agriculture

महिलाओं का कृषि उत्पादन क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान

महिलाओं
Written by bheru lal gaderi

कृषि में महिलाओं का योगदान काफी अहम है। विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार भारतीय कृषि में महिलाओं का योगदान करीब 32% है, जबकि कुछ राज्यों (पहाड़ी तथा उत्तरी पूर्वी क्षेत्र तथा केरल) में महिलाओं का योगदान कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पुरुषों से भी ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि भारत के 48% कृषि संबंधित रोजगार में महिलाए हैं जबकि लगभग 7.5 करोड़ महिलाएं दूध उत्पादन तथा पशुधन व्यवसाय से संबंधित गतिविधियों में सार्थक भूमिका निभाती हैं। कृषि के क्षेत्र में कुल 60 से 80 फीसदी तक हिस्सेदारी महिलाओं की होती है। महिलाओं की कृषि में यह सहभागिता क्षेत्र में कुल क्षेत्र विशेष की खेती पर निर्भर करती है फिर भी उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। कृषि कार्यों के साथ ही महिलाएं मछली पालन, कृषि वानिकी और पशुपालन में योगदान दे रही है।

महिलाओं

महिला के प्रत्यक्ष योगदान एवं सक्रिय भागीदारी के परिणाम स्वरुप भारत अनेक प्रकार के फल, सब्जी और अनाज के मामले में महत्वपूर्ण उत्पादक देश बन गया है।पशु पालन, मछली पालन, चटनी, अचार, मुरब्बे यानी कि खाद्य परिरक्षण, हथकरघा, दस्तकारी जैसे कामों में ग्रामीण महिलाएं पीछे नहीं है। वे खेतों में कार्य करने के अलावा कृषि संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय भी लेती है। कृषि में अहम योगदान देने के बावजूद महिला श्रमिकों की कृषि संसाधनों और इस क्षेत्र में मौजूद असीम संभावनाओं में भागीदारी काफी कम है। इस भागीदारी को बढ़ाकर ही महिलाओं को कृषि से होने वाले मुनाफे को बढ़ाया जा सकता है।

Read also – गुग्गल की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

विभिन्न कृषि क्षेत्र में महिलाओं का योगदान

भा.कृ.अनु.प. के डीआरडब्ल्यूए की ओर से 9 राज्यों में किए गए एक शोध से पता चला है की प्रमुख फसलों के उत्पादन में इनकी 75% भागीदारी, बागवानी में 79 फीसदी और कटाई में 51 फीसदी और मछली उत्पादन में 58 फीसदी भागीदारी निभाती हैं। कृषि क्षेत्र में महिला की सबसे अधिक भागीदारी हिमाचल प्रदेश में हैं। ये आंकड़े काफी उत्साहजनक है। इनको कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें उचित मोके दिए जाए तो उनकी हिस्सेदारी को और अधिक लाभ के रूप में परिणित किया जा सकता है।

Read also – अरण्डी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

विभिन्न राज्यों के महिलाओं के कृषि क्षेत्र में भागीदारी

नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के आंकड़ों के मुताबिक 23 राज्यों में कृषि वानिकी और मछली पालन में कुल श्रमशक्ति का 50 भाग महिलाओं का है। छत्तीसगढ़, बिहार और मध्यप्रदेश में 70 फीसदी से ज्यादा महिलाएं कृषि क्षेत्र पर आधारित है, जबकि पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु और केरल में यह संख्या 50 फीसदी हैं। मिजोरम, आसाम, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में कृषि क्षेत्र में 10 फीसदी महिला श्रम शक्ति हैं। कृषि में पुरुषों के साथ इनकी भागीदारी को बढ़ाकर सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों को काफी हद तक बदला जा सकता है। इससे महिलाओं के सशक्तिकरण को और अधिक बढ़ावा मिल सकता है।

Read also:- Read also – वनककड़ी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

फसल उत्पादन में महिलाओं का योगदान

फसल उत्पादन के प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य में इनका अहम योगदान होता है। इसमें पौधे लगाना, खरपतवार हटाना और कटाई उपरांत की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी शामिल है। बागवानी में महिलाएं काफी अहम योगदान देती है इनमे पौध लगाना, बेसिन बनाना, कटाई- छटाई करना और खाद डालना शामिल है। इस क्षेत्र में यदि महिलाओं को अधिक वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराते हुए उनकी पहुंच बाजार तक कराने की कोशिश की जाए तो मुनाफा और अधिक बढ़ सकता है।

Read also – सनाय की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मछली पालन

मछली उत्पादन में प्रमुखतः तटीय और गैर- तटीय प्रक्रिया शामिल होती हैं। तटीय कार्यों में मछली पकड़ना मुख्य कार्य हैं जबकि गैर-तटीय कार्यों में मछलियों के लिए जाल बनाना मुख्य कार्य माना जाता है। मछली उत्पादन में महिलाओ से संबंधित दो मुद्दे शामिल हैं- पहला, संसाधन और उत्पादों में उनकी सहभागिता और दूसरा मछली उत्पादन से महिलाओं के जीविकोपार्जन की व्यवस्था करना। इस क्षेत्र में कार्य करने वाले अधिकतर श्रमिक गैर- संगठित हैं।

