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मशरूम की खेती एवं अत्याधुनिक उत्पादन विधियां

मशरूम की खेती
Written by bheru lal gaderi

हमारे देश में कृषि पर आधारित उद्यम के रूप में मशरूम(Mushroom farming) की खेती का व्यवसाय बड़े पैमाने पर उभर कर आ रहा है। युवक इसे तेजी से अपना रहे है क्योंकि इसमें अधिक आमदनी है और इसे रोजगार भी मिल रहा है। स्टार्टअप एवं नवीन लघु उद्योग के रूप में इसकी पहचान बढ़ रही है।

मशरूम की खेती

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वर्षा ऋतु में जंगलों, चरागाहों एवं खेतों में ये काफी मात्रा में निकलते है उनमे कुछ खाने योग्य एवं कुछ जहरीले होते है .खाने वाले मशरूम (Mushroom)को लोग इक्क्ठा करे स्वयं खाते है या बेच देते है। इनमें से खाने वाले मशरूम की वैज्ञानिकों ने पहचान की है और उनकी खेती करने के तरीकों को खोजा है।

बटन मशरूम (button mushroom)

बटन मशरूम सर्वाधिक लोकप्रिय एवं स्वादिष्ट मशरूम है। इसमें भी पौष्टिक तत्व अन्य मशरूम की तरह ही है। इस मशरूम का उत्पादन सर्दियों में ही किया जा सकता है। तापमान 20 से कम एवं 70% से अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है। बटन मशरूम की खेती एक विशेष प्रकार की खाद पर ही की जा सकती है जिसे कम्पोस्ट कहते है।

मशरूम की खेती

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कम्पोस्ट दो प्रकार से तैयार की जा सकती है।

  1. लम्बी विधि द्वारा

  2. अलप विधि द्वारा

लम्बी विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करना

इस विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने के लिए किसी विशेष मूल्यवान मशीनरी की आवश्यकता नहीं पड़ती है। कम्पोस्ट बनाने के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री काम में ली जा सकती है।

कम्पोस्ट बनाने के विभिन्न सूत्र

सूत्र – 1

गेहूं/चावल का भूसा- 1000 किलोग्राम, अमोनियम सल्फेट/कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट- 27 किलोग्राम, सुपरफास्फेट- 10 किलोग्राम, यूरिया-17 किलोग्राम, गेहूं का चौकर-100 किलोग्राम, जिप्सम-36 किलोग्राम।

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सूत्र – 2

गेहूं/चावल का भूसा- 1000 किलोग्राम, गेहूं का चापड़- 100 किलोग्राम, सुपर फास्फेट- 10 किलोग्राम, केल्सियम अमोनियम नाइट्रेट सल्फेट(206%)-28 किलोग्राम, जिप्सम- 100 किलोग्राम, यूरिया(46% नाइट्रोजन)- 12 किलोग्राम, सल्फेट या न्यूरेट ऑफ पोटाश-10 किलोग्राम, नेमागान(60%)- 135 मिली लीटर, निलसेस-175 लीटर।

सूत्र – 3

गेहूं/चावल का भूसा- (1:1)1000 किलोग्राम, केल्सियम अमोनियम नाइट्रेट -30 किलोग्राम, यूरिया-132 किलोग्राम,  गेहूं का चौकर-50 किलोग्राम,  जिप्सम- 35 किलोग्राम, लिण्डेन(10%)-1 किलोग्राम, फार्मलीन-2 लीटर।

उपरोक्त सूत्रों के अलावा राजस्थान के वता वर्ण अनुसार उपयुक्त सूत्र निम्न है :-

गेहूं का भूसा 1000 किलोग्राम, गेहूं का चापड़- 200 किलोग्राम, यूरिया- 20 किलो, जिप्सम- 35 किलो, लिण्डेन- 1 किग्रा., फार्मलीन- 2 लीटर।

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अल्प विधि द्वारा

सूत्र क्रमांक-1

गेहू/चावल का भूसा-1000 किलोग्राम, गेहू का चोकर-50 किलोग्राम, मुर्गी की खाद-40 किलोग्राम, यूरिया-185 किलोग्राम, जिप्सम-67 किलोग्राम, लिंडन डस्ट-1 किलोग्राम।

सूत्र क्रमांक-2

गेहू/चावल का भूसा-1000 किलोग्राम, चावल का चोकर-68 किलोग्राम, मुर्गी की खाद-400 किलोग्राम, यूरिया-20 किलोग्राम, जिप्सम-64 किलोग्राम, कपास के बीज का चोकर-17 किलोग्राम।

सूत्र क्रमांक-3

गेहू/चावल का भूसा-1000 किलोग्राम, मुर्गी की खाद-400 किलोग्राम, यूरिया-14, किलोग्राम, जिप्सम-30 किलोग्राम, ब्रूवर के दानें-72 किलोग्राम।

दीर्घ विधि से कम्पोस्ट तैयार करने की विधि:-

इस विधि द्वारा कम्पोस्ट को कम्पोस्टिंग शेड में ही तैयार किया जाता हैं। इस विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने में करीब २८ दिन लगते हैं। इसमें प्राप्त कम्पोस्ट की उपज लघु विधि द्वारा तैयार कम्पोस्ट से अपेक्षाकृत कम मिलती हैं सबसे पहले समतल एवं साफ फर्श पर भूसे को दो दिन तक पानी डालकर गीला किया जाता हैं।

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इस गीले भूसे में जिप्सम के अलावा सारी सामग्री मिलाकर उसे थोड़ा और गिला करें। यह बात ध्यान में रखें की पानी उसमे से बहकर बाहर ही निकलें एवं लकड़ी को चौकोर बोर्ड की सहायता से 1 मीटर चौड़ा एवं 3 मीटर लम्बा (लम्बी कम्पोस्ट बोरस की मात्रा के अनुसार) और करीब 1.5 मीटर ऊँचा चौकोर ढेर बना लें। चार पांच घण्टे बाद लकड़ी के बोर्ड को तोड़कर वापस चौकोर ढेर को दो दिन तक ऐसे ही पड़ा रखें। दो दिन बाद ढेर को तोड़कर वापस चौकोर ढेर बना लें एवं ध्यान रखें की ढेर का अंदर का हिस्सा बाहर व बाहर का हिस्सा अंदर आ जाये।

इस तरह से ढेर को दो दिन के अंतराल पर तीसरे दिन पलटाई करते जाये एवं तीसरी पलटाई पर जिप्सम की पूरी मात्रा मिला दें। पानी की मात्रा यदि कम हो तो उस पर पानी छिड़क दे एवं चौकोर ढेर बना लें। पलटै करने का विवरण सरणी में दिया गया हैं।

पाईप विधि यह विधि दीर्घ कम्पोस्टिंग विधि में लगने वाले समय को कम करने के लिए हैं। इस विधि द्वारा 19-20 दिन में कम्पोस्ट तैयार हो जाती हैं। इसमें कुल 12पाइप, 4 फ़ीट आकार के जिनमे चारों और 1 इंच व्यास के छेद किये जाते हैं की आवश्यकता होती हैं।

कम्पोस्ट की शुरूआती 3 पलटाई तक विधि लम्बी विधि जैसी हैं। तीसरी पलटाई के बाद कम्पोस्ट को एक लोहे के फ्रेम के आकार में भरते समय निचे से एक फ़ीट की ऊंचाई के अंतराल में एक-एक पाईप लगाते हैं। इन्हे एक फ्रेम की सहायता से व्यवस्थित किया जाता हैं। यदि 2 टन का कम्पोस्ट बनाना हैं तो पाईप को व्यवस्थित रखने के लिए 4 फ्रेम की आवश्यकता पड़ती हैं।

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इस विधि में तीसरी पलटाई के बाद हर पलटाई 4 दिन बाद की जाती हैं। लगभग 2-3 पलटाई उपरांत कम्पोस्ट तैयार हो जाता हैं। यदि अमोनिया की गन्ध हो तो एक पलटाई और की जाती हैं। इस पुरे कम्पोस्ट को 100 गेज की पॉलीथिन शिट से ढकना आवश्यक हैं एवं इस शीट में बड़े छेद कर दें ताकि हवा का आवागमन बना रहें।

