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लहसुन की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

लहसुन
Written by bheru lal gaderi

भारत में लहसुन( garlic) लगभग 140 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता हैं जोकि विश्व में लहसुन की खेती में चीन के बाद दूसरा स्थान हैं। राजस्थान में लहसुन का क्षेत्रफल 15 हजार हेक्टेयर एवं उत्पादकता 4300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हैं। राजस्थान के बारां जिले में लहसुन की खेती 6685 हेक्टेयर में की जाकर 5784 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार प्राप्त की गई। जिले के प्रगतिशील कृषकों द्वारा 11-12 में. टन प्रति हेक्टेयर की दर से पैदावार ली जा रही हैं, जो कि जिले के लिए बड़ी उपलब्धता हैं। यही कारण हैं की राज्य की प्रथम लहसुन मंडी को छीपाबड़ौद (बारां) में स्थापित किया गया।

लहसुन

लहसुन में गंधक युक्त योगिक एलाएल प्रोपाइल डाईसल्फाइड तथा एलिन नामक अमीनो अम्ल पाये जाते हैं। सामान्य दशा में एलिन रंगहीन, गंधहीन तथा जल में घुलनशील होता हैं, परन्तु जब लहसुन काटा, छिला तथा कुचला जाता हैं तो इसमें उपस्थित एलीनेज एन्जाइम सक्रिय हो जाते हैं तथा एलिन को एलिसिन में बदल देते हैं। इसी परिवर्तन के कारण इसमें से विशिष्ट तेज गंध आने लगती हैं। जीवाणुओं के विरुद्ध सक्रियता भी इसी एलिसिन नामक पदार्थ के कारण होती हैं।

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भूमि एवं जलवायु

लहसुन की खेती किसी भी प्रकार की भूमि में की जा सकती हैं, परन्तु इसके लिए जीवाश्म युक्त उपजाऊ व जल निकास युक्त दोमट मिट्टी उपयुक्त होती हैं। भारी, चिकनी मिट्टी में कंद का आकार छोटा व खुदाई में कठिनाई होती हैं। यह पाला व लवणीयता को भी कुछ स्तर तक सहन कर सकती हैं। लहसुन की वृद्धि के समय ठंडा व नम जलवायु तथा कन्द परिपक्वता के समय शुष्क जलवायु उपयुक्त रहती हैं। ठंडी जलवायु का पौधा होने के कारण इसकी खेती फलदार बगीचों में भी की जा सकती हैं। अधिक तापमान व नमी में कलियों के सड़ने की संभावना रहती हैं तथा अंकुरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं।

भूमि की तैयारी

लहसुन की खेती के लिए गहरी जुताई तथा इसके बाद हेरों से भूमि की जुताई करना उपयुक्त रहता हैं। जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाती हैं। इसके बाद खरपतवार निकालकर खेत को समतल कर लेते हैं।

लहसुन की उन्नत किस्मे

जामनगर सफेद

इस किस्म के कंदों में कलियाँ आकार में बड़ी तथा संख्या में 20-25 तक होती हैं एवं कंदों का व्यास 3.5 से 4.5 से.मी. तक होता हैं। इसकी उपज 130 क्विंटल/हेक्टेयर तक प्राप्त होती हैं। इसकी संस्तुति रबी मौसम में ऐसे क्षेत्रों के लिए की जाती हैं, जहां पर्पल ब्लाच या अंगमारी की बीमारी नहीं आती हैं।

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यमुना सफेद (जी-1)

इस किस्म के कंद रंग सफेद, चमकदार एवं घने होते हैं। प्राप्त कंदों का व्यास 4.0 से 4.5 से.मी. होता हैं। अधिकतर कीटों- रोगों के प्रति इस किस्म में निरोधकता पाई जाती हैं। इस किस्म के द्वारा 150 क्विंटल/हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

यमुना सफेद 2 (जी-50)

यह किस्म देश के उत्तरी प्रांतों के लिए उपयुक्त हैं। कंदों का व्यास 3.5 से 4.0 से.मी. होता हैं। इसकी औसत पैदावार 150 से 200 क्वी./हैक. हैं।

जी-282

यह देश के उत्तरी एवं मध्य भाग के लिए अनुमोदित की गई किस्म हैं। अन्य की अपेक्षा इसकी पत्तियां अधिक छोड़ी, कंद तथा कलिया बड़े आकार की होती हैं। इसके कंदों का व्या. 5.0 से 6.0 से.मी. होता हैं। इसकी औसत पैदावार 175 से 200 क्वी./हैक. हैं। मुख्यतः यह किस्म निर्यात के लिए उपयुक्त पाई गई हैं।

