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महुआ महत्व एवं उन्नत शस्य क्रियाऐं

महुआ महत्व एवं उन्नत शस्य क्रियाऐं
Written by bheru lal gaderi

महुआ भारत में जन जातीय समुदाय का महत्वपूर्ण भोज्य पदार्थ हैं। महुआ के फूल एवं फल ग्रीषम ऋतू में उपजते हैं। जनजातीय समुदाय के पास चावल व अन्य भोज्य पदार्थों की कमी के समय इसको भोजन के रूप में उपयोग करते हैं। मध्य एवं पश्चिमी भारत के दूरदराज वन अंचलों में बसे ग्रामीण आदिवासी जनो के लिए रोजगार के साधन एवं खाद्य रूप में महुआ वृक्ष का महत्व बहुत अधिक हैं। इसे अलग-अलग राज्यों में विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता हैं हिंदी में मोवरा, इंग्लिश में इंडियन बटर ट्री, संस्कृत में मधुका, गुडपुष्पा इत्यादि।

महुआ महत्व एवं उन्नत शस्य क्रियाऐं

उत्पत्ति एवं वितरण

एक माध्यम आकर का बड़ा वृक्ष लगभग पुरे भारत में शुष्क अथवा मिश्रित उष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्रों में समुद्र तल से लगभग 1200  मीटर ऊंचाई तक पाया जाता हैं। भारत में मुख्य रूप से पूर्व उत्तरप्रदेश, छतीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, गुजरात, राजस्थान में डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर जिलों में बहुतायत से पाया जाता हैं। महुआ के लिए शुष्क उष्ण कटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता होती हैं। महुआ के लिए 20-46  डिग्री से तापमान तथा 550-1500 मि.मि. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र इसकी वृद्धि के लिए उपयुक्त होते हैं। इसे सूर्य का प्रकाश अत्यंत प्रिय हैं।

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भूमि

पौधों को गहरी चिकनी बलुई या रेतीली दोमट मिटटी की आवश्यकता हैं फिर भी इसे पथरीली, मटियार, खारी व क्षारीय मिट्टियों में भी आसानी से उगाया जा सकता हैं।

प्रवर्धन

महुआ का प्रवर्धन बीजों एवं कलम द्वारा किया जाता हैं। बीजों का संग्रहण जून-अगस्त में किया जाता हैं इकट्ठे किये बीजों को बुवाई पूर्व गर्म पानी (80-100 सेन्टीग्रेड) में डालकर उसे शीघ्र ठंडा किया जाता हैं फिर 24 घण्टे तक उसी में डुबोकर रख दिए जाते हैं।

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पौध नर्सरी विधि

क्यारियों में

पौध नर्सरी बरसात के दिनों में तैयार की जाती हैं। उपचारित बीजों को 2 से.मी. गहराई पर लाइनों में 10से.मी. x 10 से.मी. के अंतराल पर पतली नाली बनाकर बोना चाहिए बुवाई के बाद क्यारियों की सिंचाई की जाती हैं। अंकुरण 10-15 दिनों में हो जाता हैं।

पॉलीथिन थैलियों में

सामान्यतः पॉलीथिन की थैलियां 15 से.मी. x10  से.मी. आकर की काम में लेते हैं। इन थैलियों को मिट्टी, खाद तथा बालू की मात्रा उपयुक्त अनुपात 3:1:1 के मिश्रण से भरकर नर्सरी में बीएड में जमा लेते हैं। उपचारित बीजों को इन थैलियों में 2  से.मी. गहराई पर बुवाई कर देते हैं। अंकुरण हो जाने के बाद 2-3 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करना चाहिए।

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रोपाई विधि

गर्मी के मौसम या मई-जून माह में 60 से.मी. x 60 से.मी. x 60 से.मी. आकार के कतार से कतार 7 मीटर व पौधे से पौधे की 7 मीटर की दुरी रखते हुए खोद देने चाहिए तथा इन गड्डो को धुप में खुला छोड़ देना चाहिए। पॉलीथिन में तैयार किये गए महुआ के पौधों का रोपण जुलाई-सितम्बर माह तक गड्डों में किया जाता हैं।

