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मधुमक्खी पालन (Bee keeping) – एक उपयोगी व्यवसाय

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)मधुमक्खी पालन (Bee keeping)
Written by bheru lal gaderi

मधुमक्खी और मानव जाती का परिचय प्राचीन कल से ही माना जाता है। मधुमक्खी पालन (Bee keeping) मनुष्य के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से लाभ दायक है। इसमें हमें रोजगार के साथ मोम तथा उत्तम खाद्य पदार्थ शहद प्राप्त होता है। शहद (मधु) का प्रयोग सभी त्योहारों, पूजाकर्मों एवं मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक आवश्यक बताया गया है। इसके आलावा इससे पेड़-पौधे के परागण से फसल की पैदावार में वृद्धि होती है।

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

मधुमक्खी पालन की विशेषताएं

सभी वर्ग के किसान, भूमिहीन, बेरोजगार मधुमक्खी पालन(Bee keeping) कार्य को कर सकते है क्यों कि इसमें भूमि होना आवश्यक नहीं है एवं समय की भी कम आवश्यकता होती है।

  1. हलके काम की वजह से इसे बच्चे व् स्त्रियों द्वारा भी क्या जा सकता है।
  2. मधुमक्खी पालन कार्य दूर दर्ज के क्षेत्रों में भी किया जा सकता है।
  3. इस व्यवसाय को बहुत ही कम लागत में शुरू किया जा सकता है।
  4. इस कार्य की तकनीत आसान है।
  5. इससे मोम, शहद से भी मूलयवान है।
  6. इससे प्राप्त उत्पादों को लम्बे समय तक सुरक्षित रक्खा जा सकता है।
  7. मधुमक्खी मदुरै एवं पराग फूलों से ले लेती है जो की वनों, अजोत्य भूमि में खड़ी वनस्पति या फसलों से प्राप्त होते होती है।
  8. फसलों की उपज एवं गुणवत्ता मधुमक्खी परागण से बढ़ती है तथा मधुमक्खी पालन करने वालों के अल्वा दूसरे किसानों को भी इसका लाभ मिलता है।
  9. मधुमक्खी पालन की खेती के किसी भी पहलु से स्पर्धा नहीं है।

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सम्पूर्ण जानकारी मधुमक्खी पालन के बारे में

मधुमक्खी पालन शुरू करने से पहले मधुमक्खी का जीवन चक्र, व्यवहार, व्यवस्था, शत्रु, बिमारियों तथा उनका निदान, मधुमक्खी पान के लिए उपयोग में लिए जाने वाले उपकरण आदि की जानकारी अवश्य ले लें।

Image Credit – Pollinator Partnership

मधुमक्खी का विकास एवं जीवन चक्र

अण्डा

डिंभ प्यूपा

मधुमक्खी

2-4 दिन

5-6 दिन 7-14 दिन

20 दिन  बाद

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मधुमक्खी वंश में एक रानी, कुछ नर मक्खियाँ व बहुत सी कमेरी मधुमक्खियाँ होती है। इसका छत्ता माँ का बना होता है, जो 13-18 दिन की आयु की कमेरी मधुमक्खियों की ग्रंथियों से निकलता है। शहद को छत्ते के ऊपर वाले भाग में एकत्रित किया जाता है। शिशुपालन निचले वाले भाग में किया जाता है। शिशु मधुमक्खी कोष्ठों के आस-पास में पराग को संग्रह करती है। प्रौढ़ कमेरी मधुमक्खी छत्तों में 34 डिग्री सेल्सियस तापमान बनाये रखती है।

रानी मधुमक्खी (Queen Bee)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Queen Bee

इसे माँ मधुमक्खी भी कहते है। एक परिवार में एक ही रानी मक्खी पायी जाती है। यह पूर्ण विकसित मादा है  – तथा इसका कार्य केवल अंडे देना होता है। रानी के कोष्ट के तले अंडे देने के तीन दिन बाद डिंभ (लार्वा) निकल आता है। जिसका पालन उपचारिका मधुमक्खी करती है। जिस डिंभ से रानी विकसित करवाई जानी हो उसे अवलेह (रॉयल जेली) दिया जाता है। वंश वृद्धि के समय या रानी बूढी होने पर या किसी कारण से रानी के मरने पर नई रानी बनाई जाती है।

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आमतौर पर रानी 6-12 दिन की आयु में संभोग उड़ने भरती है और 8-10 नर मधुमक्खी से संभोग करते है की उसकी ब्याना का शुक्राणु कक्ष शुक्राणुओं से भर जाये। रानी मधुमक्खी संभोग के 2-4 दिन बाद अण्डे देना शुरू करती है। यह दो प्रकार के अण्डे देती है – निषेचित(फर्टिलाइज्ड) व अनिषेचित(अनफर्टिलाइज्ड) निषेचित अण्डो से कमेरी मधुमक्खी या रानी का विकास होता है और अनिषेचित अण्डों से नर मधुमक्खी विकसित होती है। इन्हे निखटटू भी कहते है। रानी एक से तीन वर्ष तक अण्डे देती है। रानी मधुमक्खी का रंग पीला सुनहरा व पेट लम्बा होता है।

कमेरी मधुमक्खी/श्रमिक मधुमक्खियां (Workar Bees)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – The Telegraph

इन मधुमक्खियों का पेट छोटा व धारीदार होता हैं। यह मादा होती हैं परन्तु इनमे प्रजनन अंग पूरी तरह विकसित नहीं होते हैं। कमेरी मधुमक्खी में आयु के हिसाब से काम का विभाजन होता हैं। जैसे पहले 2 दिन अंदर की सफाई, 3-13 दिन शिशुओं को भोजन देने का काम करना, 3-18 दिन की आयु तक मोम निकालना, छत्ता बनाना तथा मधुरस को गाढ़ा करके पका हुआ शहद तैयार करना आदि। अगले दो दिन कमेरी मधुमक्खी शत्रुओं से वंश की रक्षा करती हैं।

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इसके बाद शेष आयु तक भोजन इकट्ठा करती हैं। मधुमक्खी वंश की जरूरत के अनुसार अपना काम बदल भी सकती हैं। जब कमेरी मधुमक्खी को मधुरस एवं पराग मिल जाता हैं तो वंश में आकर कई प्रकार के नाच नाचती हैं जिससे दूसरी मधुमक्खियों को भोजन की जगहों पर दुरी, दिशा और उत्तमता का बोध कराती हैं। भारतीय मधुमक्खी 1-2 किलोमीटर तथा मेलीफेरा 3-4 किलोमीटर की दुरी से भोजन ला सकती हैं।

नर मधुमक्खी/निखट्टू (Male Bees)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – Matt Cole – Photography

नर मधुमक्खी का काम केवल रानी मधुमक्खी के साथ सम्भोग करना हैं। इनका आकर कमेरी मधुमक्खी से बड़ा होता हैं। नर मधुमक्खी मौसम अनुकूल होने पर 9-13 दिन की आयु के दौरान सम्भोग उड़ान भरते हैं। संभोग के समय प्रजनन अंग रानी में कटकर रह जाते हैं और न्र मधुमक्खी मर जाते हैं। नर मधुमक्खी भोजन के लिए श्रमिक मधुमक्खियों पर निर्भर करते हैं।

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मधुमक्खी की प्रजातियाँ

भारतीय उपमहाद्वीप में मधुमक्खी की केवल चार प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमे से भारतीय तथा पाश्चात्य (मेलीफेरा) का मधुमक्खी ग्रहों में रखकर पालन किया जाता हैं लेकिन सारंग व छोटी या मूंगा मधुमक्खी को ग्रहों में रखना संभव नहीं हैं।

भारतीय मधुमक्खी (Apis cerana indic)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

