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रजनीगंधा की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

रजनीगंधा
Written by bheru lal gaderi

रजनीगंधा(Tuberose) का फूल अपनी मनमोहक सुगंध अधिक समय तक ताजा रहने तथा दूर परिवहन क्षमता के कारण बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसकी मांग भी बाजार में लगातार बढ़ रही है। इसके फूलों का उपयोग मुख्य रूप से गुलदस्ता, माला एवं गजरा बनाने में प्रयोग किया जाता है।

रजनीगंधा

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मूल्यवान प्राकृतिक सुगंधित तेल होने के कारण इसकी खेती वैज्ञानिक तरीके से बड़े पैमाने पर की जा रही हैं। भारतवर्ष में रजनीगंधा को विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे गुलचेरी (हिंदी), गुलशब्बू (उर्दू), ट्यूबरोज (अंग्रेजी), रजनीगन्धा (बंगाली), सुगंधराजा, नेलोसम्पेंगी (तमिल) आदि।

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औषधीय महत्व

रजनीगन्धा के कंदों में लाइकोरिन नामक “एल्केलाइड” पाया जाता है, जिसका उपयोग उल्टी की औषधि बनाने में किया जाता है। इसके अतिरिक्त दो स्टोरोड क्रमशः हिकोजेनिन एवं टिगोजेनिन भी पाए जाते हैं।

प्रजातियां

रजनीगन्धा की लगभग 12 से 18 प्रजातियां पाई जाती हैं। जिनमें से 9 प्रजातियां सफेदपुष्प वाली हैं।

रजनीगंधा की प्रमुख प्रजातियां – पोलीएन्थेस, पालुस्ट्रेस, पो. ड्यूरानगेन्सिंग, पो. मोंटाना, पो. लोंगिफ्लोरा, जेमिनिफ्लोरा, पो. प्लेटीफाईला, पो. ग्रेमिनिफोलिया, पो. ग्रेसिलिस, पो. ब्लीशीं, पो. प्रिंगली, पो. सेसीफ्लोरा, पो. नेल्सोनि आदि।

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उन्नत किस्में

रजनीगंधा में सिंगल टाइप (पंखुड़ियों की एक पंक्ति प्रति पुष्प एवं गुणसूत्र संख्या 2n=60), सेमी डबल टाइप (पंखुड़ियों की 3 से अधिक पंक्ति प्रति पुष्प एवं गुणसूत्र संख्या 2n=50) प्रकार की किस्में पाई जाती हैं।

भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान हिसार गटटा बैंगलोर द्वारा विकसित संकर किस्में-

अर्का प्रज्वल, अर्का वैभव, अर्का श्रंगार, अर्का सुवासिनी  एवं अर्का निरन्तरा।

राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा परिवर्तित किस्में-

स्वर्णरेखा एवं रजत रेखा। महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ केंद्र गणेश खिंड, पुणे द्वारा संकरण- फुले रंजनी (श्रंगार x पुणे लोकल सिंगल) बाहर से लाई गई किस्में- पर्ल डबल एवं मेक्सिकन सिंगल आदि।

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खाद एवं उर्वरक

अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद 20-25 टन प्रति हेक्टर के हिसाब से खेत की तैयारी के समय खेत में मिला देवे। इसके अतिरिक्त 200 किलोग्राम फास्फोरस, 200 की.ग्रा. पोटाश एवं नत्रजन की आधी मात्रा 125 किग्रा कंदों की रोपाई के समय दे तथा शेष नत्रजन 125 किग्रा की मात्रा क्रमश: 30 व 60 दिन बाद फसल में छिड़काव कर सिंचाई करे।

कंद का चयन

रजनीगंधा का सफलतापूर्वक उत्पादन करने हेतु उपयुक्त कंद का चयन अति आवश्यक है।1.5-2.0 सेंटीमीटर के आकार के रोग रहित एवं स्वस्थ कंद का चयन करना चाहिए। आदर्श कंद का औसतन वजन 25-30 ग्राम होना चाहिए।

बुवाई से पूर्व कंद को 2 ग्राम प्रति लीटर बाविस्टिन या केप्टान से 30 मिनट तक उपचारित कर छाया में सुखाने के उपरांत सीधे जीवाणु रहित रेत के गमलों में अंकुरित होने के बाद तैयार खेत में रोपाई करें।