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एग्रीफाण्ड पार्वती (जी-313)

यह किस्म उन स्थानों के लिए उपुक्त हैं जहां दिन लम्बे होते हैं। अतः उत्तरी भारत में मध्यम व ऊँचे स्थानों के लिए उपयुक्त हैं। इसके कंद बड़े आकार में एवं कंद का व्यास 5.0 से 6.0 से.मी. होता हैं। इस किस्म के द्वारा 175 से 225 क्वी./है. तक उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

बीज की मात्रा

लहसुन के लिए 5-6 क्वी./है. बीज की आवश्यकता होती हैं। लेकिन मशीन द्वारा बुवाई करने पर इसकी मात्रा 6-7 क्वी. तक होती हैं।

रोपाई का समय

लहसुन की बुवाई अक्टुम्बर माह में करते हैं। बुवाई के समय इसके लिए कतार से कतार की दुरी 15 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 7 से.मी. रखनी चाहिए। लहसुन की अगेती बुवाई करने पर कली सदन की समस्या अधिक होती हैं।

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खाद एवं उर्वरक

खाद एवं उर्वरक की मात्रा कृषि विज्ञानं केंद्र के मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में कराने के पश्चात् आवश्यकतानुसार करना चाहिए। सामान्यतः खेती की तैयारी के समय 20 से 25 टन गोबर की खाद/है. की दर से भूमि में मिलाकर जुताई करना चाहिए। कलिया लगने से पहले 50 की.ग्रा. नत्रजन, 60 की.ग्रा. फास्फोरस, 100 की.ग्रा. पोटाश तथा 25 की.ग्रा. जिंक सल्फेट/है. की दर से बुवाई से पूर्व आवश्यकता होती हैं। बुवाई के एक महीने बाद 50 की.ग्रा. नत्रजन खड़ी फसल में छिड़कना लाभकारी होता हैं। लहसुन की बुवाई के 55-60 दिन के बाद किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

सिंचाई व निराई-गुड़ाई

भूमि में नमी की कमी हो तो कलियों की बुवाई के बाद एक हल्की सिंचाई करते है। इसके पश्चात वानस्पतिक वृद्धि व कंद बनते समय 7-8 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई व फसल पकने की अवस्था पर 12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें।

लहसुन की खेती से अच्छी पैदावार के लिए 3-4 बार निराई-गुड़ाई अवश्य करें। जिससे कंद को हवा मिले एवं नई जड़ो का विकास हो सके। एक माह बाद सिंचाई के तुरंत बाद डंडे या रस्सी से पौधों को हिलाने से कंद का विकास अच्छा होता है।

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खरपतवार नियंत्रण

लहसुन में खरपतवार नियंत्रण हेतु पेंडीमेथिलीन 3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 1-3 दिन के अन्दर प्रयोग कर सकते हैं अथवा ऑक्सीडायजोना 1 किग्रा./हेक्टेयर अंकुरण पूर्व प्रयोग करने से खरपतवार नियंत्रण अच्छा होता है तथा उपज भी अच्छी प्राप्त होती है। मेथाजोल 3.0 लीटर/हे. अंकुरण पूर्व प्रयोग करने से 79% तक खरपतवार नियंत्रण होता है।

वृद्धि नियामक का प्रयोग

लहसुन की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए 0.05 मि.ली. प्लेनोफिक्स या 500 मि.ग्रा. साईकोसिल या 0.05 मि.ली. इथेपान/लीटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के 60-90 दिन पश्चात छिड़काव करना उचित रहता है। लहसुन की खुदाई से दो सप्ताह पहले 3 ग्राम मैलिक हाइड्राजाइड/लीटर पानी में छिड़काव करने से भण्डारण के समय अंकुरण नहीं होता है तथा लहसुन 10 माह तक सुरक्षित रखे जा सकते है।

खुदाई एवं उपज

ऊपर की पत्तियां पीली या भूरी पड़ने लगे तथा मुख्य तना मुड़ जाने पर लहसुन पकाना माना जाता है। इस प्रकर लहसुन के कंद को पकने में 4-5 माह का समय लगता है। खुदाई के पश्चात कंद को साफ करके ऊपर की पत्तियों से बांधते हैं तथा 3-4 दिन के लिए किसी छायादार स्थान पर रखते है। जिससे खेत की गर्मी कंद से निकल सकें। इसके बाद ठन्डे व शुष्क कमरे में लहसुन की 100 से 125 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।

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