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मुर्गीपालन (प्रतापधन मुर्गी) जनजाति परिवारों हेतु

मुर्गीपालन (प्रतापधन मुर्गी) जनजाति परिवारों हेतु
Written by bheru lal gaderi

हमारे देश की अर्थव्यवस्था में कृषि के साथ-साथ पशुपालन तथा मुर्गीपालन बहुत महत्व है। मुर्गीपालन का भारतीय कृषकों के लिए विशेष महत्व है। क्योंकि मुर्गीपालन का व्यवसाय कम जगह कम खर्च पर तुरंत आए का एक ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अच्छा व्यवसाय मुर्गीपालन मे किसान जिनके पास बहुत कम जमीन (लगभग 2 एकड़ से कम) वह भूमिहीन मजदूर इसको कर सकते हैं क्योंकि यह बेरोजगारी के साथ-साथ एक प्रोटीन का अच्छा स्त्रोत है। जिससे कुपोषण के शिकार से भी बचा जा सकता है।

भारत में कुल 729.21 मिलियन पोल्ट्री है एवं राजस्थान में कुल 8.02 मिलयन जो कि भारत की जनसंख्या का लगभग 1.1% ही है। आज भी भारत जैसे देश में पारंपरिक तरीके से कुछ जातीय मुर्गीपालन का कार्य कर रही हैं।  भारत में सिर्फ 30% देशी मुर्गिया है क्योंकि इनकी उत्पादन क्षमता बहुत कम है (लगभग 50-60 अंडे प्रतिवर्ष) जो कुल उत्पादन का सिर्फ 1% ही है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन के अनुसार 180 अंडे व 11 किलो मांस प्रति व्यक्ति वर्ष की आवश्यकता  होती है जबकि अभी सिर्फ 58 अंडे व 2.8 किलोग्राम मांस ही उपलब्ध हो पा रहा  है जो कि काफी कम है।

 मुर्गीपालन (प्रतापधन मुर्गी) जनजाति परिवारों हेतु

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राजस्थान में मुर्गीपालन

राजस्थान में कुल अंडा उत्पादन 1190 मिलियन है जो कि भारत के अंडे उत्पादन का 1.59% है। यदि हम प्रति व्यक्ति उपलब्धता की बात करें तो राजस्थान में सिर्फ 17 अंडा प्रति व्यक्ति हैं जो की आवश्यकता से कम है। राजस्थान में मुर्गीपालन अधिकांश: ग्रामीण इलाको में किया जाता है। व्यवसायिक मुर्गीपालन राजस्थान के कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित है व्यवसायिक मुर्गीपालन में अधिक उत्पादन खर्च एवं जोखिम को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्र में मुर्गीपालन पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए। राजस्थान का दक्षिणी भाग जनजाति बाहुल्य क्षेत्र है यहां के कुछ जिले जैसे डूंगरपुर, बांसवाड़ा एवं प्रतापगढ़ पूर्णतया जनजाति क्षेत्र है यह पहाड़ी क्षेत्र है। एवं औसत जोत अत्यधिक कम हैं यहां अधिकांश लघु एवं सीमांत किसान अथवा भूमिहीन मजदूर है जिनके लिए मुर्गीपालन कम खर्च पर एवं अत्यधिक लाभकारी व्यवसाय हो सकता है, जो ना केवल आर्थिक उन्नति भरण पोषण एवं आजीविका सुरक्षा का साधन हो सकता है।

आज भारत जैसे देश को आवश्यकता है ऐसी नस्ल की जो ग्रामीण क्षेत्र का अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में देशी मुर्गियों से ज्यादा अंडा एवं मांस उत्पादन कर सके। आज राजस्थान की स्थिति यह है कि कुल कुक्कुट का 60% योगदान ग्रामीण कुक्कुट का है, इस स्थिति को मध्य नजर रखते हुए अखिल भारतीय समन्वयक कुक्कुट प्रजनन अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर द्वारा द्धप्रयोजनी बहुरंगी संकर नस्ल विकसित की गई है। जिसका नाम प्रतापधन रखा गया है।