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भारत में इसके तीन प्रमुख स्वरूप हैं। स्वभाव में यह मेलीफेरा मधुमक्खी जैसी हैं। काफी समय से इन मधुमक्खी को परम्परागत मधुमक्खी ग्रहों में रखा जरा रहा हैं परन्तु आजकल आधुनिक मधुमक्खी पेटिकाओं में इनका पालन किया जाता हैं। यह कई समानांतर छत्ते बनाती हैं।

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वंश वृद्धि व वकछूट की इस मधुमक्खी की मूल आदत हैं। यह थोड़ी सी परेशानी या भोजन की कमी होने पर घर छोड़कर भाग जाती हैं। इस मधुमक्खी से भारतवर्ष में 3-5 किलोग्राम शहद प्रतिवंश मिल जाता हैं। परन्तु कश्मीर में 25-30 किलोग्राम तक प्रतिवंश शहद उत्पादन की इस प्रजाति की क्षमता हैं।

पाश्चात्य मधुमक्खी या इटालियन मधुमक्खी (Apis melifera)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – Wikimedia Commons

यह प्रजाति संसार में अन्य तीनों प्रजातियों से अधिक विस्तृत रूप में पाई जाती हैं। जलवायु अलग-अलग होने से इसकी 18 विभिन्न प्रजातियां पैदा हो गई हैं। यह विविधताओं में आसानी से ढल जाती हैं। इनमे वकछूट की आदत केवल नाममात्र को हैं। प्रति वर्ष इस मधुमक्खी से औसतन 25-30 किलोग्राम शहद प्रतिवंश मिल जाता हैं। पाश्चात्य मधुमक्खी प्रजाति इटली, अमरीका और आस्ट्रेलिया से 1962-64 में भारत लाई गई थी और कई प्रांतों में बहुत सफल सिद्ध हुई हैं तथा अन्य प्रांतों में इसका विस्तार किया जा रहा हैं।

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हरियाणा व निकट के राज्यों में इस मधुमक्खी का पालन किया जाता हैं। यदि इस जाती की मधुमक्खी को समय-समय पर अच्छे मधुमक्खी विचरण वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाए तो इनसे प्रतिवर्ष 40-50 किलोग्राम शहद प्रतिवश प्राप्त किया जा सकता हैं।

पहाड़ी या सारंग मधुमक्खी (Apis dorsata)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

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यह मधुमक्खी आकार में सभी जातियों से बड़ी हैं और इसकी लम्बाई 1.5-2.0 से.मी. तथा वक्ष की चौड़ाई ५ मी.मी. होती हैं। इस जाती की रानी, कमेरी और नर मधुमक्खी लगभग एक ही आकार की होती हैं। यह मधुमक्खी स्वभाव में अत्यधिक गुस्सैल होती हैं। किसी कारण वंश को छेड़े जाने पर जब वे आक्रमण करती हैं तो काफी दूर तक पीछा करती हैं तथा कभी-कभी इनका आक्रमण प्राणघातक भी हो सकता हैं। यह मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तित करती रहती हैं।

फलतः इनकी शहद उत्पादन क्षमता अन्य जातियों से कही अधिक होती हैं  तथा यह इकहरा छत्ता वृक्ष की टहनी या घर की  छत के निचली तरफ बनाती हैं। जिस जगह भोजन काफी मात्रा में तथा उत्तम हो वहां इस प्रजाति को 50-100 तक वंश होते हैं। थोड़ी परेशानी होने पर यह अपना छत्ता तोड़कर भाग जाती हैं तथा भोजन की कमी हो जाए तो भी उस जगह से दूसरी जगह चली जाती हैं। भारत में बहुत सा मोम और शहद सारंग मधुमक्खी से ही मिलता हैं। इससे 50 किलोग्राम शहद प्रति छत्ता तक मिल सकता हैं। इस मधुमक्खी में विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखने की क्षमता पाई जाती हैं। यही कारण हैं की हिमाचल की 1500 मीटर ऊंचाई तक की पहाड़ियों तथा तराई में इसके हजारों छत्ते पेड़ों, ऊँची इमारतों,पानी की टंकियों आदि पर पाए जाते हैं।

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छोटी या मूंगा मधुमक्खी (Apis Florea)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

यह आकार में बहुत छोटी होती हैं तथा इकहरा छत्ता पेड़ या झड़ी की टहनी के निचली तरफ बनाती हैं। इस मधुमक्खी में भी वकछूट तथा स्थान बदलने की आदत बहुत प्रबल हैं। एक छत्ते से 200-300 ग्राम तक शहद मिलता हैं।

मधुमक्खी का व्यवहार, व्यवस्था एवं उनका प्रबंधन

विभिन्न मधुमक्खी जातियों के स्वभाव व व्यवहार में अंतर अवश्य हैं परन्तु तापमान, समुद्र तल से ऊंचाई, अपेक्षित आद्रता तथा आसपास की स्थिति भी इनकी क्रियाओं को प्रभावित करती हैं। मधुमक्खी का स्वयं एवं वंश को बचने का मूल स्वभाव हैं .मधुमक्खियां खतरे के ससमय डंक मारती हैं जिससे थोड़ी सूजन जरूर होती हैं, लेकिन यह डंक विष मनुष्य की कई बिमारियों को ठीक करने में लाभकारी हैं।

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वैसे डंक से बचने के लिए, वंशों को देखते समय मुँह पर जाली लगाकर चौखटों को धीरे-धीरे और सहजता से उठाये। अगर मधुमक्खी काफी गुस्से में हो तो धुम्न का प्रयोग करें। मधुमक्खी गृहों में रखी जाने वाली प्रजातियाँ प्रायः शांत स्वभाव वाली होती हैं लेकिन सारंग मधुमक्खी में काफी गुस्सा होता हैं तथा एक मधुमक्खी के डांक मारने पर अन्य बहुत सी मधुमक्खियां भी पीछे भागती हैं।

मधुमक्खी का व्यवहार

घरछूट

मधुमक्खी घर में अगर भोजन की कमी हो, शत्रुओं तथा रोगों का प्रकोप हो, मधुमक्खी के साथ आराम तथा सावधानी से काम न किया जाये या ज्यादा तापमान हो तो वे घर छोड़कर भाग जाती हैं तथा नए और अधिक सुरक्षित स्थान पर नया घर बना लेती हैं। भारतीय मधुमक्खी में पश्चात्य (मेलीफेरा) मधुमक्खी की अपेक्षा यह आदत अधिक प्रबल हैं।

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वकछूट

बसंत के आते ही मौसम की अनुकूलता व मधु सम्बन्धी पुष्प उपलब्ध होने से मधुमक्खी प्रजनन तीव्र होने लगता हैं। अतः मधुमक्खियों की संख्या तीव्र गति स बढ़ती हैं। फलस्वरूप छत्ते के स्थान की कमी हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी रानी कुछ सदस्यों के साथ वंश को छोड़ देती हैं। इसे वकछूट या गण छोड़ना कहते हैं।

मधुमक्खी अपने वंशों की अनुकूल परिस्तिथियों में संख्या में बढ़ोतरी करती हैं जोकि मधुमक्खियों का मूल स्वभाव हैं। भारतीय मधुमक्खी में यह प्रवृति  बहुत अधिक पाई जाती हैं। यदि छत्ते ठीक प्रकार से न बने हो या बहुत पुराने  और टूटे-फूटे हो या रानी के अंडे देने के समय छत्ते में कोष्ठों की कमी या रानी अधिक आयु हो जाए या मधुरस के मुख्य स्राव से पहले वंश में मधुमक्खियों की संख्या अधिक हो तो कमेरी मधुमक्खी बगैर काम के रह जाती हैं और इन हालतों में वकछूट की संभावना काफी ज्यादा हो जाती हैं। इस तरह की वंश बढ़ोतरी मधुमक्खी पालक के लिए भरी समस्या हैं जिससे मधुमक्खी वंश शक्तिशाली नहीं रह एते हैं तथा शहद न के बराबर ही मिलता हैं।

