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मक्का उत्पादन की आधुनिक तकनीक से अधिक उत्पादन

मक्का उत्पादन की आधुनिक तकनीक
Written by bheru lal gaderi

मक्का की खेती भारत में मुख्यतया दाना, हरे भुट्टे व हरे चारे के लिए की जाती है। मक्का के हरे चारे में हाइड्रोसाइनिक अम्ल की मात्रा नहीं होती है इसलिए इसे बिना किसी भय के किसी भी अवस्था में पशुओं को खिलाया जा सकता है। उन्नत किस्मों के बीज का अभाव एवं अन्य प्रबंधन कारक मक्का की पैदावार को प्रभावित करते हैं। यदि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई उन्नत तकनीक का उपयोग किया जाए तो मक्का का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। दूसरी ओर क्षेत्र विशेष में फसल विविधीकरण को भी बढ़ावा मिलेगा। साथ ही कुछ क्षेत्र में स्वीट कोर्न, बेबी कॉर्न तथा पॉप कॉर्न का उत्पादन करके अधिक शुद्ध लाभ कमाया जा सकता है।

मक्का उत्पादन की आधुनिक तकनीक

जलवायु

अंकुरण के लिए 18-21 डिग्री सेल्सियस व बढ़वार के लिए 32 डिग्री औसत तापमान होना चाहिए। वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए 750 से 800 मि.मि. तक वर्षा का होना अच्छी उपज के लिए आवश्यक है। पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए 60-70% अपेक्षित आर्द्रता उत्तम पाई गई है।

मिट्टी एवं तैयारी

मक्का के लिए ऐसे खेत का चुनाव करे, जिसमें जल निकासी की समुचित व्यवस्था हो। रेतीली दोमट से चिकनी मिट्टी जिसमें जीवांश प्रचुर मात्रा में हो, वायु संचार अच्छा हो, उसमें मक्का उगाई जा सकती है। भूमि लवणीयता व क्षारीयता से ग्रस्त नहीं होना चाहिए। पहले मिट्टी पलटने वाले हल से एवं उसके पश्चात हे रोव कल्टीवेटर पाटा लगा कर खेत को अच्छी तरह तैयार करें। बीज अंकुरण के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी होना चाहिए।

उन्नत किस्मों का चयन

पी.ई.एच.एम.-2

यह किस्म 80 से 85 दिन में पककर 33 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार देती है। इसका दाना पीला, बड़ा व चमकीला, 50% सिल्किंग 50 से 52 दिन में प्रमुख रोग व कीटों के प्रति प्रतिरोधी है।

पी.ई.एच.एम.-5

75 से 85 दिन में पकने वाली इस किस्म की पैदावार 45 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। जिसका दाना पीले से नारंगी रंग का चमकीला होता है।

गंगा- 11

यह किस्म 95 से 115 दिन में पककर 45 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टर पैदावार देती है। जिसका दाना नारंगी पीला कठोर, पौधों की ऊंचाई 205 सेमी होती है।

डक्कन-103

यह किस्म 100 से 115 दिन में पककर 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार देती है। दाना पीला चमकीला, भुट्टा लंबा व प्रत्येक भुट्टे में 14 से 16 तक कतारे होती है। वर्षा पोषित क्षेत्र के लिए ज्यादा उपयुक्त है।

माहि कंचन

अल्प अवधि में पकने वाली यह किस्म 35 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार देती है। दाना पीला चमकीला, यह पत्ती धब्बा रोग, तुलासीता, तना गलन तथा तना छेदक कीट प्रतिरोधी है व अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए भी उपयुक्त है।

प्रताप हाब्रिड मक्का-1

यह किस्म 80 से 85 दिन में पककर 35 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार देती है। सफेद, मोटे, चमकदार दाने, रोग रोधी, वर्षा पोषित एवं सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए उपयोगी है।

एच.एम.-10

मध्यम परिपक्वता, पीला दाना, औसत उपज 72 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हैं।

