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मृदा जांच में मृदा उर्वरता का महत्व

मृदा जांच
Written by bheru lal gaderi

किसान भाइयों जैसा की आपको यद् होगा की हमारे देश की जनसँख्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। भारत में लगभग 65% लोग खेती पर ही निर्भर हैं। जबकि हमारी कृषि करने योग्य भूमि सिकुड़ती जा रही हैं। भूमि की उर्वरता सभी देशों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं, जिससे किसी भी देश की सभ्यता का अंदाज वहां की भूमि के सदुपयोग या दुरूपयोग से लगाया जा सकता हैं। हमारे पास ऐसा कोई साधन नहीं हैं। हम भूमि पर क्षैतिज विस्तार कर सके। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता हैं। की हम  इनका उपयोग किस प्रकार करें। क्योंकि हम सभी यह जानते हैं की सभी वनस्पतियों तथा प्राणियों का जीवन कृषि पर ही टिका हुआ हैं। आज के बदलते युग में जब कृषि भी एक व्यापर बन गया हैं, मृदा उर्वरता का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता हैं। मूल्यवान उर्वरकों एवं जैविक खादों के सुरक्षित तथा उचित उपयोग का मार्ग भी मृदा जांच के ज्ञान से ही संभव हो सकता हैं।

मृदा जांच

मृदा जांच में मुख्य उद्देश्य

  • मृदा में आवश्यक पोषक तत्व की मात्रा ज्ञात करना।
  • मृदा जांच के आधार पर फसलों के लिए संस्तुति देना।
  • मृदा जांच के आधार पर मानचित्र तैयार करना।
  • समस्या ग्रस्त भूमियों के लिये मृदा सुधारकों की सही-सही मात्रा का निर्धारण करना।

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पोषक तत्वों की मात्रा निर्धारण आदि मुख्यतया निम्न तथ्यों को ज्ञात करने के लिए किया जाता हैं:

  1. मृदा पीएच की जाँच
  2. नाइट्रोजन की उपलब्धता
  3. फास्फोरस की उपलब्धता
  4. पोटाश की उपलब्धता
  5. जैविक कार्बन की उपलब्धता
  6. घुलनशील
  7. विधुत चालकता
  8. फ्री कार्बोनेट की मात्रा

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मृदा जांच प्रयोगशाला द्वारा जो विभिन्न विश्लेषण किए जाते है उनका विवरण निम्न तालिका अनुसार हैं।

मृदा जांच में मृदा नमूने का सही होने का विशेष महत्व होता हैं। इसलिए मृदा के नमूने को इस प्रकार लेना चाहिए की वे जिन खेतों से लिए जाये, वे उनकी मिट्टियों का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर सकें। यह इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि इन्ही जाँच के परिणामों के आधार पर उर्वरक संस्तुतियां तैयार करनी होती हैं। किसी भी क्षेत्र में भली-भांति वितरित भागों से याद्रच्छिक ढंग से मृदा का जो नमूना लिया जाता हैं, उसे प्राथमिक नमूना कहते हैं। जब प्राथमिक नमूनों को आपस में भली-भांति मिला लिया जाता हैं तो उसे प्रतिनिधि या संयुक्त नमूना कहते हैं।

मृदा जांच

नमूना एकत्रित करते समय खेत में ढाल तथा मिट्टी के रंग व गठन, फसल प्रबंध, फसल चक्र आदि बातों पर ध्यान देना चाहिए। यदि इनके कारण खेत में असमानता हो तो जितना क्षेत्रफल में समान हो, सयुक्त नमूना व्ही से एकत्रित करना चाहिए।

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ऐसी जगह से मृदा नमूना कभी नहीं लेना चाहिए जैसे की पेड़ों के निचे, गोबर के ढेर के पास, सड़क के किनारे, कीचड़ के गढ्ढे, सिंचाई वाली नाली और खेत की बाउंड्री के पास वाली जगह या कही पर सख्त परत हैं, तो उसका नमूना अलग से लेना चाहिए और मोटाई, गहराई आदि लिख कर लेना चाहिए।