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नियंत्रण

  1. मधुमक्खी वंशों को छत्तों वाली चौखटे देते रहने से भीड़ के कारण वकछूट को कम किया जा सकता हैं।
  2. वकछूट के समय रानी मधुमक्खी कोष्ठों को ख़त्म करते रहें।
  3. शिशु छत्तों की चौखटे निकलकर वंश में दे तथा उनकी जगह पर नये छ्त्ताधार ता छत्ते, रानी द्वारा अण्डे देने के लिए दें जिससे शिशु-पालन वाली मधुमक्खी अपने कार्य में जुट जाती हैं।
  4. वंश को अस्थायी तोर पर विभाजित करें तथा मधुर स्त्राव से पहले दोनों को फिर मिला दें।
  5. मधुमक्खी वंशों को विभाजित कर अपनी इच्छानुसार वंशों की संख्या बढ़ाई जा सकती हैं।

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लूटमार (Robbing)

कुछा मधुमक्ख्यां फूलों के अतिरिक्त अन्य स्त्रोतों से भी अपना भोजन लती हैं। तथा वे कभी-कभी अन्य मधुमक्खी ग्रहों से भी शहद चुरा लती हैं इसे लूटमार कहते हैं। जब फूलों का अभाव हो जाता हैं तो उस समय लूटमार की घटनाए बढ़ जाती हैं ऐसी स्थिति में लुटे हुए वंश कमजोर हो जाते हैं। घुसपैठी मधुमक्खी लुटे जाने वाले ग्रहों में सीधे प्रवेश न करके उस ग्रह की रक्षक मधुमक्खियों के ऊपर मंडराने लगती हैं तथा रक्षकों से बचकर अंदर प्रवेश कर जाती हैं।

रक्षक संख्या कम होने के कारण घुसपैठियों का सामना भी नहीं कर पाती। घुसपैठियों के अंदर घुसने के बाद लड़ाई भी होती हैं। इसमें दोनों को ही नुकसान होता हैं। लुटेरी मधुमक्खियां पहले रानी को तलाश करके उसे मारने का प्रयत्न करती हैं संख्या अधिक होने पर वे उस गृह का सारा शहद लूट लेती हैं। कभी-कभी चोर मधुमक्खियां अन्य रास्तों से जैसे दरारों से भी अंदर घुस जाती हैं। बाहर निकलने के लिए मुख्य द्वार का प्रयोग करती हैं।

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नियंत्रण

  • वंशों को कमजोर न होने दे।
  • कृतिम भोजन सूर्यास्त के बाद देकर भोजन पात्र को सूर्योदय से पहले निकाल ले। कृतिम भोजन गृह के पास न गिरे।
  • ग्रहों का निरक्षण करते समय ग्रहों को अधिक समय तक खुला न रखे जहां तक संभव हो जल्दी से जल्दी निरिक्षण करके ग्रहों को बंद कर दें।
  • ग्रह का प्रवेश द्वार भोजनकाल समय में कम कर दे।
  • लूटमार के समय ग्रह को कतई न खोले।
  • लुमार के समय ग्रहों के पास कार्बोलिन एसिड या फिनाइल से भीगा घास का गुच्छा रख देवे।
  • लुटे जाने वाले ग्रह को हटाकर 3 की.मी. दूर रख दे व खली डिब्बों में दोबारा शहद से भरी एक फ्रेम रख दे। शहद खत्म होने पर लुटेरी मक्खियां दोबारा वहां नहीं आएगी।

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मधुमक्खी की अन्य व्यवस्थाएं और प्रबंधन

कृत्रिम भोजन

सर्दियों में कुछ स्थानों पर मधुमक्खियों के लिए भोज के स्त्रोत नहीं मिलते या सर्दी अधिक होने से मधुमक्खियां घर छोड़कर बाहर नहीं आ सकती। इस समय इनको सही ढंग से पालने के लिए जरूरत के अनुसार 50-70% शक़्कर का शर्बत भोजन पात्र के अंदर पेटिका में रखकर दिया जाता हैं।

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – ISRAEL21c

बसंत के मौसम के आरम्भ में फूल खिलने से 15-20 दिन पहले कृतिम भोजन देने से लाभ होता हैं। क्योंकि यह वनाश की प्रजनन शक्ति को बढ़ाता हैं तथा कमेरी मधुमक्खियों की मधुरस तथा प्राग इकट्ठा करने की इच्छा को जगाता हैं।

इस कृत्रिम भोजन की उन जगहों में जरूरत नहीं पड़ती, जहां सर्दी अधिक न हो और सरसों जाती की फसलों से भोजन मिलता रहें। वकछूट तथा गर्मी के मौसम में भोजन की कमी को पूरा करने के लिए  कृत्रिम भोजन की आवश्यकता हो सकती हैं।

शहद निकालते समय वंश की जरूरत के अनुसार शहद छोड़ देना चाहिए जिससे प्रायः कृत्रिम भोजन देने की आवश्यकता न पड़ें। अगर मधुकमखियों को प्राग ठीक मात्रा में मिलता रहें तो वंश की प्रजनन प्रक्रिया जारी रहती हैं।  अन्यथा कई बार ठप भी हो जाती हैं।

इस हालत में प्राग परिपक्व भोजन देकर वंशों को शक्तिशली बनाया जा सकता हैं। तेल-निकल हुआ सोयाबीन का आटा, खमीर, शक़्कर और थोड़े शहद का मिश्रण पराग का एक अच्छा परिपूरक हैं जिसको मधुमक्खियां अच्छी तरह स्वीकार कर लेती हैं।

इसमें यदि 5% मधुकमखियों द्वारा इकट्ठा किया पराग मिलाया जाए तो यह परिपूरक उत्तम हो जाता हैं। जब मधुकमाक्खियों को अधिक पराग उपलब्ध हो तो पेटिका के प्रवेश द्वार पर पराग पाश के प्रयोग से प्राग एकत्र किया जा सकता हैं।

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पानी की व्यवस्था

जब मधुरस के फूल न हो तथा वंश इक्क्ठा किए हुए शहद को खा रहा हो तो पानी की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि परिचारिका मधुमक्खियां उस संग्रहित मधु में पानी मिलकर शिशुओं को खिलाती है।

गर्मी के मौसम में पानी छत्तों पर छिड़ककर मधुमक्खियां पंखों से पंखा कर तापमान कम करती है। इसलिए मधुमक्खी गृहों वाली जगह में पानी होना जरुरी है।

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – honeybeesuite.com

बहता हुआ पानी, किस बर्तन में रखे पानी से ज्यादा अच्छा होता है। क्योंकि स्थिर पानी से बीमारियां फैलने का खतरा ज्यादा रहता है।

यदि पानी का प्रबंधन करना हो तो घड़े के तले में छोटा छेद करें जिसमे धागे की बत्ती फंसा दे। इस घड़े को तिपाई पर रखें ताकि पानी बून्द-बून्द टपके। पानी की बून्द ढलानकार पत्थर या लकड़ी के टुकड़े पर गिराए।

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मधुमक्खी वंशों का विभाजन व मेल

वकछूट प्राकृतिक ढंग है जिससे वंशों की संख्या को बढ़ा सकते है। परन्तु यह उत्तम ढंग नहीं है इसलिए वंशों का विभाजन एक उपयुक्त ढंग है।

बसंत ऋतु में शक्तिशाली वंशों में दो या तीन शिशुकक्ष चौखटे मधुमक्खियों के साथ, एक चौखट नए अण्डों की तथा एक चौखट पराग व मकरकन्द की लेकर छोटे मधुमक्खी गृह में रखकर उन्हें मधुमक्खी स्थल से दूर ले जाएं तथा उन्हें नई रानी मधुमक्खी दे।