प्रताप मक्का 3 व 5

यह किस्मे 80 से 90 दिन में पककर 40 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार देती है इन संकुल किस्मों का दाना सफेद व चमकीला होता है। यह सिंचित और असिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त है।

इन उन्नत किस्मों के अलावा बाजार में प्रचलित मक्का की किस्में जैसे:- सम्पन्न, एन.के.-30, ऑल राउंडर, बायो-9681, मुक्ता, हाइशेल, निर्मल को भी बिजाई के लिए काम में लिया जा सकता है। यह किस्में 90 से 110 दिन में पककर 50 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है। अनमोल-11 (80-85 दिन) अंतराशस्य सोयाबीन फसल के रूप में उपयुक्त है।

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क्वालिटी प्रोटीन मक्का किस्में

एच.क्यू.पी.एम.-7, विवेक क्यू.पी.एम.-2, एच.क्यू.पी.एम.-5, शक्तिमान-3, शक्तिमान-4, यह किस्में 80 से 85 दिन में पककर तैयार होती है एवं इन किस्मों की औसत उपज 60 से 72 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा दाना पीला नारंगी होता है।

बीज की मात्रा

20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रमाणित बीज बोए।

बीजोपचार

मक्का के बीजों को थायरम 3 ग्राम या कार्बेंडाजिम 2 ग्राम या ट्राइकोडर्मा 4 से 6 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से मिलाकर उपचार करें। कवकनाशी के अलावा मक्का के बीजों को एक एजेक्टोबेक्टर 3 पैकेट 600 ग्राम) एवं फास्फेट विलयशील जीवाणु तीन पैकेट से उपचारित करें।

बुवाई का समय

खरीफ मक्का की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय 15 से 30 जून है। जहां सिंचाई की सुविधा है वहां पलेवा लगाकर मध्य जून में मक्का की बुवाई कर दे।

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पौध संख्या एवं फसल ज्यामिति

मध्यम व देर से पकने वाली किस्मों में उचित पौध दर 65 से 66 हजार पौधे प्रति हैक्टेयर तथा जल्दी, हरे भुट्टे वाली फसल एवं पॉप कॉर्न के लिए उचित पौध दर 82-83 हजार पौधे प्रति हैक्टेयर रखें। इस संख्या को प्राप्त करने के लिए कतार से कतार की दूरी 45 से 60 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 20-25 से.मी. रखे। बीज की गहराई 5 से.मी. से ज्यादा न रखे।

पोषक तत्व प्रबंधन

मक्का में खाद एवं उर्वरक प्रयोग मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला की सिफारिश के अनुसार करें। साधारणतया मक्का की फसल से पूरी उपज प्राप्त करने के लिए अच्छी पकी हुई 10 टन गोबर की खाद या  कंपोस्ट खाद के अलावा 90 से 120 किलो नत्रजन, 35-40 किलो फास्फोरस एवं 30-35 किलो पोटाश उर्वरक परत हेक्टेयर काम में लेवे। देसी खाद को बुवाई के 15 से 20 दिन पूर्व समान रूप से बिखेर कर खेत जुताई कर मिला देना चाहिए।

संपूर्ण फास्फोरस, पोटाश, जिंक सल्फेट एवं कुल मात्रा की 10% नाइट्रोजन बुवाई के समय 6 से 9 से.मी. गहराई पर कतारों में उर दे। शेष नत्रजन चार चरणों में बांटकर 20% नाइट्रोजन 10 से 15 दिन बाद, 30% मंजर वाली अवस्था पर (45-55 दिन) एवं 10% दाना भरने की अवस्था पर वर्षा को ध्यान में रखते हुए अच्छी तरह मिट्टी में मिलाकर जड़ों पर मिट्टी चढ़ावें। जस्ते की कमी वाली मृदाओं में 25 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई से पूर्व देवें।

