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मटर को कीट एवं रोगों से कैसे सुरक्षित रखें

मटर को कीट एवं रोगों से कैसे सुरक्षित रखें
Written by bheru lal gaderi

मटर एक महत्वपूर्ण सब्जी की फसल है। इसे रबी में उगाया जाता है व इसका प्रयोग ताजा डिब्बाबंद व सूखी मटर के रूप में किया जाता है। फसल पैदावार में अधिकतम अस्थिरता हेतु कृषि की विभिन्न प्रक्रियाओं को अपनाना आवश्यक है। इसी कड़ी में कीटों और रोगों के उचित प्रबंधन पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया तो उत्पादन में बढ़ोतरी बहुत कठिन है। नाशक जीवों और रोगों से फसल की उपज में काफी कमी आती है। मटर को प्रभावित करने वाले विभिन्न कीट और रोगों व उनके नियंत्रण की जानकारी होना आवश्यक है।

प्रमुख कीट

तना मक्खी

मटर को कीट एवं रोगों से कैसे सुरक्षित रखें

Image Credit-www.krishakjagat.org

इसका आक्रमण अगेती फसल में होता है। बीज अंकुरण की आरंभिक अवस्था में यह कीट गंभीर रूप धारण करता है जिसके परिणाम स्वरुप खेत में पौधों की संख्या में कमी आ जाती है। सुण्डिया जमीन की तरह के नजदीक बाहृा में प्रवेश करती है वह बाद में प्यूपा में परिवर्तित होने से पूर्व तने में पारदर्शी निकास द्वार की व्यवस्था कर लेती है, जिसके द्वारा विकसित तना मक्खी धक्का देकर तने के बाहर निकल जाती है। इस किट से ग्रसित पौधों का ठीक से विकास नहीं होता व कभी-कभी तने में दरार भी पड़ जाती है। पत्तियों पर चमकीले सफेद रंग की धारी का पाया जाना इस कीट के आक्रमण के शुरू होने का संकेत देता है। किट की लटे तने में सुरंग बनाती है। पत्तियां पीली पड़ पौधा मुरझाने लगता है। नियंत्रण के लिए मृदा में फ्रीप्रोनिल 0.3  जी. 12-15  किलो प्रति हेक्टेयर अथवा फोरेट 10 जी. 15 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से मिलावे।

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पर्ण खनक

इस किट का प्रकोप मटर के पौधों की निचली व मध्य पत्तियों में दिसंबर के अंत से प्रारंभ होता है तथा फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च के प्रथम सप्ताह में चरम सीमा पर पहुंच जाता है। पत्तियों के दोनों सतहों पर सुरंग दिखाई देती है। यह कीट पत्तियों में सुरंग बनाती हैं जिससे पत्तियां भोजन नहीं बना पाती है और पौधों की वृद्धि रुक जाती है अत्यधिक किट ग्रसित पत्तियां सूख जाती है तथा फूल व फल या कम बनती है। इसके नियंत्रण हेतु ट्राइजोफास 15 लीटर प्रति हेक्टेयर से या मिथाइल डिमेटोन 1  मि.ली./ लीटर पानी के छिड़काव करें।

फली छेदक

मटर को कीट एवं रोगों से कैसे सुरक्षित रखें

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फरवरी माह में पौधों में जब इसका प्रारंभ होकर अप्रैल तक चलता है। अंडे से निकली हुई सुंडी अपने चारों ओर जाला बुनती तथा छेड़कर फलों में घुसकर दानों को खाती रहती हैं। उससे काफी नुकसान होता है। फलिया बदरंग हो जाती है तथा उनमें पानी भर जाता है। ऐसी फलियों से दुर्गंध आने लगती है। इसके नियंत्रण हेतु मेलाथियान 5% या क्विनालफॉस 1.5% डस्ट का 20 से 25 किलो प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

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चैंपा/मोयला

मटर की कोमल पत्तियों की निचली सतह फूलों कलियों अग्रभाग तथा फलियों का रस चूस कर पौधे के विभिन्न कोमल अंगो को क्षति पहुंचता है। कीटों से प्रकोपित पौधे छोटे रह जाते हैं तथा उन की पत्तियां पीली पड़ जाती है, ग्रसित फलियां छोटी रह जाती है। नियंत्रण के लिए डाइमेथोएट 30 ई. सी. 1 मिलीलीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

सुत्रकृमी

इनसे जड़ों में गांठे बन जाती हैं पौधे पीले पड़ जाते हैं नियंत्रण हेतु बुवाई पूर्व खेत में 25 किलो कार्बोफ्यूरान प्रति हेक्टेयर की दर से मिला दे।

प्रमुख रोग

छाछया

इस रोग में सफेद चूर्ण पत्तियों व पौधे के अन्य भागों पर दिखाई देता है। नियंत्रण के लिए 1 मिली. डायनोकेप 48 ई.सी. या ट्राइडेमार्फ़ 80 ई.सी. प्रति लीटर पानी की दर से 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।  रोग रोधी किस्मे जैसे रचना, पंत मटर 5, शिखा सपना, मालवीय मटर उगाएं।

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बीज व जड़ गलन बीज

बीज बुवाई के बाद सड़ जाते हैं या उगने के बाद मर जाते हैं। नियंत्रण के लिए बीज उपचार अवश्य करें इसके लिए बीजो को 2 ग्राम कार्बेंडाजिम प्रति किलो बीज दर से उपचारित करें।

रतुआ

पत्तों पर पीले से भूरे  गोल झुंड में फैले हुए बीजाणुकोष के लक्षण है। बीजाणुकोशों के भूरे रंग के कारण ही इस रोग को रतुआ रोग की संज्ञा दी गई है। नियंत्रण के लिए मैंकोजेब 2 ग्राम या घुलनशील गंधक 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से 10, 15 दिन के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव करें।