लघु विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करना

इस विधि से तैयार किया गया कम्पोस्ट दीर्घ विधि से तैयार किये गए कम्पोस्ट से अच्छा होता हैं इस पर मशरूम की उपज भी ज्यादा मिलती हैं एवं कम्पोस्ट तैयार करने में समय कम लगता हैं। परन्तु साथ ही इस विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने में लागत भी ज्यादा आती हैं और कुछ यंत्रों की आवश्यकता होती हैं जैसे कम्पोस्ट शेड, बल्क पाश्चुराइजेशन कमरा या टनल, पीक हीटिंग कमरा इत्यादि।

कम्पोस्ट यार्ड

एक मध्यम आकर के मशरूम फार्म के लिए 100′ लम्बाई एवं 40′ चौड़ाई वाला शेड ठीक रहता है। कम्पोस्ट यार्ड का फर्श सीमेंट का बना होना चाहिए साथ ही पानी को निचे इक्क्ठा करने के लिए गुड्डी पिट होना चाहिए। ऊपर सीमेंट की चादर या टिन शेड लगन चाहिए।

बल्क पाश्चुराइजेशन कमरा या टनल इसकी दीवारें  इंसुलेटेड होती है एवं इसमें दो फर्श होते है। पहले फर्श में 2% का ढलान दिया जाता है। इसके ऊपर लकड़ी या लोहे की जाली लगी होती है जिसके ऊपर कम्पोस्ट को रखा जाता है।

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करीब 25-30% फर्श को खुला रखा जाता है जिससे भाप व् हवा का आवागमन अच्छी तरह से हो पाये। कमरे का आकार कम्पोस्ट की मात्रा पर निर्भर करता है। करीब 20-22 टन कम्पोस्ट बनाने के लिए 36′ लम्बाई, 10 फिट चौड़ाई  फिट फर्श की ऊंचाई आकार के इंसुलेटेड कमरे की आवश्यकता होती है।

इसके अलावा हमें 150 किलोग्राम/घंटा की दर से भाप बनाने वाले बायलर की आवश्यकता होती है। इसके अलावा 1450 आर.पी.एम. दबाव 100-110 मिली लीटर एवं 150-200 घनमीटर हवा प्रति घंटा प्रति ब्लेअर की आवश्यकता होती है।

जहां पर ढलान दिया जाता है वहां पर भाप एवं हवा के पाइप खुलते है जो की ब्लोअर से जुड़े रहते है। ब्लोअर , प्लेनम के नीचे लगा रहता है एवं भूमिगत कमरे में रहते है। तजा हवा, डम्पर्स की सहायता से पुनः सर्कुलेशन डक्ट से कम्पोस्ट की कंडीशनिंग की जाती है।

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पाश्चुराइजेशन कक्ष में दो वेंटिलेटर ओपनिंग होती है एक अमोनियम रिसर्कुलेशन एवं अन्य गैसों के लिए एवं दूसरी तजा हवा के लिए। टनल के दोनों तरफ दरवाजे होते है एक और से कम्पोस्ट डाला जाता है और दूसरी ओर से निकाला जाता है।

उच्च तापीय कक्ष

यह सामान्य इन्सुलेटेड कक्ष होता हैं जिसमे भाप की नलियां एवं हवा के आगमन के लिए पंखा लगा होता हैं। 24 फ़ीट लम्बाई एवं 6 फ़ीट चौड़ाई 8 फ़ीट छत की ऊंचाई का कमरा 250 ट्रे को रखने के लिए ठीक रहता हैं।

इस कक्ष का उपयोग केसिंग सामग्री को निर्जीवीकरण के लिए काम में लेते हैं।

इस विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने के लिए गेहूं/चावल का भूसा, मुर्गी की खाद बाला सूत्र काम में लिया जाता हैं।

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प्रथम चरण

दीर्घ अवधि की तरह ही कम्पोस्ट बनाने के लिए भूसे को दिन तक गीला किया जाता हैं। तीसरी पलटाई तक वैसे ही पलटाई की जाती हैं जैसे दीर्घ अवधि में की जाती हैं। चौकोर ढेर बनाया जाता हैं एवं मध्य भाग में तापमान 70-80 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता हैं एवं बाहरी हिस्से में तापमान 50-60 डिग्री सेल्सियस होता हैं।

द्वितीय चरण

द्वितीय चरण में कम्पोस्ट को टनल में डाल दिया जाता हैं एवं तापमान स्वतः ही  (6-8 घंटे में) 57 डिग्री सेल्सियस हो जाता हैं। धीरे-धीरे इनका तापमान 50 से 45 डिग्री सेल्सियस तक घटाकर ताजा हवा अंदर डालकर एवं एक्जास्ट से गर्म हवा को बाहर निकालकर किया जाता हैं।

तृतीय चरण

बहुत सारे तापमापी अलग-अलग जगह पर टनल में लगा दिये जाते हैं। जिससे की टनल के अंदर का तापमान देखा जा सकें। एक तापमापी को प्लेनम में रखा जाता हैं एवं 2-3 तापमापी को कम्पोस्ट ढेर में रखा जाता हैं। दो तापमापियों को कम्पोस्ट ढेर के ऊपर रखा जाता हैं। दरवाजें को बन्द करके, ब्लोअर के पंखे को चालू करने से कम्पोस्ट का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस आ जाता हैं।

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यह ध्यान में रखना चाहिये की टनल के अंदर ही हवा के तापमान का अंतर 3 डिग्री सेल्सियस से अधिक न हो,जैसे ही कम्पोस्ट का तापमान 45 डिग्री हो, ताजा हवा रोक देनी चाहिये। धीरे-धीरे स्वतः ही तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस प्रति घंटा की दर से बढ़ने लगता हैं एवं 57 डिग्री सेल्सियस हो (10-12 घंटे में) तापमान मिल जाता हैं। इस तापमान पर कम्पोस्ट को 6-8 घंटे रखा जाता हैं ताकि उसका पाश्चुरीकरण अच्छी तरह से हो सकें। ताजा हवा के प्रवाह के लिए डक्ट को खोल देते हैं (लगभग 10%) इस प्रकार कम्पोस्ट के पाश्चुरीकरण के बाद उसकी कंडीशनिंग की जाती हैं।

कम्पोस्ट की कंडीशनिंग

उपरोक्त पाश्चुरीकरण कम्पोस्ट में कुछ ताजा हवा देने से इस भाप की सप्लाई बंद करके उसका तापमान 4 डिग्री  सेल्सियस तक लाया जाता हैं इस तापमान पर आने में लगभग तीन दिन का समय लगता हैं एवं अमोनिया की मात्रा 10 पी.पी.एम. से कम हो जाती हैं। इस कंडीशनिंग के बाद कम्पोस्ट को 25 डिग्री सेल्सियस से 28 डिग्री सेल्सियस तक ठण्डा किया जाता हैं। और इसके लिए ताजा हवा के प्रवाह का उपयोग किया जाता हैं।

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इस प्रकार पूरी प्रक्रिया में 7-8 दिन लगते हैं पास्चुरीकरण एवं कंडीशनिंग के समय 25-30% कम्पोस्ट का वजन कम हो जाता हैं यदि हम 20 टन कम्पोस्ट बनाना चाहते हैं तो हमे लगभग 28 टन कम्पोस्ट टनल में भरना चाहिये। जिसके लिए 12 टन कच्चे माल की आवश्यकता होगी। यानि कुल कच्चे माल का 2 से 2.5 गुना कम्पोस्ट अंत में प्राप्त होता हैं।

अच्छे कम्पोस्ट की पहचान

कम्पोस्ट बनने के बाद हमे कुछ बाते ध्यान में रखनी चाहिये जैसे की कम्पोस्ट का रंग गहरा भूरा होना चाहिये, यह हाथ पर चिपकना नहीं चाहिये, इसमें से अच्छी खुशबु आती हो, अमोनिया की गनध नहीं हो, नमी की मात्रा 68-72% एवं पी.एच. 7.2-7.8 होना चाहिये। यह भी ध्यान रखना चाहिये की उसमे किसी प्रकार के कीड़े, निमेटोड एवं दूसरी फफूंद न हो। यह पहचान लम्बी विधि द्वारा बनाये बिजाई कम्पोस्ट पर भी लागु होती हैं।

