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रासायनिक उर्वरक प्रयोग,महत्व एवं उपयोग विधि

उर्वरक
Written by bheru lal gaderi

मृदा में जिन पोषक तत्वों की कमी होती है उन्ही के अनुसार उपयुक्त उर्वरक उस मृदा में डालने चाहिए। लेकिन फसलों द्वारा उनका कृषक उपयोग उर्वरकों के डालने की विधि तथा समय पर निर्भर करता है। अधिकांश मृदाओं का उर्वरक स्तर कम होने के कारण उन पर उर्वरकों के प्रयोग का असर शीघ्र होता है। यदि उर्वरक ठीक विधि से तथा ठीक समय पर मृदा में मिलाये जाये तो पोषक तत्वों की उपलब्धता पोंधो के लिए बढ़ जाती है।

उर्वरक

उर्वरक प्रयोग विधि

विभिन्न अवस्थाओं में फसलों को विभिन्न विधि से उर्वरक दिया जाता है उर्वरक प्रयोग की उचित विधि के चुनने में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।

नत्रजन उर्वरक

  • नत्रजन जल में अत्यधिक विलेय होते है और अनुप्रयोग के स्थान से प्रत्येक दशा में गतिशील होते है अतः पौधे इन्हे प्रत्येक स्थान से आसानी से ग्रहण कर लेते है, यदि इन उर्वरकों को मृदा की उर्वरा सतह पर प्रयोग किया जाये तो भी यह आसानी से पौधों की जड़ो को प्राप्त हो जाते है। अतः नत्रजन उर्वरकों का प्रयोग फसल की बुवाई से पहले या बुवाई के समय ही छिड़कवा,ड्रिलिंग,संस्थापन विधि से किया जा सकता है।
  • यह उर्वरक लीचिंग से शीघ्र नष्ट हो जाते है इसलिए इसे पौधों की वृद्धि की विभिन्न अवस्थाओं में थोड़ी थोड़ी मात्रा में प्रयोग किया जाना चाहिए। नत्रजन उर्वरक नम मृदाओं में आसानी से गतिशील होते है, इसलिए इन उर्वरकों का प्रयोग सतह पर करते हैं और तुरंत बाद सिंचाई कर देते है।

फॉस्फोरस उर्वरक

  • फॉस्फोरस का संचालन प्रयोग किये जाने वाले स्थान से बहुत धीरे-धीरे होता है। अतः इसका प्रयोग पोंधों की जड़ो के पास करना अत्यंत आवश्यक है जहाँ से पौधे इसे आसानी से ग्रहण कर सकें।
  • मृदा में प्रयोग करने के पश्चात फॉस्फेट का स्थरीकरण हो जाने से यह विलय अवस्था से अविलेय अवस्था में परिवर्तित हो जाता है जिससे फॉस्फोरस के आयन पोंधों की जड़ो से जितनी अधिक दुरी पर होते है और मृदा में इनका स्थरीकरण उतना ही अधिक होता है और पोंधों को फॉस्फोरस उतनी ही कम मात्रा में प्राप्त होता है। अतः फॉस्फोरस का प्रयोग स्थानिक संस्थापन विधि से करते है।

पोटाश उर्वरक

पोटाश उर्वरक मृदा में कम गतिशील होते है और मृदा में इनका स्थरीकरण भी हो जाता है, इसलिए पोटाश उर्वरकों को जड़ क्षेत्र के समीप ही प्रयोग करना चाहिए

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विभिन्न फसलों में उर्वरकों की आवश्यकता एवं महत्व

  1. पोंधों को सबसे अधिक नत्रजन की आवश्यकता वृद्धि की मध्यम अवस्था में, उससे कम प्रारम्भिक अवस्था में तथा सबसे कम फसल पकने के समय होती है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि फसल की अच्छी वृद्धि, अच्छी उपज के लिए फसल उगने से कटने तक उचित मात्रा में नत्रजन का मृदा में होना आवश्यक है।
  2. नत्रजन उर्वरक जल विलेय होते है तथा मृदा में शीघ्रता से गतिशील होने के कारण सभी दिशाओं में गति करते है और अधिक होने पर सिंचाई जल के साथ लीचिंग होकर नष्ट हो जाते है। इसलिए इन उर्वरकों की पूरी मात्रा एक ही बार प्रयोग न करें।
  3. फॉस्फोरस मृदा में अचल अवस्था में रहता है अतः लीचिंग से नष्ट नहीं होता है। फॉस्फोरस की आवश्यकता पोंधों को अपनी वृद्धि की प्रारम्भ अवस्था में अधिक होती है, और सभी फॉस्फोरस उर्वरक पौधों को धीरे-धीरे प्राप्त होते है, इसलिए फॉस्फोरस उर्वरक की सम्पूर्ण मात्रा बोन से पहले या पौंधे उगने के समय ही प्रयोग करनी चाहिए।
  4. नत्रजन के समान ही पौधों को पोटाश की आवश्यकता फसल के काटने तक होती है, लेकिन पोटाश उर्वरक फॉस्फोरस उर्वरक के समान ही फसलों को बहुत ही धीरे-धीरे उपलब्ध होते है, इसलिए पोटाशयुक्त उर्वरक की सम्पूर्ण मात्रा का प्रयोग फसल बुवाई के समय ही करना चाहिए।
  5. पोषक तत्व बलुई मृदाओं में भारी मृदाओं जैसे क्ले की तुलना में शीघ्र ही लीचिंग से नष्ट हो जाते है। अतः विशेषरूप से जल विलेय उर्वरकों का प्रयोग बलुई मृदाओं में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कई बार करना चाहिए।