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प्रतापधन की विशेषताएं                    

  • ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से पाली जा सकती है।
  • इस नस्ल की मुर्गी का रंग बहुरंगिन होने के कारण गांव के लोगों द्वारा पसंद करने के साथ-साथ इसकी रंग विभिन्नता उसे अपने शत्रुओं से बचाव करने में भी सहायक है।
  • इसकी लंबी टांग होने से ग्रामीण क्षेत्र में अपने को शत्रुओं से बचाती है।
  • अंडे का रंग भी देशी अंडे जैसे हल्के भूरे रंग का होता है।
  • अंडे सहने की क्षमता है।
  • जल्दी वृद्धि दर 20 सप्ताह (5 माह) पर वजन 1.5 से 3.0 किग्रा मुर्गे का व 1.2 से 2.7 किग्रा मुर्गी का वजन होता है।
  • अधिक अंडा उत्पादन लगभग (160-170 अंडे/वर्ष) जबकि राजस्थान में देशी मुर्गी के40-50 अंडे होते हैं।
  •  देशी मुर्गी की तुलना में 4 गुना अधिक अंडा उत्पादन देशी मुर्गी की तुलना में 75% अधिक वजन।

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प्रतापधन चूजों का रखरखाव एवं प्रबंधन

प्रारंभिक अवस्था यानी 1 दिन से लेकर 45 दिन तक के चूजों को कृतिम उष्मा की आवश्यकता होती है इसके लिए किसान लकड़ी/धातु/टोकरी के बने ब्रूडर के नीचे एक बल्ब लगाकर 50-60 चूजों को रख सकते हैं। गर्मी प्रदान करने से बिछावन भी सहायक होती है जो ब्रूडर के अंदर 1-2 इंच मोटी चादर के रूप में बिछाई जाती है। बिछावन के लिए किसान गेहूं या चावल का भूसा, लकड़ी का बुरादा आदि प्रयोग कर सकते हैं। चूजे लाने से पहले सभी प्रकार के बर्तनों को जीवाणु नाशक दवा से साफ करके व्यवस्थित रख दें। यह सारी व्यवस्था 1 से 45 दिन के चूजों के लिए होती है।

आहार व्यवस्था

4 से 6 सप्ताह के चूजों के लिए ग्रामीण स्तर पर प्रायः संतुलित आहार नहीं मिल पाता है। अतः किसान भाइयों को 6 सप्ताह के चूजे ही लाने चाहिए। संतुलित आहार में खनिज तत्व, विटामिन, जीवाणुनाशक व कोक्सिडियल  दवाओं का समावेश होना चाहिए।

स्वास्थ्य

प्रतापधन का मुख्य बीमारियां से बचाव के लिए निम्नलिखित सारणी के अनुसार टिकाकरण करना चाहिए:

आयु दिन

टीके का नाम स्ट्रेन मात्रा तरीका

1

मरेक्स रोग एचविटी 0.20 मिली सबकट इंजेक्शन

1

रानीखेत लासोटा एक बून्द

नाक या आंख में

14

आई.बी.डी. गम्बोरो एक बून्द नाक या आंख में
28 रानीखेत लासोटा 0.03 मिली

पिने के पानी में

42 फाउल पोक्स 0.20 मिली

मांसपेशियों में

ग्रामीण क्षेत्रों में पठोरो व अंडे देने वाली मुर्गी का प्रबंधन

प्रतापधन के चूजे 4 से 6 माह के पश्चात किसान अपने घर के आगे पीछे आराम से रख सकता है। इस पद्धति को फ्री रेंज कहते हैं। इसमें दिन भर के लिए घर के बाहर छोड़ दिया जाता है और रात को सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है।