बिजाई (स्पानिंग)

मशरूम का बीज ताजा, पूरी बढ़वार लिए एवं अन्य फफूंद से मुक्त होना चाहिये। कई लोग 1.5 किलो बीज भी उपयोग में लेते हैं। परन्तु यह कम्पोस्ट का तापमान बढ़ा देता हैं। बीज की मात्रा 1 क्विंटल कम्पोस्ट में 750 ग्राम से 1 किलोग्राम के आसपास होनी चाहिये। इस बीज/स्पॉन को कम्पोस्ट में अच्छी तरह मिलाकर उसे या तो पॉलीथिन की थैलियों (12 इंच) या पॉलीथिन शीट (6-8 इंच) पर शेल्फ में भर देना चाहिये।

पॉलीथिन की थैलियों को ऊपर से मोड़कर बंद कर देना चाहिये जबकि शेल्फ पर अकबार ढक देना चाहिये। थैलियां 8 किलो कम्पोस्ट भरने के लिए उपयुक्त हो, इससे उत्पादन 10 किलो कम्पोस्ट के बराबर मिलता हैं।

इस समय का तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से कम एवं नमी 70% रखनी चाहिये। करीब 15 दिन बाद उसके अंदर स्पॉन रन पूरा हो जाता हैं और इसके बाद केसिंग की आवश्यकता होती हैं।

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केसिंग

जैसे ही स्पॉन रन पूरा हो जाता हैं उसके बाद केसिंग मिट्टी के लिए उपयुक्त मिश्रण इस प्रकार हैं:

  1. बगीचे की खाद (एफ.वाई.एम.)+दोमट मिट्टी- 1:1
  2. एफ.वाई.एम.+ दो साल पुरानी बटन मशरूम की खाद-1:1
  3. एफ.वाई.एम.+ दोमट मिट्टी+रेती+2 साल पुरानी बटन मशरूम की खाद- 1:1:1:1

उपरोक्त किसी भी एक मिश्रण को लेवें परन्तु मिश्रण-२ सर्वाधिक उपयुक्त एवं अधिक उपज देने वाला हैं। एवं 8 घंटे तक पानी में भिगोना चाहिये। करीब 8 घंटे के बाद पानी से निकलकर सूखा कर केसिंग मिट्टी का निर्जीवीकरण, फार्मलीन के 6% घोल से करना चाहिये एवं उसे 48 घंटे बंद रखना चाहिये।

इसके बाद इसे खोलकर 24 घंटे फैलाकर रखें ताकि मिश्रण सुख जाए और स्पॉन राण कंपसट पर 1 इंच मोटी परत लगानी चाहिए एवं पानी इस तरह छिड़के की केवल केसिंग ही गीली हो। कमरे का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से कम होना चाहिए एवं नमी 70-90% के बिच होनी चाहिए साथ ही हवा का आवागमन होना चाहिए।

केसिंग मिश्रण की पानी सोखने की क्षमता 75% के आसपास, पी. एच. 7.7-7.8 केसिंग मिट्ठी का धनत्व 0.75-0.80 ग्राम/मिलीलीटर तथा पोरोसिटी व इ.सी. कम होनी चाहिए।

केसिंग करने के लगभग 10-12 दिन पश्चात् इसमें छोटे-छोटे मशरूम के अंकुरण बनने शुरू हो जाते है। इस समय केसिंग पर 0.3% केल्सियम क्लोराइड का छिड़काव दिन एक बार पानी के साथ जरूर करना चाहिए और इसको मशरूम तोड़ने तक बराबर करते रहना चाहिए।

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जो अगले 5-7 दिनों में बढ़कर पूरा आकर ले लेते है। इन्हे घुमाकर तोड़ लेना चाहिए, तोड़ने के बाद निचे की मिट्ठी लगे तने के भाग को चाकू  से काट देना चाहिए एवं आकर के अनुसार छांट लेना चाहिए।

एक बार केसिंग में लगाने के बाद करीब 80 दिन तक फसल प्राप्त होती रहती है। कुल उपज 1 क्विंटल कम्पोस्ट पर 15-18 किलो के लगभग प्राप्त होती है। जब कम्पोस्ट लघु विधि से बनाया गया हो तो उपज 20-25 किलोग्राम तक प्राप्त होती है।

एक किलो मशरूम उत्पादन की लागत 20-22 रूपये के बीच आती है एवं बाजार में इसका मूल्य 120-125 रूपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाता है।

ढिंगरी मशरूम (Oyster Mushroom)

ढिंगरी मशरूम का उत्पादन करना लाभदायक रहता है, क्योंकि यह एक नगदी फसल है जिसे अलप अवधि में उगाया जा सकता है। यह सालभर उपज देने वाली फसल है।

मशरूम की खेती

इसकी खेती को अलप अवधि प्रक्षिक्षण (शॉर्टटर्म ट्रेंनिग ) से आसानी से प्रारम्भ किया जा सकता है। इसमें अधिक महंगे उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती है। इसका प्रक्षिक्षण उदयपुर स्थित केंद्र पर कभी भी लिया जासकता है।

इसमें काम आने वाली सामग्री में गेहूं या चावल का भूसा, मशरूम के बीज(स्पॉन), पॉलीथिन की ठेलिया, रबर बेंड, लकड़ी या लोहे की बनी रैके, पॉलीथिन की शीट(10×5) एवं सिंचाई के लिए फुट स्प्रेयर पम्प या बैटरी चलित स्प्रेयर की आवश्यकता होती है। उपरोक्त सभी सामग्री किसान आसानी से जुटा कर इसकी खेती प्रारम्भ कर सकता है।

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यदि 1000 किलोग्राम सूखा भूसा लेते है तो 700-900 किलो ताजा मशरूम प्राप्त होती है जो बाजार में 100 रूपये प्रति किलो के हिसाब से आसानी से बेच सकते है।

यदि मशरूम को ताजा अवस्था में नहीं बेचा जा सके तो इसे सूखा कर 900 रूपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से भी बेच सकते है।

यदि 15X15 का कमरा या झोपड़ी हो तो 3000 रूपये प्रति माह अतिरिक्त आमदनी प्राप्त की सकती है।

ढिंगरी मशरूम के उत्पादन कक्षों एवं रैकों का निर्माण करना

उत्पादन कक्ष

कच्चा घर/ बांस की झोपड़ी

इसमें बांस, सरकंडे, धान की पुआल.बाजरे/ज्वार आदि स्थानीय घास से झोपड़ी बनाई जाती है। इन झोपड़ियों का का आकर 18-20×10-12 मीटर तथा ऊंचाई 3.5-4.0 मीटर रखनी चाहिए। उत्पादन कक्ष हवादार तथा रोशनी युक्त होना चाहिए। हवा के लिए पूर्व व् पश्चिम में रोशनदान, एवं खिड़किया एवं दरवाजे उत्तर-दक्षिण में होनी चाहिए।

झोपड़ी के अंदर के ढांचे या बांस की रैक बनाने चाहिए जिन पर मशरूम के बीज मिले पॉलीथिन बैग्स रखे जाते है। वर्षा पूर्व झोपड़ी की छत पर पॉलीथिन की चादर से धक देते है ताकि बरसात में पानी  अंदर न आये।

उत्पादन कक्ष में रैकों का निर्माण करना

मशरूम का अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए रैकों का बनाना बहुत जरुरी है क्योंकि इनमे हम ४-५ गुना अधिक मशरूम का उत्पादन कर सकते है। इसके लिए सबसे पहले हमें ढांचा बनाना होगा।

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ढांचा बांस की बल्लियों से तैयार किया जा सकता है। ढांचों की चौड़ाई 3 फिट तथा ऊंचाई 7 फिट रखनी चाहिए। इसके बीच 4-5  रैक बनाई जा सकती है। सबसे पहले निचे से 6-7

इंच ऊपर एवं एवं दूसरी, तीसरी,चौथी, पांचवी की बीच 1.5 फिट की दुरी रखनी चाहिए। ढांचे में रेके प्लास्टिक की डोरी, निवार से बुनी होनी चाहिए। जिस पर पस्टिक थैलियां राखी जा सके।