यदि नई रानी नहीं हो तो भी अण्डों से यह विभाजन नई रानी मधुमक्खी का पालन कर लेता है। यह छोटे छोटे वंश ग्रीष्म  ऋतू तक पूर्ण तथा अच्छे मधुमक्खी वंश बन जाते है।

कई परिस्थितियों में कमजोर या रानी रहित वंशों को अन्य वंशों में मिलाने की जरुरत होती है, क्योंकि कमजोर वंश सर्दी के प्रकोप को सहन नहीं कर सकते व न ही शहद उत्पादन में उपयोगी साबित होते है। दो वंशो को मिलाने के लिए विशेष सावधानी अपनानी पड़ती है अन्यथा मधुमक्खियां आपस में लड़ाई करने लग जाएगी।

इस कार्य के लिए जिन दो वंशों को मिलाना हो और उन दोनों वंशन में रानी हो तो जिस वंश में कमजोर रानी हो उसे निकाल दिया जाता है। रानी वाले वंश को जिस वंश में मिलाना हो उस और प्रतिदिन एक-एक फुट खिसकाया जाता है।

जब दोनों वंश एक दूसरे के निकट आ जाये तो इन्हे मिलाने के लिए रानी वाले वंश के शिशु कक्ष के ऊपर अख़बार का पन्ना जिसमे छोटे-छोटे छिद्रr  किये हों, रखकर तथा इस पर निचे की तरफ थोड़ा-थोड़ा शहद लगा दिया जाता है।

फिर उसके ऊपर मिलाये जाने वाले रानी रहित वंश का शिशु कक्ष रख कर ऊपर ढक्क्न लगा दिया जाता है। धीरे-धीरे दोनों वंशो की गंध मिल जाती है व कमेरी मधुमक्खी कागज को काट देती है। दो वंशो को मिलाने का काम सांयकाल में किया जाता है।

रानी मधुमक्खी बनाने की कृत्रिम विधि (Artificial method of making queen bee)

वंश विभाजन या पुरानी रानी मधुमक्खी को बदलने के समय नई रानी की जरुरत आवश्यकता पड़ती है। वैसे रानी रहित वंश में स्वयं ही रानी कोष्ट बन जाते है। परन्तु एक ही समय वंश में रानी मधुमक्खियों को कृत्रिम विधि से बनाना उचित है।

मधुमक्खियों के घरछूट के समय तथा पराग व मधुरस का भण्डार अधिक मात्रा में होने पर रानी मधुमक्खी बनाई जाये तो अधिक उपयुक्त होता है।

कृत्रिम विधि से रानी रहित या रानी सहित वंशों में भी नई रानी बना सकते है। उचित आकर की लकड़ी की गोल छड़ से बने मोमी रानी कपों को लकड़ी के समतल छड़ में लगाकर एक चौखट में फसा देते है।

अण्डें से 24 घंटे के अंदर निकले बच्चों को इन कपों में ग्राफ्टिंग सुई से स्थान्तरित किया जाता है। इस चौखट को रानी कोष्ट निर्मित वाली कॉलोनी में कमेरी मक्खियों के मध्य लटका दिया जाता है। ग्राफ्टिंग के 10 दिन बाद, सील बन्द रानी कोष्ठों को निकालकर अलग रानी को पालने वाली कॉलोनी में रखा जाता है।

जैसे ही रानी मधुमक्खी कोष्ठों से बहार निकलती है उन्हें रानी पिंजरों में पोषण करने वाली मधुमक्खी के साथ बंद कर देते है। वंश में रानी मधुमक्खी देने के समय इस पिंजरे से 24 घंटे बाद रानी मधुमक्खी को छोड़ा जाता है।

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नई रानी का वंश में प्रवेश

नई रानी तैयार करने के बाद वंचित मधुमक्खी गृहों में नई रानी को प्रवेश कराया जाता है। इसके लिए रानी पिंजरे का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि प्रत्येक वंश की रानी की गंध अलग होती है व प्रवेश की जाने वाली रानी को स्वीकार करने के लिए 24-28 घंटे लगते है। अतः रानी मक्खी को रानी पिंजरे में 4-5 कमेरी मधुमक्खियों सहित, रानी विहीन वंश में दो मधुमक्खी चौखटों के बिच में लटका दिया जाता है। 24 घंटे के बाद रानी को मधुमक्खी के छत्ते में छोड़कर निरिक्षण करे।

यदि रानी ठीक प्रकार से मधुमक्खियों के बीच घूमने लगे व मधुमक्खियां उसे इधर-उधर न घसीटें तो समझना चाहिए की नई रानी मधुमक्खी वंश में स्वीकार्य है अन्यथा रानी मक्खी को पुनः पिंजरे में बंद कर दे तथा अगले 12-24घंटे बाद वंश में रानी का प्रवेश करवाने का एक अन्य ढंग भी है जिसमे की रानी पिंजरे में रानी व कमेरी मधुमक्खियां डालने के पश्चात् पिंजरे के द्धार को चीनी व शहद से बनाई गई केन्डी से बंद कर दिया जाता है।

मधुमक्खी परिवार का विभिन्न मौसमों में प्रबंधन

मधुमक्खी पालन(Bee keeping) में समन्वित कार्यों को मधुकमाक्खी वंश प्रबंधन कहां जाता हैं जिसका उद्देश्य शहद बनने से पूर्व मधुमक्खी संख्या में अत्यधिक वृद्धि करना हैं ताकि मधुस्राव का पूर्ण लाभ उठा सके। परन्तु जब मधुरस और पराग के स्त्रोतों की कमी हो तो वंशों में वृद्धि कम होनी चाहिए और पुनः मधुस्राव से पूर्व प्रजनन तेज हो जाना चाहिए। अतः इसे ध्यान में रखते हुए मधुमक्खी वंशों के प्रबंध की योजना मौसम और वातावरण के अनुसार बहुत जरूरी हैं।

ठन्डे स्थानों में शीत ऋतू में शिशु पालन और प्रजनन का कार्य बहुत कम या बंद हो जाता हैं। और मधुमक्खी केवल मधुमक्खी ग्रहों में ही रहती हैं। बसंत ऋतू में ऐसे स्थानों में प्रजनन का कार्य होता हैं तथा वंश की तेजी से बढ़ोतरी होती हैं। इसके बाद फूल उपलब्ध होने के कारण शहद इकट्ठा करने व बक्सों में मधुमक्खियों की संख्या बढ़ाने पर यह उपयुक्त समय हैं।

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मई के अंत में शहद निकलने की संभावना हो सकती हैं। बसंत में लूटमार व वकछूट की संभावना रहती हैं। इसलिए बक्सों को अधिक देर तक खुला न छोड़े व रोकथाम के उपयुक्त उपाय करने चाहिए।

 कीटनाशक का मधुमक्खियों पर प्रभाव व बचाव

फसलों के शत्रु, कीट, फफूंदी, कीटाणु और विष्णु रोगों की रोकथाम के लिए कई प्रकार के रसायन प्रयोग किये जाते हैं, जिनसे मधुमक्खियों पर दुष्प्रभाव पड़ता हैं। विषयुक्त प्रभाव से तथा अधिक भूमि में फसल उगने से मधुमक्खियों के अलावा दूसरे परागण करने वाले कीटों की संख्या भी कम होती जा रही हैं तथा आमतौर पर मधुमक्खी पर फसल के परागण के लिए निर्भर करना पड़ेगा इसलिए जहां उपज की बढ़ोतरी के लिए कीटों व रोगो से बचाव करना हैं वहां मक्खियों को रसायनों के विष से बचाना हैं।

यदि फूल खिलने की अवस्था में रसायन का छिड़काव या भुरकाव हो जाता हैं तो मधमक्खियाँ विषयुक्त हो जाती हैं तथा लौटते समय रास्ते या खेत में लुढ़क कर मर जाती हैं।

