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मक्का (स्वीट कॉर्न एवं बेबी कॉर्न) की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मक्का
Written by bheru lal gaderi

मक्का को विश्व में खाद्यान फसलों की रानी कहाँ जाता हैं क्योंकि इसकी उत्पादन क्षमता खाद्यान फसलों में से सबसे अधिक हैं। पहले मक्का को विश्व में गरीबों का मुख्य भोजन माना जाता था जबकि अब ऐसा नहीं हैं। अब इसका उपयोग मानव आहार (24%), साथ-साथ कुक्कुट आहार (44%), स्टार्च (12%), गरीब(2%),पशु आहार (16%) तथा बीज (2%) के रूप में किया जाने लगा हैं। इसके अलावा मक्का तेल, साबुन इत्यादि बनाने के लिए भी प्रयोग की जाती हैं।

मक्का से भारतवर्ष में 1000 से ज्यादा उत्पाद तैयार किये जाते हैं। छोटे बच्चों के लिए मक्का का चुरा पौष्टिक भोजन हैं तथा इसके दाने भून कर भी खाया जाता हैं। शहरों के आस-पास मक्का की खेती भुट्टों के लिए मुख्य रूप से की जाती हैं। आजकल मक्का की विभिन्न प्रजातियों को अलग-अलग तरह उपयोग में लाया जाता हैं। मक्का को स्वीट कॉर्न एवं बेबी कॉर्न के रूप में पहचान मिल चुकी हैं।

मक्का

मक्का उत्पादन

यह विश्व के 166 देशों में उगाई जाने वाली फसल हैं जो विश्व के सकल खाद्यान उत्पादन में एक चौथाई से ज्यादा का योगदान करती हैं। विश्व के कुल मक्का उत्पादन में भारत का 3% योगदान हैं। अमेरिका, चीन, ब्राजील एवं मेक्सिको के बाद भारत का पांचवा स्थान हैं। मक्का भारतवर्ष के लगभग सभी क्षेत्रों में उगाया जाता हैं। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्य्प्रदेश, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, बिहार, हिमाचलप्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर तथा उत्तरी पूर्वी राज्यों में मक्का मुख्यतया उगाई जाती हैं।

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मक्का एक ऐसी फसल हैं जो विविध परिस्तितियों, जलवायु, मृदा आदि में पुरे वर्ष भर के मौसम में उगाई जा सकती हैं। मक्का न केवल विविध परिस्थितियों में उगाई जाने वाली फसल हैं अपितु यह विविध उपयोगो जैसे दाना, भुट्टा, बेबी कॉर्न, पॉप कॉर्न, चारा आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली विविधता वाली फसल हैं।

स्वीट कॉर्न

मीठी मक्का (स्वीटकॉर्न) की तुड़ाई शाम के समय, परागण के लगभग 18 से 22 दिन बाद करनी चाहिए। भुट्टों को अच्छी तरह पैकिंग करके ठन्डे स्थान (कोल्ड स्टोर, फ्रिज इत्यादि) पर भंडारित करना चाहिए। मीठी मक्का में फेरुलिक अम्ल होता हैं जो एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में कैंसर, हृदय रोग और अपक्षयी न्यूरो तंत्र जैसी विभिन्न बिमारियों के रोकथाम एवं उपचार हेतु प्रभावी हैं।

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उपयोग

मीठी मक्का का दाना सामान्य मक्का से मोटा होता हैं। इसे  कच्चा या उबालकर खाया जा सकता हैं। यह सब्जी एवं अनेक तरह के पकवान जैसे स्वीट कॉर्न केक, स्वीट कॉर्न क्रीम स्टाइल आदि बनाने में भी प्रयुक्त होता हैं। हरा भुट्टा तोड़ने के बाद पौधे को काटकर हरे चारे के रूप में उपयोग में लाया जा सकता हैं।

उत्पादन तकनीकी

मीठी मक्का की बुवाई जिस खेत में करनी होती हैं उससे 250 मीटर की दुरी तक मक्का की कोई दूसरी किस्मे नहीं उगाई जानी चाहिए। अगर 250मी. की दुरी के अंतर्गत मक्का की कोई दूसरी किस्म खेत में उगाई जा रही हो तो बुवाई इस प्रकार करनी चाहिए जिससे आसपास के खेत में मक्का की नर मंजरी 14 दिन पहले या 14 दिन बाद में आए सामान्य मधुरता वाली (स्टेंडर्ड स्वीट) किस्मों के लिए 9-10 की.ग्रा./हे. एवं अधिक मधुरता वाली (सुपर स्वीट) किस्मों के लिए 5-6 की.ग्रा./हे. की दर से बिज पर्याप्त रहता हैं।

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पंक्तियों एवं पौधों की दुरी

मीठी मक्का की बुवाई 60-75 सेमी. कतारों के बिच की दुरी, तथा 20-25 सेमी. पौधों के बिच की दुरी रखनी चाहिए।