मशरूम उत्पादन के लिए सामग्री

विधि एवं देखभाल

मशरूम उत्पादन के लिए सामग्री

  1. गेहूं या चावल का भूसा जो ताजा फसल से लिया हुआ ही उपयोग में लिया जाता है।
  2. भूसा बारिश में भीगा हुआ एवं पुराण नहीं होना चाहिए वर्ण फसल को नुकसान होने की संभावना रहती है।
  3. भूसा साफ और शुद्ध होना चाहिए अर्थात उसमे मिट्टी या दूसरी फसल/खरपतवार के अवशेष/बीज नहीं होना चाहिए। भूसे के टुकड़ो की लम्बाई 1-5 इंच होनी चाहिए।
  4. प्लास्टिक का ड्रम ढक्क्न वाला एवं 200 लीटर क्षमता का होना चाहिए।
  5. पॉलीथिन की शीट 8-10 फिट लम्बी तथा 4-5 फिट छोड़ी होनी चाहिए एवं बिजाई किए हुए भूसे को भरने के लिए पॉलीथिन की थेलिया (साइज 24×18”) रबर बेंड,बीज तोलने के लिए तुला।
  6. अच्छी उपज हेतु शुद्ध बीज/स्पॉन पम्प एवं बाल्टी इत्यादि।

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भूसे का उपचार

भूसे में उपस्थित अवांछित फफूंद के बीजाणु, कीटाणु, जीवाणु इत्यादि को अलग करने के लिए इसे गर्म पानी से उपचारित किया जाता है।

फफूंदनाशी एवं कीटनाशी से उपचार

इसमें 200 लीटर के ड्रम में  पहलेसूखा भूसा भर दे .फिर उसमे पानी डेल और आधा भर जाने के बाद 10 लीटर पानी की बाल्टी में 300 मि.ली. फार्मलीन+7.5 बाविस्टिन एवं 30 मि.ली. नुवान अच्छी तरह से मिलाकर दाल दे। तत्पश्चात ड्रम को पूरा पानी से भर दे।  इसके बाद ढक्क्न को अच्छी तरह सर टाइट बंद कर दे।  24 घंटे रखने के बाद पूर्व की तरह साफ पॉलीथिन की शिट पर इस भूसे को निकल दे और अतिरक्त पानी निकल जाने के बाद पूर्ववत विधि से भूसा बिजाई के लिए उपयुक्त है।

गेहूं के भूसे में नमी की मात्रा पता लगाना

सफल मशरूम उत्पादन के लिए भूसे में नमी की मात्रा उचित होना अनिवार्य है क्योंकि यदि नमी अधिक होगी तो भूसा एवं मशरूम स्पॉन सड़ जायेगा एवं कवक जाल ठीक से नहीं फैलेगा।

अतः नमी की उचित मात्रा का पता करने के लिए भूसे को हाथ में ले कर दबाये तो यदि उसमे से पानी की बुँदे गिरने लगे तो समझना  चाहिए की इसमें पानी की मात्रा ज्यादा है। पर यदि भूसे को हाथ से दबाने पर पानी न निकले और केवल हाथ गिला रह जाए तो यह भूसे में पानी/नमी की उचित मात्रा होगी। यह मात्रा लगभग 60-62% नमी की होगी।

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बीजाई करना

भूसे में नमी की मात्रा को उचित रखते हुए बीजाई का कार्य किया जाता है। जिस स्थान पर बुवाई करनी हो वहां अच्छी तरह से साफ-सफाई कर लेनी चाहिए। इसके लिए वहां 48 घंटे पहले 6% फार्मलीन से छिड़काव कर देना चाहिए एवं उस जगह को 48 घंटे तक बंद रखना चाहिए।

एक लम्बी पॉलीथिन शीट जिसकी लम्बाई 8-10 फिट हो, को बिछा देना चाहिए। उपचारित किया भूसा इसी शीट पर डालना चाहिए।

बीज की दर

बीज की दर वातावरण के तापक्रम पर निर्भर करती है। यदि तापमान 25 से. से कम हो तो बीज की दर 3% गीले भूसे के वजन के अनुसार काम में ले और तापमान 30 से. या अधिक हो तो बीज दर % गीले भूसे के वजन के हिसाब से 2.5% रखनी चाहिए।

भूसे में बीज मिलाने का तरीका

सब पहले भूसे को तोलकर पॉलीथिन शीट पर डालते है फिर उसके वजन के हिसाब से बीज तोलकर उसमे अच्छी तरह से मिलाते है। फिर 100-125 गेज की मोटी पॉलीथिन की थैलियों (24×18″) में भर देते है।

परतदार विधि

इस विधि में बीज पार्ट के रूप में मिलाते है। जब भूसे को थैलियों में भरना हो तो बीज की पहली परत 4 इंच पर, दूसरी 8 इंच पर तथा तीसरी परत 12 इंच पर बीज को हाथ से फैलाकर कर डालते है। सबसे ऊपर भूसे को थैलियों में दबा कर भरना चाहिए।

बिजाई के बाद थैलियों के मुँह को ऊपर रबर बेंड से बंद कर लकड़ी की बनाई गई रेकों पर रखना चाहिए।

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फसल की देखभाल

  1. जिस कमरे में बैग्स रखे जाते है, वहां का तापमान 25+2 से. से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इसके लिए कमरे में हवा का आवागमन ठीक होना चाहिए। तापमान अधिक हो तो कमरे की दीवारे गीली कर देनी चाहिए। आद्रता/नमी की उचित मात्रा बनाने के लिए कमरे में फोगर लगाने चाहिए।
  2. उत्पादन कक्ष में रोशनी ठीक होनी चाहिए।
  3. यदि उत्पादन कक्ष का फर्श कच्चा हो तो नमी अधिक रहेगी इससे उत्पादन में वृद्धि होगी।
  4. प्रति दिन उत्पादन कक्ष का निरिक्षण अनिवार्य है क्योंकि जब बीज बढ़वार हो रहो हो तो यह ध्यान रखने वाली बात है की पॉलीथिन बेग्स में दूसरी कोई फफूंदी जैसे काली, हरी तो नहीं आगई है। दूसरी फफूंदी का धब्बा नजर आते ही उस बह को बाहर कर अन्य फफूंद को हटाना चाहिए।
  5. यदि उत्पादन कक्ष में मक्खी या मछर दिखाई दे तो लाइट ट्रैप या पीले ग्रीस लगे कागज रखने चाहिए।
  6. उत्पादन कक्ष में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखे। कुल मिलाकर उचित नमी, स्वछ वायु, साफ-सफाई रखते हुए अधिक उत्पादन प्राप्त कर कर सकते है।
  7. बुवाई के 15-20 दिनों के बाद ढिंगरी मशरूम के बीज से कवक जाल पॉलीथिन बैग्स के अंदर सारे भूसे में अच्छी तरह फैल जायेगा तब हल्के हाथ से पॉलीथिन बेग को उल्टा कर लेते है। इस प्रकार पॉलीथिन अलग कर ली जाती है और भूसा सफ़ेद बण्डल के रूप में बन जाता है। इन बंडलों को रेको पर जमा दिया जाता है।
  8. कुछ घंटों के बाद स्प्रेयर पम्प से हल्का-हल्का पानी दिन में 3-4 बार आवश्यकतानुसार दिया जाता है। ध्यान रहे पानी हमेशा स्प्रेयर पम्प से ही दे।
  9. बीज बढ़वार पूर्ण होने पर उत्पादन कक्ष का तापमान 20-30 डिग्री तथा नमी 80-90% बनाये रखे। कमरे की खिड़कियों एवं दरवाजे को खोलकर ताज़ी हवा एवं रोशनी आने दे।

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उपज

करीब 100 किलोग्राम सूखे भूसे से 70-80 किलोग्राम ताजा ढींगरी मशरूम आसानी से प्राप्त की जा सकती है।

