agriculture

मूँग की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

मूँग
Written by bheru lal gaderi

मूँग का प्रयोग मुख्य रूप से दालों के रूप में होता है और प्रोटीन का एक प्रमुख स्रोत है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में खरीफ के मौसम में मूँग की खेती 19.28 हजार हेक्टेयर में की जाती हैं, रबी के मौसम में मूँग की खेती 23.79 हजार हेक्टेयर में की जाती हैं इसका औसतन उत्पादन 350- 450 किलोग्राम/हे. होता हैं। मूँग का प्रकाशकाल एवं तापमान के लिए असंवेदनशील हैं अतः इसे साल में कभी भी उगाया जा सकता हैं। इसे तीनो ऋतुओ में उगाया जाता हैं। छत्तीसगढ़ में जिन किसानो के पास सिंचाई की उपलब्धता होती हैं वे वहाँ मूँग की खेती जायद में मध्य फरवरी से मार्च के अंत या अप्रेल माह के प्रथम सप्ताह में खेत की सिंचाई करके इसकी बुवाई की जाती हैं।

मूँग

मूँग के बीज में 20- 26% प्रोटीन, 46-54 % स्टार्च, 3-8% रेशा होता हैं। मूँग की मुसला जड़े होती हैं। 20-50 सेमी. भूमि की सतह से निचे तक फैलती हैं। जड़ो से बहुत सी छोटी शाखाए निकलती हैं गहरी जड़ो का पौधा होने के कारण भूमि की नमि का अच्छी तरह से उपयोग कर लेता हैं। अंकुरण के लगभग 2-3 सप्ताह बाद जड़ो में ग्रंथिया बनती हैं, जिनमे नाइट्रोजन यौगिकीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ  हो जाती हैं। परीक्षणों में पाया गया की मूँग की फसल से प्रति हेक्टेयर 30-40 की. ग्रा. नाइट्रोजन का यौगिकीकरण हो जाता हैं।

भूमि का चुनाव और भूमि की तैयारी (Land selection and land preparation)

मूँग की फसल के लिए अधिक जल धारण क्षमता वाली डोरसा व कन्हार भूमि का चयन करना चाहिए। दो- तीन बार खेत की जुताई कर पाटा चलाकर खेत के ढेलो को तोड़ लेना चाहिए। दीमक के बचाव के लिए क्लोरपायरीफास 1.5% चूर्ण का 20 की. ग्रा./हे. की दर से खेत में तैयारी के समय मिला देना चाहिए।

You may like also – भिन्डी उत्पादन तकनीक एवं फसल सुरक्षा उपाय

मूँग की उन्नत किस्में (Advanced varieties of mung)

उन्नत किस्मों के शुद्ध और स्वछ बीज बोन से करीबन 20-25 प्रतिशत उपज में बढ़ोत्तरी होती है। यह मूँग की कुछ उन्नत किस्मों का विवरण दिया जा रह है जिनका उपयोग कर किसान अधिक उपज प्राप्त कर सकते है।

 

क्र. किस्में फसल अवधि

(दिनों में)

उपज

(क्विं. /है.)

अन्य विशेषताएँ
1 मालवीय ज्योति 65-75 10-12 दाना मध्यम आकार, रंग चमकीला, पीला मोजेक रोग निरोधक।
2 पूसा विशाल 60-66 10-12 दाना बड़ा, चमकीला पीला मोजेक निरोधक।
3 बी. एस.-4 65-70 10-13 दाना मध्यम चमकीला पीला मोजेक सहनशील।
4 मालवीय जन चेतना 60-65 10-12 पीला मोजेक व पर्ण दाग निरोधक।
5 पीडीएम – 139(सम्राट) 65-70 10-12 यह किस्म मोटे दाने वाली होती है, जो  पीला मोजेक के प्रति सहनशील व भभूतिया रोग निरोधक है एवं खरीफ में भी बुवाई के लिए उपयुक्त है।
6 एसएमएल-668 65-70 10-12 यह किस्म पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से विकसित की गई है। जो  पीला मोजेक के प्रति सहनशील व भभूतिया रोग निरोधक है एवं खरीफ में भी बुवाई के लिए उपयुक्त है।

You may like also – उड़द की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

बीज की मात्रा (Quantity of seed)

बीज की मात्रा बोने के तरीके एवं पौध अंतरण के आधार पर निर्भर करता है।  समान्यत: मूँग की खेती के लिए कतारों में बोने पर 20-25 कि. ग्रा. प्रति हैक्टेयर लगता है।

बीजोपचार (Seed Treatment)

उत्तम अंकुरण और उचित विकास के लिए कवकनाशी रसायन और जैव उर्वरक से बीजपचार करना चाहिए। इसके लिए एक कि. ग्रा. बीज में 3 ग्राम फफूँदनाशक दवा जैसे कार्बेन्डाजिम(Carbendazim) या थाइरम(Thirum) अथवा केप्टान दवा को मिलाएँ।

