agriculture

मेथी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मेथी
Written by bheru lal gaderi

मेथी (Fenugreek) की खेती पुरे भारत में की जाती हैं। इसका सब्जी में केवल पत्तियों का प्रयोग किया जा सकता हैं इसके साथ ही बीजों का प्रयोग मसालें के रूप में किया जाता हैं। मेथी में प्रोटीन के साथ-साथ विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता हैं। भारत में मेथी का उपयोग शाक एवं मसालें के रूप में किया जाता हैं। इसकी पत्तियां और कोमल फलियां सब्जी के रूप में उपयोग की जाती हैं। मेथी के सूखे दानों का उपयोग मसालें के रूप में, सब्जियों के छौकने व बघारने में, अचार और आयुर्वेदिक औषधियों में किया जाता हैं।

मेथी

उत्पति एवं वितरण

यद्यपि मेथी उत्तर भारत में उत्तरी पश्चिमी भागों में काफी समय से जंगली रूप में उगती पायी गयी हैं फिर भी इसकी उत्पत्ति पूर्वी यूरोप और इथोपिया से ही मानी जाती हैं। भारत में इसे मुख्य रूप से उत्तरी भारत, राजस्थान, मध्य्प्रदेश, गुजरात, पंजाब एवं उत्तरप्रदेश में उगाया जाता हैं।

Read also – पोटाश का प्रयोग एवं महत्व कपास की फसल में

जलवायु

मेथी ठन्डे मौसम की फसल हैं और यह पाले के आक्रमण को भी सहन कर लेती हैं। इसकी वानस्पतिक बढ़वार को लम्बे ठन्डे मौसम की आवश्यकता होती हैं।

भूमि एवं तैयारी

मेथी शरद ऋतू की फसल हैं, इसका उत्पादन रबी की फसल के रूप में किया जाता हैं। यह अधिक वर्षा वाले स्थानों पर कम उगाई जाती हैं। मेथी के लिए दोमट एवं बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती हैं, जिसमे जल निकास का उचित प्रबंध होना आवश्यक हैं। इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. 6 से 7 होना चाहिए।

 बुवाई

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुवाई का उपयुक्त समय मध्य सितम्बर से मध्य नवम्बर तक होता हैं, वैसे पत्तियां प्राप्त करने के लिए इसे फरवरी में बो सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी बुवाई का उपयुक्त समय मार्च-अप्रेल हैं। कसूरी मेथी की बुवाई अक्टूबर में करनी चाहिए।

Read also – चने की अधिक उपज देगी नई विकसित किस्में “तीज” और “मीरा”

मेथी की उन्नत किस्में

मेथी की उन्नतशील प्रजातियां जैसे की पूसा अर्ली बंचिग, कसूरी मेथी, लेम सेलेक्शन 1, राजेंद्र क्रांति, हिसार सोनाली, पंत रागिनी, एम्.एच.-103, सी.ओ.-1, आर.एम.टी.-1 एवं आर.एम.टी.-43 आदि हैं।

बीज की मात्रा

सामान्य मेथी का बीज 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर  तथा कसूरी किस्म में 20 किलोग्राम बीज ही पर्याप्त होता हैं।

बोने का ढंग

मेथी की बुवाई दो प्रकार से की जाती हैं।

छिटकवा बुवाई

खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में बांटकर उनमे बीज छिटक देते हैं और उसमे रेक चलाकर उन्हें मिट्टी की पतली तह से ढक देते हैं।

पंक्तियों में बुवाई

अन्तः कृषि क्रियाओं के करने और अधिक उपज लेने के लिए पंक्तियों में बुवाई करना लाभदायक होता हैं। पंक्तियों की आपसी दुरी 20 से 25 सेमी. और पौधों की आपसी दुरी 10 सेमी. रखनी चाहिए। सामान्य मेथी का अंकुरण 5-6 दिन बाद हो जाता हैं, जबकि कसूरी मेथी का अंकुरण 7-8 दिन बाद होता हैं। बीजों को बोने से पूर्व राइजोबियम मेलोलोरी कल्चर से उपचारित करके बोना चाहिए।

Read also – राजमंडी एप जिंसों की ऑनलाइन खरीद-बिक्री में मददगार

खाद और उर्वरक

पकी गोबर की खाद 100 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर खेत की तैयारी के समय आखिरी जुताई में देनी चाहिए। इसके साथ ही 40 किलोग्राम नत्रजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस तथा 50 की.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर तत्व के रूप में देना चाहिए। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा नत्रजन की आधी मात्रा खेत की तैयारी करते समय बेसल ड्रेसिंग में तथा नत्रजन की आधी मात्रा दो भागों में टॉप ड्रेसिंग में देना चाहिए। पहली बार 25 से 30 दिन के बाद खड़ी फसल में शेष आधा-आधा करके देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा को कई भागों में बाटकर प्रत्येक कटाई के उपरांत डालें।

सिंचाई

मेथी के उचित अंकुरण के लिए भूमि में पर्याप्त नमी का होना बहुत जरूरी हैं यदि खेत में नमी की कमी हो, तो हल्की सिंचाई करनी चाहिये। शेष सिंचाइयाँ 7-10 दिन के अंतर से करनी चाहिए। 5-7 सिंचाइयाँ पर्याप्त होती हैं। फली और बीज निर्माण के समय खेत में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए।

निराई-गुड़ाई

आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करने से अधिक उपज मिलती हैं। दूसरी सिंचाई के उपरांत जब मिट्टी गीली न हो तब हल्की गुड़ाई करें। खरपतवार नियंत्रण हेतु बोने से पूर्व फ्लुक्लोरालीन के 0.75किलो/हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। और और 50 दिन बाद एक बार निराई कर देनी चाहिए।

Read also – चना की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

कटाई

सामान्य मेथी में बुवाई के लगभग 4 सप्ताह बाद पहली कटाई करते हैं। इसमें पौधों को भूमि के काफी निकट से काटते हैं। उसके उपरांत 4-6 कटाइयों के बाद उखाड़ कर गुच्छों में बांधकर बाजार में भेज देते हैं परन्तु आमतौर पर पौधों को उखाड़ते नहीं हैं, बल्कि 2-3 कटाइयों के बाद पौधों को छोड़ देते हैं, ताकि उनसे बीज लिया जा सके। कसूरी किस्म की फसल की 5-6 कटइयां लेने के उपरांत फसल को बीजोत्पादन के लिए छोड़ देते हैं।

उपज

फसल जब केवल पत्ती प्राप्ति हेतु बोई जाती हैं , तो 90 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज होती हैं। यदि फसल पत्ती और बीज दोनों के लिए उगाते हैं, तो 2 से 3 पत्ती कटिंग से 15 से 20 क्विंटल पत्ती तथा बाद में 8-10 क्विंटल बीज प्राप्त होता हैं, जब केवल बीज प्राप्त करने हेतु फसल उगाई जाती हैं, तो 12 से 15 क्विंटल बीजोत्पादन होता हैं।

Read also:- कपास की फसल में कीट प्रबंधन

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.