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लहसुन का कटाई उपरांत संरक्षण एवं मूल्य संवर्धन

लहसुन
Written by bheru lal gaderi

लहसुन लिलिएसी परिवार का बल्बनुमा व बारहमासी पौधा है। इस पौधे के फल को मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है। कई बार भारतीय व्यंजनों का आदर्श घटक इसकी सुगंध बहुत तीखा स्वाद वाली है एवं भोजन व दवाओं में इसका व्यापक उपयोग के कारण इसका व्यापारिक महत्व है। दक्षिणी यूरोपीय एवं एशियाई व्यंजनों में लहसुन का सूप, टमाटर सॉस व सलाद का स्वाद बढ़ाने के लिए काट कर या पीसकर इसका प्रयोग किए जाते हैं। मध्य एशिया इसका मुख्य मूल है व भूमध्य क्षेत्र दूसरा मूल्य है। इसके बल्ब भूमिगत विकसित होते हैं। इन बल्ब को काफी लंबे समय तक रखा जा सकता है साथ ही खराब हैंडलिंग व दूर के परिवहन को भी यह सहन कर सकती हैं।

लहसुन

इसका सबसे महत्वपूर्ण उपयोग संक्रमण, कैंसर व हृदय बीमारियों की रोकथाम में है। भारत में इसकी दो विशिष्ट प्रजातियां हैं- फवारी एवं रॉयल गडी। इसके अलावा कुछ स्थानीय प्रजातियां जैसे गोदावरी, स्वेता, मद्रासी, तबीटी, क्रियोल एवं जामनगर भी भारत में के विभिन्न हिस्सों में उगाई जाती है। भारत सरकार ने राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान और विकास फाउंडेशन द्वारा विकसित किस्मे जैसे एग्रीफाउंड वाइट, यमुना सफेद व यमुना सफेद-2 को अधिसूचित किया है।

उत्पादन एवं व्यापार

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) के अनुसार इसका सबसे बड़ा उत्पादक देश चीन है एवं इसके बाद भारत, दक्षिण कोरिया, अमेरिका मिश्र एवं स्पेन हैं।

भारत में मध्य प्रदेश प्रमुख उत्पादक राज्य है। इसके बाद गुजरात, उड़ीसा, राजस्थान, महाराष्ट्र व अन्य राज्य है। पंजाब लगभग 14000 मीट्रिक टन उत्पादित करता है एवं इसकी सबसे ज्यादा उपज 12.5 मीट्रिक टन/हेक्टेयर है।

यध्यपि चीन, फ्रांस, स्पेन इसके निर्यातक देश है। इन देशों में फ़ों वाल लहसुन (40 से 60 मि.मी. व्यास का बल्ब जिसमें 10 से 15 फांके होते हैं ) पैदा किया जाता है जिसकी मांग काफी ज्यादा है। जी- 282 व एग्रीफाउंड पार्वती किस्मों में यह बड़े आकर वाली होती है। इन किस्मों की खेती मध्य प्रदेश, उड़ीसा, हरियाणा एवं पंजाब राज्यों में बढ़ रही है।

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रासायनिक संरचना:-

यह कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं फास्फोरस का मुख्य स्त्रोत है।

कटाई व हैंडलिंग:-

सामान्यत लहसुन की प्रजातियां, मृदा व मौसम पर निर्भर करते हुए लहसुन की फसल बुवाई के 130 से 135 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। जब भूमि से ऊपर लहसुन आंशिक रूप से शुष्क हो जाता है व जमीन की ओर झुकने लगता है, तब कटाई के लिए तैयार है। इसके बल्ब को पूरी तरह से सुखाने के लिए लगभग 1 हफ्ते तक खेत में इसे क्युरिंग के लिए रखा जाता है।

सूर्य की तेज रोशनी से बचाव के लिए को इनके पत्तों से ढक कर रखा जाता है। सूखने के बाद, पौधों को छोटे बंडलों में बांधकर बांस की लकड़ियों या रस्सी पर लटकाकर भंडारित किया जाता है। भंडारण विपणन से पहले किए हुए लहसुन की कटाई व ग्रेडिंग की जाति हैं। टूटे हुए, चोट लगे हुए, रोगग्रस्त खोखले बल्ब को अलग कर दिया जाता है। छंटाई व ग्रेडिंग का मुख्य उद्देश्य विपणन में अच्छा मूल्य प्राप्त करना है।