मृदा नमूने की गहराई

मृदा नमूने की गहराई फसल के प्रकार, मृदा जांच प्रयोगशाला की सलाह एवं कृषि पद्धतियों (ट्रेक्टर या हल से जुताई) पर निर्भर करती हैं। सामान्यतः सही गहराई वह होती हैं जहां तक पौधों की सभी फसलों के अनुसार अलग-अलग होती हैं मृदा जांच के लिए 0-15 सेमी. तक गहराई से नमूने एकत्र किये जाते हैं। परन्तु ट्रेक्टर आदि से जुताई गहरी होती हैं, तो 0.20 सेमी. तक की गहराई से लेना चाहिए। गहरी जड़ वाली फसलों के लिये नमूने की गहराई एक फिट तक होती हैं। चारागाह घास के मैदान हेतु नमूना 10 सेमी. की गहराई से लेना चाहिए। समस्याप्रद मृदाओं जैसे अम्लीय, क्षारीय व लवणीय मृदाओं में नमूना 0-15 सेमी. के अंतर पर 1 मीटर तक लेना चाहिए। बागों में मृदा नमूने 15-15 सेमी. गहरी परतों से अलग-अलग लेना उचित रहता हैं।

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मृदा जांच

समस्या ग्रस्त मिट्टियों में ऐसे स्थानों से अलग नमूना लेना चाहिए, जहां फसल की वृद्धि अन्य स्थानों से कम हो अथवा पोषक तत्वों की कमी के लक्षण विध्यमान हैं। साथ ही उस स्थान से भी अलग नमूना लेना चाहिए, जो इस समस्या ग्रस्त स्थान से लगा हुआ हैं। ऐसे सभी नमूने अलग-अलग एकत्र करने चाहिए। ऊसर भूमियों में भौतिक रूप से अलग दिखाई देने वाले सभी स्थानों से प्राथमिक नमूने लेने चाहिए और प्रत्येक प्रकार का प्रतिशत क्षेत्रफल मालूम करना चाहिए। कंकड़ या कड़ी परत के नमूने भी अलग से एकत्र करने चाहिए ताकि मिट्टी के नमूने भी अलग से एकत्र करने चाहिए ताकि मिट्टी के विभिन्न अवयवों को भली-भांति जाँच करके किसानों को उचित परामर्श दिया जा सकें।

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उपकरण एवं सामग्री

आगार, बरमा (ट्यूब), बाल्टी, फावड़ा, पटरी, टैग टिन या मोठे कागज का टुकड़ा, कपड़े या पॉलीथिन की थैली 13 सेमी. X 25 सेमी. लेबल के सामने, बेलन, छलनी(2 मी.मी.), खुरपी

नमूना एकत्रित करने की विधि

  1. खेत समतल हो और पुरे खेत में एक ही फसल उगाई गयी हो तथा उर्वरकों की समान मात्रा डाली गयी हो तो पुरे खेत से एक ही संयुक्त नमूना लेना चाहिए।
  2. नमूना लेने से पहले यह आवश्यक हैं की जिस जगह से नमूना लेना हैं। वहां की ऊपरी सतह से घास आदि को साफ कर देना चाहिए। नमूना एकत्र करने के लिए 15-20 स्थान का चयन करते हैं।
  3. सबसे पहले 15 सेमी. वि  शेप का गड्ढा बनाते हैं। फिर खुरपी या फावड़े की सहायता से इसकी दीवार के साथ-साथ पूरी गहराई तक की मिट्टी की एक समान परत काटकर किसी साफ बर्तन में एकत्र करते हैं।
  4. मृदा नमूनों को छाया में सुखाना चाहिए, क्योंकि धुप में सुखाने से नमूने में उपस्थित पोषक तत्वों में अवांछनीय परिवर्तन हो जाता हैं। छाया में सुख जाने के बाद नमूनों के ढेले (लकड़ी के हथोड़े) फोड़कर, कंकड़, पत्थर तथा खरपतवार पौधों की जड़ें आदि को निकालकर फेंक देते हैं।
  5. मृदा नमूनों को फिर स मि.मि. की छलनी से छानकर नमूने को खूब अच्छी तरह मिलाकर उसमे से लगभग 005 ग्राम. मिट्टी ले लेते हैं।
  6. इसके बाद नमूने को एक साफ कपड़े की थैली में भरकर कागज या टीन के टुकड़े पर खेत का क्रमांक किसान का नाम व पता लिखकर एक थैली के अंदर तथा दूसरी थैली के मुँह पर बांध देना चाहिए।
  7. इसके बाद नमूने वाली थैली पर संभव हो तो नाली स्याही से किसान का और खेत का विवरण लिख देना चाहिए।

