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मूँगफली की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

मूँगफली की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

मूँगफली तिलहनी फसलों में से एक महत्वपूर्ण फसल हैं यह सभी प्रकार की तेल वाली फसलों में से सर्वाधिक सूखा सहन करने वाली फसल हैं, इसलिए इसे तिलहनी समूह की फसलों का “राजा” कहा जाता हैं। इसमें तेल(45-55%) एवं प्रोटीन (28-30%) अधिकता के कारण अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक मात्रा में ऊर्जा प्रदान करती हैं। इसकी पाचन शीलता लगभग 86.08% होती हैं। इसमें विटामिन्स एवं खनिज पदार्थ जैसे आवशयक पोषक तत्व भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसलिए जनमानस में इसको “गरीबो का बादाम” की संज्ञा दी गई हैं। खरीफ फसल की यह मुख्य तिलहनी फसल हैं लेकिन अब इसकी खेती जायद मौसम में भी सफलतापूर्वक उन स्थानों पर की जा रही हैं जहाँ खरीफ मौसम में मूँगफली उगाई जाती हों तथा गर्मियों के लिए अच्छे सिंचाई के साधन उपलब्ध हो।

मूँगफली की उन्नत खेती

मूँगफली की उन्नत किस्में (Perennial varieties of peanuts)

आधुनिक युग में (हरित क्रांति) का श्रेय उन्नत बीजों का को दिया गया हैं। क्योंकि उनन्त किस्म के बीजो का आधुनिक कृषि का प्रमुख आधार हैं। इन किस्मों के बीजो को प्रति हैक्टेयर पैदावार प्रचलित देशी किस्मों के बीजों से कई गुना अधिक होती हैं। ये नव  विकसित किस्में उत्पादकता के साथ- साथ प्रतिकूल अवस्थाओं के प्रति अधिक सहनशील एवं प्रतिरोधी होती हैं। संकरण बीजों का उपयोग करते समय संतुलित उर्वरक उपयोग एवं उचित जल प्रबंधन इत्यादि संसाधनों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। अतः जायद में मूँगफली को आधुनिक तकनीकों से उत्पादन करने के लिए इसकी उन्नत किस्मे इस प्रकार हैं।

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जी. जी. 2(G.G.2)

यह मूँगफली की गुच्छेदार किस्म हैं। इसका उत्पादन 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता हैं तथा इसमें तेल की मात्रा 40-42% तक होती हैं। यह लगभग 130 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं।

टी.ए.जी.24(T.A.G.24)

यह मूँगफली की गुच्छेदार किस्म हैं। जायद बुवाई के लिए सर्वोत्तम किस्म हैं इसका उत्पादन 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता हैं। साथ ही काम समय में पक कर तैयार हो जाती हैं  इसमें तेल की मात्रा 50% तथा फलियों में दानो का अनुपात 60% होता हैं।

एस. बी.11(S.B.11)

यह किस्म खरीफ एवं जायद दोनों में उगाई जाती हैं किन्तु खरीफ की अपेक्षा जायद में ज्यादा उपज देती हैं। इसमें तेल की मात्रा 40-50% तक होती हैं। इसकी औसत उपज 25-30 किवंटल/हेक्टेयर होती हैं।

डी. एच.86(D.H.86)

यह झुमका किस्म जायद के लिए उपयुक्त हैं। इसकी औसत उपज 30-35किवंटल /हेक्टेयर होती हैं।120-125 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। इसमें तेल की मात्रा 48% होती हैं। फलियों में दाने का अनुपात 65% तक होता हैं।

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खेत की तैयारी (Field preparation)

मूँगफली की खेती के लिए लगभग 70-90 फारेनाइट तापमान एवं परिपक्वता के समय ठंडी राते एवं वार्षिक वर्षा 50-125 से.मी. होनी चाहिए। इसकी फलियों का निर्माण भूमि में होता हैं। अतः इसकी फसल के लिए अच्छे जल निकास वाली भुरभुरी दोमट व रेतीली दोमट, कैल्शियम और मध्य जीव पदार्थों युक्त पी.एच. 6-8.5 उपयुक्त रहता हैं। सामान्यतः 12-15 सेमी. गहराई उपयुक्त होती हैं। गहरी जुताई करने से इसकी सुईयाँ जमीन में काफी गहरी चली जाती हैं जिससे खुदाई में काफी परेशानी आती हैं। एक जुताई मिटटी पलटने वाले हल से व 2-3 जुताई देशी हल या हेरो से करके बुवाई के लिए खेत को समतल कर लेना चाहिए।

भूमि उपचार  (Land treatment)

मुगफली में मुख्यतः सफ़ेद लट, दीमक, शीर्ष गलन रोग एवं पत्ती धब्बा रोग इत्यादि का प्रकोप अधिक होता हैं इसलिए भूमि में अंतिम जुताई के समय फोरेट 10 जी या कार्बोफ्यूरोन या हेप्टाक्लोर आदि से 25 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से उपचारित करते हैं। दीमक का प्रकोप कम करने के लिए खेत की पूरी सफाई जैसे सूखे डन्ठल एवं कच्ची खाद आदि को खेत से हटाना चाहिए।

