनी चाहिए।

प्रवर्धन

वनककड़ी का प्रवर्धन बीजों एवं जड़ों द्वारा होता है।

बुवाई

वनककड़ी के लिए नर्सरी तैयार करके जून-जुलाई माह में पके हुए फलों को लुगदी सहित बो देना चाहिए, ताकि अगले अप्रैल तक बीज जम जाये अथवा प्रकंदीय जड़ों को 1.3 से 2.5 से.मी. तक के टुकड़ों में काटकर,जून- जुलाई माह में बोना चाहिए। पौध से पौध के बीच की दूरी 15-20 सेमी एवं कतार से कतार के बीच की दूरी 30 सेमी. से कम नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार एक हेक्टेयर भूमि के लिए 7 से 8 की.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है।

सिंचाई

वनककड़ी को वर्षाकाल के दौरान सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। परंतु ग्रीष्मकाल में सिंचाई लगभग 30 से 40 दिनों के अंतराल में करते रहना चाहिए।

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निराई एवं गुड़ाई

वनककड़ी को फसल के दौरान प्रत्येक वर्ष 4-5 बार तक निराई-गुड़ाई करके खरपतवार को बाहर निकाल देनी चाहिए।

रोग एवं उनकी रोकथाम

वनककड़ी की फसल में कभी -कभी प्रकंदों पर गाठें पड़ जाती है। इसकी रोकथाम के लिए उपयुक्त कीटनाशक (बाविस्टिन 0.1%) का उपयोग करना चाहिए।

दोहन व संग्रहण

वनककड़ी की कन्दों का विकास बहुत धीरे-धीरे होता हैं। बुवाई के 5 से 6 वर्षों बाद ही इसके कंदों में सक्रिय घटक की मात्रा सबसे अधिक होती है। जब प्रकंदो में 3 से 5 तक विहीन तने निकल आते हैं, तो समझना चाहिए कि वनककड़ी की खुदाई का समय हो गया है। यदि वनककड़ी के कंदों से रेजिन निकलना हो, तो सितंबर- अक्टूबर में खोदना चाहिए। परंतु पोडोफाइलोटोक्सिन के लिए, फरवरी-मार्च का मौसम उपयुक्त होता है। जड़ों की खुदाई के उपरांत तक साफ करके छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर सूखा लेना चाहिए। तत्पश्चात बोरों में भरकर सुरक्षित स्थान पर संग्रहित कर देना चाहिए।

उत्पादन व उपज

वनककड़ी की फसल से 5 वर्ष पश्चात 30-40 क्विंटल सुखी जड़े व कन्द प्रति हेक्टेयर की दर से प्राप्त होती है। साथ ही लगभग 10 किलोग्राम बीज भी प्राप्त होते हैं।

वनककड़ी का बाजार मूल्य

इसके सूखे प्रकंदों का वर्तमान बाजार मूल्य 1000-1500/- रूपये प्रति कि.ग्रा. तक हैं।

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