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मसूर की फसल में कीट व रोग एवं प्रबंधन

मसूर की फसल
Written by bheru lal gaderi

मसूर (Lentil)की फसल में लगने वाले लगभग सभी कीट वही होते हैं जो रबी दलहन फसलों में लगते हैं।  इसमें से मुख्य रूप से कटवर्म, एफिड और मटर का फलीछेदक अधिक हानि पहुंचाते हैं। इसकी रोकथाम मटर एवं चने खाने वाले खाने वाले गिडार को नष्ट करने के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 -ई.सी. 0.15% का 1 मि.ली. दवा को 1 लीटर पानी में घोल बनाकर/हेक्टेयर (800-1000 लीटर पानी) के हिसाब से छिड़काव करें।

मसूर की फसल

मसूर की फसल में बीमारियां एवं उनकी रोकथाम

मसूर की फसल

रतुआ या गेरुई

यह रोग यूरोमाइसिज फेबि नामक फफूंद द्वारा फैलाया जाता है। इसकी रोकथाम के लिए निम्न उपाय करें

  1. रोग रोधी किस्मे पंत एल.- 406 एवं एल.9-12 उगाए।
  2. फसल पर इस बीमारी का प्रकोप जनवरी से शुरु होकर अंत तक चलता है और मसूर में भारी नुकसान का कारण बन जाता है। इसकी पहचान पत्तियों एवं तनो पर गुलाबी व भूरे रंग के धब्बे पाए जाने पर की जा सकती है। तत्पश्चात पत्तियों और तनो पर काले धब्बे भी देखे जा सकते हैं। प्रकोप होने पर पौधा सूख जाता है।
  3. फसल की कटाई के बाद अवशेष को जला देना चाहिए।
  4. रोगरोधी किस्मे जैसे डी.पी.एल.-62, एल.-15, नरेंद्र मसूर-1, पंत एल.-406, पंत एल.-639, पंत एल.-4 आदि, किस्मे ही उगाये।
  5. फसल पर 0.2 प्रतिशत मैंकोजेब 75 डब्ल्यू. पी. का 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें।

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उकठा

यह रोग मसूर उगने वाले सभी क्षेत्रों में पाया जाता है। इस रोग के प्रकोप से पौधे पीले पड़ जाते हैं और सुख भी जाते हैं। यह एक भूमि जनित रोग हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोग रोधी किस्मे उगाये। (पंत एल.-405,406,639)

  • उचित फसल चक्र अपनाए।
  • स्वस्थ बीज की बुवाई करें।

चूर्णिल आसिता

फसल बोने के लगभग 90 दिन बाद इस रोग के छोटे-छोटे धब्बे पत्तियों की निचली सतह या निचले भागों पर देखे जा सकते हैं, जो बाद में आकर में बढ़ते हैं तत्पश्चात दोनों सतह को पूरी तरह ढक लेते हैं।

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रोकथाम

  1. रोग ग्रसितपौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए।
  2. 3 की.ग्रा. सल्फेक्स1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करे।

मृदुरोमिल आसिता

इस रोग की पहचान पत्तियों की ऊपरी सतह पर हल्के हरे पीले निश्चित आकार के धब्बे पाए जाते हैं।

रोकथाम

  1. उचित फसल चक्र अपनाए
  2. एग्रोसीन जी.एन.- 0.2 प्रतिशत फफूंदनाशक के हिसाब से बीजोपचार करके बिजोद और निवेश द्रव्य नियंत्रित किया जा सकता है।

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अंगमारी या झुलसा

रोग का पहला लक्षण जलसिक्त के रूप में दिखाई देते हैं। ये धब्बे जल्दी ही भूरे रंग में बदल जाते हैं। रोगग्रस्त भाग से ऊपर पौधे स्वस्थ दिखाई देते हैं।

रोकथाम

  1. रोगी बीजों को उखाड़ कर जला दे।
  2. बीजो को थाइरम/केप्टान/बोनोमिल 0.02 प्रतिशत से उपचार करके ही बोये।

स्केलेरोशियम अंगमारी

पत्तिया धीरे-धीरे अपना रंग समाप्त करने लगती है। मुलायम शाखाएं गिरने से पौधा थोड़े दिनों में सूख जाता है। पौधों को जड़ सहित भूमि से निकाला जा सकता है।

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रोकथाम

  1. ग्रीष्म ऋतु में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए।
  2. अवशेषों को जला देना चाहिए।
  3. बीज को बोनोमिल 0.3% की दर से उपचारित करना चाहिए।

प्रस्तुति :-

आर. के. महावर, एस. एस. पुनिया,

नरेंद्र कुमार जैन,

मीनाक्षी धीर,

ए. के. रघुवंशी एवं एन. पी. सिंह

कृषि अनुसंधान केंद्र कोटा (राज)

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