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लौकी की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

लौकी
Written by bheru lal gaderi

लौकी की बैलों की अच्छी वृद्धि 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर  होती हैं। इनके लिए उपजाऊ दोमट भूमि जहां पानी का निकास अच्छा हो उत्तम होती हैं। इनकी खेती गर्मी और वर्षा दोनों ऋतुओ में की जाती हैं।

लौकी

किस्मे

लौकी में पूसा समर प्रोलीफिक लौंग, पूसा प्रोनिफिक राउंड, पूसा मंजरी(संकर गोल), पूसा नविन, पूसा मेघदूत (संकर लम्बी), पूसा संतुष्टि, पूसा सन्देश, पूसा समृद्धि, अर्का बहार।

 बुवाई का समय

लौकी की बुवाई ग्रीष्मकालीन फसल के लिए फरवरी- मार्च व वर्षा कालीन फसल की जून- जुलाई में करना उचित हैं। बीमारियों की रोकथाम के लिए बीजो को बोने से पूर्व बविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित कर बोना चाहिए बुवाई का समय इस बात पर निर्भर करता हैं की इन सब्जियों की बुवाई नदी पेटे में की जा रही हैं या समतल भूमि पर।

लौकी की अगेती फसल

अगेती फसल लेने के लिए निम्न उपाय अपनाये जा सकते है। चूँकि बीजों का अंकुरण 20 डिग्री सेंटीग्रेड से काम तापमान पर ठीक प्रकार से नहीं हो पता है, अतः बीजों को सीधे खेत में न बोकर प्लास्टिक की थेलियों में बोया जा सकता है। थैलियों में 1/3 भाग चिकनी मिट्टी, 1/3 भाग बालू व 1/3 मींगनी या गोबर की खाद मिलाकर एक थैली में दो बीज को बोया जा सकता है। थेलियो में रखे बीजों कि झारे से सिंचाई करें। वातावरण गर्म  बनाये रखने के लिए रात के समय थैलियों को पॉलीथिन से ढक देवें। उपयुक्त तापमान होने पर  तैयार खेत में स्थानान्तरण कर करें।

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खाद एवं उर्वरक

1. गोबर की खाद 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
2. नत्रजन 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
3. फास्फोरस 40 किलो प्रति हेक्टेयर
4. पोटाश 40 किलो प्रति हेक्टेयर

 

बीजों की बुवाई

सीधे खेत में बोन के लिए बीजों को बुवाई से पूर्व 24 घंटे पानी में भिगोने के बाद टाट में बांध कर 24 घंटे रखें। उपयुक्त तापक्रम पर रखने से बीजों की अंकुरण प्रक्रिया गतिशील हो जाती है इसके बाद बीजों को खेत में बोया जा सकता है। इससे अंकुरण प्रतिशत बढ़ जाता है।

खाद एवं उर्वरक का उपयोग

देशी खाद, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की 1/3 मात्रा अर्थात 30 किलो नत्रजन बुवाई के समय भूमि में मिलाकर देवें तथा शेष नत्रजन की मात्रा दो बराबर भागो में बांटकर टॉप ड्रेसिंग (खड़ी फसल में) के रूप में प्रथम बार बिवाई के 25-30 दिन के बाद व दूसरी बार फूल आने के समय देना चाहिए।

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बीज की मात्रा

4-5 की.ग्रा./हैक्टेयर

दूरी

2.5.3×0.75 मीटर

कुष्माण्ड कुल की सब्जियों की बुवाई नालियों में करते हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान पर दो-तीन बीज बोये जाते हैं। अंकुरण के कुछ दिन 1-2 पौधों को रखकर शेष को हटा देते हैं।

प्रमुख किट

लाल भृंग

यह किट लाल रंग का  होता हैं तथा अंकुरित एवं नई पतियों को खाकर छलनी कर देता हैं। इसके प्रकोप से कई बार लौकी की पूरी फसल नष्ट हो जाती हैं।

रोग नियंत्रण

नियंत्रण हेतु कार्बोरील 5% चूर्ण का 20 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करे या एसीफेट 75 एस. पी. आधा ग्राम/ लीटर पानी की दर से छिड़के एवं 15 दिन के अंतर पर दोहरावे।

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फल मक्खी

यह करेला, तुरई, टिंडा, ककड़ी व् खरबूजे आदि को अधिक नुकसान पहुँचाती हैं। इसके आक्रमण से फल काणे हो जाते हैं