भारत में घरेलू उपयोग के लिए लहसुन को खुले जालीदार जूट बैग में रखा जाता है। आंध्रप्रदेश में लहसुन को 90 कि.ग्रा की पैकिंग में रखा जाता है। कर्नाटक व अन्य लहसुन उत्पादित राज्यों में लहसुन को 40-60 की.ग्रा. की पैकिंग में रखा जाता है। लहसुन ग्रेडिंग व पैकेजिंग नियम, 18 कि.ग्रा., 25 कि.ग्रा. व 50 किग्रा के आकार के पैकिंग प्रदान करता है। निर्यात के लिए 18 कि.ग्रा. 25 कि.ग्रा. की पैकिंग रिप्लाई वाले गत्तों के डिब्बों में की जाती है। बहुत से विकसित देशों में प्लास्टिक के बुने हुए बैग या नायलॉन की जाली वाली बैक लहसुन बल्ब की पैकेजिंग के लिए सामान्य प्रयोग किए जाते हैं। इनके कई लाभ है जैसे- भंडारण के दौरान नुकसान में कमी एवं विपणन के लिए आकर्षक पैकेजिंग।

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लहसुन का भंडारण:-

लहसुन के प्रसंस्कृत उत्पाद का भंडारण उसकी भंडारण अवधि बढ़ाने में बहुत महत्वपूर्ण है। अच्छी तरह से क्युरिंग किए हुए इसको साधारण हवादार कमरे में लंबे समय के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। पतियों के साथ ही भंडारण को अच्छे हवादार कमरे में लटकाकर भंडारित किया जा सकता है। यद्यपि यह व्यावसायिक स्तर पर संभव नहीं है, क्योंकि इसमें ज्यादा स्थान की आवश्यकता होती है।

अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि 0.6 डिग्री सेल्सियस से 0 डिग्री सेल्सियस और 80% या कम सापेक्ष आद्रता पर इसको कम से कम 6 से 7 महीनों के लिए भंडारित किया जा सकता है। उच्च तापमान (26.4 से 32 डिग्री सेल्सियस पर इसको एक महीने या कम समय के लिए भंडारित कर सकते हैं। मध्यवर्ती तापमान 4.4 डिग्री से 18.2 डिग्री सेल्सियस के बीच) अवांछनीय हैं, क्योंकि इससे शीघ्र अंकुरण, उच्च सापेक्ष आद्रता होती है, जिसके कारण सड़न व फफूंदी लगने शुरु हो जाती है।

कटाई उपरांत बीमारियों का रासायनिक नियंत्रण:-

भंडारण एवं विपणन के समय, इसकी महत्वपूर्ण बीमारिया ब्लू मोल्ड रॉट, बल्ब की क्षति, एस्परजिलस रॉट, फ्यूजेरियम रॉट, शुष्क रॉट एवं ग्रे मोल्ड रॉट हैं। सबसे ज्यादा प्रचलित बीमारी ब्लू मोल्ड रॉट है, जिसमें लहसुन में घाव बन जाते हैं। बल्ब की क्षति के बाद वाली अवस्थाओं में इसके फांके मुलायम, एवं जिनेब एवं नबम का छिड़काव शुष्क रॉट को कुशलतापूर्वक रोकने में प्रभावशाली भंडारित हैं। भंडारित लहसुन में व्हीट कर्ल माइट को नियंत्रित करने के लिए मिथाइल ब्रोमाइड की धूनी 32 ग्राम प्रति मीटर के अनुसार 2 घंटों के लिए 21 डिग्री सेल्सियस तापमान पर करनी चाहिए।

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लहसुन बल्ब में विकिरण:-

अंकुरण के कारण भंडारण के समय लहसुन के बल्ब में काफी गिरावट आती है। कई शोधकर्ताओं ने आयोजित विकिरण रेडिएशन के प्रभाव से नुकसान में कमी को साबित किया है। कटाई के 30 दिन बाद, लहसुन के बल्ब को कोबाल्ड-60 की 50 ग्राम मात्रा से उपचारित करने पर अंकुरण व वजन घटने में कमी आती है।

लहसुन के प्रसंस्कृत उत्पाद:-

कई व्यंजनों में ताजे लहसुन के उपयोग के आलावा, इसके विभिन्न प्रकार के प्रसंस्कृत उत्पाद बनाए। इसके प्रसंस्करण की कई विधियों को मानकीकृत किया गया हैं।