प्लास्टिक के बोरे में 10 कि. ग्रा. बीज लेकर उसमे लगभग 30 ग्राम फफूँदनाशक दवा डालें। बोरी के मुहँ को बांध कर 10 मिनट तक अच्छी तरह से हिलाएं ताकि हर दाने पर दवा की परत अच्छी तरह चढ़ जावें।इसके बाद राइजोबियम कल्चर व पी.एस.बी.कल्चर 5 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करें। फसल के अनुसार नियत तिथि देखकर राइजोबियम कल्चर के पकेट लेवें। उपचारित बीज को छांव में सुखाकर तुरंत बुवाई करें।

You may like laso – तरबूज और खरबूज की उन्नत खेती की तकनीक

कल्चर का घोल बनाना

एक लीटर पानी में 50 ग्राम गुड़ और 2 ग्राम बबूल का गोंद मिलाकर 10-15 मिनट तक गर्म कर लेवें फिर ठंडा कर 200 ग्राम कल्चर का पैकेट इसमें मिला दें। फफूंदनाशी दवा जैसे थाइरम, बाविस्टिन 2-3 ग्राम दवा को प्रति किलोग्राम की दर से मिला देना चाहिए। इससे बीज,तना एवं जड़सड़न रोगों का प्रकोप कम होता है। इसके बाद बीजों को विशिष्ट राइजोबियम कल्चर और स्फुर घोलक जीवाणु वाले जैव उर्वरक की 5-10 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिए।

राइजोबियम कल्चर

राइजोबियम कल्चर के उपयोग से लगभग 50 कि. ग्रा./है. नत्रजन  का स्थरीकरण होता है। राइजोबियम कल्चर उपचारित बीज बोन से दलहनी फसलें वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थरीकरण करने सक्षम हो जाती है। तथा  उपज में 1-20 % वृद्धि सम्भव है।

स्फुर घोलक जीवाणु (पी.एस.बी.) Phosphorus bacteria

पी.एस.बी. कल्चर मृदा में उपस्थित अघुलनशील स्फुर(Phosphorus) को पौधों को उपलब्ध करने की क्षमता रखता है। इससे उपचारित करने पर 50% स्फुर(Phosphorus) की बचत हो जाती है यह 30 की. ग्रा./है स्फुर(Phosphorus) उपलब्ध करता है। कम स्फुर(Phosphorus) वाली मृदाओं में पी.एस.बी. कल्चर के उपयोग से लगभग 15-20% तक उपज में वृद्धि होती है।

You may like also :  कवकनाशी का प्रयोग फसलों में कवक जनित रोगों पर नियंत्रण

बुवाई का समय

जायद में मूँग की बुवाई का उपयुक्त समय मध्य फरवरी से मार्च के अंत तक या अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक बुवाई करना चाहिए।

बुवाई का तरीका

छिटकवां विधि से बोने की बजाय कतारों में बुवाई करना चाहिए। कतार में बोन के लिए पंक्ति से पंक्ति की दुरी 5-10 से. मि. रखनी चाहिए। इसकी बुवाई के लिए ड्बल पेटी वाली सीड ड्रिल उपुक्त है।

सिंचाई

पहली सिंचाई बोने के 20 दिन बाद करते हैं बाद की सिंचाइयाँ 10-15 दिन के अंतराल में करे। भूमि में नमी के स्तर को ध्यान में रख कर सिंचाई करें।

भूमि में जल संरक्षण के उपाय(Measures for water conservation)

  • खेत समतल हो।
  • गहरी जुताई करें।
  • गोबर खाद का उपयोग करें।
  • भूमि में हल्की सिंचाई करे एवं माइक्रो ईरिगेशन सिस्टम का उपयोग करें।

You may like also – Water Management System in Rabi crops

खरपतवार नियंत्रण (weed control)

मूँग में निम्नलिखित खरपतवार पाई जाती है – संकरी पत्ती वाली खरपतवार जैसे – मोथा,दुब, सावां,सोमाना,सरफोंक,घोड़ा घास, करवट, मुसकेनि,हिरणखुरी और चौड़ीपत्ती वाली खरपतवार जैसे – दूधी, महकवां, सोला, कुकरोंदा, व अरकरा आदि पाई जाती है। मूँग में खरपतवार नियंत्रण के लिए सस्य क्रियाएं जैसे गहरी जुताई , कतार बुवाई , कतारों के बीच में देशी हल का उपयोग करें।पहली निराई गुड़ाई 20-25 दिन व दूसरी 35-40 दिन में करनी चाहिए।

