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पॉलीहाउस में रंगीन शिमला मिर्च की उत्पादन तकनीकी

रंगीन शिमला मिर्च
Written by bheru lal gaderi

पॉलीहाउस में उगाई जाने वाली सब्जियों में शिमला मिर्च का प्रमुख स्थान है, रंगीन शिमला मिर्च की मांग बड़े शहरों, होटलों एवं शादी समारोहों में लगातार बढ़ रही है, यह तकनीक लाभ देने वाली फसल है, एवं इसका गुणवत्तायुक्त उत्पादन केवल पॉलीहाउस में ही संभव हो सकता है। बाजार में रंगीन शिमला मिर्च की मांग दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, एवं निर्यात के क्षेत्र में भी इस की संभावनाएं असीमित है। पॉली हाउस में शिमला मिर्च की सफल खेती निम्न प्रकार से की जा सकती है।

रंगीन शिमला मिर्च

रंगीन शिमला मिर्च की उन्नत किस्में

 लाल शिमला मिर्च

बोम्बी, नन 3019 , नताशा टोरकल, महाभारत, तनवी प्लस  आदि

  पीली शिमला मिर्च

स्वर्णा, फिएस्टा, नन 3020, यु. एस.26 आदि।

हरी शिमला मिर्च

इंदिरा, भारत, केलिकोर्निया वंडर, ग्रीनगोल्ड आदि।

तापमान एवं आद्रता

रंगीन शिमला मिर्च जलवायु कारकों से अत्यधिक संवेदनशील फसल हैं। अतः इसकी खेती अन्य सब्जियों की अपेक्षा कठिन होती है। बीज अंकुरण के लिए उपयुक्त तापमान 24 से 25 डिग्री सेल्सियस होता है एवं अधिक समय लगता है। पौधों की वृद्धि के लिए 20-25 से. मृदा तप उपयुक्त होता है।  फलस्थापन  के लिए दिन का तापमान 20-22 डिग्री सेल्सियस एवं रात का तापमान 18 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त होता है अपेक्षित आर्द्रता 75-80% वंचित होती  हैं।

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नर्सरी तैयार करना

किसी भी फसल के उत्पादन के लिए सबसे आवश्यक होता है, की पौध रोग एवं कीट युक्त होनी चाहिए। प्रारंभिक अवस्था में पौधे में रोग एवं कीटों का संक्रमण हो जाता है तो गुणवत्तायुक्त एवं अधिक उत्पादन संभव नहीं हो पाता है। अतः अच्छी एवं स्वस्थ पौध तैयार करना अति आवश्यक हैं निम्नानुसार  प्रो-ट्रे पौध तैयार की जा सकती है। 1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में शिमला मिर्च के 3000 पौधों की आवश्यकता होती है। नर्सरी उठी हुई क्यारियों अथवा प्रो-ट्रे में तैयार की जा सकती है।

क्यारियों में पौध तैयार करने से कवक जनित मृदोढ़ रोगों के फैलने का अदेशा रहता है, क्योंकि शुरुआती अवस्था में पौध इन रोग कारकों से अति संवेदनशील होते हैं अतः जहां तक संभव हो पौध प्रो-ट्रे में ही तैयार करनी चाहिए। सर्वप्रथम प्रो-ट्रे को साफ पानी से धोकर 2 घंटे धूप में सुखाना चाहिए अथवा प्रो-ट्रे का निर्जलीकरण करना चाहिए तत्पश्चात प्रो-ट्रे में वर्मीकुलाइट परलाइट एवं कोकोपिथ का मिश्रण क्रमशः 1:1:2 के अनुपात में भरना चाहिए। मिश्रण में पर्याप्त नमी मिलाना चाहिए।  इस मिश्रण में कितना पानी मिलाना चाहिए जिससे यह मिश्रण हाथ में लेकर बांधा जा सके।