Read also:- Read also – मक्का उत्पादन की आधुनिक तकनीक से अधिक उत्पादन

पशु उत्पादन और प्रबंधन

पशु उत्पादन और प्रबंधन के क्षेत्र में महिलाएं प्रमुख योगदान दे रही है। गाय और भैंसों के पालन में महिलाएं रोजाना 3 से 6 घंटे तक श्रम करती हैं। इसमें दुधारू पशुओं को चारा खिलाना, दूध निकालना व पशु आवास की साफ- सफाई का कार्य शामिल है। चारा एकत्रित करने में भी महिलाएं काफी महत्वपूर्ण योगदान देती है। उत्पादन और प्रबंधन के लिए जरूरी तकनीकी ज्ञान, कौशल और पशुपालन हेतु वित्तीय व्यवस्था जैसे बिंदु महिलाओ से जुड़े हैं।

Read also – कृषि रसायन का मृदा स्वास्थ्य पर प्रभाव

प्राकृतिक संसाधन

देश के ज्यादातर ग्रामीण समुदाय अपनी आजीविका के लिए ग्रामीण संसाधनों पर ही निर्भर रहते हैं। इनमें से प्रमुख जल, खाद्द्य, ईंधन, चारा, घर और अन्य सामाजिक जरूरतों को पूरा करने वाले संसाधन है। महिलाएं प्राकृतिक संसाधनों से आजीविका का स्त्रोत प्राप्त करने में प्रमुख भूमिका निभा रही है। इसमें खाद्य पदार्थ एकत्रित करने, ईंधन लकडिया इकट्ठी करना, छोटे पौधों को रोपना जैसे कई कार्य शामिल हैं। महिलाओं की इस क्षेत्र में प्रमुख चुनौती उनके योगदान को चिन्हित करने और सूचना- तकनीक तक उनकी पहुंच को और अधिक मजबूत बनाने की है।

Read also:- Read also – लीची के औषधीय गुण खाने के फायदे एवं नुकसान

महिलाओं की समस्याओं का निदान

सहकारी समितियों में महिलाओ को सदस्य बनाने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है जिससे महिलाओं को भी सहकारी समितियों से ऋण, तकनीकी मार्गदर्शन, कृषि उत्पादों का विपणन आदि की सुविधा उपलब्ध हो सके। महिलाओ को संस्थागत-ऋण प्राप्त हो, इसके लिए खेत पर पति- पत्नी के नाम पर संयुक्त पट्टा होना चाहिए। महिलाओं की कुशलता और उनके कृषि औजारों की क्षमता बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। राष्ट्र के विकास के लिए कृषि कार्यों में जुड़े ग्रामीण महिलाओ के सशक्तिकरण पर ध्यान दिया जाना बहुत जरूरी है।

कृषि के स्थाई विकास के लिए जहां एक और किसानों के लिए प्रशिक्षण व प्रसार सेवाओं की व्यवस्था करनी होगी। नीति निर्माता इस आवश्यकता के बारे में बहुत जागरूक हो रहे हैं और उन्होंने न सिर्फ सरकारी एजेंसियों के माध्यम से बल्कि समर्पित गैर सरकारी संगठनों के जरिए नई-नई योजनाए और कार्यक्रम आरम्भ किए हैं। लेकिन महिलाओं तक पहुंचने के लिए एक बड़ी बाधा यह है कि महिलाओं की घरेलू जिम्मेदारियों के कारण वह घर से दूर किसी स्थान पर प्रशिक्षण पाठ्यक्रम या बैठक में भाग लेने में असुविधा महसूस करती है। कई महिलाओं तक पुरुष प्रसार कार्यकर्ता नहीं पहुंच पाते हैं एवं महिला प्रसार कार्यकर्ताओं की संख्या बहुत सीमित हैं।

ऐसे में महिलाओ तक पहुंचने के लिए कई तरीके अपनाए जा रहे हैं. इनमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का उपयोग, क्षेत्रीय प्रदर्शन, मुद्रित सामग्री और अध्ययन यात्राएं आदि शामिल हैं। इनके माध्यम से महिला किसानों को अन्य महिला किसानों की सफलताओं के उदाहरणों की जानकारी दी जा सकती है।

Read also – फसल मित्र कीट का जैविक खेती में महत्व एवं उपयोग

प्रस्तुति

डॉ. मनीषा सिंगोदिया

स्रोत:-

कृषि भारती

वर्ष 8, अंक 09, जयपुर, 16 जून 2018

Mob.- 09983353511

Email- krishibharti@gmail.com

Read also – स्ट्राबेरी की उन्नत खेती एवं कीट प्रबंधन

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.