कटाई

बीज के अंकुरण में लगभग 45 दिनों के बाद नर मंजरी आती हैं और इसके 2-3 दिनों के बाद मादा मंजरी (सिल्क) आती हैं। खरीफ के मौसम में परागण (पोलीनेशन) के 18-22 दिनों के बाद मीठी मक्का के भुट्टों की तुड़ाई की जा सकती हैं। इस अवस्था (तुड़ाई अवस्था) की पहचान भुट्टे के ऊपरी भाग यानि सिल्क के सूखने से की जा सकती हैं या इस अवस्था में भुट्टे को नख से दबाने दूध जैसा तरल पदार्थ निकलने लगता हैं। भुट्टे की तुड़ाई सुबह या शाम को करनी चाहिए। हरे भुट्टे को तोड़ने के बाद बचे हुए हरे पौधे को चारे के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए।

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कटाई उपरांत प्रबंधन

भुट्टे को तुड़ाई के ठीक बाद संसाधन इकाई (प्रोसेसिंग यूनिट) या मंडी में पहुंचा देना चाहिए। भुट्टे को ढेर लगाकर नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे लकड़ी के डिब्बे (वुडेन केट्स) कार्टून आदि में रखना चाहिए। कमरे के तापमान पर (रूम टेम्परेचर) पर 24 घंटे के अंदर मधु मक्का के भुट्टे का 50% या उससे अधिक भाग शर्करा के दूसरे रूप में बदल जाता हैं। अतः इन्हे हाइड्रोकुलिंग पैकेजिंग करके शीत गृह (कोल्ड स्टोरेज) में रखा जाता हैं। भुट्टे को एक जगह से दूसरे जगह ले जाने में भी बर्फ की मदद से ठंडा करके रखना चाहिए। भुट्टे को प्लास्टिक के ट्रे में रखकर ले जाना चाहिए।

बेबी कॉर्न

बेबी कॉर्न को शिशु मक्का भी कहते है। यह अनिषेचित मक्का का भुट्टा है। जो सिल्क की 2-3 से.मी. लम्बाई वाली अवस्था या सिल्क आने के 1-3 दिन के अंदर पौधे से तोड़ लिया जाता है। अच्छे बेबी कॉर्न की लम्बाई6-11 से.मी. और रंग हल्का पीला होना चाहिए। एक वर्ष में बेबी कॉर्न की 3-4 फसलें आसानी से ली जा सकती है। इसकी खेती से पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा भी मिल जाता। बेबीकोर्न की निश्चित मार्केटिंग और पेकिंग से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। यह विभिन्न व्यंजनों के रूप में उपयोग में लाया जाता है। बेबीकॉर्न को दक्षिणी भारत पुरे वर्ष भर तथा उत्तरी भारत में फरवरी से नवम्बर के बीच बोया जा सकता है।

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बेबीकोर्न की उच्च उत्पादकता तकनीक

उपयुक्त किस्म का चयन

अलप अवधि, मध्यम ऊंचाई तथा अधिक फलने वाले एकल संकर किस्म का चयन करना चाहिए। एच. एम. – 4, प्रकाश इत्यादि बेबीकॉर्न की उपयुक्त संकर किस्में है।

बेबी कॉर्न की श्रेणियां

श्रेणी लम्बाई व्यास (डायामीटर)
छोटी (शॉट)* 4-7 से.मी. 1.0-1.2 से.मी.
मध्यम (मीडियम)* 7-10 से.मी. 1.2-1.4 से.मी.
लम्बा (लॉन्ग)** 11-13 से.मी. 1.4-1.5से.मी.

* अंतर्राष्ट्रीय बाजार **स्थानीय बाजार

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बुवाई का समय

दक्षिण भारत में इसे वर्ष भर लगाया जा सकता है। उत्तरी भारत में इसे दिसम्बर से जनवरी में नालियों के प्रतिरोपित करके बोया जा सकता है। इसके लिए नवम्बर में नर्सरी लगाना चाहिए। अगस्त से नवम्बर के बीच लगाए गए बेबीकॉर्न सर्वोत्तम किस्म के होते है।

बुवाई की विधि

बुवाई मेड़ो (रिजों) में करनी चाहिए तथा पौधों के आकर (उठा/फैले हुए) के अनुसार पंक्ति से पंक्ति की दुरी 60 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 15 से 20 से.मी. रखनी चाहिए।

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उत्पादन तकनीक

बेबीकॉर्न की उत्पादन तकनीक कुछ विभिन्नताओं के आलावा सामान्य मक्का की तरह ही है। ये विभिन्नता निम्नलिखित है

  • अग्र परिपक्वता (जल्दी तैयार होने) वाली एकल क्रॉस संकर मक्का की प्राथमिकता।
  • पोधो की अधिक संख्या।
  • अधिक पौधे होने के कारण अधिक उर्वरता का उपयोग।
  • झण्डों को तोडना (डिटेसलिंग)
  • सिल्क आने के बाद एवं 24 घंटों के अंदर भुट्टों की तुड़ाई कर लेनी चाहिए।

झंडों को तोड़ने (डिटेसलिंग)

झंडा बाहर दिखाई देते ही निकाल लेना चाहिए। झंडे को पशुओं को खिलाया जा सकता हैं।

तुड़ाई:-

बेबी कॉर्न की तुड़ाई के लिए निम्लिखित बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक हैं।