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सावधानियां

  • वृक्षों के नीचे, खाद के गड्ढों तथा मेढ़ के पास से मृदा नमूना एकत्र नहीं करना चाहिए।
  • तैयार किया हुआ नमूना कभी खुला नहीं छोड़ना चाहिए।
  • मृदा नमूना खेत के उस स्थान से नहीं लेना चाहिए, जहां पर उर्वरकों का बोरा रखा गया हो क्योंकि वहां पर उर्वरक का कुछ भाग गरूर गिर जाता हैं।
  • मृदा नमूनों को उर्वरकों के बोरों के ऊपर नहीं सुखना चाहिए।
  • मृदा नमूनों को उर्वरकों के बोरो के पास नहीं रखना चाहिए।
  • अगर किसी खेत की मृदा जांच पहले किसी प्रयोग शाखा में करा चुके हैं, तो उसका विवरण भी देना आवश्यक हैं।
  • नमूना जिस गहराई से लिया जाय, वह नमूने की थैली पर अंकित होना चाहिए।

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मृदा उर्वरता में कमी के कारण

  • मृदा में लगातार खेती करना एवं पर्याप्त खाद उर्वरकों का प्रयोग करना।
  • मृदा में जीवांश जैविक कार्बन का लगातार घटता स्तर।
  • प्रयोग किये जा रहे उर्वरकों के उपयोग की क्षमता में लगातार कमी होना।
  • मृदा क्षरण से पोषक तत्वों का धीरे-धीरे हास्य होना।
  • उर्वरकों का असंतुलित प्रयोग में लाना।
  • देश के विभिन्न भाग में उर्वरकों के प्रयोग में असमानता।
  • सघन खेती का प्रचलन, जिससे एक साथ कई पोषक तत्वों की कमी होना।
  • मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग न होना।

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उर्वरता को बनाये रखने के लिए सुझाव

  1. उर्वरकों का प्रयोग हमेशा मृदा जांच के आधार पर एवं फसल विशेष की संस्तुति के अनुसार ही करना चाहिए।
  2. उर्वरकों प्रबंधन एक फसल में न करके पुरे फसल चक्र में अपनाना चाहिए।
  3. फसल चक्र में जैविक खादें जैसे की गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, फसलों के अवशेष तथा दलहनी फसलों का समावेश करना चाहिए।
  4. दलहनी फसलों में जैविक उर्वरकों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।
  5. फसल चक्र में फसलों का चुनाव इस प्रकार करें की प्रथम फसल से बचे हुये पोषक तत्वों का सही उपयोग हो सके एवं मृदा से पोषक तत्वों का सही उपयोग हो सके एवं मृदा से पोषक तत्वों का सही अवशोषण हो सकें।
  6. उर्वरकों का प्रयोग हमेशा संतुलित रूप से करना चाहिए, जिससे उर्वरक उपयोग क्षमता में वृद्धि हो सकें।
  7. सघन खेती में समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाए, जिसमे उर्वरकों के साथ गोबर की खाद, हरी खाद, फसल अवशेषों एवं जैविक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता हैं।
  8. नत्रजन उर्वरकों का प्रयोग कई बार में करना चाहिए।
  9. फास्फोरस का प्रयोग रबी वाली फसलों में करना चाहिए।
  10. फसल चक्र के साथ उर्वरक चक्र भी अपनाये, जिससे सही उर्वरक उपयोग क्षमता आ सकें।
  11. रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग सही समय, सही विधि एवं सही साधन से ही करना चाहिए।

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अतः संक्षिप्त में हम यहां यह कह सकते हैं की मृदा की उर्वरता हमारी सबसे महत्वपूर्ण पूंजी हैं। अगर स्वस्थ मृदा, होगी तो हम अधिक उत्पादन ले सकेंगे और बढ़ती जनसंख्या तथा घटते हुये खाद्य उत्पादन के बिच संतुलन स्थापित कर सकेंगे। इसलिए मृदा जांच(मृदा परीक्षण ) करना अति आवश्यक हैं।

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