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लाख कीट पालन – वनोपज अतिरिक्त आय का साधन

लाख कीट पालन
Written by bheru lal gaderi

भारत के विभिन्न भागों में वनों पर आधारित लोगों के लिए लाख कीट पालन रोजमर्रा हेतु जीवन यापन का महत्वपूर्ण जरिया है साथ ही साथ यह भिन्न-भिन्न राज्यों जैसे झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात आदि में एक महत्वपूर्ण रोजगार का साधन है। जिनमें से 5 राज्य मिलकर लगभग 95% लाख का उत्पादन में योगदान देते हैं जो क्रमश झारखंड(58), पश्चिमी बंगाल(16.1), मध्य प्रदेश(11.9),  महाराष्ट्र(5.6),  ओडिसा(3.2) है। पिछले कुछ वर्षों में लाख का उत्पादन लगभग 7.3% बढ़ा है।

लाख कीट पालन

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जैसा कि हम जानते हैं कि भारत एक व्यापक जलवायु वाला देश हैं जो लगभग 21.23 प्रतिशत वनों से आच्छादित हैं एवं वन देश की आर्थिकी में मुख्यतया दो प्रकार के उत्पादों को प्रदान करके योगदान देते हैं। जैसे लकड़ी वाले एवं बिना लकड़ी वाले वन उत्पादन उनमें रेजंस गोंड, तर्पेटएन फल, परफ्यूम वाले तेल इत्यादि प्राप्त होते हैं एवं इस प्रकार के पदार्थ आदिवासी क्षेत्रों में किसानो के लिए रोजगार का एक अतिरिक्त साधन भी हो सकते हैं जो छोटे उद्योग धंधों में काम आते हैं।

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लाख उत्पादन में भारत का योगदान 

भारत का लाख कीट, कराय गोंद एवं ग्वार गम से प्राप्त प्राकृतिक रेजिन्स एवं गोंद उत्पादन में समूचे विश्व में एकाधिकार है। जो विश्व का 18.6% बाजार का हिस्सा है। लाख उत्पादन एक बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण आदान है जो किसानों के साथ-साथ देश की आय बढ़ाने में मददगार साबित हुआ है। लाख(lacquer) रेसिन एक प्रकार का गोंद की तरह का उत्पाद होता है जो केवल मात्र लाख कीट से प्राप्त होता है।

लाख कीट पालन

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लाख शब्द का जन्म संस्कृत के शब्द लाखस्य से हुआ है जिसका मतलब एक लाख होता है। हो सकता है यह शब्द इतने ज्यादा कीटों के एक साथ होने की वजह से दिया हो। विविध स्रोत बताते हैं कि एक लाख का उपयोग रेशों को रंगने में, चूड़ियां बनाने में सोने एवं चांदी के आभूषणों को बनाते वक्त एवं चमड़े की रंगाई करते वक्त काम में लिया जाता है।

भारत यूरोपियन देशों में वर्ष 1607 से लाख उत्पादन का निर्यात करता रहा है तथा उन्नीसवीं शताब्दी से देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। लाख से बनने वाले विभिन्न उत्पाद व्यापारिक दृष्टि एवं उद्योग में उपयोग की दृष्टि से काफी अहम भूमिका निभाते हैं जिनको प्राकृतिक के हिसाब से भी सुरक्षित समझा जाता है।

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लाख उत्पादन की प्रक्रिया

लाख कीट उत्पादन एक प्रकार का रेजिन होता है जो कीट के शरीर स्त्रवन से प्राप्त होता है। यह कीट पौध भक्षी होते हैं। जो पौधों की ऊपरी टहनियों पर भक्षण करते हैं पौधे जैसे पलाश, ( ब्यूतिया  मोनोस्पर्मा) एवं बेर (जिजिफस मोरोशियना) हैं जिनको सामान्यतया लाख कीट पालन के लिए महत्वपूर्ण पौधों पर भी पालन किया जा सकता है। लाख कीट एवं प्रकार का अंड-शिशु प्रजनन करने वाला कीट होता है जो अंडे को जन्म नहीं देता है। ऐसे कीट का संपूर्ण जीवन काल लगभग छः माह में ही पूरा होता है।