खाद व उर्वरक

एक वर्ष के पौधों को 10  किलो गोबर की सड़ी खाद, 200  ग्राम यूरिया, 300  ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 125  म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की आवश्यकता होती हैं रोपण के समय जुलाई माह में गोबर की खड्ड सिंगल सुपर फास्फेट व पोटाश की पूरी मात्रा मिलकर गद्दों में भर देनी चाहिए। यूरिया की मात्रा को दो बराबर हिस्सों में बांटकर 100 ग्राम यूरिया रोपण के एक माह बाद एवं 100 ग्राम यूरिया रोपण के दो माह बाद पौधों के पास डालना चाहिए। उपरोक्त उर्वरकों की मात्रा को 10  वर्षों तक इसी तरह पौधों में देना चाहिए।

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सिंचाई

महुआ में सिंचाई की क्रांतिक अवस्थाएं जैसे -सुषुप्ता अवस्था, यानि पत्तियों का जड़ना, फूल का आना शुरू होना (मार्च-अप्रेल) एवं फल का आना (मई माह) होती हैं। यदि इन अवस्थाओं पर सिंचाई उपलब्ध हो जाती हैं। तो उत्पादन में बढ़ोतरी भी होती हैं। फिर भी महुआ में शुरू के 2 से 3 वर्षों तक पहली 4 सिंचाई नवम्बर से मार्च तक 45 दिनों के अंतराल पर तथा मार्च के बाद 30  दिनों के अंतराल पर 3  सिंचाई करने से पौधों व जड़ों की बढ़वार समुचित रूप में होती हैं।

अंतराशस्य फसल

वृक्षारोपण के बाद पौधों के बिच उपलब्ध भूमि में सब्जियां: ककड़ी, भिंडी, लोकि, तरोई आदि की जा सकती हैं महुआ में अंतराशस्य फसल करीब 6-8 वर्षों तक ले सकते हैं।

कटाई-छटाई

महुआ में पौधे जब तक धरातल से ९० से.मी. की ऊंचाई के हो जाते हैं तब तेज धार वाले चाकू से शीर्ष शाखा को काट देना चाहिए चाहिये। ऐसा करने से पौधें में 4-6 शाखाएं विकसित होती हैं महुआ पौधों में छटाई नहीं होती हैं बल्कि मरी हुयी व बीमारी वाली शाखाओं की ही छटाई की जाती हैं।

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पुष्पन व फलन

महुआ महत्व एवं उन्नत शस्य क्रियाऐं

महुआ में पुषपन पतझड उपरांत फरवरी से मार्च तक होता हैं फूल गुच्छों के रूप में लगते हैं एक गुच्छे में 10-60  फूल लगते हैं कम परागण की वजह से 8-13% की फल बनते हैं। तथा अन्य फूल जमीन पर गिर जाते हैं। फल के पकने का समय मई के तीसरे सप्ताह से लेकर जून अंत तक का होता हैं। इन फलों से एक सप्ताह के अंदर फोड़कर बीज निकाल लिए जाते हैं अन्यथा अंदर ही अंकुरित हो जाते हैं। इन बीजों में से गिरी को निकाल लेते हैं और जुट के बोरोन में ६% नमी पर संग्रहित कर लेते हैं। इसी गिरी से तेल निकाल लिया जाता हैं।

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उपज

गूदेदार रस भरे एवं मीठे फल (सूखे) 100-150 किलोग्राम/वृक्ष/वर्ष  एवं  बीज  60-60 की.ग्रा./वृक्ष/वर्ष

महुआ के कीट, बीमारियां एवं नियंत्रण

कीट

  • छाल को खाने वाला केटरपिलर (इंदरबेला स्पेसीज)
  • महुआ पत्ती रोलर (पोलिकोरोसिस सेलीफेरा)
  • लकड़ी सड़न फफूंद (पालीसटेनहेली लियेनस)
  • फनेरोगेमिट परजीवी

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बीमारियां

बीज तथा फलों का सड़ना

यह एजपरजिलस फलेवस, एजपरजिंलस नाइजर, पेनिसिलम एवं स्टाथयोपाता फेजिपप्लेकटरा फफूंद की वजह से होता हैं। इसके लिए बीजों में नमी 5-6% ही रखनी चाहिए।

पत्ती धब्बा एवं पट्टी ब्लाइट

यह पेस्टोलोटियेगप्सिस डीचक्टा, सरकोस्पोरा हेटीकोला तथा पास्तालोसिया पेरागुरेनसीस फफूंद की वजह से होता हैं।

