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मसूर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मसूर की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

मसूर(Lentil) दलहनी वर्ग में सबसे प्राचीनतम फसलों में से एक है। मसूर मध्य एवं उत्तरी भारत के बरानी क्षेत्रों में आसानी से उगाई जा सकती है। यह फसल शुष्क एवं अर्ध शुष्क क्षेत्रों में मृदा क्षरण रोकने में सहायक है। इसका मुख्य प्रयोग दाल के रूप में किया जाता है।

मसूर की उन्नत खेती

इसकी खेती उत्तरप्रदेश , मध्यप्रदेश, बिहार और पश्चिमी बंगाल में बहुतायत में की जाती है। मसूर की खेती कम वर्षा और विपरीत परिस्थितियों वाली जलवायु में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। मसूर की फसल में रोग एवं कीटों का भी ही प्रकोप कम होता है।

मसूर की पैदावार में कमी के प्रमुख कारण

  1. प्रायः किसान सत एवं पुराने बीजो को काम में लेते है जिससे जमाव से लेकर बनने तक विभिन किस्म की बीमारयों का प्रकोप होने के कारण उत्पादन में कमी आती है।
  2. मसूर का कम उत्पादन के मुख्य कारण
  3. चयन की गई प्रजाति का क्षेत्र की परिस्थिति के अनुकूल न होना।
  4. उन्नत व उपयुक्त किस्मों के प्रचार-प्रसार का अभाव होना।
  5. उन्नत प्रजातियों का गुणवत्ता वाला बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना।
  6. असिंचित दशाओं में अंत: फसल प्रणाली की अपेक्षा एकल फसल प्रणाली को बढ़ावा देना।
  7. उर्वरकों का फसल में असंतुलित उपयोग।
  8. मुख्य रूप से असिंचित और शुष्क क्षत्रो में खेती करना।
  9. जैविक उर्वरकों मुख्यतः राइजोबियम व् फॉस्फेट सोल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया के प्रयोग को नजरअंदाज करना।

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मसूर की उन्नत किस्में

पिछले 15 वर्षों में भारतीय अनुसंधान संस्थान कानपुर एवं कृषि विश्वविद्यालय व अन्य शोध केंद्रों ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए मसूर की अनेक उन्नत प्रजातियों का विकास किया है। इनमे से अधिकांश प्रजातियां प्रमुख रोगों के प्रति अवरोधी है।

कुछ नवीनतम एवं उन्नतशील प्रजातियों का विवरण निम्न प्रकार से है।

एच.यू.एल.(H.U.L.) -57

इस किस्म के बीज छोटे होते है। इसे उत्तर पूर्वी मैदानी क्षेत्रों के लिए संस्तुत किया गया है। यह किस्म 121 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत पैदावार 14.0 क्वी./हे. है। यह किस्म रतुआ प्रति रोधी है।

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वी.एल.(V.L.) -507

यह किस्म बड़े दाने वाली है। इसे उत्तर पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अनुमोदित किया गया है। इसकी फसल अवधि 160-170 दिन है। यह किस्म उकटा रोग के प्रति प्रतिरोधी है। इसका औसत उत्पादन 12.4 क्वी./हे. है।

लेंस -4076 (शिवालिक)

इसे उत्तर-पश्चिमी के मैदानी क्षेत्रों व मध्य क्षेत्रों के लिए सिफारिश की गई है। इस प्रजाति की औसत उपज 16 क्वी./हे. व फसल पकने की अवधि 135 दिन है। तथा यह रतुआ रोग रोधी है। इसके 100 दानों का वजन 3.2 ग्राम है।

के.एस.एल.(K.S.L.)-218

इस किस्म के उत्तर पूर्वी मैदानी क्षेत्रों के लिए अनुमोदित किया गया है। यह किस्म छोटे दानों वाली है। इसके पकने की अवधि 120-125 दिन है। इस किस्म की औसत पैदावार लगभग 14 किवंटल पर हेक्टेयर है। यह किस्म उकटा रोग के प्रति प्रतिरोधी है।

डी.पी.एल.(D.P.L.) -15

इसे उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों के लिए संस्तुत किया गया है। इस किस्म की औसत उपज 15.5 क्विंटल पर हेक्टेयर है। यह 135 दिन में पककर तैयार होती है। यह प्रजाति बड़े दानों वाली है। यह रतुआ एवं उकटा रोग प्रतिरोधी है।

पूसा वैभव (L.-4147)

यह एक छोटे दानों वाली किस्म है। पूसा वैभव की औसत पैदावार 18 क्विंटल पर हेक्टेयर है। यह किस्म रतुआ रोग रोधी है। यह 134 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।

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जे.एल.(J.L.) -3

इसे मध्य क्षेत्र के लिए संस्तुत किया गया है। इसके पकने की अवधि 113 दिन है। यह प्रजाति बड़े दानों वाली है। यह उकठा रोग के प्रति रोगरोधी है। इसकी औसत पैदावार 14 क्विंटल पर् हेक्टेयर है।