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आहार

वैसे तो मुर्गियां ग्रामीण परिवेश में अपने आप इधर-उधर जाकर किचन के अपशिष्ट भाग को तथा छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े खा कर अपना पालन-पोषण कर लेती है। फिर भी कुछ मात्रा में खाना देना उपयोगी रहता है। मुर्गियों को आहार में मक्का, गेहूं, ज्वार, जौ कटे हुए चावल आदि खिला सकते हैं। मुर्गियों का ज्यादा वजन होने से अंडा उत्पादन कम होता है इसके लिए मुर्गी का वजन 2.2 किलोग्राम 6-6.5 माह तक होना चाहिए। अंडे देने वाली मुर्गी को हमेशा कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है जो कि अंडे के कवच निर्माण में सहायक होता है। इसके लिए 3-4 ग्राम/मुर्गी/दिन के हिसाब से संगमरमर पत्थर के टुकड़े देने से कवच कठोर बनता है।

आवास

उचित आवास व्यवस्था नहीं होने से मुर्गियों के उत्पादन क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा उन्हें मृत्यु दर भी बढ़ जाती है। मुर्गियों का दड़बा बनाते समय यह ध्यान में रखें कि एक मुर्गी को 1.5 से 2.0 वर्ग फीट जमीन की आवश्यकता होती है। दडबा जमीन से थोड़ा ऊपर ढलान पर छायादार स्थान पर को तथा उसमें अच्छा वायु संचार हो दड़बे  की लंबाई पूर्व-पश्चिम में होनी चाहिए ताकि मुर्गियों को सीधी धूप प्रकाश से बचाया जा सके

आवास में बिछावन के लिए चावल की भूसी, गेहूं का भूसा काम में लिया जाना चाहिए ताकि मुर्गियों को गर्मी व फर्श सुखा बना रहे।

स्वास्थ्य प्रबंधन

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मुर्गियों की स्वच्छता एवं स्वस्थ स्वास्थ्य इस व्यवसाय की सफलता है। जिसके कारण इनकी वृद्धि उत्पादन क्षमता में अच्छी वृद्धि होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में फैलने वाली मुर्गियों की मुख्य बीमारी रानीखेत है। इसके लिए छः माह के अंतराल में रानीखेत का टीका लगाना चाहिए। साथ में दो तीन माह के अंतराल में आंतरिक परजीवियों की दवा देना उचित रहता है। ग्रामीण परिवेश में उनकी मृत्यु दर अधिक होने के मुख्य कारण इनके शत्रु जैसे कुत्ता, बिल्ली, नेवला और सांप है अगर इन शत्रुओं से इनकी रक्षा करें तो ग्रामीण परिवेश में मुर्गीपालन एक सफल व्यवसाय हैं। उपयुक्त सभी बातों को ध्यान में रखते हुए किसान 20 से 30 प्रतापधन मुर्गीया रखकर अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकता है।

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प्रतापधन की उत्पादन क्षमता

 आर्थिक गुण

  • एक दिन के चूजे का औसत वजन
  • 8 सप्ताह पर औसत वजन
  • 20 सप्ताह पर मुर्गे का औसत वजन
  • 20 सप्ताह पर मुर्गी का औसत वजन
  • 40 सप्ताह पर मुर्गे का औसत वजन
  • 40 सप्ताह पर मुर्गी का औसत वजन
  • प्रथम अंडा उत्पादन पर उम्र
  • योन परिपक्वता की उम्र
  •  अंडे का औसत वजन

वार्षिक अंडा उत्पादन

प्रतापधन को ग्रामीण क्षेत्रों में एवं गहन विधि से भी पाला जा सकता है। संसाधनों को देखते हुए मुर्गीपालन विधि अपनाई जा सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पालने हेतु संसाधनों के अनुसार क्रमशः 20, 50 एवं 100 चूजों के साथ शुरुआत की जा सकती है।

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Author :-

डॉ. सिद्धार्थ मिश्रा (मो.नं. 9414978472)

राजस्थान कृषि महाविद्यालय उदयपुर

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