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महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन- ए अनटोल्ड स्टोरी बिहाइंड द सक्सेस

महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन
Written by bheru lal gaderi

कमल जीत जी की फेसबुक वाल से

31 मार्च 2013 को हैफेड पंचकूला में बैठ कर मैंने आखिरी प्रोपोजल लिखा और शाम पांच बजे बाहर आ गया, क्योंकि ये आखिरी दिन था, मुझे आज तक नही पता उस प्रोपोजल का क्या हुआ। लेकिन 1 अप्रैल को दिव्या को रोहतक छोड़ कर सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से मुम्बई की फ्लाइट पकड़ कर मुम्बई पहुंचा। क्योंकि भाई ईश्वर सिंह कुंडू महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन के फाइनल राउंड के लिए आने वाले थे।

महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन

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महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन 

महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी ने एक बहुत बड़ा कैम्पेन महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन चला कर 15 प्रतिभागियों को नेशनल लेवल से फाइनल राउंड के लिए चुना था और सभी प्रतिभागियों की 4 दिन की ट्रेनिंग होनी थी और उसके बाद फाइनल प्रेजेंटेशन होनी थी। 4 दिन की ट्रेनिंग अपने वर्क प्रोजेक्ट को बेहतरीन और ओरिजिनल ढंग से पेश करने के लिए दी जा रही थी।
महिंद्रा एंड महिंद्रा कॉर्पोरेट कार्यालय में एक बड़ा स्पेस हमारे लिए रिजर्व था और “अर्नेस्ट एंड यंग ” की टीम और DASRA की टीम हमें रगड़ने मांजने के लिए तैयार थी। सभी प्रतिभागी अकेले थे। मैं कुंडू साहब के अस्सिटेंट के तौर पर उस ग्रुप में ऑफिशली शामिल हो गया और हम दोनों ट्रेनिंग लेने लग गए।

महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन में ट्रेनिंग का आलम यह था के सुबह 9 बजे रात 9 बजे तक प्रोजेक्ट डेवेलोपमेन्ट के विभिन्न आस्पेक्ट्स पर ट्रेनिगं दिया करते और रात को काम करने के लिए असाइनमेन्ट भी दे दिया करते। कुंडू साहब और मैं एक एक बात नोट करते और अपने देसी हिसाब से नोट्स बनाते जाते। होटल में 1 बन्दे की व्यवस्था थी सो मैंने नज़दीक ही एक लॉज में जुगाड़ बना लिया था। सुबह कुंडू साहब के होटल से महिंद्रा एंड महिंद्रा का कार्यालय 1 घंटे की दूरी पर था जहां हम स्टाफ बस के ले जाये जाते । बस यही एक घंटा सुबह शाम मिल रहा था जिसमे खराटे मार के सो लेते। कसम से मुम्बई देख ही नही पाए।

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प्रेजेंटेशन

तीसरे दिन आनंद महिंद्रा स्वयं आये और सभी इन्नोवटर्स से बात की। सभी मे जोश भर गया। चौथे दिन तक हमारी प्रेजेंटेशन बन कर तैयार हो चुकी थी। अब उसे प्रेजेंट करना था। मैंने प्रेजेंटेशन बनाई और कुंडू साहब ने डिलीवर की हमने एक दूसरे के पैर दबा दबा कर कम्यूनिकेट किया और पूरे समय मे प्रेजेंटेशन समाप्त हो गयी। सबसे अधिक सवाल कुंडू साहब से पूछे गए जिनको अंग्रेजी में ट्रांसलेट करके मैं जजेज को बताता रहा। उसके बाद हम दूसरे इन्नोवटर्स की प्रेजेंटेशन देखते रहे। एक से बढ़ कर एक इन्नोवटर्स थे, क्या अंग्रेजी बोला करते।