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बीज की मात्रा एवं बुवाई (Seed quantity and sowing)

जायद फसल के लिए मूँगफली की बुवाई फरवरी के दूसरे सप्ताह से मार्च के दूसरे सप्ताह तक कर सकते हैं। जबकि खरीफ में वर्षा के बाद भूमि में पर्याप्त नमी को देखकर बुवाई करनी चाहिए। झुमका किस्म का 100 किग्रा. बीज (गुली) एवं विस्तारी किस्म व अर्धविस्तारी किस्म 60-80 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करनी चाहिए। झुमका किस्म में कतार से कतार की दुरी 30 सेमी. एवं पौधे से पोधे की दुरी 10 सेमी. रखनी चाहिए। विस्तारी एवं अर्धविस्तारी किस्मों के लिए कतार से कतार की दुरी 45 सेमी. एवं पौधे सेपोधे की दुरी 15 सेमी. रखनी चाहिए।

बीजोपचार (Seed Treatment)

बीज कृषि का मुख्य आधार होता हैं जिसका उत्पादन एवं उत्पादकता पर सीधा असर पड़ता हैं। अतः हमेशा प्रमाणित बीज ही खरीद कर बोना चाहिए। बीज को कवक एवं जीवाणु आदि के प्रभाव से बचाने के लिए क्रमशः कवकनाशी(3 ग्राम थाइरम या कार्बेन्डाजिम या 2 ग्राम मेंकोजेब से प्रति किलो की दर) से कीटनाशी (1 लीटर क्लोरोपायरीफोस 20 ई.सी. से प्रति 40 किलो बीज की दर) से और अंत में राइजोबियम कल्चर एवं फास्फेट विलेयक जीवाणु खाद से उपचारित करना चाहिए। राइजोबियम कल्चर से बीजों को उपचारित करने के लिए 2-5 लीटर पानी में 300 ग्राम गुड़ डालकर गर्म करके घोल बनाए।घोल को ठंडा कर के उसमे600 ग्राम राइजोबियम मिलाये। यह घोल 1 हैक्टेयर में बुवाई करने वाले बीज के लिए काफी होता है। इसके बीजों पर समान परत चढ़ानी चाहिए। इसके बाद फॉस्फेट विलय जीवाणु खाद से बीजों को उपचारित करते है। उपचारित बीजों को छायादार भाग में सुखाकर शीघ्र बुवाई करनी चाहिए। इससे उत्पादन में 2-15% तक उपज बढ़ जाती है। फास्फेट विलय जीवाणु से मृदा में उपस्थित अघुलनशील फॉस्फोरस घुलनशील फॉस्फोरस के रूप में बदल देता है जिसे पौधे आसानी से ग्रहण कर लेते है इससे उत्पादन में बढ़त एवं दानों में चमक एवं सुडौलता भी बढ़ती है।

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उर्वरक (Fertilizer)

मूँगफली के लिए 20-30 कि.ग्रा. नत्रजन, 50-60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस एवं 30-40 कि.ग्रा. पोटाश का प्रति हैक्टेयर की दर उपयोग करना चाहिए। फॉस्फोरस, पोटाश एवं आधी मात्रा नत्रजन की भूमि में अंतिम जुताई के साथ लाइनों में बुवाई कर देनी चाहिए।

नत्रजन  (Nitrogen)

यह पौधों की वनस्पति वृद्धि में तेजी एवं पर्णहरित क्लोरोफिल व प्रोटीन निर्माण में मुख्य योगदान देता है। इसमें 20 किग्रा. नत्रजन प्रति हैक्टेयर देते है। नत्रजन के मुख्य स्त्रोत किसान खाद, अमोनियम सल्फेट, यूरिया इत्यादि है। नत्रजन की पूर्ति के लिए अमोनियम सल्फेट अधिक उपयुक्त होता है।

फॉस्फोरस (Phosphorus)

दलहनी फसलों के लिए फॉस्फोरस एक आवश्यक पोषक तत्व है। इससे जड़ों में पाई जाने वाली ग्रंथियों का विकास होता है। यह फल एवं बीज के निर्माण में आवश्यक होता है। सिंगला सुपर फॉस्फेट मूँगफली की फसल के लिए अच्छा होता है। इसमें 60 किग्रा. फॉस्फोरस पेंटा ऑक्साइड/हैक्टेयर देते है।

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पोटेशियम(Potassium)

यह राइजोबियम जीवाणुओं को भोजन सप्लाई करता हैं। यह नाइट्रोजन के प्रतिकूल प्रभाव को रोकता हैं। इसमें प्रत्येक 100बीजों का वजन बढ़ता हैं तथा बीज चमकीले एवं सुडोल बनते हैं। सल्फेट ऑफ़ पोटाश इसका बहुत अच्छा स्त्रोत हैं।

कैल्शियम एवं सल्फर(Calcium and sulfur)