आई पी एल. (I.P.L.) -81

इस प्रजाति को मध्य क्षेत्र के लिए अनुमोदित किया गया है। यह किस्म बड़े दानों वाली है। यह रतुआ और उकठा दोनों रोगो के प्रति रोगरोधी है। यह किस्म 113 दिन में पककर तैयार होती है।

डी.पी.एल.-62

यह बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म हैं। दानें बड़े आकार के होने के कारण बाजार में ज्यादा मांग हैं। इसकी औसत उत्पादकता १७. क्विंटल/हैक्टेयर हैं। यह प्रजाति रतुआ और उक्ठा रोग की प्रतिरोधी किस्म हैं।

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जे.एल.-1

बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए उपयोगी एवं उकठा अवरोधी हैं। स्थानीय प्रजातियों की तुलना में 42% अधिक उपज देने की क्षमता रखती हैं।

उपयुक्त मसूर की प्रजातियों के अलावा एच.यु.एल.-57, पी.एल.-406, जे.एल.-3, पी.एल.-4, पी.एल.-5, पंत.एल.-236, पंत.एल.-406, नरेंद्र मसूर-1, डी.पी.एल.-15, डी.पी.एल.-62 आदि नवीनतम प्रजातियां हैं।

जलवायु

मसूर की जलवायु के लिए ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती हैं। इसकी बुवाई रबी की फसल के रूप में सर्दियों में की जाती हैं। यह पाला तथा कम तापमान को भी सहन करने की क्षमता रखती हैं। इसको समुद्र तल से 300 मीटर की ऊंचाई तक आसानी से उगाया जा सकता हैं। अन्य दलहनी फसलों की अपेक्षा यह अत्यधिक वर्षा को भी सहन कर लेती हैं।

शुष्क व वर्षा आधारित क्षेत्रों में वर्षा ऋतू की संरक्षित नमी पर भी इसकी अधिक पैदावार ली जा सकती हैं।  वानस्पतिक वृद्धि के समय इसे कम तापमान की आवश्यकता होती हैं, जबकि पकने के समय अपेक्षाकृत अधिक तापमान की जरूरत होती हैं। इसकी वृद्धि के लिए उपयुक्त तापमान 20-30 डिग्री सेल्सियस हैं। गर्म आर्द्र क्षेत्रों में इसकी फसल अच्छी नहीं होती हैं। दाने भरने की अवस्था पर रात का कम तापमान उपयुक्त रहता हैं। बादल रहित चमकीली धुप से फसल की वृद्धि व उपज पर अनुकूल प्रभाव पड़ता हैं।

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भूमि का चुनाव

मसूर की खेती रेतीली दोमट मिटटी से लेकर गहरी काली मिट्टी तक सभी प्रकार की भूमियों में आसानी से की जा सकती हैं। मसूर की फसल को अच्छे जल निकास वाली मध्यम क्षारीय व लवणीय मृदाओं में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता हैं। जलभराव वाले क्षेत्रों में भी धान की कटाई के बाद मसूर को बोया जा सकता हैं क्योंकि ऐसी परिस्तिथि में कोई अन्य धान्य या दलहनी फसल आसानी से नहीं उगाई जा सकती हैं। अम्लीय मृदाएं मसूर की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।

 

खेत की तैयारी

सिंचित क्षेत्रों में मसूर की बुवाई के लिए पलेवा करके डिस्क हेरों व कल्टीवेटर से दो-तीन जुताइयाँ करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाये। जिससे मिट्टी भुरभुरी व चूर्णित हो जाये। बारानी क्षेत्रों में वर्षा ऋतू की नमी पर मसूर की बुवाई की जाती हैं।

इसके लिए खरीफ फसलों की कटाई के उपरांत मौका मिलते ही खेत की आरपार जुताई करके तुरंत पाटा लगाना चाहिए जिससे वर्षा ऋतू की पर्याप्त नमी संरक्षित की जा सके।

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पिछले फसल के अवशेषों व खरपतवारों के डंठलों को नष्ट कर दे। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त  नमी होनी चाहिए जिससे बीजों का जमाव शीघ्र व एक समान रूप से हो सके। बुवाई के समय मसूर की फसल से भरपूर पैदावार लेने हेतु बुवाई सही समय पर करना अति आवश्यक हैं।

मसूर की बुवाई के लिए उपयुक्त समय अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से लेकर नवम्बर का प्रथम सप्ताह हैं। यद्ध्यपि 15 नवम्बर तक इसकी बुवाई की जा सकती हैं। मसूर की बुवाई 15 नवम्बर के बाद करने पर उपज में भारी गिरावट आ जाती हैं।

बारानी क्षेत्रों में मसूर की बुवाई अक्टूबर के पखवाड़े में अवश्य कर देनी चाहिए। अगेती बुवाई से फसल वानस्पतिक वृद्धि अधिक हो जाती हैं। परन्तु इसका दानें की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।

देर से बुवाई करने पर पौधों की वृद्धि कम होती हैं। साथ ही पौधों में कम शाखाएं निकलती हैं। अतः जहां तक हो सके, बुवाई समय पर करनी चाहिए।