  • बेबी कॉर्न के भुट्टों को 3-4 सेमी. सिल्क आने पर तोड़ लेना चाहिए।
  • भुट्टा तोड़ते समय उसके ऊपर की पत्तियां नहीं हटानी चाहिए। पत्तियां हटाने से ये जल्दी खराब हो जाते हैं।
  • खरीफ में प्रतिदिन सिल्क आने के बाद एवं 24 घंटे के पहले भुट्टे की तुड़ाई कर लेनी चाहिए।

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उपज:-

बेबी कॉर्न की उपज इसके किस्मों की क्षमता और जलवायुवीय दशाओं पर निर्भर करती हैं। अच्छी फसल की स्थिति में औसतन 55-114 क्विंटल प्रति हेक्टेयर छिली हुई 11-19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर छिली हुई बेबी कॉर्न प्राप्त की जा सकती हैं। इसके अलावा 150-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा भी मिलता हैं जिससे अतिरिक्त आय प्राप्त होती हैं।

कटाई उपरांत प्रबंधन:-

  • बेबी कॉर्न का छिलका तुड़ाई के बाद उतार लेना चाहिए। यह कार्य छायादार एवं हवादार स्थानों पर करना चाहिए।
  • भंडारण ठंडी जगहों पर करना चाहिए।
  • छिलका उतरे हुए बेबी कॉर्न को ढेर लगाकर नहीं रखना चाहिए, बल्कि प्लास्टिक की टोकरी, थैले या अन्य कोई कंटेनर में रखना चाहिए।
  • बेबी कॉर्न को तुरंत मंडी या प्रसंस्करण इकाई में पहुंचा देना चाहिए।

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बेबी कॉर्न के गुण:-

  •  इसका रंग, आकार और प्रकार में एक समानता होनी चाहिए।
  • बेबी कॉर्न का रंग क्रीम या हल्का पीला होना चाहिए।
  • दाने एवं पंक्तियाँ नियमित और सीधी होनी चाहिए।

श्रेणीकरण

शिशुमक्का की सफाई, छटनी और श्रेणीकरण मशीन या हाथ द्वारा किया जा सकता हैं। शिशुमक्का की विभिन्न श्रेणियां निम्नलिखित तालिका में दर्शाई गयी हैं।

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पैकेजिंग

पैकेजिंग विभिन्न प्रसंस्करण इकाई में अलग- अलग तरह से होती हैं .यह टिन, शीशे के जारों तथा प्लास्टिक की थैलियों में की जा सकती हैं। लम्बे समय तक संरक्षित करने के लिए शीशा के जारों में की गई पेकिंग सर्वोत्तम होती हैं। ग्लास पेकिंग में 52% बेबी कॉर्न तथा 48% नमक का घोल होता हैं। एच.पी.एम.सी.,सुन्दर नगर (हिमाचलप्रदेश) में टिन पैकेजिंग का प्रयोग किया जाता हैं। किसान सामान्यतः पेकिंग के लिए पॉलीबेगों को उपयोग में लाते हैं।

प्रसंस्करण

बेबी कॉर्न की शेल्फ लाइफ (जीवन क्षमता) को बढ़ाने के लिए इसे प्रसंस्कृत किया जाता हैं।

  • केनिंग (डिब्बाबंदी)
  • डिहाइड्रेशन (निर्जलीकृत)
  • फ्रीजिंग (प्रशीतन)

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बेबी कॉर्न की खेती के लाभ

  • फसल विविधीकरण
  • किसानों, ग्रामीण महिलाओं एवं नवयुवकों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करना।
  • कम समय में मृदा अर्जित करना।
  • निर्यात द्वारा विदेशी मुद्रा में वृद्धि तथा व्यापार में बढ़ावा।
  • पशुपालन को बढ़ावा देना
  • मानव आहार प्रसंस्करण उधोग को बढ़ावा देना।
  • अन्तः सस्य (इंटरक्रॉपिंग) द्वारा अधिक आय अर्जित करना।

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उपज

बेबी कॉर्न की उपज किस्मों की क्षमता एवं मौसम पर निर्भर करती हैं एक बार में 6-8 क्विंटल प्रति एकड़ बेबी कॉर्न की उपज ली जा सकती हैं। इससे 80-160 क्विंटल प्रति एकड़ हरा चारा भी मिल जाता हैं। इसके अलावा कई उत्पाद भी प्राप्त होते हैं जैसे नरमंजरी, रेशा, छिलका और तुड़ाई के बाद बचा हरा पौधा। ये सभी उत्पाद बहुत ही पौष्टिक होते हैं, जिन्हे पशुओं को चारे के रूप में खिलाया जा सकता हैं।

पौध संरक्षण

फसल को रोगों और कीटों से बचाने के लिए क्यूनालफॉस25%ई.सी. का 2-2.5 मिली./लीटर के हिसाब से छिड़काव करें। तना छेदक के निवारण के लिए फोरेट 10जी/कार्बोफ्यूरोन 10किग्रा./हे. काम में ले।

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