कैल्शियम एवं सल्फर को भूमि में 5 सेमी. गहराई तक मिलाते हैं। जिससे विकसित हो रही कलियों और सुईयां द्वारा इसको ग्रहण कर लिया जाता हैं। जिप्सम का प्रयोग 500 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के 45-60 दिन के बीच मृदा की सतह में इस प्रकार देना चाहिए की सभी पौधे आसानी से ग्रहण कर सके।

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सिंचाई(Irrigation)

खरीफ की फसल पूर्ण रूप से वर्षा पर आधारित होती हैं।  लेकिन यदि मूँगफली की विशिष्ट अवस्थाओं में सिंचाई कर दी जाए तो प्रति हेक्टेयर में उपज में बढ़ोतरी होती हैं। सामान्यतयः जायद में बोई गई फसल को पलेवा के अतिरिक्त 8 सिंचाई विभिन्न अवस्थाओं में आवशयक होती हैं परिस्थितियों एवं भूमि के अनुसार सिंचाइयों की संख्या में वृद्धि संभव हैं। इस फसल में शाख बनते, फूल निकलते एवं फली का विकास होते समय सिंचाई करना आवश्यक हैं। क्योकि ये अवस्थाए महत्वपूर्ण होती हैं इन अवस्थाओं पर नमी की कमी पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। फव्वारा सिंचाई पद्दति जायद मूँगफली के लिए काफी उपयोगी सीधा हुई हैं।

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खरपतवार नियंत्रण(weed control)

बुवाई के 30-35 दिनों के बाद ही फसल को खरपतवार रहित कर देना चाहिए। इस समय खरपतवार से 80% तक फसल को नुकसान हो सकता हैं फसल में सुइयां बनना प्रारंभ होने तक निराई- गुड़ाई एवं सभी कार्य पूर्ण कर लेने चाहिए। जायद में जहाँ खरपतवार अधिक होती हैं वहाँ उनके नियंत्रण के लिए निम्नलिखित खरपतवारनाशी का छिड़काव करना चाहिए।

बुवाई से पहले

फ्लूक्लोरलीन 45% ई.सी. का 0.5-1.00 किग्रा./हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर तुरंत भूमि में मिला देना चाहियें। इसके अलावा ट्राईफ़लूरालीन 48% ई.सी. का 0.25-0.75 किग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि को उपचारित करें।

अंकुरण से पहले

एलाक्लोर 50 ई.सी. या 10% जी का 1.00-1.5 किग्रा. या नाइट्रोफेन का 0.25-0.75 किग्रा. या पेंडीमेथालिन 30% ई.सी. का या 5% जी. का 1.25 किग्रा. की दर से भूमि को उपचारित करने के बाद एमेजाथापीर 10% 0.1-02 किग्रा. या फ्लुजीफोप पी- 0.25-0.375 किग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से लगभग 5-25 दिन तक छिड़काव कर भूमि उपचारित करनी चाहिए।

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खुदाई

जब पत्तियों का रंग पीला पड़ने लगे एवं फलियों के अन्दर का ऐनिन का रंग उड़ जाये तथा बीजों के खोल रंगीन हो जाये तो खेत में हल्की सिंचाई कर लें एवं पौधों से फलियों को अलग कर लें।

भण्डारण(Storage)

मूँगफली में उचित भंडारण एवं अंकुरण क्षमता को बनाये रखने हेतु कटाई के बाद सावधानीपूर्वक सुखाना चाहियें। भण्डारण करते समय पके हुए दानो में नमी की मात्रा 8-10% से अधिक नहीं होनी चाहियें अधिक नमी होने पर मूँगफली में पीली फफूंद द्वारा एफ्लाटॉक्सिन नामक तत्व पैदा हो जाता हैं। यह मानव एवं पशुओ के लिए हानी कारक होता हैं। यदि मूँगफली को तेज धुप में सुखाया जाता हैं तो अंकुरण क्षमता का हास्य होता हैं। इसलिए अंकुरण क्षमता को बनाये रखने के लिए निम्न बातो का ध्यान रखना चाहिए।

  1. उपयुक्त नमी होने पर मूंगफली को जमीन से निकल दे ताकि मूँगफली जमीन में न रहें।
  2. मूँगफली को जमीन से निकलने के बाद छोटा- छोटा गट्ठर बना कर, छाया वाली जगह पर सुखाना चाहियें
  3. जब मूँगफली को सुख जाए तो उसे पौधों से अलग कर 8-10% तक नमी रखकर सुखाना चाहियें।
  4. पूर्ण सुखी फलियों को हवादार जगह पर भंडारित करना चाहियें जहाँ पर नमी ग्रहण नहीं कर सकें या या फिर प्रत्येक बोरों में कैल्शियम क्लोराइड 300 ग्राम प्रति 40 किग्रा। बीज की दर से भंडारित करे।
  5. भण्डारण से हानी पहुंचाने वाले कीटों से सुरक्षा रखे जिससे भण्डारण के समय फलियां ख़राब न हो।                                                   You may like also- कद्दूवर्गीय सब्जियों में कीट एवं रोग नियंत्रण
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