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बीज

समय से बुवाई हेतु मसूर की छोटे दाने वाली किस्मों का 25-30 किग्रा. और बड़े दानों वाली किस्मों के लिए 35-40 किग्रा. बीज प्रति हेक्टयर काफी होता है।

बारानी क्षेत्रों में देर से बुवाई के लिए 50-60 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। मसूर को मिश्रित फसल के रूप में बोने के लिए बीज की मात्रा आधी कर देनी चाहिए।

बीज उपचार

मसूर की फसल को भूमि व बीज जनित बीमारियों से बचाव करने के लिए फफूंदनाशी रसायन जैसे – बिनोमाइल 0.3% अथवा 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।

दीमक

जिन क्षेत्रों में दीमक का प्रकोप हो वहा पर बीजों को क्लोरोपायरीफास 20 ई. सी. 800 एम.एल. दवाई प्रति क्विंटल बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिए।

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कल्चर का प्रयोग

इस बात का ध्यान रखें जिस खेत में पहली बार मसूर बोई जा रही हो तो राइजोबियम जीवाणु से उपचारित करना अति आवश्यक है। इसके लिए राइजोबियम जीवाणु की अति विशिष्ट किस्म को ही प्रयोग में लेना चाहिए।

इससे फसल द्वारा वायुमंडलीय नाइट्रोजन यौगिकीकरण प्रक्रिया पर अच्छा प्रभाव पड़ता है जो फसल उत्पादन बढ़ाने में सहायक है। एक हेक्टेयर क्षेत्र में में बुवाई करने हेतु राइजोबियम जीवाणु के दो पैकेट पर्याप्त होते है।

इसके अलावा फास्फेट सोलुबिलाइजिंग बैक्टीरिया द्वारा बीजोपचार से मृदा में उपलब्ध फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलती है।

बुवाई की विधि

मसूर की बुवाई लाइनों में हल या सीडड्रिल की सहायता से करनी चाहिए। बुवाई की छिटकवां विधि काफी प्रचलित है परन्तु बेहतर पैदावार के लिए यह विधि सबसे नुकसानदायक है।

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मसूर के लिए पंक्ति से पंक्ति की दुरी 25-30 से.मी. व पौधे से पौधे की दुरी 1-2 से.मी. रखनी चाहिए। बीज को 3-4 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिए। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

मसूर की फसल के लिए 8-10 टन अच्छी पक्की हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत तैयार करते समय सामान मात्रा में डालना चाहिए। 20 किग्रा. नाइट्रोजन, 50 किग्रा. फॉस्फोरस तथा 30-40 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। जिंक की कमी वाले क्षेत्रों में 25 किग्रा. जिंक सल्फेट एवं सल्फर की कमी वाले क्षेत्रों में 30 किग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।

वैसे मृदा परीक्षण के आधार पर खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए।

सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे आयरन, जस्ता एवं बोरोन की कमी को दूर करने के उपाय भी करने चाहिए।

जस्ते की कमी दूर करने के लिए  0.5% जिंक सल्फेट + 0.25% चुने के घोल का छिड़काव कड़ी फसल में करना चाहिए।

सिंचाई

सामन्यतया मसूर की खेती असिंचित क्षेत्रों में की जाती है परन्तु इसकी भरपूर पैदावार हेतु इसमें एक या दो सिंचाई की जरुरत होती है।

पहली सिंचाई बुवाई के 40-45 दिन बाद (फूल बनाने से पूर्व) तथा दूसरी सिंचाई बुवाई के 70-80 दिन बाद (फलियां बनने पर) करनी चाहिए। इससे फसल में उकटा बीमारी आने की संभावना बहुत कम हो जाती है। यदि एक ही सिंचाई की व्यवस्था हो तो 60-65 दिनों बाद करनी चाहिए।

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खरपतवार नियंत्रण

फसल की बुवाई के 25-30 दिन बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। इससे भूमि वायु संचार भी अच्छा होता है साथ ही  भूमि में नमी लम्बे समय तक बनी रहती है।

खरपतवारों के प्रभावी नियंत्रण के लिए पेंडी मेथालिन (30 ई.सी.) का 1.25 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से 600-700 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व छिड़काव करें।

कटाई एवं मढ़ाई

जब 70-80% फलियां भूरे रंग की हो जाए और पौधा पीला पड़ जाए तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। देर से कटाई करने पर फलियों से दानें छिटकने का अंदेशा रहता हैं। कटाई उपरांत फसल को खलिहान में 3-4 दिनों तक अच्छी तरह सूखा लेना चाहिए। ऐसा करने से फलियों से दानें आसानी से अलग हो जाते हैं। भंडारण करने से पूर्व दानों को अच्छी तरह सूखा लेना चाहिए। जिससे दानों में नमी की मात्रा 10-12% के बिच बनी रहें। इससे दानों में कीटों के संक्रमण की कम संभावना रहती हैं। इस तरह नवीनतम सस्य तकनीक अपनायी जाए तो मसूर की फसल को 20-22 क्विंटल/हैक्टेयर दाना उपज की जा सकती हैं। साथ ही 30-35 क्विंटल/हैक्टेयर तक सूखा भूसा भी प्राप्त हो जाता हैं।

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