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कीटनाशक दवाएं तीन तरह जैसे धूमन से, सम्पर्क में आने से व खाने से पाचन प्रणाली द्वारा मक्खी के शरीर में पहुंच जाती हैं तथा आमतौर पर इनके प्रभाव से पंख, पैर और पाचन प्रणाली काम करना बंध कर देते हैं। इस प्रकार वे मर जाती हैं तथा मधुमक्खी वंश अधिक कमजोर पड़ते चले जाते हैं।

फसल पर प्रयोग किए गए जहर का शहद में मिलना संभव नहीं हैं क्योंकि जैसे ही मधुमक्खी इसका अनुभव करती हैं वैसे ही वो मधुमक्खी घर से बाहर आकर मर जाती हैं। यदि जहरीला मकरन्द  मधुमक्खी ले लेती हैं तो भी उसे विष का पता चल जाता हैं और वो इसको अन्य काम करने वाली मक्खियों को नहीं देती हैं। इसके बावजूद काम करने वाली मधुमक्खी को जहर का असर हो जाए तो वो इस मकरन्द या आपके शहद को छत्ते में संग्रहित नहीं करती हैं।

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विषयुक्त रसायनों की किस्में

अत्यधिक विषयुक्त रसायन

यह रसायन छिड़काव या बुरकाव के एक दिन बाद तक मधुमक्खियों को हानि पहुंचाते हैं इस श्रेणी में निम्न रसायन हैं

क्लोरोपायरीफास, फेनथियम, डायएल्ड्रिन, कार्बोफ्यूरान, फोसड्रीन, डायमेथेट, डायजिन, ई.पी.एन., फेनीट्रोथियान, सेटासिड, डायक्लोरोबास, एल्डीकोव, लिंडेन, मिथाइल, पैराथियान, बी.एच.सी. फॉसफॉमिडान, कर्बरील, मेथामिडफास।

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मध्यम विषयुक्त रसायन

ये रसायन सावधानी से फसलों पर प्रयोग से किए जा सकते है।

एल्ड्रिन, डायसल्फोटॉन, परसेवेल, क्लोरडेन, डेमेटॉन, फोसालोन, मेटॉसिटॉक्स, फोरेट।

कम विषयुक्त या सुरक्षित रसायन

कीटनाशक

एलेथ्रिन, निकोटिन, क्लोरडाण्जिलेट, रेटिनान, विनयेकरिल, फरवटेनक्स, डायकोफल, टेट्रायडायफोन, क्लोरडायमीफॉरम, पाइरोजम, फेसोन, मैनाजोन, टॉक्सफिन।

फफूंदी नाशक

बेनोमिल, कॉपर सल्फेट, मेंजेब, बोडोमिक्चर, फालसिड – डायथेन, नाबाम, केप्टाफाल, काल्टन, थीरम, केप्टान, मानेब जीरम।

मधुमक्खियों का विषीकरण से बचाव

फसल पर रसायन प्रयोग करने से पहले यह जान लेना चाहिए की परागण करने वाली मधुमक्खी या दूसरे कोई कीट तो नहीं है। शत्रु कीट या बीमारी से फसल को कितनी हानि होगी ? यदि शत्रुओं को रोकना है तो रसायन का प्रयोग न करें, उनकी रोकथाम किसी दूसरे तरीके से करे।

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यदि जहरीला रसायन प्रयोग में लाना पड़े तो निम्न लिखित बातो का ध्यान रखें

  1. रसायनो का प्रयोग फसल पर तभी करे जब मधुमक्खियां उन पर काम न कर रही हो।
  2. इनका छिड़काव करते समय मधुमक्खियों के घरों को उठा कर दूर रखे।
  3. इन दवाओं के प्रयोग करते समय यह जान ले की हर कीट या रोग के लिए एक से अधिक रसायन हो सकते है इसलिए कम जहरीले तथा कम गाढ़े कीटनाशकों का प्रयोग करें।
  4. रसायनों को प्रयोग करते समय मधुमक्खी घरों को ढकना तथा प्रवेश द्वार को जाली से बंद करना ठीक होगा तथा मधुमक्खी 12-24 घंटे बंद रहकर विष से बच जाती है।
  5. मधुमखियों को रसायन के छिड़काव के दौरान सुरक्षित स्थान पर स्थाई ढंग से स्थान्तरित करें तथा बाद में वापिस ले आये।

मधुमक्खी पालन की शुरुआत

मधुमक्खी पालन शुरू करने के लिए आवश्यक है की पहले प्रक्षिक्षण प्राप्त किया जाए और मधुमक्खियों के बारे में सभी जानकारी हो।

प्रक्षिक्षण के लिए निम्नलिखित स्थानों पर सम्पर्क कर सकते है।

मधुमक्खी प्रशिक्षण केन्द्र

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KHADI AND VILLAGE INDUSTRIES COMMISSION
BEE-KEEPING TRAINING CENTRES
Accredited Specialised Training Centres for Bee Keeping
Sr. Name and Address of Centre
1 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, At & PO, Jonha-835103, Dist.Ranchi, (Jharkhand)
2 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Gen. Mahadev Singh Road, Kanwali, Dehradun, (Uttranchal) 
3 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Kharar Road, Dist. Fatehgarh Sahib, Bassipathana-40412(Punjab) 
4 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, PO-Gandhi Nagar, Khetri-782403 (Assam) 
5 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, 18-A,Cave Street, Kanyakumari Dist.Nagarcoil-629001(TN) 
6 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Himalayan Farm, Bareli Road, Haldwani-263139,Nainital (Uttaranchal) 
7 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Pialitown, Dist. 24,Parganas -743387 (WB) 
8 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Panjokhara, Po.ViaKandhala(Muzaffarnagar-247775 Uttarpradesh) 
9 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Sakhigopal, Dist.Puri -752014(Orissa) 
10 Bee Keeping Extension Centre,
ZillaK G. Sangh, Sarvodayagram, Muzaffarpur-842002(Bihar) 
11 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Mehsi, Maruabad, Mehsi, East Champaran-845426 (Bihar) 
12 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Vijayarai, Dist.West Godavari-534175 (AP) 
13 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Bhatyari, Po-Kanhal,Dist. Jammu-818132 (J&K) 
14 Bee Keeping Extension Centre,
Khadi & Village Industries Commission, Amb, Dist.UNA (HP) 

Image Credit – KHADI AND VILLAGE INDUSTRIES COMMISSION

जिस स्थान पर मधुमक्खियां रखनी हो वहां पर हवा का आगमन ठीक ढंग से हो, यह वर्षा ऋतू में अधिक आवश्यक है। क्योंकि हवा रुकी रहे तो हवा में नमी अधिक होने से मधुमक्खियां सुस्त हो जाएगी।

इसके पास किसी पानी के प्राकृतिक या अप्राकृतिक स्रोत का भी होना आवश्यक है।

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मधुमक्खी स्थान की स्थापना

मधुमक्खी पालन में पूर्ण सफलता प्राप्त के करने के लिए स्थान का सही चयन करना बहुत जरुरी है। जिस स्थान पर मधुमक्खियों को एक बार रख दिया जाता है तो वहां से उन्हें हटाना आसान नहीं है क्योंकि मधुमक्खियां हवा में अपने मधुमक्खी गृह के प्रवेश द्वार तक एक विशेष प्रकार की सुगंध छोड़कर कर रास्ता बना लेती है, जिसके द्वारा वह अपने घर को पहचानती है।

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – The Natural History Log

गृह के चरों और एक किलोमीटर की दुरी तक मधुमक्खियों का परिचित उड़ान क्षेत्र होता है। मधुमक्खी परिवार को अचानक कुछ दुरी पर ले जाने से कमेरी मक्खियां वापिस पुरानी जगह पर आकर भटक जाती है।