पेस्ट:-

Image Credit – spiceupthecurry.com

साफ किए हुए लहसुन के तोड़कर इसका छिलका उतारा जाता है। तत्पश्चात एक समान पेस्ट प्राप्त करने के लिए सावधानीपूर्वक उबला जाता हैं। आकर्षक स्वरूप व अच्छी भंडारण क्षमता के लिए 0.1% सल्फर डाइ-ऑक्साइड 15% सोडियम क्लोराइड एवं 0.05% एस्कॉर्बिक अम्ल मिलाया जा सकता है। पेस्ट को 70, 80 या 90 डिग्री सेल्सियस तापमान 15 मिनट के लिए ऊष्मा द्वारा प्रसंस्कृत कर सकते हैं। यह उत्पाद 250 सेल्सियस तापमान पर कम से कम छः महीनों के लिए सुरक्षित व स्थिर रहता है।

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तेल:-

लहसुन

Image Credit – Boldsky Hindi

मसले हुए लहसुन को भाप में पकाकर इसका तेल प्राप्त किया जाता है। नमी से युक्त लहसुन से 0.46 से 0.57% तक तेल की उपज होती हैं, जिससे यह काफी महंगा हो जाता है। लहसुन के तेल का विशिष्ट घनत्व एवं अपवर्तक सूचकांक 25 डिग्री सेल्सियस तापमान पर क्रमशः 1.091-1.098 एवं 1.5740-1.5820 हैं।

लहसुन के वाष्पीकरण घटक 

 वाष्पशील घटक

डाई-मिथाइल सल्फाइड

डाई एलील डाई सल्फाइड

डाई-एलीलसल्फाइड

एलील प्रोपाइल डाई सल्फाइड

मिथाइल एलील सल्फाइड

मिथाइल एलील डाई सल्फाइड

डाईप्रोपाइल डाई सल्फाइड

मिथाइल प्रोपाइल डाई सल्फाइड

सल्फर डाई ऑक्साइड

डाई एलील ट्राई सल्फाइड

डाई-एलील थायोसल्फीनेट

मिथाइल एलील ट्राई सल्फाइड

 

लहसुन के आसवित तेल का मुख्य घटक डाई-एलिल डाई सल्फाइड है। आमतौर पर लहसुन के तेल में वनस्पति तेल मिलाकर इसके तेल के कैप्सूल बनाए जाते हैं। इसमें लहसुन की गंध आती है व इसे खाद्य पदार्थों में फ्लेवर एजेंट के रूप में उपयोग किया जाता है।

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अचार

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पुरे कटे हुए को सिरका, ब्राइन या वनस्पति तेल या इनके मिश्रण में मिलाया जाता है। इसका उच्च गुणवत्ता वाला अचार बनाने के लिए पैकिंग करने से पहले पारंपरिक तरीके से  माइक्रोवेब द्वारा करना बहुत जरूरी है। इससे एंजाइम एलीनेज को निष्क्रिय करके तीखा स्वाद व हरा रंग दूर किया जा सकता है।

निर्जलित/शुष्क

इसकी नमी निकालने से कुल वज़न में कमी, भंडारण स्थान की बचत एवं परिवहन होने वाले सामान में आसानी होती है। मुख्यतः लहसुन को सुखाकर स्लाइस, एवं पाउडर बनाया जाता है। स्थिर अवस्था में इसकी रासायनिक संरचना ताजा लहसुन की रासायनिक संरचना जैसी होती है। इसका पाउडर बनाने से पहले इसे छिला, काटा व सुखाया जाता है। सुखी हुई लहसुन का रेस्टोरेंट, होटल अन्य खाद्य प्रतिष्ठानों एवं घर में काफी उपयोग है।

भारतीय मानक विनिर्देश ब्यूरो 5502 में लहसुन के नमूने के प्रशिक्षण तरीकों का प्रावधान है। इसके अनुसार, शुष्क लहसुन सफेद रंग से क्रीमी रंग का हो जाता है।

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प्रस्तुति:-

भेरूलाल कुम्हार, अनिल कुमार शर्मा, महेंद्र सिंह व महेश कुमार पुनिया,

कृषि विज्ञान केंद्र/कृषि विश्वविद्यालय, बोरखेड़ा कोटा (राज.)

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