अच्छे बीज की पहचान

  1. स्पॉन 20-25 दिन से ज्यादा पुराना नहीं होना चाहिए।
  2. कवकजाल अच्छी तरह से फैला हुआ होना चाहिए .कोई अन्य काली, हरी, पीली फफूंद नहीं होनी चाहिए।
  3. स्पॉन का रंग सफ़ेद होना चाहिए।
  4. इसमें से ढिंगरी मशरूम की खुशबु आनी चाहिए।
  5. बीजो में यदि कोई अन्य दुर्गन्ध आती हो तो ऐसे बीजो को काम में लेना चाहिए।
  6. कवकजाल सारे दानों पर फैला हुआ होना चाहिए।
  7. बुवाई के समय भी बीजों को अधिक समय तक खुला न छोड़े।
  8. यदि स्पॉन को तुरंत काम में नहीं लेना हो तो 15-20 से. तापमान पर रखे।

ढिंगरी मशरूम में लगने वाले कीड़े एवं रोग

बीज बढ़वार के समय भूसे पर लगने वाली खरपतवार फफूँदे से

बीज बढ़वार के समय कवकजाल फैलने की अवस्था में मुख्य खरपतवार फफूंद जैसे – ट्राइकोड्रामा, एस्परजिलस, राइजोपस, म्युकर, स्केलेरोशियम, रोल्फसाईं एवं क्रोप्राइनस लगाती है। ये खरपतवार ढिंगरी मशरूम के कवकजाल को बढ़ने से रोकती है।

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रोग से बचाव

  1. बीज की गुणवत्ता उत्तम होनी चाहिए तथा इसकी खरीददारी प्रमाणिक प्रयोगशाला से करनी चाहिए।
  2. हमेशा ताजा बीज काम में लेना चाहिए जिससे उपज भी अधिक प्राप्त होती है एवं कीट-बीमारिया भी कम आती है।
  3. भूसे का उपचार ठीक से करना चाहिए।
  4. भूसे में नमी की मात्रा अधिक नहीं होनी चाहिए।
  5. सिंचाई के लिए उपयोग में लिया जाने वाला पानी शुद्ध और मीठा होना चाहिए।
  6. यदि पानी टेंक का हो तो, उसे समय समय पर 0.15% बलीचिग पाउडर से उपचारित करना चाहिए। यदि किसी बेग में कोई दूसरी फफूंद दिखाई दे तो उस जगह से पॉलीथिन काटकर, संक्रमित भाग को चिमटी की सहायता से अच्छी प्रकर से हटा देना चाहिए। उस स्थान पर बाविस्टिन +कैल्शियम  कार्बोनेट (1+10 ग्राम) के मिश्रण का भुरकाव करना चाहिए।
  7. यदि किसी बैग में खरपतवार फफूंद अधिक हो तो उसे उत्पादन कक्ष से दूर कहीं फेक देना चाहिए।
  8. बिजाई के समय यह जरूर ध्यान रखना चाहिए की बीज पूर्ण रूप से शुद्ध हो और किसी भी प्रकार के खरपतवार फफूंद के बीज की मिलावट न हो।
  9. उत्पादन कक्ष में कही भी पानी एकत्रित नहीं होना चाहिए। जिससे मक्खी-मछर को पनपने का मौका न मिले।

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ढींगरी मशरूम में लगने वाले कीट

इसमें डिप्टेरियन फोरोइड एवं स्प्रिंग टेल्स मक्खियां का प्रकोप अधिक होता हैं। ये मक्खियां बीज बढ़वार के समय कवकजाल की गंध से अधिक आकर्षित होती हैं। यदि कमरे में नमी अधिक हो और वायु का आवागमन कम हो एवं मशरूम उत्पादन कक्ष, में अधिक व्यक्तियों का आवागमन हो या कही पानी भरा हो तो इनका प्रकोप होने की संभावना अधिक रहती हैं।

उपचार

  1. बिजाई से लेकर तुड़ाई साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। कक्ष में कही भी पानी नहीं भरा रहना चाहिए। भूसे में नमी की उचित मात्रा होनी चाहिए। प्रकाश की भी ठीक व्यवस्था होनी चाहिए।
  2. उत्पादन कक्ष में समय-समय पर डी.डी.वी.पी. नुवान (0.2%)+नामक कीटनाशी एवं फार्मलीन 6% का छिड़काव 7 दिन के अंतराल में फर्श एवं दीवारों पर करना चाहिए। दवाई का स्प्रे शाम को करके खिड़की, दरवाजें बंद कर देना चाहिए। सुबह स्वस्छ वायु का आवागमन होने दें।
  3. उत्पादन कक्ष के आसपास डी.डी.वी.पी. नुवान (0.2%)+फार्मलीन (6%) का छिड़काव 7 दिन के अंतराल पर करें।
  4. मक्खियों को आकर्षित करने के लिए प्रकाश प्रपंच एवं पीला कागज ट्रेप जो तेल या ग्रीस में भीगा हो का उपयोग करना चाहिए।
  5. प्रकाश के स्त्रोत के पास पॉलीथिन शीट में चिपचिपा पदार्थ लगाकर लटकाना चाहिए, जिससे प्रौढ़ कीट चिपक कर मर जाए।

उत्पादन कक्ष के दरवाजें पर जाली (मच्छर अवरोधी) प्लास्टिक/लोहे की लगा दें जिससे स्वच्छ वायु आ सकें लेकिन मक्खी,मच्छरों को रोका का सकें।

दूध छाता मशरूम (Milk umbrella mushroom)

यह मशरूम मार्च से नवम्बर तक उगाई जा सकती हैं, परन्तु मार्च में बिजाई करने पर ही इसका उत्पादन लिया जा सकता हैं। दूध छाता नाम इसलिए हैं की इसका रंग दूध जैसा सफेद होता हैं। इसमें उपलब्ध पोषक तत्व अन्य खाद्य मशरूम के बराबर हैं और खनिज लवण की मात्रा अधिक है। इस मशरूम का सर्वप्रथम उत्पादन उदयपुर की इसी प्रयोगशाला में हुआ था।

Image Credit – mushrooms.ca

मशरूम उत्पादन के लिए सामग्री तैयार करना

  1. गेहू अथवा चावल का भूसा इसके लिए उपयोग में लिया जा सकता हैं।
  2. भूसा ताजा फसल से लिया हुआ होना चाहिये।
  3. यह बारिश से भीगा हुआ न हो तथा इसमें अन्य फसल के अवशेष न हो।
  4. इसमें खेत की मिट्टी एवं गेहू के दानें इत्यादि न हो।
  5. भूसे के टुकड़ों की लम्बाई 1-1.5 इंच होनी चाहिये। यह ध्यान रखना चाहिये की भूसा, बहुत बारीक़ न हो। जिससे बेड्स बनाने के बाद में हवा का आवागमन ठीक होता हैं।

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भूसे का उपचार

भूसे को उपचारित करने के लिए भूसे का उपचारित अवांछित फफूंद व जीवाणुओं एवं कीटों के अंडो से मुक्त करने के लिए किया जाता हैं। भूसे का उपचार दो तरह से किया जा सकता हैं।

  1. रासायनिक उपचार
  2. गर्म पानी से उपचार

रासायनिक उपचार

यह उपचार सस्ता, सरल एवं अधिक उपज देता हैं। गर्मी के दिनों में यह उपचार अधिक प्रभावी हैं एवं उत्पादन भी अच्छा मिलता हैं। इस उपचार के लिए 100 लीटर पानी में बाविस्टिन नामक फफूंदनाशक दवा ८ग्राम+फार्मलीन (350 मिलीलीटर)+ डाइक्लोरोवास डी.डी.वी.पी. 30 मिली लीटर नामक कीटनाशी दवाओं का घोल बनाकर 20 किग्रा. सुखें गेहू या चावल के भूसे को गलाया जाता हैं।

इस उपचार के लिए प्लास्टिक का ड्रम (200 लीटर) या सीमेंट की टंकी काम में ली जा सकती हैं। पहले ड्रम को सूखे भूसे से भर दें फिर उसमे पानी डालें। आधा भरने के बाद सारी दवाइयों को एक बाल्टी पानी में अच्छी तरह घोलकर डालें फिर अतिरिक्त पानी पूरा भूसा गिला होने तक डालें और ढक्क्न को अच्छी तरह से बंद कर दें।