गृह को तेज हवा, बिजली के तारों के पास, झड़ी अथवा रुकावट वाले स्थान आदि के पास नहीं रखना चाहिए।

मधुमक्खियों के शत्रु, बीमारी एवं उनका निदान व प्रबंधन

मोमी पतंगा, परभक्षी ततैया, चिड़िया, छिपकली, मेंढक, परजीवी अष्टपदीयां, चींटिया, गिरगिट इत्यादि मधुमक्खियों के प्रमुख शत्रु हैं तथा गृह में चल रही गतिविधियों में असुविधा का कारण बनते है।

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प्रमुख शत्रु

मोमी पतंगा

तितली नुमा इस कीट की सुंडी स्लेटी रंग की होती है। इसकी सुन्डिया छत्तों पर सुरंग सी बनाते हुए उनमे सफेद तंतुओं का जाल बुनती है। इस तरह पूरा छत्ता नष्ट हो जाता है। यह मधुमक्खी गृह तथा भंडारित छत्तों का शत्रु है। वंशो में इसका प्रकोप तब होता है जब मधुमक्खी गृह में में जरुरत से ज्यादा छत्तों वाली चोखटें हो और उन पर मधुमखियां न हो।

परजीवी अष्टपदी

मोमी पतंगा

मादा पतंगा मधुमक्खी गृह के तलपट, छिद्रों, दरारों व खाली छत्तों में अण्डें देती है। वर्षा ऋतू में यह कीड़ा मधुमक्खियों को ज्यादा हानि पहुंचाता है।

इसके प्रकोप से ग्रसित मधुमक्खी वंश कमजोर पद जाते है। छत्तों में जले लग जाने से रानी मक्खी अण्डें देना बंद कर देती है।

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मोमी पतंगा नियंत्रण के उपाय

इस शत्रु से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए।
  1. कमजोर मधुमक्खी वंशों को आपस में मिलाएं अथवा इन्हे शक्तिशाली बनाए।
  2. आवश्यकता से अधिक छत्तों को वंश से निकालकर भंडारित करना चाहिए इनका भंडारण इस तरह से करें ताकि यह मोमी पतंगे इन पर अंडे न दे सकें। इसके लिए किसी ऐसे कमरे, जिसमे धूमन के लिए हवा का आवागमन रोका जा सकें, का प्रयोग करें। यदि आवश्यकता होतो ऐसे छत्तो को सल्फर डालकर या इथीलीन डायब्रोमाइड या पैराडाक्लोरो बेनजीन से धूमन करें।
  3. मोमी पतंगों से प्रभावित छत्तों को निकालकर मोम निकालने के काम में लाएं या नष्ट कर दें।
  4. मधुमक्खी गृहों के सभी छिद्रों व दरारों को भली-भांति गोबर या कीचड़ से बंद कर दें।
  5. मोमी पतंगों के अण्डों को नष्ट करें। छत्तों को सूर्य की गर्मी में रखें ताकि पतंगों की सुंडियां नष्ट हो जाए। तलपट्टे की सफाई 15 दिन के अंतराल पर करते रहें ताकि मोमी पतंगों की सुंडियों और अण्डों का सफाया हो जाए।

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परभक्षी ततैया

ये युवा मधुमक्खियों, इनके अण्डों, शिशुओं व शहद को अत्यधिक हानि पहुंचाते हैं.ये मधुमक्खी गृह द्वार के पास बैठकर गृह से निकलती, बाहर से भोजन लेकर आती मधुमक्खियों को पकड़कर काटता हैं व शहद ग्रंथियों को निकालकर खाता हैं। इनके प्रकोप से वंश कुछ ही समय में समाप्त हो सकता हैं या मधुमक्खियां गृह छोड़कर भाग जाती हैं। ये जुलाई-अगस्त में अत्यधिक हानि पहुँचाते हैं।

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – Alchetron

नियंत्रण

  1. फरवरी के अंत में या मार्च के शुरू में परभक्षी ततैया की रानी निकलती हैं और वो मधुमक्खी वंशों पर आक्रमण करती हैं। जैसे ही यह गृह में आना आरम्भ करें इसे एक पतली लकड़ी की फट्टी की सहायता से मर देना चाहिए। ऐसा देखा गया हैं की पहले आने वाले मादा ततैया होते हैं। इन्हे मरने से इनके वंश की स्थापना नहीं होती।
  2. मधुमक्खी गृह के चारों और २ किलोमीटर की दुरी तक इनके छत्तों की खोज करके छत्तों को जलाना चाहिए या कीटनाशक दवाइयों से खत्म करना चाहिए।
  3. मधुमक्खी गृह का प्रवेश द्वार छोटा करना चाहिए।

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चींटियां

ये मधुमक्खी गृह से शहद एवं अण्डों की चोरी करती हैं। इससे बचाव के लिए मधुमक्खी गृह के पायों को पानी भरी प्यालियों में रखें ताकि बक्सों के आस-पास की जगह साफ सुथरी हो तथा वहां पर कोई मीठा पदार्थ नहीं होना चाहिए। यदि मधुमक्खी गृह के समीप इनकी कॉलोनियां हो तो उन्हें नष्ट करें।

हरी चिड़ियाँ

हरी चिड़िया मधुमक्खियों के प्रमुख शत्रुओं में से एक हैं। हरे तथा मटियाले रंग की चिड़िया उड़ती हुई मक्खियों को पकड़ कर उन्हें अपना भोजन बनती हैं। इनका आक्रमण फूलों की कमी वाले महीनों में ज्यादा होता हैं।

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – telegraph.co.uk

अगर आकाश में बदल छाये हुए हो तथा आसपास घने पेड़-पौधे हो तो यह समस्या और भी गंभीर रूप धारण कर लेती हैं। इन्हे लगातार डराकर उड़ा देना चाहिए। कंकड़, पत्थर या मिट्टी की बनी गोली से पक्षी को मरकर भगाएं। मधुमक्खी पेटियों को घने पेड़ों के निचे रखें। यदि पेड़ों की 3-4 पंक्तियाँ हो तो पक्षियों को उड़न लेने में कठिनाई होती हैं, तथा प्रकोप बहुत कम हो जाता हैं।

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परजीवी अष्टपदी (Parasite all-round)

कई प्रकार की अष्टपदियाँ मधुमक्खियों का रक्त चूसकर निर्वाह करती हैं। आंतरिक अष्टपदी मधुमक्खी में एकेरीना रोग का कारण हैं। ग्रसित मधुमक्खी दूसरी मधुमक्खी में आकर इस रोग को फैलाती हैं। इस परजीवी के प्रकोप से मधुमक्खी वंश में क्षीणता आती हैं और ये धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए सल्फर का धुँआ लाभदायक होता हैं।

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

परजीवी अष्टपदी

इसके लिए मोटे कागज को 30% पोटेशियम नाइट्रेट के घोल में डुबोकर सूखा लें। इन कागजों को धुआंकर में डालकर इसके धुए को मधुमक्खी पर छोड़े। यह धुँआ शरद ऋतू के शुरू या अंत में करना उचित हैं। 5 मि.ली. फारमिक अम्ल को एक छोटी शीशी में डालकर उस पर रुई का ढक्क्न लगा दें। 15-20 दिन के लगातार धूमन से अष्टपदियाँ खत्म हो जाती हैं।

अष्टपदी की कुछ जातियां मधुमक्खी के बाहरी भागों से रक्त चूसकर निर्वाह करती हैं। इसकी दो प्रजातियां हैं जो की मधुमक्खी वंशों को काफी नुकसान पहुंचाती हैं। ट्रोपीलिलेप्स एवं वरोआ दोनों अष्टपदियाँ मधुमक्खी के ऊपर चिपककर उसका खून चुस्ती हैं और इनके प्रकोप से मधुमक्खियों के शिशुओं का पूर्ण विकास नहीं हो पाता हैं।