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प्रो-ट्रे में बिजाई

प्रो-ट्रे में मिश्रण भरने के बाद प्रति कक्ष में एक बीज बोना चाहिए। बीच कोष्ठिका के बीचो-बीच डालना चाहिए। बिजाई के तुरंत पश्चात जारे की सहायता से पानी देना चाहिए। अंकुरण के लिए तापमान एवं नवमी का पर्याप्त बना रहना आवश्यक होता है, इसलिए बिजाई के बाद प्रो-ट्रे के ऊपर थर्माकोल या पॉलिथीन ढकी जाती है।  मौसम के अनुसार 2 या 3 दिन बाद ढकी हुई परत हटा लेते हैं। एवं प्रतिदिन एन.पी.के. 19:19:19 का एक प्रतिशत विलयन बनाकर पानी पिलाना चाहिए। सामान्यत पौध 35 दिन बाद स्थानांतरण योग्य हो जाती है। इस अवधि में प्रो-ट्रे को जमीन के ऊपर नहीं रखना चाहिए। अन्यथा पौधे की जड़ें मृदा के अंदर चली जाती है एवं पौध निकालते हुए झड़े टूटने का खतरा रहता है। अतः प्रो-ट्रे को लकड़ी अथवा लोहे का स्टैंड बना कर रखा जाता है।

रोपाई के लिए क्यारिया तैयार करना

रंगीन शिमला मिर्च की पौध स्थानांतरण योग्य हो, उससे पहले पॉलीहाउस में क्यारियां अच्छे से तैयार करनी चाहिए। इसके लिए 1 मीटर चौड़ी एवं 30 सेमी ऊंची क्यारियां बनाई जाती है, क्यारियों की लंबाई पॉली हाउस के आकार पर निर्भर करती है क्यारिया बनाते समय दो क्यारियों के बीच-बीच 60 सेमी का पथ रखा जाता है। जिससे कृपण कार्यों में सुविधा रहती हैं। क्यारियों का रोपण से 2 दिन पहले निर्जलीकरण किया जाता है इसके लिए कांच की प्लेट में में 8-10 ग्राम पोटेशियम परमैंगनेट क्रिस्टल डाले जाते हैं, तथा पूरी बेड को पॉलीथिन से ढक दिया जाता है। तत्पश्चात प्रत्येक पेट्रीडिश में 5-7 मिलीलीटर फॉर्मेलिन डाल दिया जाता है।

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इससे तुरंत गैस निकलती है, जिसे मृदा में उपस्थित हानिकारक सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते ही स्वचता के लिए हानिकारक होती है। अतः फॉर्मेलिन डालने के तुरंत बाद पूरी यूनिट के कम से कम 24 घंटे के लिए बंद रखा जाता है। अगले दिन पॉलिथीन हटाकर क्यारियों की खुदाई की जाती है तथा ड्रिप की लाइन बिछाकर उचित दुरी पर पौधों की रोपाई की जाती है पौधों से पौधे की दूरी 45 सेमी रखनी चाहिए।  पौधरोपण करने से 2 घंटे पहले ड्रिप चालू कर देना अच्छा रहता  है। रोपाई संभवतया: दोपहर बाद करनी चाहिए जिससे पौधों में मरने की संभावना न्यूनतम रहती है।

फर्टिगेशन

पौध स्थानांतरण के पश्चात अगले दिन 1% एन.पी.के. 19:19:19 का विलयन बनाकर पौधों पर छिड़काव करना चाहिए जिससे पौधों की शुरुआती वृद्धि अच्छी होती है। तत्पश्चात सप्ताह में एक बार एन.पी.के एवं सूक्षम पोषक तत्वों का मिश्रण पौधों को ड्रिप के साथ अथवा ट्रेनिंग करके देना चाहिए। सामान्यतया शिमला मिर्च के लिए 250 किलो नत्रजन 125 किलो फास्फोरस एवं 125 किलो प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता है।

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प्रति 1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में प्रति सप्ताह 5-7 किलोग्राम जल में घुलनशील उर्वरक मिश्रण देने से पौधों की बढ़वार अच्छी रहती है, एवं उपज भी अच्छी प्राप्त होती है। प्रारंभिक 4-5 सप्ताह  2-3 किलो एन.पी.के. 19:19:19 एवं उसके बाद धीरे-धीरे उर्वरक मिश्रण बढ़ाया जाता है। फल बनते समय सूक्ष्म पोषक तत्वों का मिश्रण जैसे एग्रोमीन अथवा बायोविटा इत्यादि लगभग 1 किलोग्राम प्रति हजार वर्ग मीटर के हिसाब से डालना चाहिए।