भूसे को रासायनिक घोल से 24 घंटे तक उपचारित करें, उसके पश्चात् उसे एक जालीदार स्टेण्ड पर एक घंटे तक रखना चाहिए जिससे उसका अतिरिक्त पानी निकल जाये। भूसे को हाथ दबाने पर पानी नहीं टपकना चाहिए।

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गर्म पानी से उपचार

भूसे को 10-12 घंटे तक साफ़ पानी में गला देना चाहिए। बाद में उसे पानी से निकालकर उबलते हुए पानी में एक घंटे तक रख देना चाहिए। जिससे भूसे में उपस्थित फफूंद के जीवाणु एवं कीटों के अंडे नष्ट हो जाए।

बिजाई करना

भूसे को उपचारित करने के बाद उसे एक साफ कमरे में स्वच्छ पॉलीथिन की चादर पर डाले उससे पूर्व उस स्थान पर 2% फार्मलीन का स्प्रे करे। गीले भूसे में 3-4% की दर से बीज मिलाये। यदि तापमान 30 डिग्री से. से अधिक हो तो बीज दर 3% रखनी चाहिए। एवं तापमान 30 डिग्री से. से कम हो तो बीज दर की मात्रा 4% रखनी चाहिए।

बिजाई की विधि

भूसे में दो तरीको बीज की बिजाई की जा सकती है।

भूसे में बीज को अच्छी तरह से मिला सकते है।

परतदार बिजाई करना – पलिथिन की थैलियों में पहले 4 इंच भूसा भरा जाता है फिर बीज डाला जाता है ऐसे तीन परतों में डाला जाता है। इसके बाद थैली का मुँह रबर या ढगे की सहायता से बंद कर दया जाता है। यह तरीका अच्छे परिणाम देता है।

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बीजाई के बाद देखभाल

  1. बिजाई की हुई थैलियों को 25 से 28 डिग्री से. तापमान पर रखना चाहिए।
  2. इसके स्पॉन के रन के समय उत्पादन कक्ष में प्राकृतिक रोशनी होनी चाहिए।
  3. ताजा हवा का आगमन होना चाहिए।
  4. प्रतिदिन स्पॉन रन को देखते रहना चाहिए। यह पूरी तरह से सफ़ेद होना चाहिए।

अच्छे स्पॉन की पहचान

  1. स्पॉन 20-25 दिन से ज्यादा पुराना नहीं होना चाहिए।
  2. कवकजाल अच्छी तरह से फैला हुआ होना चाहिए .कोई अन्य काली, हरी, पीली फफूंद नहीं होनी चाहिए।
  3. स्पॉन का रंग सफ़ेद होना चाहिए।
  4. इसमें से मशरूम की खुशबु आनी चाहिए।
  5. बीजो में यदि कोई अन्य दुर्गन्ध आती हो तो ऐसे बीजो को काम में लेना चाहिए।
  6. कवकजाल सारे दानों पर फैला हुआ होना चाहिए।
  7. बुवाई के समय भी बीजों को अधिक समय तक खुला न छोड़े।
  8. यदि स्पॉन को तुरंत काम में नहीं लेना हो तो 15-20 से. तापमान पर रखे।

केसिंग मिट्टी

उपयुक्त तापमान एवं नमी पर 15 दिनों में स्पॉन रन भूसे में अच्छी तरह से फेल जाता है। इस समय भूसे की सतह पर दो-तीन साल पुराने गोबर की खाद एवं अन्य कम्पोस्ट जैसे मशरूम उत्पादन के बाद बचे हुए अवशेष का 2-3 साल पुराना कम्पोस्ट जैसे पदार्थ से उसे ढकना आवश्यक हो जाता हैं इस प्रक्रिया को केसिंग कहते हैं और इस तरह बिछाई गई परत को केसिंग परत कहते हैं।

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दूध छाता  मशरूम से केसिंग परत लगाने के कुछ फायदे हैं जैसे :-

  1. दूध छाता मशरूम में पिन हेड बनने के लिए केसिंग अनिवार्य हैं। इसकी अनुपस्थिति में मशरूम बहुत कम या बिलकुल ही नहीं बनती हैं।
  2. केसिंग मिटटी में पोषक तत्वों की मात्रा बहुत कम होनी चाहिये। जिससे स्पॉन रन रुक जाता हैं और मशरूम बनने में सहायता मिलती हैं।
  3. उपयुक्त नमी बनाये रखने के लिए केसिंग की आवश्यकता होती हैं।

अच्छी केसिंग सामग्री के गुण

  1. इसमें पोषक तत्व नहीं होने चाहिए।
  2. इसमें हवा का आवागमन ठीक से होना चाहिये, यानि यह भुरभुरा हो और हल्का हो।
  3. इसमें कंकड़, पत्थर एवं सड़ी हुई वस्तुए नहीं होनी चाहिये।
  4. इसकी इसकी अम्लीयता/क्षारीयता (पी.एच.) 6.0 से 7.0 के बीच होनी चाहिये।

विभिन्न केसिंग मिश्रण

निम्नलिखित केसिंग मिश्रण को काम में लिया जा सकता हैं-

  1. गोबर की खाद (2वर्ष पुरानी)
  2. गोबर की खाद (1:1)+बायोगैस स्लरी (दोनों 2-3 वर्ष पुरानी)
  3. गोबर की खाद (1:1)+ऍफ़.वाई.एम्. (दोनों 2-3 वर्ष पुराने)
  4. गोबर की खाद (1:1)+बटन माशरूम्की उपज लेने के पश्चात् बचा हुआ कम्पोस्ट (दोनों 2 वर्ष पुराने)

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केसिंग मिश्रण तैयार करना

  • सामग्री को अच्छी तरह से मिलाना चाहिये।
  • इसके पश्चात् इस मिश्रण को पानी में 8 घंटे तक डुबोकर रखें। फिर उसे निकालकर पॉलीथिन शीट पर फैला दें ताकि यह सुख जाये।

केसिंग मिश्रण का उपचार

  • सूखे हुए केसिंग मिश्रण को साफ पॉलीथिन की चादर पर फैलाए एवं 8% फार्मलीन के घोल से छिड़ककर पूरी तरह गीला कर दें तथा चरों तरह से ढककर रख देना चाहिये।
  • इस मिश्रण को 48 घंटे बाद फैलाएं जिससे फार्मलीन की गंध उसमे से निकल जाये।

केसिंग परत बिछाना

  • इस परत को पानी छिड़ककर गिला करें एवं मिश्रण को हाथ से दबाकर देखें की वह ठीक से गिला हुआ हैं या नहीं।
  • स्पॉन रन पूरा होने के बाद उसको समतल कर लें एवं स्प्रेयर पम्प की सहायता से पानी का हल्का छिड़काव करें।
  • छिड़काव के बाद 2 से.मी. केसिंग मिश्रण की परत बिछाये। यह समतल होना चाहिये।

केसिंग करने के बाद रख रखाव

  1. केसिंग करने के बाद दिन में 3 बार पानी का छिड़काव केसिंग परत पर करना चाहिए। उत्पादन कक्ष में 80% नमी बनी रहनी चाहिए। अत्यधिक पानी न दे अन्यथा वह बेग के अंदर जाकर सड़न पैदा करेगा।
  2. उत्पादन कक्ष का तापमान 30 डिग्री से. से अधिक न हो। अन्यथा विपरीत असर पड़ेगा, मशरूम के बटन सूखने लग जायेगे।
  3. उत्पादन कक्ष में प्रकाश की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  4. उत्पादन कक्ष में ताजा हवा का प्रबंध होना चाहिए। इसके लिए सुबह-शाम खिड़की दरवाजे खुले रखे।
  5. साथ ही खिड़की, दरवाजो, एवं रोशन दान में जाली लगी होनी चाहिए ताकि कीड़ो, मछर उत्पादन कक्ष में प्रवेश न कर पाए
  6. केसिंग परत लगाने के करीब 10-12 दिन बाद पिन हेड निकलने शुरू हो जाते है।