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खरपतवार प्रबंधन

मक्का की फसल को शुरू के 35 से 45 दिन तक खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। इसके लिए मक्का में बुवाई के 20 एवं 40 दिन पर अच्छे निराई- गुड़ाई करनी चाहिए। दूसरी निराई-गुड़ाई करते समय कतारों में पौधों पर मिट्टी भी चढ़ावे। मक्का फसल बुवाई के तुरंत बाद एवं अंकुरण से पूर्व 0.5 किलो एट्राजिन या 0.75 किलो पेंडीमिथलीन 1.0 किलो मेटाक्लोर सक्रिय तत्व को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में छिड़के। छिड़काव के पश्चात वर्षा हो जाए तो दोबारा छिड़काव न करें।  छिड़काव से सभी प्रकार के खरपतवार नष्ट हो जाते हैं इस छिड़काव के समय मृदा में नमी होना जरूरी है।

खड़ी फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए 2,4-डी एक किलो सक्रिय तत्व का 600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर बुवाई के 30 दिन बाद छिड़काव कर सकते हैं। 0.75 से 1 किलो प्रति हेक्टेयर एट्राजिन अर्ली पोस्ट इमरजेंस के रूप में मक्का अंकुरण के 2 सप्ताह के अंदर प्रयोग करना उपयुक्त रहता है।

जल प्रबंधन

मक्का में बढ़वार और मांजरे आते समय पानी की आवश्यकता होती है। अतः वर्षा न हो तो इस समय सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।

अंतराशस्य

मक्का के साथ सोयाबीन, उड़द, मूंग एवं अरहर को अंतराशस्य फसल के रूप में मक्का की दो कतारों 30-30 से.मी. पर तथा उसके  पश्चात 30-30 से.मी. पर मुंग, उड़द, या सोयाबीन की कतारें 2:2 या 5:2 के क्रम में बोए। फसलों की बुवाई ऐसी दिशा में करें की अंतराशस्य फसल पर छाया कम रहे तथा दोनों फसलों को पर्याप्त प्रकाश मिले।

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कीट व व्याधि एवं उनका प्रबंधन

मक्का की फसल पर बुवाई से कटाई तक लगभग 60 प्रकार के कीटों का प्रकोप होता है, जो मक्का उगाने वाले किसानों को न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि मक्का की गुणवत्ता को भी प्रभावित करते हैं। मक्का के मुख्य कीट दीमक, तना छेदक, फड़का, मोयला, भुट्टा छेदक एवं व्याधियां तुलसिता, पछेती उखटा प्रमुख हैं।  जिनके नियंत्रण के लिए समय-समय पर उपचार करें।

कटाई एवं गहाई

जब दानो में नमी 20 से 25% तक हो तो मक्का फसल की कटाई कर लेना चाहिए। खेत में खड़े पौधों से भुट्टे तोड़कर कटाई करने की विधि अच्छी रहती है। क्योंकि कई संकर तथा संकुल किस्मों में भुट्टा पकने पर भी पौधों का रंग हरा रहता है। पके हुए भुट्टो का छिलका उतारकर उन्हें धूप में सुखाया जाता है, जब तक दानों में 15% नमी ना रह जाए। गहाई डंडे तथा हाथों से की जाती है। मक्का की गहाई शेलर से जल्दी एवं अच्छी होती है। दानों को धूप में सुखाकर जब तक दानों में 8 से 10% तक नमी हो भंडारण कर लिया जाता है।

उपज

दानें के लिए उगाए गए मक्का की विभिन्न किस्मों से उन्नत सस्य क्रियाओं द्वारा निम्नलिखित औसत दाना उपज प्राप्त की जा सकती है।

  • हरे चारे के लिए उगाई गई मक्का की हरे चारे वाली उन्नत किस्म अफ्रीकन टाल से 350 से 400 क्विंटल हरा चारा प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होता है।
  • बेबी कॉर्न के लिए ली गई जल्दी पकने वाली उन्नत किस्म एच.एम.-4 12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर शिशु मक्का तथा 200 से 250 प्रति हेक्टेयर तक हरा चारा भी प्राप्त होता है।

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प्रस्तुति

डॉ. भवानी शंकर मीणा,

सस्य वैज्ञानिक, वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केंद्र,

कोटा (राज.)

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