इन दोनों प्रजातियों का प्रकोप आजकल मेलीफेरा पर अत्यधिक हो रहा हैं। ये अष्टपदियाँ मधुमक्खी शिशु का रस चुस्ती हैं। ये प्रौढ़ नहीं बन पाते और बन भी जाए तो पंख या टाँगें ठीक से विकसित नहीं हो पाती और उनका आकार छोटा रह जाता हैं। ट्रोपीलीलेपस का उपचार सल्फर धुए द्वारा शिशु कक्ष की चौखटों की ऊपरी पट्टी पर मधुस्राव के समय 10 दिन के अंतराल पर करें।

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नियंत्रण

बरोआ माईट के नियंत्रण के लिए फारमिक एसिड 85% 5 मि.ली. प्रतिदिन लगातार 15 दिन तक कांच की छोटी शीशी में रुई की बत्ती बनाकर इस तरह इस्तेमाल करे की बत्ती शीशी की तली को छुए और उसका दूसरा हिस्सा शीशी से बाहर निकला रहे ताकि फारमिक एसिड के फ्यूमज अच्छी तरह मधुमक्खी बक्से में फेल सके।

फारमिक एसिड का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरते क्योंकि फारमिक एसिड चमड़ी और आँखों के लिए काफी घातक है।

प्रमुख बीमारियां

अमेरिकन फाउल ब्रूड  (A.F.B.)

इसका प्रभाव इटेलियन मधुमक्खी पर ज्यादा होता है। इस रोग से ग्रस्त शिशुओं से दुर्गन्ध आने लगती है। यह दुर्गन्ध गंधक के तेजाब जैसी होती है। उसका कारण लेसिलस लार्वा जीवाणु है। इसके विष्णु भोजन से 2-3 दिन में इल्ली (शिशु) के शरीर में प्रवेश कर जाते है।

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – Bee Informed Partnership

इनका प्रभाव शुरू में नहीं होता है क्योंकि तब इल्लियों को शहद खूब खाने को मिलता है। लेकिन जैसे-जैसे शहद की मात्रा कम हो जाती है यह तेजी से बढ़ता है। इसके प्रकोप से इल्ली की अंतिम अवस्था तथा प्यूपा की प्रारंभिक अवस्था में मृत्यु हो जाती है।

बदबू के अलावा खुले कोष्ठों में मृत शिशु का मिलना, बंद टोपियों का रंग बदलना व उसमे सुराख़ होना मृत शिशु के शरीर में सिंक चुभो कर खींचने धागा बन जाना, मृत शिशु के शरीर का रंग पीला होना आदि से इसकी पहचान की जा सकती है।

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यूरोपियन फाउल ब्रूड (E.F.B.)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – Bee Informed Partnership

इससे ग्रस्त शिशुओं के शरीर से सदी हुई मछली के समान दुर्गन्ध आती है, व शिशु 4-5 दिन की अवस्था में ही मर जाते है। ये बेसिलस लार्वा, बेसिलस पैरा उल्वी व लिटरोस्पेस नामक जीवाणु के कारण होती है। इससे ग्रसित शिशुओं को आसानी से निकला जा सकता है व इसमें सुई चुभों कर खींचने पर या तो धागा बनता है या नहीं बनता या फिर बहुत बारीक बनता है।

सैक ब्रूड (S.B.)

यह बीमारी मधुमक्खियों के शिशुओं में कोष्ठ बंद होने से पहले आती है। इसमें सुंडी में पहले बहार की चमड़ी मोटी हो जाती है, और अंदर के अंग पानी की तरह हो जाते है।

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – agric.wa.gov.au

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यह एक विषाणु रोग है। इसका कोई नियंत्रण नहीं है। परन्तु यह रोग शक्तिशाली वंशो में कम पाया जाता है। इसके प्रकोप को कम करने के लिए कॉलोनी की साफ-सफाई रखना अति आवश्यक है।

निदान

इनकी रोकथाम के लिए एन्टी-बायोटिक का प्रयोग करना चाहिए। यदि प्रकोप तीव्र हो तो छत्तों को नष्ट कर देना ही ठीक रहता है। टेरामाइसिन 250 मिलीग्राम प्रति 5 लीटर चीनी के घोल में देना चाहिए। इसे प्रति सप्ताह दोहराएं। प्रभावित बक्सों व उपकरणों को फार्मेलिन से जीवाणु रहित करना चाहिए।

मधुमक्खी एवं परागण

फल या बीज बनाने के लिए परागण प्रक्रिया बहुत आवश्यक होती है। फूलों के नर भाग से परागण मादा भाग के गर्भ दंड पर लग जाने को परागण कहते है। इस कार्य को पूरा करने में हवा, पानी, पक्षी, कीट सहायक होते है।

एक मधुमक्खी को 1 पोंड शहद एकत्र करने के लिए लगभग 32000 फूलों पर जाना पड़ता है तथा ये एक बार में 100 फूलों पर जाती है। एक शक्तिशाली मधुमक्खी वंश क1 वर्ष में 100-150 किग्रा. शहद और 20-30 किग्रा. पराग की आवश्यकता पड़ती है।

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विभिन फसलों की पैदावार बढ़ने के लिए मधुमक्खियों के बक्सों की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता एवं समय

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

क्र.स. फसल मौन बक्से

प्रति हेक्टेयर

1. सरसों 2-3
2. सूरजमुखी 4-5
3. बरसीम 2-3
4. लुर्सन 3-4
5. प्याज (बीज) 1-2
6. फूल गोभी (बीज) 2-3
7. पत्ता गोभी (बीज) 2-3
8. मूली (बीज) 1-5
9. शलगम बीज 2-3
10. सौंफ 2-3
11. नाशपाती 1-5
12. आडू 2-3
13. आलूबुखारा 2-5
14. लीची 4-5
15. स्ट्राबेरी 1-2

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मधुमक्खी पालन के लिए उपकरण

आधुनिक मधुमक्खी पालन के ढंगों से हम म धुमक्खी वंश की उत्तम व्यवस्था कर सकते है तथा अधिक मात्रा में और बढ़िया शहद ले सकते है। परम्परागत मधुमक्खी पालन में शहद में पराग, मोम एवं शिशु आदि के निचुड़ने से मिलावट हो जाती थी तथा ऐसा शहद पका हुआ न होने के कारण किण्वन हो जाता था। इन कमियों को आधुनिक मधुमक्खी बक्सों को प्रयोग में लाने से दूर किया गया है जो की दो मुख्य बातों पर आधारित है।

मधुमक्खी शिशुओं का पालन छत्ते के निचले भाग में, प्रवेश द्वार के पास व् मधु संचय ऊपरी भाग में तथा मुख्य द्वार से दुरी पर करती है।

छत्तों के बिच सामान अंतर होता है जिससे मधुमक्खियां उनके बिच आसानी से काम कर सकती है या गुम सकती है।

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मधुमक्खी पेटिका (Beehive)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – aliexpress.com

यह लकड़ी का बना छत्ते का आधार होता है। यह मधुमक्खियों के सवभाव के अनुसार सुविधाजनक बनाया गया है। बक्से में तलपट, शिशु कक्ष, मधुकक्ष, अंदर का ढक्क्न रोधक जाली, डम्मी बोर्ड, शिशु कक्ष रोधक जाली, रानी रोधक जाली, चोखटें(फ्रेम), स्टेण्ड, व बाहरी ढक्क्न आदि भाग होते है। प्रत्येक कक्ष में लकड़ी के बने 10-10 चौखटे होते है। बक्से गंध रहित लकड़ी से तैयार किये जाते है जैसे – केल, शीशम, तनु, आम इत्यादि। कैल की लकड़ी साफ़, नरम एवं वजन में हल्की होने के कारन मधुमक्खी पालन के लिए उपयुक्त साबित हुई है।