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उत्पादन

  1. मशरूम के पीन हेड करीब 6-7 दिन में बड़े हो जाते है जिन्हे घुमाकर तोड़ लेना चाहिए। चाकू से काटकर या खिंच कर न निकाले।
  2. करीब 7-10 दिन के अंतराल पर मशरूम बेग दुबारा पीन हेड्स निकलने शुरू हो जाते है। जो अगले 6-7 दिन में बड़े हो जाते है।
  3. इस तरह से एक बार बीज लगाने पर 5-6 बार मशरूम प्राप्त होगी। इसकी कुल उपज 1000 किलोग्राम सूखे भूसे पर 600 किग्रा. ताजा मशरूम प्राप्त होती जाती है।
  4. मशरूम उपज आने में 60 दिन का समय लगेगा। बिजाई से लेकर आखरी फसल तक कुल समय 90 दिन का होता है।

तुड़ाई के बाद संग्रहण

  1. इस मशरूम को तुड़ाई के बाद 25 डिग्री तापमान पर करीब 3-4 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  2. रेफ्रिजरेटर में 5 डिग्री से. तापमान पर करीब 7-10 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  3. मशरूम को 30-35 डिग्री से. तापमान पर सुखाकर पॉलीथिन की थैली में बंद कर 1 वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  4. दूध छाता मशरूम को सुखाकर पाउडर बनाकर लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यदि उसमे नमी का असर न हो।

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विपणन

  • सब्जी मंडी यदि मशरूम उत्पादन स्थल के पास में है तो मशरूम तुड़ाई के बाद सुबह उसे सीधा सब्जी मंडी में बेच सकते है।
  • यदि मंडी स्थल दूर है तो तुड़ाई शाम को देर से कर के सुबह तक उसे बाजार में भेज सकते है।

शिताके मशरूम की खेती (Japani mushroom farming)

शिताके मशरूम को जापानी मशरूम भी कहा जाता है। यह एक भरपूर औषधीय गुण वाली मशरूम है। यह मशरूम आज विश्व की सर्वाधिक उत्पादन की सूचि में शामिल है। चीन इसका निर्यातक है एवं विश्व की कुल उत्पादित मशरूम में यह प्रथम है एवं बटन मशरूम दूसरे स्थान पर है। ताजा मशरूम 1400 से 1600 रूपये प्रति किलो के भाव से बिक रही है।

मशरूम की खेती

Image Credit – BuyFruit

उत्पादन इसके उत्पादन के लिए लकड़ी का बुरादा एक उपयुक्त माध्यम है। यदि गेहूं के भूसे के साथ इसे 1 भाग गेहूं और तीन भाग लकड़ी का बुरादा ले तो उत्पादन अच्छा होता है।

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सूत्र -1

सौ बेग लगाने के लिए 100 किलो लकड़ी का बुरादा + 1 किलो केल्सियम कार्बोनेट + 2 किलो जप्सम का चूर्ण + 30 किलो गेहूं का चापड़।

सूत्र – 2

सौ बेग लगाने के लिए 75 किलो लकड़ी का बुरादा + 1 किलो केल्सियम कार्बोनेट + 2 किलो जप्सम का चूर्ण + 25 किलो गेहूं का भूसा ।

उपरोक्त दोनों सूत्र राजस्थान में इस मशरूम का उत्पादन के लिए सर्वोत्तम है। इसका उत्पादन मुख्यतया सर्दियों में किया जाता है।

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सामग्री तैयार करने की विधि

उपरोक्त दोनों सूत्रों में आवश्यक सामग्री 25 घंटे तक पानी में भिगो कर रखे। अगले दिन इसे बहार निकाल कर जाली या पॉलीथिन की शीट पर डाल दे। ताकि अतिरिक्त पानी निथर जाये। उचित नमी की मात्रा होने के बाद कैल्शियम क्लोराइड एवं जिप्सम की मात्रा को अच्छी तरह से मिला दे।

अब यह बेग में भरने के लिए उपयुक्त है। इस प्रकार बेग को ऑटोक्लेव में 2 घंटे तक 15 पौंड दाब एवं 121.6 डिग्री से.  तापमान पर निर्जीवीकरण करे। ठंडा होने पर ये बेग बिजाई के लिए तैयार है।

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बिजाई एवं बेग भरना

दो तरह के बेग काम में लिए जा सकते है। एक जिसकी साइज 12 इंच चौड़ी एवं 24 इंच लम्बी हो एवं दूसरे 8 इंच चौड़ी तथा 30 इंच लम्बी हो।

दूसरे तरह के बेग को लेटाकर रख सकते है। जबकि पहले के बेग को ढिंगरी मशरूम की तरह रक् सकते है।

उत्पादन

इस मशरूम को सर्दी में अच्छी तरह से उगाया जा सकता है। जब थैलियों में बढ़वार पूरी हो जाये एवं इसके ऊपर हल्के भूरे रंग की परत दिखाई दे तब पॉलीथिन को हटा देना चाहिए। पानी का छिड़काव निरंतर दिन में 7-8 बार करे। 2-4 दिन बाद प्रत्येक बेग को बर्फ डेल हुए पानी 2-3 घंटे डुबोकर रखे एवं बेग पर 7-8 छेद अंदर 2-3 से.मि. गहराई तक कर दे।

पॉलीथिन हटाने एवं सहित पानी के उपचार के 10-12 दिन बाद बम्पिंग जिसे पिन हेड भी कहते है निकलना शुरू जाते है। यह 5-6 दिन में छतरी का आकार ले लेते है। भूरे रंग के मशरूम तोड़ने लायक हो जाते है।

कमरे का तापमान 25 डिग्री से. अधिक नहीं होना चाहिए। यदि दो किलो सूखा बुरादा या बुरादा + भूसा लेते  ही तो उत्पादन लगभग 1500 से 1800 ग्राम तक ताजा मशरूम प्राप्त होती है। तुड़ाई बटन मशरूम की तरह घुमाकर की जाती है।

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विपणन

इस मशरूम को ताजा 1400 से 1600 रूपये किलो तक में बेच सकते है। यदि बाजार दूर है तो शीट वहां में भेज सकते है। अन्यथा इसे कमरे के तापमान पर सुखकर भी बेच सकते है। सूखे मशरूम का भाव 7000 से 7500 रूपये किलो है।

इस मशरूम को के बाजार में बेचने के आलावा एच.आई.सी. केंद्र मुरथल हरियाणा में इसको बेच सकते है।

गैनोडरमा मशरूम (Guanoderma mushrooms)

यह एक सख्त एवं वर्षा ऋतू में सूखे या जीवित वृक्षों की जड़ो के पास उगती है। इसका रंग गहरा लाल, भूरा एवं स्लेटी होता है। प्रकृति में इसकी कई प्रजातियां पाई जाती है। ताजा मशरूम गूदेदार होती है एवं सूखने पर यह कड़क हो जाती है।

मशरूम की खेती

उत्पादन

इसके औषधीय महत्व को देखते हुए पूर्वी देशों में इसके उत्पादन की विधि विकसित की गई है। परन्तु जलवायु की विभिन्नता एवं विशेष प्रकार के कृषि अवशेषों की उपलब्धता के कारण इसके उत्पादन का तरीका कुछ भिन्न है।

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माध्यम तैयार करना

इसके लिए गेहूं का भूसा तथा लकड़ी का बुरादा 1:3 लिए जाते है। दोनों को करीब 20 घंटे तक अलग-अलग गलाने के पश्चात् इसे बाहर निकाल कर अतिरिक्त पानी को निथार कर दोनों को बराबर मात्रा 75% के लगभग होनी चाहिए।

इसके बाद दोहरी की हुई थैलियों में ऊपर की और प्लास्टिक की वलय एवं डाट लगा देते है। इसके ऊपर कागज तथा बर बेंड लगाकर इसे ऑटोक्लेव में 15 पोंड डाब पर डेढ़ से डप घंटे के लिए निर्जीवीकरण करते है। इसके बाद इसे ठंडा होने के लिए रख देते है।

बीज तैयार करना

उपरोक्त विधि से तैयार मिश्रण में 3% गीले मिश्रण के हिसाब से बीजाई करते है, फिर इसे 30-35 डिग्री से. तापमान पर बीज बढ़वार के लिए रख देते है। लगभग 5 सप्ताह में बीज बढ़वार पूर्ण हो जाती है।

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थैलियों को काटना तथा डॉट  हटाना

