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मटर की उन्नत खेती और उत्पादन तकनीक

Written by bheru lal gaderi

मटर(peas) एक महत्वपूर्ण दलहनी एवं सब्जी की फसल हैं। इसकी खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य्प्रदेश, बिहार, आसाम व उड़ीसा में की जाती हैं। इसकी हरी फलियों का प्रयोग भारतीय व्यंजनों में बहुतायत से किया जाता हैं। इसके साथ ही हरे दानों को डिब्बाबंदी करके बेमौसम में खाने के लिए संग्रहित किया जाता हैं।

मटर की उन्नत खेती

मटर स्वाद व जायके के साथ ही प्रोटीन, विटामिन्स तथा खनिज लवणों का प्रचुर मात्रा का स्त्रोत हैं। मटर की खेती यदि वैज्ञानिक तरिके से की जाए तो किसान अच्छा मुनाफा कमा सकता हैं।

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भूमि

मटर की खेती यद्धपि किसी भी प्रकार की मिटटी में की जा सकती हैं, परन्तु बलुई दोमट या दोमट मृदा 6.5 से 7.5 पी.एच. मान वाली सर्वोत्तम रहती हैं। अच्छे जल निकास की व्यवस्था होना आवश्यक हैं।

उन्नत प्रजातियां

अगेती

अर्किल, पन्त मटर-2, पन्त सब्जी मटर-3, आजाद मटर-3, पंजाब अगेती, बी.एल.-7, प्रजातियां 60-70 दिनों में खाने लायक फली देने लगती हैं।

मध्यम

पन्त उपहार, आजाद मटर-1, इनमे 75-80 दिनों में खाने योग्य फलियां तैयार हो जाती हैं।

पछेती

बोनेविले, जवाहर मटर-1, इनमे खाने योग्य फलियां 95-100 दिनों में तैयार हो जाती हैं।

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बुवाई का समय

मैदानी क्षेत्रों में 25 अक्टुम्बर से 15 नवम्बर तक उपयुक्त समय होता हैं। इससे पूर्व बोने से विशेषतः अगेती किस्मों में तने मक्खी द्वारा काफी हानी पहुंचाती हैं। 1800 से 2500 मीटर ऊंचाई पर पहाड़ी क्षेत्रों में विभिन्न प्रजातियां नवम्बर या बसंत ऋतू में बोई जा सकती हैं। सिंचित गर्म घाटियों में मटर की बुवाई सितम्बर-अक्टुम्बर माह में की जा सकती हैं।

उर्वरक

अच्छी उपज के लिए 25-30 किलो नत्रजन, 75 किलो फास्फोरस एवं 50 किलो पोटाश तत्व प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें। मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग अधिक उपयुक्त होता हैं। सभी प्रकार के उर्वरक की पूरी मात्रा बेसल ड्रेसिंग के रूप में ही प्रयोग करें।

बुवाई की विधि

मटर की बुवाई कतारों में करें, कतार से कतार की दुरी 30-35 से.मी. दुरी (क्रमशः अगेती व पछेती प्रजातियों के लिए) एवं पौध से पौध 4-5 से.मी. रखे। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 80 से 100 किलो बीज की आवश्यकता होती हैं। बुवाई से पूर्व 2.00 ग्राम थाइरम+एक ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से बीजोपचार अवश्य करें।

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खरपतवार नियंत्रण एवं सिंचाई

बुवाई से 3-4 सप्ताह बाद एक निराई करना आवश्यक होता हैं। खरपतवार नियंत्रण हेतु खरपतवारनाशी रसायनों का भी प्रयोग किया जा सकता हैं। बुवाई से पूर्व फ्लूक्लोरोलीन 1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व, या खरपतवार निकालने से पहले पेंडीमेथिलीन, 1.5 की.ग्रा. सक्रिय तत्व, प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें। मटर की  अधिक उत्पादन के लिए पहली सिंचाई फूल निकलते समय एवं दूसरी फलियों में दाना पड़ते समय करें।

फसल सुरक्षा

पाउडरी मिल्ड्यू एवं गेरुई द्वारा मटर की काफी हानी होती हैं। पाउडरी मिल्ड्यू की रोकथाम के लिए डायनोकेप 0.5 लीटर या घुलनयुक्त सल्फर 2.5 किलोग्राम 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रतिहेक्टेयर की दर से छिड़काव भी करें। गेरुई के प्रकोप से बचने के लिए 2.5 किलोग्राम मेंकोजेब प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।

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मटर को हानि पहुंचाने वाले कीड़ों में तना छेदक, रोयेंदार गिडार तथा एफिड भी काफी नुकसान पहुंचाते हैं। तना छेदक के नियंत्रण के लिए क्लोरपायरीफास 5 मि.ली. प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करें या बुवाई के पहले 30 किलोग्राम कार्बोफ्यूरान भूमि में भली-भांति मिला दें। पत्ती खाने वाले गिडार की रोकथाम के लिए 1.25 लीटर इंडोसल्फान 35 ई.सी. एवं फली छेदक सुंडी के लिए 2.00 की.ग्रा. कार्बारिल (50% घुलनशील चूर्ण) को 1000 लीटर पानी में अलग-अलग घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। एफिड एवं लिफ़ माइनर के लिए फास्फोमिडान (85 ई.सी.) 1.00 लीटर, 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। फलियों की तुड़ाई, छिड़काव के 15 दिन बाद करनी चाहिए।

कटाई

प्रजातियों के अनुसार हरी फलियां अलग-अलग समय में तैयार होती हैं। फलियां 10-12 दिन के अन्तर पर 3-4 बार तोड़ें। मैदानी क्षेत्रों में दाने वाली फसल मार्च तक पककर तैयार हो जाती हैं।

मटर की उपज

उन्नतशील विधि से खेती करने पर 80 से 100 किवंटल हरी फलियां एवं 20 क्विंटल दाना प्रति हेक्टेयर प्राप्त किया जा सकता हैं।

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