रिजल्ट अन्नोउंस

रात 8 बज गए और रिजल्ट अन्नोउंस हुआ तो पहले 3 नम्बर फिर 2 नम्बर वाला, उसके बाद उन्होंने सस्पेंस बना दिया हम उठ कर चलने को तैयार हुए के बस बाहर चलते हैं। कुंडू साहब आगे आगे और मैं पीछे पीछे। इतने में स्टेज से नाम अन्नोउंस हुआ, “कृषिकों हेरबोलिक लेबोरेटरीज कैथल हरियाणा”। हम दोनों फ्रीज हो गए। हमे विश्वास ही नही हुआ। कांपती टांगो के साथ स्टेज पर पहुंचे तब तक मैं स्टेबल हो गया था। मैंने भाई ईश्वर सिंह कुंडू को उठा लिया और उस दिन इतिहास बन गया।

44 लाख कुंडू साहब के लिए बहुत थे। अपने आविष्कार का राकेट बनाने के लिए। उसके बाद वहां पार्टी का आयोजन हुआ। हमे यकीन ही नही हुआ था। उस रात 12 बजे होटल पहुंचे तो मैं भी होटल में घुस गया। रात वहीं सोये और सुबह फ्लाइट पकड़ कर दिल्ली आ गए।

महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन

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रोहतक में भाई Sanjay KhuranaJagphool Singh सर जी , भाई Sumit Kaushik ji, भाई अजय गोदारा तिलियार लेक पर रोड शो की तैयारी किये हुए मिले, रोहतक में जोरदार रोडशो निकाला गया।

मिस्ड कॉल

महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन की सफलता तक पहुंचने में अनेक दौर ऐसे आये जहां हमे जन समर्थन की आवश्यकता पड़ी, सेकंड लास्ट राउंड में एक कॉम्पोनेन्ट था के एक नम्बर पर मिस्ड कॉल लगवाना, हमने अपने संपर्कों के घोड़े खोल दिये विशेषकर Katar Singh Verma सर जो गुज्जर समाज कल्याण परिषद चंडीगढ़ और पंचकूला के वाईस प्रेजिडेंट हैं ने एक बड़ा कैम्पेन चला कर कुंडू साहब के लिए मिस्ड कॉल रूपी वोट्स का जुगाड़ किया। मीडिया के साथियों ने भी बार बार खबरें छाप कर मिस कॉल के लिए अपील जारी की कुल मिला कर हम 69000 के आस पास वोट्स ले पाए और सेकंड रहे। तब जाकर फाइनल राउंड में जगह बना पाए।
टर्निंग पॉइंट

टर्निंग पॉइंट

5 अप्रैल 2013 का दिन कभी नही भूला जा सकता क्योंकि उस दिन जिंदगी में एक टर्निंग पॉइंट नजदीक से देखा। जब घर वापिस आया तो मेरे चेहरे पर सुकून था। मुझ से कुछ सवाल भी किये गए के तुम्हे क्या मिला। मेरा जवाब हमेशा मेरे लिए ही होता है और मैं जवाब अपनी मर्जी से ही दिया करता हूँ, क्योंकि मुझे पता है के जवाब देना हमेशा की तरह ऊपर वाले का काम होता है।

एक महीने के बाद मेरी जिंदगी में भी एक टर्निंग पॉइंट आया और 45 लाख रुपये का प्रोजेक्ट मिला काम करने के लिए। सबको जवाब अपने आप मिल गया। उसके बाद सब इतिहास है। एक गोल्डेन इतिहास। मैं और कुंडू साहब अक्सर बैठते हैं, तो पुराने दिन याद करते हैं। किस प्रकार एक टेक्नोलॉजी को मिट्टी में से निकाल कर पसीने से नहला कर जमीन पर उतारा है।

इस पूरे सफर में पूज्य गुरुदेव प्रोफेसर अनिल गुप्ता जी का आशीवार्द काम करता रहा क्योंकि उन्ही की कृपा से ही यह राह मिली और लड़ने का जज्बा । लड़ाई किससे ? अपने आप से। लड़ाई जारी है, अभी और मंजिले मुकाम इंतज़ार में हैं क्योंकि मंज़िल का कोई मज़ा नही होता मज़ा केवल सफर का होता है।

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महिंद्रा स्पार्क दी राइज कॉम्पिटिशन 01

Kamal Jeet

 

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