चाकू से इन थैलियों के चरों तरफ कट लगा देते है। आर्द्रता बनाये रखने के लिए पानी का निरंतर छिड़काव किया जाता है।

मशरूम तुड़ाई

काट लगी हुई थैलियों से कुछ दिनों के बाद मशरूम निकलना प्रारम्भ हो जाती है, बढ़वार धीरे-धीरे होती है। करीब 3-5 सप्ताह में यह परिपक्व हो जाती है। संग्रह करने के लिए मशरूम को घुमाकर तोड़ लिया जाता है। इसे सुखाकर इसका पाउडर बनाकर लम्बे समय तक संग्रहित किया जा सकता है।

बाजार भाव

अभी राजस्थान में इस मशरूम को बाजार में नहीं बेचा जाता है लेकिन कुछ व्यवसायिक उत्पाद जैसे कैप्सूल (डी.एक्स.एन.) एवं पाउडर बाजार में रूपये 1100 पर 100 कैप्सूल की दर से एवं रूपये 1150(50 ग्राम पाउडर) बाजार में विक्रय के लिए उपलब्ध है।

भारत सरकार की संस्था आई.सी.ए.आर. द्वारा प्राप्त निर्देशों के अनुसार इस मशरूम का उत्पादन अत्यंत नियंत्रित रूप से करना होगा। उत्पादन के उपरांत बचे अवशेषों को पेड़ों से दूर गहरे गद्दे में डालना चाहिए। यह पेड़ों को नुकसान पैदा करती है।

मशरूम उत्पादन में प्रक्षिक्षण प्राप्ति के स्रोत एवं उनका विवरण

कम्पोस्ट व् बीज की गुणवत्ता के समतुल्य प्रक्षिक्षण(टेनिंग) भी महत्वपूर्ण है। प्रक्षिक्षण के आभाव में फसल उत्पादन के दौरान विभिन्न प्रकार की समस्याए उत्पन्न हो जाती है। अतः मशरूम उत्पादन शुरू करने से पहले प्रशिक्षण लेना अति आवश्यक है।

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मशरूम उत्पादन में प्रशिक्षण सुविधा सर्वत्र उपलब्ध नहीं है। कुछ गिने-चुने अनुसन्धान व विकास संस्थानों में ही मशरूम उत्पादन में प्रक्षिक्षण की व्यवस्था है। राष्ट्रिय स्तर पर देश के समस्त राज्यों के किसानो, बेरोजगार युवाओं, विषय वास्तु विशेषज्ञों तथा अन्य अनुसन्धान व् विकास कार्य से जुड़े शोधकर्ताओं को प्रक्षिक्षण प्रदान करने की व्यवस्था ” राष्ट्रिय खुम्ब अनुसन्धान केंद्र, सोनल – हिमाचल प्रदेश एवं निम्नलिखित संथाओं से प्रक्षिक्षण प्राप्त किया जा सकता है।

मशरूम उत्पादन – मुख्य प्रक्षिक्षण कार्यक्रम

कृषक प्रशिक्षण कार्य

यह प्रशिक्षण कायक्रम खासतौर से ऐसे किसानों बेरोजगार युवाओं व युवतियों के लिए आयोजित किया जाता है, जो घरेलू स्तर पर मशरूम का उत्पादन शुरू करना चाहते है।

उद्यमी प्रशिक्षण कार्यक्रम

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम ऐसे व्यक्तियों के लिए आयोजित किया जाता है। जो व्यवसायिक स्तर पर मशरूम का उत्पादन कर रहे होते है या करना चाहते है।

अंतराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम

यह प्रशिक्षण कार्यक्रम भारत के पडोसी देशों के विकास व अनुसंधानकर्ताओं तथा मशरूम उत्पादकों के लिए आयोजित किया जाता है। यह कार्यक्रम 15 दिन की अवधि का होता है।

प्रायोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम

पिछले कई सालों से केन्द्र व राज्य सरकार की विभिन्न रोजगार व ग्राम विकासमुख परियोजनाओं में मशरूम उत्पादन पर विशेष जोर दिया गया है। समय-समय पर विभिन्न परियोजनाओं के तहत किसानों, महिलाओं व युवाओं को मशरूम उत्पादन में प्रशिक्षण देने हेतु आवेदन प्राप्त होता है। इस आवश्यकता को पूर्ण करने के उद्येश्य से केन्द्र प्रत्येक वर्ष 4-5 प्रायोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन करता है।

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अन्य प्रशिक्षण संस्था

राष्ट्रीय खुम्ब अनुसंधान केन्द्र के अतिरिक्त निम्नलिखित संस्थाओं से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया जा सकता है।

  1. अखिल भारतीय खुम्ब उन्नयन परियोजना पादप रोग विज्ञान विभाग महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रोद्योगिक विश्वविद्यालय उदयपुर (राजस्थान)
  2. खुम्ब परियोजना, उद्यान विभाग, चम्बाघाट, सोलन (हि.प्र.)
  3. इंडो-डच खुम्ब परियोजना, चौ. श्रवण कुमार कृषि विश्व-विद्यालय, पालमपुर, कांगड़ा (हि.प्र.)
  4. हैक एग्रो मशरूम रिसर्च एवं डवलपमेंट यूनिट, मुरथल, सोनीपत (हरियाणा)
  5. अखिल भारतीय खुम्ब उन्नयन परियोजना, पादप रोग विज्ञान विभाग, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयंबटूर (तमिलनाडु)
  6. अखिल भारतीय खुम्ब उन्नयन परियोजना, पादप रोग विज्ञान विभाग, जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्व विद्यालय, पंतनगर उधम सिंह नगर (उत्तरांचल)।
  7. अखिल भारतीय खुम्ब उन्नयन परियोजना, नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, फैजाबाद (उत्तरप्रदेश)।
  8. अखिल भारतीय खुम्ब उन्नयन परियोजना, माइक्रोबायोलॉजी विभाग, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना (पजाब)।
  9. अखिल भारतीय खुम्ब उन्नयन परियोजना, पादप रोग विज्ञान विभाग, कृषि विश्वविद्यालय, महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, पूना (महाराष्ट्र)
  10. अखिल भारतीय खुम्ब उन्नयन परियोजना, पादप रोग विज्ञान विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)
  11. मशरूम प्रयोगशाला, भारतीय उद्यान अनुसंधान संस्थान, हसर घटटा लेक पोस्ट, बंगलौर (कर्नाटक)
  12. पादप रोग विज्ञान विभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली – 110012
  13. अखिल भारतीय खुम्ब विकास परियोजना, पादप रोग विज्ञान विभाग, चन्द्रशेखर आजाद, कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर (उ.प्र.)
  14. अखिल भारतीय खुम्ब विकास परियोजना, आचार्य एन.जी. रंगा कृषि विश्वविद्यालय, तिरुपति परिसर।

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मशरूम बेचने के सम्पर्क सूत्र

क्र.स. नाम व पता

मोबाईल न.

1.

श्री के. के. पालीवाल, मोती चोहट्टा, उदयपुर (राजस्थान)

+91 9214972902

2.

श्री मनोज जोशी, मादरी इंडस्ट्रियल एरिया, उदयपुर

+91 9414067407

3.

श्री राकेश पूर्बिया, कुम्हारों का भट्टा, उदयपुर

+91 8740865172

4.

श्री किशन सिंह, विश्वविद्यालय परिसर, उदयपुर

+91 8107881349

5.

श्री जिग्नेश पटेल, कालूपुर, अहमदाबाद

+91 781820151

6.

श्री गोपी लाल शर्मा, गांव पोस्ट – कलड़वास, उदयपुर

+919166567426

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 स्रोत –

डॉ. श्याम सुन्दर शर्मा

परियोजना प्रभारी एवं आचार्य व विभागाध्यक्ष

श्रीमती कला नाथ

कृषि प्रयवेक्षक

श्री अविनाश कुमार नागदा

प्रयोगशाला सहायक

अखिल भारतीय समन्वित मशरूम विकास परियोजना

पौध व्याधिकी विज्ञानं विभाग, राजस्थान कृषि महाविद्यालय

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय – उदयपुर 313001 राजस्थान

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