बुवाई का समय एवं पौध दूरी

भारतवर्ष में रजनीगंधा की सामान्यतया उतरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में फरवरी-मार्च एवं पहाड़ों में अप्रैल-मई माह में की जाती है। खेत की तैयार क्यारियों में कंधों की रोपाई 30 से.मी.  कतार से कतार एवं 30 से.मी. पौध से पौध की दूरी पर करनी चाहिए।

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सिंचाई

बुवाई के समय कंद अंकुरण तक एवं कंद खुदाई से लगभग 30 दिन पहले नहीं करनी चाहिए। कंद अंकुरण के उपरांत 7 दिन के अंतराल से सिंचाई करनी चाहिए। वर्षा ऋतु में आवश्यकता होने पर एवं शरद ऋतु में 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।

पलवार

नमी, संरक्षण एवं उचित मृदा ताप प्रबंधन एवं खरपतवार नियंत्रण के लिए काले रंग की पॉलीथिन की परत, सूखी घास, वर्मी कंपोस्ट, गोबर की खाद एवं लकड़ी के बुरादे से की गई पलवार बहुत उपयोगी होती हैं।

निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण

कंद अंकुरण के उपरांत समय पर निराई-गुड़ाई करनी चाहिए एवं मिट्टी चढ़ाने का कार्य आवश्यक रूप से करना चाहिए। कंद रोपाई से पूर्व पेंडीमेथेलिन 0.75 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से  खेत में छिड़काव करने से 30 दिन तक अधिकतम खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। 60 दिन पर एक निराई गुड़ाई की जानी चाहिए।

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फूलों की कटाई

कंद की रोपाई के 90 से 95 दिन बाद कार्तिक पुष्प दंडिका काटने योग्य हो जाती है। पूर्ण रुप से विकसित पुष्प दंडिका तेज धार वाले चाकू से सुबह या शाम के समय काट कर साफ पानी से भरी बाल्टी में एकत्रित कर लेनी चाहिए।

माला के लिए पूर्ण विकसित फूलों को पुष्प दंडिका से चुन लेना चाहिए। स्थानीय बाजार के लिए कटाई नीचे के दो पुष्प पूर्णतया खेलने पर एवं दुरस्त बाजार में विपणन हेतु नीचे वाली पुष्प कलिका के पूर्णतया रंग दिखाई देने की अवस्था पर करनी चाहिए।

कन्दो की खुदाई

कंद की रोपाई करने के बाद इन कन्दो को 2 वर्ष तक उसी खेत में रखकर पुष्प दंडिका उपज ली जा सकती है। 2 वर्ष बाद कन्दो की खुदाई का काम करके बाविस्टिन 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल से उपचारित कर ठंडे, छायादार, वायु संचारित एवं  नमी रहित स्थान पर संग्रहित कर लेना चाहिए।

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कटाई उपरांत प्रबंधन

कार्तिक पुष्प को कटाई के तुरंत बाद पानी में रखना देना चाहिए। साथ ही जीवन क्षमता बढ़ाने हेतु 5% शर्करा 200+  पी.पी.एम.  एल्युमिनियम सल्फेट के घोल से उपचारित करना चाहिए। कार्तिक पुष्प स्पाइक की लंबाई, उस पर फूलों की संख्या एवं पुष्प दंडिका के वजन के आधार पर रजनीगंधा को चयनित किया जाता है।

बाजार में बेचने के लिए खुले पुष्पों को बांस की टोकरियों में एवं पुष्प  दाण्डिकाओं को सौ-सौ के बण्डल बना कर कॉरूगेटेड कार्डबोर्ड बक्सों, लाईनर या अखबार में लपेटकर पैक करना चाहिए।

उपज

रजनीगंधा के 2-3 रूपये प्रति पुष्प दण्डिका विक्रय करने पर कुल आय 380000 एवं 1 से 1.5 रूपये प्रति कंद के हिसाब से 224000 रूपये प्रति हेक्टेयर आय प्राप्त कर सकते हैं। शुद्ध आय 2.80 से ३.० लाख रुपए प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है।

अनुमानित लागत 3.0 लाख रुपए प्रति हेक्टर प्रथम वर्ष में आती है। 2 से 3 वर्ष तक लाभ वृद्धि नियमित बनी रहती है। जिसमें रखरखाव लागत ही कृषक को वाहन करनी पड़ती है।

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लेखक :-

डॉ. एल. एन. महावर एवं अर्जुन लाल रेगर
उद्यान विज्ञानं विभाग
राजस्थान कृषि महाविद्यालय
उदयपुर (राज.)

स्रोत :-

राजस्थान खेती – प्रताप
वर्ष -13, अंक- 8, फरवरी 2017

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