रोग नियंत्रण

नियंत्रण हेतु काणे फलो को तोड़कर भूमि में गहरा गाड़ कर नष्ट कर देते हैं। मैलाथियान 50 ई. सी. या डाइमिथायन 30 ई. सी. 1 मिली लीटर का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करे। आवशयकतानुसार 10- 15 दिन बाद छिड़काव को दोहरावे। शीशा या या शक्कर के 1 लीटर गोल में मैलाथियान 50 ई. सी. 10 मि. ली मिलाकर प्रलोभक तैयार करे तथा प्यालो में 50- 100 मि. ली. प्रति प्याले में डालकर खेत में कई स्थानों पर रखे। इससे मक्खियों के नियंत्रण में सहायता मिलती हैं। उपरोक्त छिड़काव करने से हरा तेला एवं मोयले का भी नियंत्रण हो जाता हैं।

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बरूथी

बरूथी पत्तियों की निचली सतह पर रहकर रस चूसती हैं इससे पत्तियों पर प्रारम्भ में सफ़ेद धब्बे बनते हैं जो बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं। परिणाम सवरूप पोधो में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बुरी तरह प्रभावित होती हैं।

रोग नियंत्रण

नियंत्रण हेतु ईथियान 50 ई. सी. 0.6 मिली लीटर पानी में गोल कर जून के दूसरे सप्ताह में छिड़कें।

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प्रमुख व्याधियाँ

तुलसिता (डाउनी मिल्ड्यू)

पत्तियों की ऊपरी सतह पर पिले धब्बे दिखाई देते हैं और नीचे सतह पर कवक की वृद्धि दिखाई देती हैं। उग्र अवस्था में रोग ग्रसित पत्तिया जड़ जाती हैं। नियंत्रण हेतु मेंकोबेज 2 ग्राम/लीटर पानी में गोल का छिड़काव करे। आवशयकता पड़ने पर इस छिड़काव को 15 दिन बाद दोहरावे।

झुलसा (ब्लाइट)

इस रोग के प्रकोप से पत्तियों पर भूरे रंग की छल्लेदार धारिया बन जाती हैं।

रोकथाम

नियंत्रण हेतु मेंकोबेज या जाइनेब 2 ग्राम या जाइरम 2 मिली. प्रति लीटर मिलाकर छिड़के। आवशयकता पड़ने पर इस छिड़काव को 15 दिन बाद दोहरावें।

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श्याम वर्ण (एन्थ्रेक्नोज)

इस रोग के प्रकोप से फलो व् पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के काले धब्बे बन जाते हैं। ग्रसित भाग मुरझाकर सूखने लगते हैं तथा फल सख्त हो जाते हैं रोग की रोकथाम के मेंकोबेज 2 ग्राम/लीटर पानी में घोल छिड़काव करे।

छाछया (पाउडरी मिल्ड्यू)

रोग ग्रसित बेलो पर सफ़ेद चूर्णी धब्बे दिखाई देते हैं। रोगग्रस्त पत्तियों एवं फलो की बढ़वार रुक जाती हैं और बाद में सुख जाते हैं।

नियंत्रण हेतु करथियन एलसी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें।

विषाणु रोग

कुष्मांड कुल की सब्जियों में दो प्रकार के विषाणु पाए जाते हैं। कुकुम्बर मोजेक वाइरस (सी. एम. वि.) 2 वाटरमेलन वाइरस (डब्ल्यू एम वी) एफिड्स से संचारित होता हैं तथा रोग का आक्रमण होने पर पत्ती की लम्बाई- चौड़ाई कम हो जाती हैं। ग्रसित पौधे में फल भद्दे रंग के बेडोल आकर के हो जाते हैं।

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रोकथाम

नियंत्रण हेतु रोग के लक्षण दिखाई देते ही पौधे को उखाड़ कर जला देवे। विषाणु ग्रसित पोधो से बीज प्राप्त न करे। रोगरोधी किस्म का चुनाव करे। मोयले की रोकथाम के लिए फास्फोमिडान 85 एस. एल. 0.3मिलिलिटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से 10- 15 दिन के अंदर छिड़काव करे।

लौकी का पत्ती धब्बा रोग

मेंकोबेज 0.2% घोल का 10 से 15 दिन के अंतराल पर तीन छिड़काव रोग के लक्षण दिखाई देते ही आरम्भ करे।

उपज

इस प्रकार उन्नत तकनीक को अपनाकर 150- 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

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