कीट की प्रथम अवस्था वाले कीट टहनियों पर रस चूसकर जीवन यापन करते हैं तथा वह अच्छी तरह से जम जाते हैं। उसके बाद यह कीट धीरे-धीरे लाख का मुखांगो के अलावा समूचे शरीर से शुरू कर देता है एवं कीट अपने आप को एक प्रकार के खोल में ढक लेता है। इस समय वातावरणीय स्थितियां कीट के विकास में अनुकूलित होना जरूरी होती हैं। जैसे तापमान, अपेक्षित आद्रता इत्यादि। मादा कीट गर्भधारण के बाद वाली अवस्थाओं में लाख का स्त्रवन शुरु कर देती हैं तथा इसकी आकारिकी में भी वृद्धि हो जाती हैं।यह क्रियाएं परपोषी एवं मौसम पर आधारित होती हैं ऐसे समय में ये कीट मधुस्राव करते हैं जो चीटियों को आकर्षित करता है।

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लाख कीट के रूप

भारत में उत्पादन होने वाले लाख कीट के दो रूप होते हैं पहला केरिका लाका जो कुसिमि एवं रंगीनी नामक परपोषी पर पाला जाता है तथा दूसरे प्रकार का कीट प्लस पर पाला जाता है। कीट की दोनों अवस्थाये 1 वर्ष में दो बार जीवनचक्र पूर्ण करती है तथा इनके प्रकार का समय अलग अलग होता है। रंगीनी फसल से वर्ष में 2 बार बैसाखी एवं केतकी में जो कि अक्टूबर नवंबर से जुलाई जून और जनवरी फरवरी तक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। कुसुमी प्रकार की फसल भी दो प्रकार से अगहनी एवं जेठवी के रूप में ली जाती है। इसका उत्पादन जून-जुलाई से अक्टूबर-नवंबर और जनवरी-फरवरी से जून-जुलाई तक लिया जाता है।

रंगीनी फसल से होने वाला उत्पादन कुसुमी फसल के मुकाबले में 6-8 गुना अधिक होता है तथा गुणवत्ता भी ज्यादा होती है एवं बाजार में मूल्य भी अधिक प्राप्त होता है। भारत में लाख का रंजक एवं एजेंट के रूप में व्यापारिक महत्व रहा है जिसका 17वी शताब्दी से ही निर्यात किया जाता रहा है। हालांकि 19वीं शताब्दी के आते-आते लाख के निर्यात के क्षेत्र में काफी स्पर्धा बढ़ गई है क्योंकि कृतिम रंजक सस्ती दरों पर उपलब्ध हो जाते हैं। भारत में लाख उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु भारत सरकार ने भारतीय लाख अनुसंधान की स्थापना झारखंड राज्य में की थी जिसका 2007 में नामकरण के परिवर्तन कर दिया गया है यह संस्थान देश में लाख उत्पादनकर्ताओं को विज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान उपलब्ध कराता है।

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लाख कीट पालन का वैज्ञानिक तरीका                                

लाख कीट पालन एवं उत्पादन के लिए के उसके परपोषी पादपों के बारे में जानकारी होना आवश्यक होता है जिनमे निम्नलिखित क्रियाएं सम्मिलित है-

इस प्रकार की किसान एवं अन्य बेरोजगार ग्रामीण युवा वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान द्वारा लाख कीट पालन अपनाकर फसलों के साथ-साथ वनों पर आधारित स्रोतों से अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं जो कि भारत सरकार के वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने में भी सार्थक सिद्ध होगा। सबसे महत्वपूर्ण ध्यान में रखने वाली बात यह है किसान इस प्रकार कि विधियों से पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचता है। लाख कीट पालन फसल उत्पादन के साथ-साथ आय प्राप्त करने में किसानों एवं आदिवासियों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है।

Author :- 

अनिल मीना, मोनिका मीना, बी. एम. मीना एवं आर. एस. मीना, पी.एचडी. शोधार्थी,

कीट विज्ञानं संभाग,

भारतीय कृषि अनुसन्धान संसथान, नई दिल्ली

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