पत्ती रत्तूआ

यह बीमारी सकोपेला की वजह से होती हैं इसके नियंत्रण के लिए पत्तियों के लिए पत्तियों पर एक छिड़काव 0.1% कार्बेन्डाजिम या दो छिड़काव 0.25% मेंकोजेब का करना चाहिए।

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उपयोगिता

ब्राउन केसरिया रंग के पके हुए गूदेदार बेरी रूप फल के 1 से 4 चमकदार बीज पाए जाते हैं। बीज के अन्दर की गिरी के वजन का 70% रहता हैं बीजों में तेल की मात्रा 33-43% तक होती हैं बीज से प्राप्त तेल को “महुआ बटर या कोको बटर” के नाम से जाना जाता हैं। जिसका उपयोग शोधन करके कन्फेन्सरी व चॉकलेट उद्द्योग में लिया जाता हैं। इसके तेल को लुब्रिकेटिंग ग्रीस के निर्माण, जुट व मोमबत्ती उद्द्योग में लिया जाता हैं औषधीय जैसे त्वचा रोगो, गठिया व सरदर्द में काम में लिया जाता हैं इसको लेक्जेटिव के रूप में पुराने कब्ज, भंगदर इत्यादि रोगो में भी उपयोग किया जाता हैं। इसका तेल रेचक कब्जहर के रूप में बवासीर एवं फिशूला रोगों के उपचार में काफी लाभप्रद हैं। तेल बायोफ्यूल (डीजल) के रूप में ऊर्जा का स्त्रोत हैं आदिवासी समुदाय द्वारा इसे खाने व प्रकाश के रूप में लिया जाता हैं।

  • महुआ फूलों में निम्नलिखित व्यंजन बनाये जैसे- रस्कुटका, महुआ खोल्ली, धोईटा,महुआ बिस्किट, डोभरी, हलवा, लड्डू, सलोनी, मखानी, जैम इत्यादि।
  • महुआ की पत्तिया मवेशी, बकरियां एवं भेड़ों के चारे के रूप में काम आती हैं इसकी पत्तों की वाष्प अंडकोष की सूजन व अन्य रोगों के उपचार में काम में लिए जाते हैं।
  • महुआ की लकड़ी का उपयोग जलाने में किया जाता हैं जिसकी केलोरिफिक मन 4890-5000 किलो कैलोरी/की.ग्रा. तक होता हैं।
  • व्यावसायिक रूप से महुआ फलों का उपयोग देशी शराब बनाने में किया जाता हैं। एक टन फूलों सी 340 लीटर एल्कोहल प्राप्त होता हैं।
  • महुआ फूल की पंखुड़ियों में अवांछित गंध वाला पदार्थ आवश्यक तेल के रूप में पाया जाता हैं। जिसमे पेंसिसेनिन, बिटेन, मेलिक तथा संक्सेनिक अम्ल पाये जाते हैं।
  • महुआ वृक्ष की छाल का काढ़ा अर्थराइटिस व जोड़ों के दर्द के लिए एवं मधुमेह आदि रोगों में किया जाता हैं।
  • महुआ के फलों को भोजन की तरह काम में लिया जाता हैं। परिपक्व फलों को प्याज व लहसुन के साथ पकाकर सब्जी के रूप में काम में लिए जाते हैं। इसके फलों में 55 से 65% रेशा, 10 से 15% शर्करा, 1.8 से 2.4% खनिज, 51 से 74 मिलीग्राम विटामिन सी एवं 586 से 890 आई.यु. विटामिन ए प्रति 100 ग्राम होते हैं।

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मार्गदर्शन

सुरेंद्र सिंह राठौर

मुख्य कार्यकारी अधिकारी

 

संकलन एवं परिकल्पना

मनिंदर जित सिंह

उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी

 

आलेख

गणपत लाल शर्मा

सलहकार कृषि

 

स्रोत :-

बायोफ्यूल प्राधिकरण

ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग

तृतीय तल, योजना भवन, युधिष्ठर मार्ग, सी-स्कीम, जयपुर

फोन. : 0141 – 2224755, 2220672

Email – biyofuelraj@yahoo.co.in

Website – www.biofuel.rajsthan.gov.in

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