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उर्वरकों के प्रयोग करने का सही समय

उर्वरकों का उपयोग करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए की फसल का स्वभाव, वृद्धि की अवस्थायें, पोषक तत्वों की आवश्यकता, मृदा दशायें तथा उर्वरकों का स्वभाव आदि कारक उर्वरकों के प्रयोग करने के समय को प्रभावित करते है। इसलिए उर्वरकों को फसल को बोने से पहले, बुवाई के समय व फसल को बोन के बाद प्रयोग करते हैं।

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फसल को बोने से पहले देना

कुछ फॉस्फोरस जैसे – रॉकफॉस्फेट, बेसिक स्लेग, आदि की अधिक तत्व उपलब्धता प्राप्त करने के लिए फसल के बोने से पहले प्रयोग करते है इन उर्वरकों में फॉस्फोरस जल अविलेय रूप में होता है।  मृदा में कार्बनिक पदार्थ से उत्पन्न अम्लों के सम्पर्क में आने से अविलेय फॉस्फेटविलेय रूप में परिवर्तित हो जाते है। चूँकि इस क्रम में समय लगता है इसलिए इन उर्वरकों को फसल के बोन से पहले खेत में मिला देना चाहिए।

बुवाई के समय

  1. अधिक वर्षा वाले क्षेत्रो में उर्वरकों का प्रयोग बुवाई के समय करना चाहिए। जबकि यह बात ढालू और रेतीली मृदाओं में विशेष महत्व रखती है, ऐसी मृदाओं में वर्षा से खाद की हानि अधिक होती है। इसलिए इन अवस्थओं में जल विलेय उर्वरकों का प्रयोग बुवाई से पहले नहीं करना चाहिए।
  2. मुख्य पोषक तत्वों में से विशेषकर नत्रजन अधिक चल (मोबाइल) होती है मृदा में जब नमी की मात्रा अधिक होती है तो नाइट्रेट, नाइट्रोजन शीघ्र ही नीचे की सतहों की और गति करके नष्ट हो जाती है। अमोनीकल नाइट्रोजन क्ले कणों पर अधोशोषित रहती है तथा लीचिंग से नष्ट नहीं हो पाती है, नाइट्रेट युक्त नाइट्रोजन उर्वरक मृदा में तभी मिलाने चाहिए जब मृदा में नमी की मात्रा उपयुक्त हो।
  3. अन्य तत्व जैसे – सल्फर, जिंक व कैल्शियम जिनकी फसलों को कम मात्रा में आवश्यकता होती है लेकिन फसलों में आपूर्ति न होने पर उपादान प्रभावित होता है। जिंक सल्फेट, फेरस सल्फेट आदि को बुवाई के समय संस्थापन विधि से देवे और कैल्शियम सल्फेट को बुवाई से पहले मिट्टी में मिलावें।

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फसलों को बोने के बाद देना

खड़ी फसल में उर्वरक देने की विधि को टॉप – ड्रेसिंग कहते हैं। सभी फसलों को उनकी उत्तम वृद्धि के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता फसल बुवाई से लेकर फसल के पकने तक भिन्न-भिन्न मात्राओं में होती है अतः विशेषरूप से अधिक दिनों में पकने वाली फसलों जैसे गन्ना आदि के लिए पोषक तत्व फसल की वृद्धि की अवस्थाओं में विभिन्न समय पर मृदा में मिलाये जाते है। लम्बी अवधि में पकने वाली धान की किस्म में नत्रजन का एक भाग कल्ले फूटने तथा दूसरा भाग फूल आने की अवस्था में मृदा में मिलाया जाता है। हल्की कणाकार वाली मृदाओं में पोटेशियम की की आवश्यक मात्रा का एक भाग खड़ी फसल में देने की सिफारिश की जाती है।

विलेय उर्वरकों व रसायनों का उचित प्रयोग

इन उर्वरकों को प्रायः फसल की खड़ी अवस्था पर दिया जाता है जैसे थायो यूरिया का 0.05-0.1 प्रतिशत, जिंक सल्फेट का 0.2 प्रतिशत एवं फेरस सल्फेट का 0.5 प्रतिशत पानी की उचित सांद्रता का विशेष ध्यान रखकर प्रयोग करें जिससे उनकी उपलब्धता फसलों की अधिक हो सके अन्यथा फसल पर विषैला असर दिखाई पड़ेगा और उत्पादन प्रभावित होगा। इनके उपयोग में किसान विशेष ध्यान रखें तथा उपयोग का समय, मात्रा, जल व रासायनिक अनुपात एवं प्रयोग विधि का अच्छा ज्ञान होना आवश्यक है।

अतः सभी किसान भाइयों से निवेदन है कि रासायनिक उर्वरको के प्रयोग की सटीक और अधिक जानकारी के लिए अपने स्थानीय क्षेत्र के कृषि सहायक अधिकारी से अवश्य सलाह लेवें।

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