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मिर्च की नर्सरी तैयार करने की उन्नत तकनीक

मिर्च की नर्सरी
Written by bheru lal gaderi

नर्सरी एक ऐसा स्थान हैं जहां पर बीज अथवा पौधे के अन्य भागों से नये पौधों को तैयार करने के लिये उचित प्रबंध किया जाता है. नर्सरी का क्षेत्र सीमित होने के कारण देखभाल करना आसान एवं सस्ता होता है।

मिर्च की नर्सरी

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नर्सरी के लिये स्थान का चुनाव:-

  1. नर्सरी के समीप बहुत बड़ा वृक्ष न हो।
  2. भूमि उपजाऊ, दोमट, खरपतवार रहित तथा अच्छे जल निकास वाली हो, अम्लीय/क्षारीय भूमि का चयन न करें।
  3. लंबे समय तक धूप रहती हो।
  4. नर्सरी के पास सिंचाई जल की सुविधा उपलब्ध हो।
  5. चयनित क्षेत्र अपेक्षाकृत ऊंचा हो ताकि पानी न ठहरे।
  6. एक फसल के पौध उगाने के बाद दूसरी बार पौध उगाने का स्थान बदल दें. यानी फसल चक्र अपनायें।

नर्सरी का आकार:-

एक आदर्श नर्सरी या रोपणी के लिये कुल क्षेत्र की सीमा निश्चित तौर पर निर्धारित नहीं की जा सकती है. जितनी फसलों के लिये और जितने क्षेत्र की आवश्यकता के लिये पौध तैयार करना होती है उसके ऊपर नर्सरी का आकार/क्षेत्र निर्भर होता है।

नर्सरी में क्यारियों का आकार:-

  • सामान्यतया नर्सरी में क्यारियों का आकार लंबाई में 3 से 5 मी., चौड़ाई में 1.0 से 1.2 मीटर और ऊंचाई में भूमि से 15-20 से.मी. ऊंचा रखा जाता है.प्रत्येक दो क्यारियों के बीच में लंबाई एवं चौड़ाई में दोनों तरफ 50 से.मी. का स्थान आवागमन की सुविधा के लिये छोड़ा जाता है।
  • एक फसल के एक हेक्टर क्षेत्र में आवश्यक पौध की संख्या का निर्धारण, पौध रोपाई का कतार से कतार एवं पौध से पौध का अंतर एवं एक स्थान पर रोपे जाने वाले पौधों की संख्या के ऊपर निर्भर होता है. सामान्यत: मिर्च के लिये रोपण अंतर 45X45 से.मी.रखने पर 4 x1x0.2 मी. आकार की 25-27 (100 से 108 वर्ग मी.) क्यारियों की आवश्यकता पड़ती है।
  • उन्नत किस्मों के 1.2 कि.ग्रा. बीज और संकर किस्मों के लिये 400 से 500 ग्राम बीज प्रति हेक्टर की आवश्यकता होती है।

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क्यारियों की तैयारी उपचार:-

नर्सरी की मिट्टी की एक बार गहरी जुताई करें या फिर फावड़े-गैंती की मदद से खुदाई करें.खुदाई करने के पश्चात् ढेले फोड़कर गुड़ाई करके मिट्टी को भुरभुरी बना लें तथा उगे हुए सभी खरपतवार निकाल दें. फिर उचित आकार की क्यारियां बनायें. इन क्यारियों में प्रति वर्ग मीटर की दर से 2 कि.ग्रा. गोबर या अँक्झिनो-111 और कम्पोस्ट की सड़ी खाद या फिर 500 ग्राम केंचुए की खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिलायें. यदि मिट्टी हल्की भारी हो तो प्रति वर्ग मीटर के लिये 2.5 कि.ग्रा. रेत अवश्य मिलायें.