खरतवारनाशकों का उपयोग

मूँग में निम्नलिखित रासायनिक कीटनाशक दवाओं का उपयोग कर सकते है।

  • खरपतवारनाशी की छिड़काव के लिए 500-600 ltr पानी प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए।
  • काँस और मोथा के नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट 35% ई.सी. 1-1.5 कि. ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर दवा 2.8-4.28 लीटर प्रति है. की दर से बुवाई के 10-15 दिन पहले प्रयोग करे।
  • पैराक्वाट (ग्रामेक्जोन) 0.5 कि. ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर दवा चौड़ी पत्ती की अपेक्षा घासों के लिए अधिक प्रभावी है इसका उपयोग भी 5-6 दिन बुवाई पूर्व करना चाहिए।

You may like also – लौकी की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

प्रभावी खपतवार नियंत्रण के सूत्र

सही दवा = सही समय +सही विधि + सही मात्रा

प्रमुख बीमारियों एवं उनका रोकथाम

मूँग की फसल में प्रमुख रूप से भभूतिया रोग, पीला मोजेक व पत्ती धब्बा रोग लगते है।

भभूतिया रोग (पाउडरी मिल्ड्यू)

लक्षण

पौधों के सम्पूर्ण भागों में सफेद रंग का पावडर जमा हो जाता है यह रोग इरीसाइफ पोलिगोनि नामक फफूंद से होता है।

नियंत्रण

इसके रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम या ट्राइडोमार्फ या हेक्सकोनाजोल एक मी.ली./लीटर पानी व घुनलशील गंधक 3 ग्राम/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। रोग निरोधक किस्मों का प्रयोग करना चाहिए।

पीला मोजेक रोग

लक्षण

पत्तियों पीले चकते बनकर सम्पूर्ण पत्तियां पीली हो जाती हे। यह रोग सफेद मक्खी से फैलता है।

रोकथाम

इस रोग के नियंत्रण के लिए रोगवाहक को नियंत्रित करना आवश्यक है। इसलिए कीटनाशक दवा रोगर या मेटासिटाक्स एक मी.ली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। प्रभावित पोंधो को उखाड़कर मिट्टी में दबा देना चाहिए।

You may like also – Integrated Disease Management in Rabi crops

पत्ती धब्बा

लक्षण

पत्तियों पर गोल या अर्धवृत्ताकार धब्बे बनते हैं यह एक फफूंद जनित रोग है जो सर्कोस्पोरा बोनेसेन्स नामक कवक से फैलता है।

रोकथाम

ताम्रयुक्त दवा 3 ग्राम/लीटर पानी में या हेक्साकोनाजोल एक मिली. पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

प्रमुख कीट एवं उनका नियंत्रण:-

इस फसल में प्रमुख रूप से चित्तीदार फली भेदक किट, कम्बल कीड़ा, इल्ली , थ्रिप्स, फुदका, सफ़ेद मक्खी आदि का प्रकोप होता हैं इन कीटों नियंत्रण के लिए निम्न उपाय प्रयोग करने चाहिये।

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करे व फसल अवक्षेप नष्ट करें।
  • समय पर बुवाई करने से कीटो द्वारा क्षति कम होती हैं।

सफ़ेद मक्खी व फुदका के प्रभावी नियंत्रण के लिए डाइमेथोएट 30 % ई. सी. या फेरोमीथियन 25% ई. सी. 625 मिली. दवा प्रति हेक्टेयर  की दर से छिड़काव कर सकते हैं। थ्रिप्स एवं फली भेदक कीटो के एक साथ प्रकोप होने पर क्लोरपायरीफास 50% ई. सी. या साइपरमेथ्रिन 5% ई. सी. दवा 50 मिली. हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

You may like also – हल्दी की उन्नत खेती एवं बीज संरक्षण,प्रक्रियाकरण(क्योरिंग)

इसके अतिरिक्त फसल की फूलो वाली अवस्था में एंडोस्कॉर्प 14.5 एस. सी. दवा का 250 मिली./हे. या प्रोफेनोफोस 50 ई. सी. दवा का 1 लीटर/हे. अथवा ट्राइजोफॉस 40 ई. सी. 1 लीटर/हेक्टेयर की दर से 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।

कटाई व गहाई:-

उचित समय पर फसल की कटाई करे, फसल अधिक सुख जाने पर फलिया खेत में ही चटकने लगती हैं। अतः 80-90% फलियों के पकने पर कटाई करनी चाहिए उसके बाद बण्डल बना कर खेत में या खलिहान में फैलाकर 2-3 दिनों तक सुखाकर डण्डे से पीटकर या थ्रेसर से गहाई करना चाहिए तत्पश्चात ओसाई करके दाने को अच्छी तरह सुखाकर भंडारित करना चाहिए।

मूँग की उपज (Produce):-

उचित सस्य क्रियाए अपनाकर किसान भाई मूँग की 12-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर सकते हैं।

You may like also – जैविक खेती – फसल उत्पादन एवं महत्व

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.