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मल्च के प्रयोग से सब्जी उत्पादन में 60% तक बढ़ोतरी

मल्च
Written by bheru lal gaderi

मल्च का प्रयोग बदलते दौर के साथ किसान बागवानी की उन्नत विधियां अपनाने लगे हैं। सब्जियों की उन्नत खेती में मल्चिंग यानी पलवार की अहम भूमिका हैं। यह कई तरह की होती हैं, जैसे जैविक मल्चिंग, प्लास्टिक मल्चिंग और डस्ट मल्चिंग। वर्तमान समय में मल्चिंग बेहतर उत्पादन के लिए अधिक कारगर साबित हो रही हैं। इस तकनीक में फसल सुरक्षा, उत्पादन बढ़ाने, नमी संरक्षण और खरपतवार नियंत्रण के लिए प्लास्टिक फिल्म का इस्तेमाल किया जाता हैं।

मल्च

प्लास्टिक मल्चिंग की आवश्यकता

प्लास्टिक मल्चिंग में पौधे के चारों तरफ की खुली मिट्टी को प्लास्टिक फिल्म में व्यवस्थित रूप से ढँक दिया जाता हैं। इसके प्रयोग से किसान को कई तरह के फायदे मिलते हैं। बाजार में विभिन्न रंगों, आकार, गुणवत्ता और मोटाई में प्लास्टिक मल्चिंग फिल्म उपलब्ध हैं। मल्चिंग का इस्तेमाल सब्जी की प्रकृति पर निर्भर करता हैं। प्लास्टिक मल्च फिल्म के उपयोग में 35-60% तक उत्पादन में बढ़ोतरी होती हैं।

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प्लास्टिक मल्च का अर्थ

जमीन पर उठी हुई क्यारियाँ बनाकर उस पर प्लास्टिक की काली, दूधिया, चाँदी की रंग वाली या 2 रंग वाली फिल्म बिछा दी जाती हैं। इसे “प्लास्टिक मल्च” कहते हैं।

यु बिछाए पलवार (मल्च)

सब्जी वाली फसलों में सामान्यतः 25 से 30 माइक्रोन वाली प्लास्टिक मल्च फिल्म का इस्तेमाल किया जाता हैं। आमतौर पर 25 माइक्रोन मोटाई वाली फिल्म मल्च के लिए उपयुक्त रहती हैं। इसके लिए खेत को अच्छी तरह जुताई करने के बाद ट्रेक्टर की सहायता से ऊंची उठी हुई क्यारियां लम्बाई में तैयार की जाती हैं। इन क्यारियों के ऊपर बून्द-बून्द वाली सिंचाई पद्धति में इस्तेमाल होने वाली ड्रिप लाइन बिछाई जाती हैं। इसके बाद रंग और फसल के आधार पर प्लास्टिक मल्च फिल्म को क्यारी के ऊपर बिछाया जाता हैं। मल्च के दोनों किनारों से मिट्टी से दबा दिया जाता हैं। इसके बाद पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दुरी के अनुसार मल्च फिल्म पर निशान बनाकर लोहे के गर्म पाइप से छेद कर दिए जाते हैं।

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सावधानियां

  • मल्च को बिछाने के के बाद उसमे अधिक खिचाव नहीं होना चाहिए।
  •  ज्यादा खिचाव होने से तापमान बढ़ने एवं कृषि कार्यों के समय वह फट जाती हैं।
  • मल्च में छेद करते समय सावधानी रखें की लोहे की गर्म पाइप निचे बिछाई गई ड्रिप लाइन तक नहीं पहुंच पाए।
  • मल्च का इस्तेमाल दोबारा किया जा सकता हैं। इस्तेमाल करते समय और बिछाते या लपेटते समय ध्यान रखे की यह फट न जाए।
  • सिल्वरी ब्लेक मल्च का उपयोग करते समय सिल्वरी सतह को ऊपर रखा जाता हैं एवं काली सतह अंदर की तरफ रखी जाती हैं।

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सब्जी फसलों में प्लास्टिक मल्चिंग के लाभ

  • कृषि लागत कम होती हैं।
  • कीट- रोग, मौसम में बदलाव से भी बचाव होता हैं।
  • निराई- गुड़ाई की आवश्यकता नहीं होती हैं।
  • इससे समय एवं पैसे की बचत होती हैं।
  • इससे मिट्टी में नमी ज्यादा समय तक बनी रहती हैं।
  • पानी का वाष्पोत्सर्जन नहीं होता हैं, इससे पानी की बचत होती हैं।
  • खरपतवार नहीं उग पाते हैं जिससे पौधे की बढ़ोतरी और विकास प्रभावित नहीं होता हैं।
  • वायु और जल से होने वाला मिट्टी का कटाव रोकती हैं।
  • मिटटी को बहरी वातावरण से अलग रखने के लिए तापमान नियंत्रित करती हैं।
  • फसल उत्पादकता में सुधार होने से सब्जी जल्दी परिपक्व होती हैं।
  • सब्जियों को गलने से बचाती हैं, क्योंकी सब्जी का पलवार के कारण जमीन से संपर्क नहीं होता हैं।

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लागत

सब्जियों के लिए प्लास्टिक मल्चिंग की अनुमानित लागत सामान्यतः 25 से 30 हजार रूपये प्रति हेक्येर तक आती हैं। यह लागत 80% क्षेत्र के आवरण के आधार पर आंकी जाती हैं। हालाँकि सब्जियों की प्रकृति के आधार पर भी इसमें भिन्नता हो सकती हैं।

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