छत्ताधार (Comb Foundation)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

यह मोम का बना छत्ते का आधार होता है। यह मधुमक्खियों द्वारा पैदा किए गए मोम की पतली  चादर होती है जिस पर मशीन से कोष्ठक उभार दिए जाते है। इसे प्रत्येक चौखट के मध्य लगा दिया जाता है। मधुमक्खी इसी पर छत्ता बनाने के लिए बाध्य हो जाती है। जिससे मधुमक्खियों का समय और मेहनत कम लगाती है।

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रानी रोकपट्ट (Queen excluder)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

Image Credit – Paynes Bee Farm

यह लोहे की पतली जाली होती है जिसे शिशु खंड तथा मधुखंड के बिच लगाया जाता है ताकि रानी मक्खी शिशु खंड से मधुखंड में न जा सके। इस जाली से कमेरी मक्खियां आसानी से आ जा सकता है।

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धुआंकर(Smoker)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

image credit-Mr Honey Bees Farm

यह यंत्र टिन का बना हुआ भीतर से खोखला होता है। इसके एक सिरे पर लकड़ी, कपडे, या उपले रखकर जला दिया जाता है। इस यंत्र को दबाने पर पतले भाग से धुंआ निकलता है। इसका प्रयोग मधुमक्खी परिवार का निरक्षण करते समय तथा शहद निकालते समय किया जाता है क्योंकि धुंआ छोड़ने से मधुमक्खियां शान्त हो जाती है।

दस्ताने (Hands gloves)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

image credit-lawnandpestcontrolsupply.com

यह प्लास्टिक, जीन, कपड़ा या रबर के बने कोहनी तक लम्बे होते है। शुरू में इनको हाथों में पहनकर मक्खियों का निरक्षण किया जाता है ताकि मक्खी गुस्से में डांक न मार सके परन्तु कुछ अनुभव के बाद मधुमक्खि पालक इनका इस्तेमाल छोड़ देते है। क्योंकि दस्ताने पहनने से रख-रखाव का काम ठीक से नहीं हो पता है।

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नकाब (Veil)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

image credit-Amazon.in

यह एक प्लास्टिक या तर की बानी जाली वाली टोपी होती है। यह निरक्षण के समय मक्खी के डांक से चेहरे, गले आदि को बचती है।

नरपाश (Drone trep)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

जब नर मधुमक्खी की संख्या ज्यादा हो जाती है तो उन्हें फंसा कर नष्ट करने या एक जगह से दूसरी जगह बदलने के लिए इस ट्रेप का इस्तेमाल किया जाता है।

द्वार रक्षक (Door slit)

यह पतली लकड़ी का बना हुआ प्रवेश द्वार की लम्बाई के बराबर होता है जिससे प्रवेशद्वार को आवश्यकता अनुसार घटाया बढ़ाया जा सकता है।

शहद निष्कासन यंत्र (Honey extractor)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

image credit-gumtree.com.au

यह लोहे की चादर का ड्रम जैसा बना होता है। इसके अंदर घूमने वाला पिंजरा होता है। जिसको ऊपर लगे हुए गियर पहिये से घुमाया जाता है। सील बंद छत्तों की टोपियों को काटकर पिंजरे में बनी जगह में रख दिया जाता है। घूमने के कारण शहद छिटक कर बहार आ जाता है और ड्रम के तले में इक्क्ठा हो जाता है।

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छीलन चाकू

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

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यह इस्पात का करीब 1 इंच लम्बा व् 2 इंच चौड़ा तेज धार वाला दो मुँहा चाकू होता है। जिससे शहद भरे छत्तों की कोष्ठों की टोपियों को काटा जाता है।

बक्सा औजार (Hive tool)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

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यह लोहे की खुरपी होती है जिसे 9 इंच लम्बी, 2 इंच छोड़ी तथा 2 सूत मोटी लोहे की पत्ती से बनाया जाता है। इसका सिरा 90 डिग्री के कोण पर 0.5 इंच मुदा होता है तथा दूसरे सिरे पर धार बानी होती है। मुड़े हुए भाग के पास कील निकालने लिए एक छेद होता है। बक्सा औजार का उपयोग मधुमक्खी बॉक्स की साफ-सफाई, चौखटों को अलग करने तथा कीलों को लगाने निकालने में किया जाता है।

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ब्रश (Brush)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

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यह बहुत ही नरम बालों का होता है और शहद निकलने के समय मधुमक्खियों को उनके छत्तों से हटाने के काम में लिया जाता है।

शहद निकालना (Honey extraction)

मधुमक्खी पालन (Bee keeping)

शहद निकलते समय यह अति आवश्यक है कि शहद केवल उन्ही चौखटों से निकले जिन पर तीन चौथाई भाग पर मोमी टोपिया लग गई हो। बाकि चौखटों से शहद न निकाले क्योंकि यह कच्चा होता है इनमे नमी की मात्रा अधिक होने के कारण खमीर बनाने का खतरा रहता है और शहद में खट्टापन आ जाता है।

छत्ते से शहद निकालने के लिए मधुमक्खियों को हल्का धुंआ दे और किसी अच्छे ब्रश से मधुमक्खियों को छत्ते से हटा दे। शहद के छत्ते को खली बक्सों में रखे और शहद निकलने के लिए ले जाये। मधुमक्खियों की जरुरत के अनुसार शहद छत्तों में छोड़ दे। .मधुमक्खी परिवार की क्षमता को देखते हुए प्रत्येक वंश में 5 किग्रा. शहद होना आवश्यक है।

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छत्तों से शहद निकालने के बाद छत्तों को मधुमक्खी वंशों को दे दे। चोरी व लड़ाई रोकने के लिए बक्सों का प्रवेश द्वार बंद करें। तजा निकाले शहद को साफ करना आसान है। इसलिए ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए की सफाई और डिब्बाबंदी का जल्दी से जल्दी हो जाये और शहद को दोबारा गर्म न करने पड़े। छत्ते से मोमी टोपिया निकालते समय प्राप्त मोम से शहद निकाले और फिर मोमो को मलमल के कपडे से बांधकर उबलते पानी में डाल कर शुद्ध मोम प्राप्त किया जा सकता है। शहद निष्कासन के बाद प्रयोग किये गए उपकारों को साफ करे।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत उद्यान विभाग के द्वारा किसानों को दी जाने वाली सुविधाएँ

क्र.स. कार्यक्रम अनुदान अनुदान की अधिकतम सीमा व विवरण

कार्यक्षेत्र

1. मधुमक्खियों के माध्यम से परागीकरण
2. मधुमक्खी  छत्ते 50% मधुमक्खी पालन हेतु प्रति छत्ते पर 800 रु. की दर से अनुदान अधिकतम सीमा 50 कॉलोनी पर किसान। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत

चयन किये गए सभी जिलें

3. मधुमक्खी कॉलोनी 50% मधुमक्खी पालन हेतु प्रति छत्ते पर 700 रु. की दर से अनुदान अधिकतम सीमा 50 कॉलोनी पर किसान।
4. मधुमक्खी उत्पादन 50% मधुमक्खी उत्पादन के लिए पंजीकृत उत्पादकों (ब्रीडर) को 3 लाख रुपये तक अनुदान।
5. सयंत्र 50% रु. 7000 प्रति सयंत्र

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स्रोत –

उद्यान विभाग हरियाणा

हॉर्टिकल्चर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट उचानी (करनाल)

Horticulture Training Institute

Adress:- 130 km. Stone for Delhi G.T. Road, Uchani (Karnal) – 132001 Haryana

Teh. :- 0184-2265484, Fax :- 0184-2266484

Email: hatiharyana@gmail.com

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