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मटर में हानिकारक कीटों का प्रबंध

कीटनाशक प्रतिरोधकता एवं एकीकृत कीट प्रबंधन के प्रमुख दिशा निर्देश निन्नलिखित हैं इनको अपनाकर किसान मटर में हानिकारक कीटों का प्रबंध एवं कीटों में कीटनाशकों के प्रति अरोधकता उत्पन्न होने से रोक सकते हैं।

  • खेत की सफाई करें और फसल के ठूठों को समय से निकाल कर नष्ट कर दे उसके बाद गर्मी में गहरी जुताई करें। जिससे सुण्डिया एवं प्यूपा की संख्या बाहर आ जाए और मर जाए।
  • खेत की मेड़ों की सफाई करें जिससे कीड़ों का आश्रय देने वाले पौधे पनप न पाए।
  • बुवाई के लिए केवल अनुमोदित किस्म/ संकरो के बीज का उपयोग करें और इंहें विश्वस्त स्त्रोतों से ही खरीदें।
  • बीज को बोने के पूर्व ही इमिडाक्लोरो 70 डब्ल्यू.एस. या थायोमेथोक्सम 70 डब्ल्यू.एस. की 5-7 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित करके बोये इससे लगभग 30-40  दिनों तक रस चूसने वाले कीटों का प्रकोप नहीं होता है। उस समय तक प्राकृतिक शत्रुओं की संख्या बढ़ जाती है।
  • अंतरवर्ती फसल ले इससे मुख्य फसल पर कीट का प्रकोप कम होता है और प्राकृतिक क्षेत्रों की संख्या को सुरक्षित रखा जा सकता है।
  • चूसक कीड़ों के शुष्णु जीन प्रारूप की लगाएं इससे कीटनाशकों के पहले छिड़काव में देरी की जा सकती है और नाशि कीड़ों प्राकृतिक शत्रुओं को सुरक्षित रखा जा सकता है।
  • प्रकाश प्रपंच का उपयोग कर प्रतिदिन कीड़ों को नष्ट करें। (प्रकाश प्रपंच में 160 वाट मरकरी वेपर बल्ब का उपयोग करें।)
  • खेत में फेरोमेन ट्रेप 8-10%  प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं। यदि 8  पतंगे प्रति ट्रेप प्रति रात्रि लगातार तीन रात मिले तो इसके नियंत्रण की कार्यवाही शुरु कर देनी चाहिए।
  • खेतों में आरंभ से ही पक्षी आश्रय स्थल (बर्ड पर्चर) अंग्रेजी के टी आकार की लकड़ी लगाएं।
  • इल्लियों एवं फल छेदक कीट के नियंत्रण के लिए ट्रायकोकार्ड ( ट्राइकोग्रामा चीलोनिस के अंडे) इन्हें 5 लाख प्रति हेक्टेयर के मान से उपयोग करें।
  • निर्धारित आर्थिक हानि स्तर होने पर ही कीटनाशक दवा का उपयोग करें।
  • हरी इल्ली, फल छेदक कीट की रोकथाम हेतु बुवाई के 35-40 दिनों के बाद एच.ए. एन.पी.व्ही. 250  एल.ई. प्रति हेक्टेयर के मान से शाम के समय छिड़काव करें।
  • रस चूसक कीड़ों की रोकथाम के लिए नीम तेल या नीम अर्क 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।
  • व्यापक आधार वाले कीटनाशक जैसे मोनोक्रोटोफॉस का शुरुआत में उपयोग न करें क्योंकि यह नाशि कीड़ों के प्राकृतिक शत्रुओं की संख्या को पनपने में बाधा डालते हैं।
  • पाइरेथ्राइड का प्रयोग फसल काल में केवल एक बार अंतिम समय पर करें। सिंथेटिक पाइरेथ्राइड का आवश्यकता से अधिक मात्रा का उपयोग या बार-बार छिड़काव सफेद मक्खी के प्रकोप को उग्र बना देता है।
  • स्पाइनोसेड और इमामेक्टिन बेंजोएट का उपयोग भी फल छेदक कीट एवं हरी इल्ली के लिए कर सकते हैं।
  • मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी.की  800-1000  मिली या इमिडाक्लोप्रिड (कॉन्फीडोर) 100 मी.ली. प्रति हेक्टेयर के मान से या डाइमेथोएट 30 ई.सी. 800-1000  मिली प्रति हेक्टेयर या एसीटामिप्रिड की 75 ग्राम दवा प्रति हेक्टेयर के मान से चूसक कीटों के नियंत्रण हेतु उपयोग करें।

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कीटनाशकों के अच्छे परिणाम के लिए अपनाएं:

उचित समय

आवश्यकता पड़ने पर कीटनाशकों का उपयोग करें।

उचित रसायन

उपयुक्त कीटनाशक को खींचने उचित मात्रा कीटनाशकों की उचित मात्रा का ही उपयोग करें।

उचित पद्धति

उचित कीटनाशक यंत्रों का छिड़काव पद्धति का उपयोग करें।

रसायनों के समूह को बदलकर उपयोग करने से अधिकांश कीटनाशकों विशेषकर कार्वामेट्स या आर्गेनोफॉस्फेट के प्रतिरोधकता वृद्धि को रोका जा सकता है।

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प्रस्तुति

सत्य प्रकाश सिंह तोमर,

 वैज्ञानिक, कृषि कीट विज्ञान (पौध संरक्षण),

 कृषि विज्ञान केंद्र, ए.बी. रोड मुरैना (मध्य प्रदेश)

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