क्यारी मिट्टी का उपचार:-

भूमि में विभिन्न प्रकार के कीड़े एवं रोगों के फफूंद, जीवाणु आदि पहले से रहते हैं जो उपयुक्त वातावरण पाकर क्रियाशील हो जाते हैं व आगे चलकर फसल को विभिन्न अवस्थाओं में हानि पहुंचाते हैं. अत: नर्सरी की मिट्टी का उपचार करना आवश्यक है।

सूर्यताप से उपचार:-

इस विधि में पौधशाला में क्यारी बनाकर उसकी जुताई-गुड़ाई करके हल्की सिंचाई कर दी जाती है जिससे मिट्टी गीली हो जाये। अब इस मिट्टी को पारदर्शी 200-300 गेज मोटाई की पालीथिन की चादर से ढंककर किनारों को मिट्टी या ईंट से दवा दें ताकि पालीथिन के अंदर बाहरी हवा और अंदर की वाष्प बाहर न निकल सके. ऐसा उपचार लगभग 4-5 सप्ताह तक करें।

यह कार्य 15 अप्रैल से 15 जून तक किया जा सकता है। क्योंकि इस समय तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहता है। उपचार उपरांत पालीथिन शीट हटाकर भूमि की तैयारी कर बीज बोयें। सूर्यताप उपचार से भूमि जनित रोग कारक जैसे फफूंदी, निमेटोड (सूत्रकृमि), कीट खरपतवार आदि की संख्या में भारी कमी हो जाती है।

कभी-कभी क्यारी की भूमि को व्यावसायिक फार्मेल्डिहाइड 40 प्रतिशत से, 250 मि.ली. 10 लीटर पानी में बने घोल से प्रत्येक क्यारी को गीला कर देते हैं और क्यारी को पहले की ही तरह पालीथिन शीट से ढंक देते हैं। 5-6 दिन बाद शीट हटाकर गुड़ाई करके 1-2 दिन के लिये खुला छोड़ देते हैं। तदुपरांत क्यारी तैयार कर बीज बोते हैं।

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बीज उपचार:-

रोपणी में बीज को सदैव उपचारित करके ही बोना चाहिये ताकि बीज जनित फफूंद से फैलने वाले रोगों को नियंत्रित किया सके। बीज उपचार के लिये 1.5 ग्राम थाइरम+1.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम (बाविस्टीन) अथवा 2.5 ग्राम डाइथेन एम-45 या 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरडी का प्रति किलो बीज के हिसाब से प्रयोग करना चाहिए। यदि क्यारी की भूमि का उपचार जैविक विधि से (ट्राइकोडर्मा) से किया गया है तो बीजोपचार भी ट्राइकोडर्मा विरडी से करें।

रसायनों द्वारा भूमि उपचार:-

बीज बोवाई के 4-5 दिन पहले क्यारी को फोरेट 10 जी एक ग्राम अथवा क्लोरोपायरीफास 5 मि.ली. प्रति ली. पानी के हिसाब से अथवा कार्बोफ्यूरान 5 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से भूमि में मिलाकर उपचार करते हैं. कभी-कभी फफूंदनाशक दवा कैप्टान 2 ग्राम/वर्ग मीटर के हिसाब से मिलाकर भी भूमि उपचार किया जाता है.

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जैविक विधि:-

क्यारी की भूमि का जैविक विधि से उपचार करने के लिये ट्राइकोडर्मा विरडी की 8-10 ग्राम मात्रा को 10 किलो गोबर खाद में मिलाकर क्यारी में बिखेर देते हैं तत्पश्चात् सिंचाई कर देते हैं. जब भूमि का जैविक विधि से उपचार करें तब अन्य किसी रसायन का प्रयोग न करें।

बीज बोने की विधि:-

क्यारियों में सर्वप्रथम उसकी चौड़ाई के समानान्तर 7-10 से.मी. की दूरी पर 1 से.मी. गहरी पंक्तियां बना लें तथा इन्हीं पंक्तियों पर बीज लगभग 1 से.मी. के अंतर से बोते हैं। बीज बोने के पश्चात कम्पोस्ट, मिट्टी व रेत के 1:1:1 के 5-6 ग्राम थाइरम या केप्टान से उपचारित मिश्रण से 0.5 से.मी. की ऊंचाई तक ढंक देते हैं।

क्यारियों को पलवार से ढंकना:-

बीज बोने के बाद स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पुआल, सरकन्डा गन्ने के सूखे पत्ते या ज्वार-मक्का के बने टटिये से ढंक देते हैं. ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे और सिंचाई करने पर पानी सीधे ढंके हुए बीजों पर न पड़े, अन्यथा मिश्रण बीज से हट जायेगा और बीज का अंकुरण प्रभावित होगा।