पौधों का प्रशिक्षण एवं कृन्तन

40 पर 50 दिन बाद तक पौधों की सामान्य बढ़वार होने के बाद पौधों में ट्रेनिंग एवं कटिंग शुरू की जाती है। इसके लिए प्रत्येक पौधों पर केवल तीन चार शाखाओं को छोड़कर अन्य शाखाओं को हटा दिया जाता है, तथा पौधों को सुतली अथवा प्लास्टिक की रस्सी के सहारे बढ़ाया जाता है। कृन्दन करते समय पास-पास वाली शाखाओं को एवं कमजोर शाखाओं को हटा दिया जाता है। मुख्य शाखाओं के बीच आने वाली फुटानों को समय-समय पर हटाते रहना चाहिए। पौधों की शाखाओं को सप्ताह में एक बार प्रशिक्षण आवश्यक होता है, नई वृद्धि को सुतली के साथ लपेटकर ऊंचा रखा जाता है ट्रेनिंग समय-समय पर नहीं करने से डलिया दूर जाती है व उत्पादन की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है।

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सामान्य देखभाल एवं सावधानियां

फर्टिगेशन के समय विलयन का PH मान 6-7 एवं ई.सी. 0.01 से कम होनी चाहिए। 15-20दिन के अंतराल पर ड्रिप लाइन के निरिक्षण करना चाहिए एवं ड्रिप लाइन जाम होने की स्थिति में फॉस्फोरस अम्ल के प्रतिशत विलियन से ड्रिप चलाना चाहिए।

  • रोपाई के 15 दिन 20 दिन बाद खुरपी से पौधों के आसपास में बनी पपड़ी को पटाना चाहिए जिससे वायु संचार बना रहता है एवं पौधों की वृद्धि अच्छी रहती है।
  • फूल एवं फल बनते समय पौधों की वनस्पति वृद्धि एवं फलन में नियंत्रण कर सामंजस्य रखना अति आवश्यक होता है। प्रत्येक शाखा पर 6-7 से अधिक फल लेने हो तो कमजोर एवं छोटे फलों को हटाना चाहिए।
  • शिमला मिर्च कवक जनित एवं वायरस जनित बीमारियों से बहुत संवेदनशील फसल है। नर्सरी में जड़ गलन से लेकर आने वाली रंगीन शिमला मिर्च की फसल को पूर्णतया नष्ट करने की क्षमता रखती है इसका समय-समय पर सही लक्षण एवं उपचार करते रहना चाहिए।
  • पॉलीहाउस में लगातार फसल लेने से मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, विशेषता कैल्शियम जिसकी कमी से फसलों पर काले भूरे रंग का धब्बा हो जाता है एवं फल सड़ने लगते हैं, इस प्रकार के फलों को देखने से किसी कवक जनित रोग का आभास होता है, ऐसी स्थिति में 10-15 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से जिप्सम डालना चाहिए।
  • रंगीन शिमला मिर्च की तुड़ाई करते समय ध्यान रखना चाहिए कि पूर्ण विकसित एवं रंगीन फूलों की चाकू एवं सिकेटियर की सहायता से कटाई करनी चाहिए।
  • कभी-कभी बाजार में रंगीन शिमला मिर्च के भाव हरी शिमला मिर्च से कम भी हो सकते हैं, को प्रारंभिक अवस्था में तोड़ लेना चाहिए।
  • रंगीन शिमला मिर्च के पौधे की शाखाएं सामान्यतः कमजोर होती है, एवं फलों के भार से टूटने की आशंका रहती है, अतः समय-समय पर सुटली की सहायता से बांधते रहना चाहिए।
  • पौधों के तने से निकलने वाली फुटनों को समय-समय पट हटाते रहना चाहिए। साथ ही पुरानी पत्तियों को को भी हटाते रहना चाहिए।

उपज

पॉली हॉउस में शिमला मिर्च की फसल 8-9 महीने चलती है एवं पौधारोपण के तीन चार महीने बाद तोड़ने लायक हो जाते हैं। एक पौधे से 6-7 किलोग्राम तक हो जाती है।

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Author :- 

डॉ के. डी. आमेटा (मो. नं. 9414164442)
उद्यान विभाग, राजस्थान कृषि महाविद्यालय उदयपुर

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