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सिंचाई:-

क्यारियों में बीज बोने के बाद 5-6 दिनों तक हजारे/झारे से हल्की सिंचाई करें ताकि बीज ज्यादा पानी पाकर बैठ न जाये. वर्षाऋतु में क्यारी की नालियों में उपस्थित अधिक पानी को पौधशाला से बाहर निकालना चाहिए। क्यारियों से पलवार/ घास-फूस तब हटायें जब लगभग 50 प्रतिशत बीजों का अंकुरण हो चुका हो। बीज बुवाई के बाद यह अवस्था मिर्च में 7-8 दिन बाद, टमाटर में 6-7 दिन बाद व बैंगन में 5-6 दिन बाद आती है।

खरपतवार नियंत्रण:-

क्यारियों में उपचार के बाद भी यदि खरपतवार उगते हैं तो उन्हें हाथ से निकालते रहना चाहिए इसके लिये पतली लंबी डंडियों की भी मदद ली जा सकती है। अच्छा होगा यदि पेन्डीमिथालीन (स्टाम्प 34 ) की 3 मि.ली. मात्रा प्रति ली. पानी में घोलकर बीज बुवाई के 48 घंटे की भीतर क्यारियों में छिड़़क दें।

पौध विरलन:-

यदि क्यारियों में पौधेे अधिक घने उग आयें तो उनको 1 से 2 सेमी. की दूरी पर छोड़ते हुए अन्य पौधों को छोटी उम्र में ही उखाड़ देना चाहिए। अन्यथा पौधे का तना पतला व कमजोर बना रहता है. घने पौधे पदगलन रोग लगने की आशंका बढ़ाते हैं. उखाड़े गये पौधे खाली स्थान पर रोपित भी किये जा सकते हैं।

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पौध सुरक्षा:-

नर्सरी में रस चूसने वाले कीट जैसे माहू, जैसिड्स सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स अप्रत्यक्ष रूप से काफी नुकसान पहुंचाते और विषाणु जन्य बीमारियों को फैलाते हैं। इनके नियंत्रण हेतु नीम तेल 5 मि.ली. एक ली. पानी में अथवा डायमिथियेट 2 मि.ली./ली. पानी में घोलकर बुवाई के 8-10 दिन और 25-27 दिन बाद छिड़कना चाहिए।

क्यारी और बीज उपचार करने के बाद भी यदि पदगलन (डेम्पिंग आफ) बीमारी लगती है। जिसमें पौधे जमीन की सतह से गलकर जमीन पर गिरने लगते हैं और सूख जाते हैं, तब फसल पर मैंकोजेब (डाइथेन एम-45) अथवा कैप्टान 2.5 ग्राम/ली. पानी में बने घोल का छिड़काव करें. कभी-कभी बीजों को अंकुरण के उपरांत बुवाई के एक सप्ताह बाद 40 मेश के नायलोन के नेट से एक क्यारी को ढंककर पौध उगायी जाती है। जिससे विषाणु रहित स्वस्थ पौध तैयार होती है।

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पौधों को उखाडऩा:-

क्यारी में तैयार पौधे जब 25-30 दिन उम्र के हो जायें, उनकी ऊंचाई 10-12 से.मी. हो जायें और उनमें 5-6 पत्तियां आ जायें तब पौधशाला से खेत में रोपण के लिए निकालना चाहिए। पौध निकालने के पूर्व उनकी हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। पौध सावधानी से निकालें और 50 या 100 पौधों के बंडल बना लें।

सावधानियां:-

  1. बीज अनुशंसित किस्म का शुद्ध एवं साफ हो।
  2. अंकुरण क्षमता 80-85 प्रतिशत हो।
  3. बीज किसी प्रमाणित संस्था, शासकीय बीज विक्रय केंद्र, अनुसंधान केंद्र अथवा विश्वसनीय विक्रेता से ही लेना चाहिए. बीज प्रमाणिकता का टैग लगा पैकेट खरीदें।
  4. बीज खरीदते समय बोरी/ पैकेट पर अंकित फसल/ किस्म, श्रेणि/ उत्पादन वर्ष, अंकुरण प्रतिशत, नमी की मात्रा/ बीज की वैधता/ बीज उपचारण आदि अवश्य देख लें. ताकि पुराने बीज से बचा जा सके। बीज बोते समय ही पैकेट खोलें।

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प्रस्तुति:-

धरती राज मीना

Superviser at Agriculture Department-कृषि विभाग

junier reserch felloship at RCA, MPUAT

Udaipur (Raj.)

Link – https://www.facebook.com/dhartiraj.meena/posts/1003663203120801

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