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भेड़ पालन – ऊन एवं नमदा उद्योग एक लाभदायक व्यवसाय

भेड़ पालन
Written by bheru lal gaderi

देश के शुष्क, अर्ध शुष्क एवं पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले भूमिहीन एवं सीमांत कृषकों का मुख्य व्यवसाय भेड़ पालन, बकरी पालन ही है। देश के इन क्षेत्रों  में प्राकृतिक आपदाओं विशेषकर मानसून की अनिश्चितता, अकाल की विभीषिका एवं कृषि संसाधनों की सीमित व्यवस्थाओं के कारण पशु पर निर्भरता अधिक बढ़ गई हैं। प्रत्येक पशु पालक का उद्देश्य होता है, कि उसके पशु अच्छे हो उनके गुण और संख्या में निरंतर वृद्धि हो सके और उसे रेवड़ से अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो सके हमारे देश में भेड़ पालन  ऊन, मांस एवं दुग्ध उत्पादन के लिए किया जाता है।

भेड़ पालन

राजस्थान में भेड़ पालन एक बहुत ही महत्वपूर्ण एवं लाभकारी व्यवसाय हैं, क्योंकि यहां पर फसल उत्पादन वर्षा की कमी तथा अनिश्चितता होने के कारण सफल व्यवसाय नहीं हैं। भेड़ पालन में गर्भित भेड़ों एवं नवजात मेमनों का प्रबंधन एवं देखभाल एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भेड़ों का गर्भकाल में जितना अच्छा प्रबंधन एवं देखभाल की जाएगी रेवड़ में उतने ही अधिक और स्वस्थ मेमनों का जन्म होगा। रेवड़ में जितने अधिक मेमने पैदा होंगे, भेड़ पालक को उतना ही अधिक आर्थिक लाभ होगा। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में भेड़ पालक को भेड़ पालन की कुल आमदनी का करीब 65% आय अकेले जानवरों की बिक्री से होती है। भेड़ पालन वैज्ञानिक तरीके से करना चाहिए।

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स्वस्थ रेवड़ के लिए पशुओं का चयन एवं छटनी

भेड़ पालन में रेवड की स्थापना करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पशुओं में विगत में कोई बीमारी ना रही हो तथा पशु स्थानीय जलवायु में पल सकने वाली नस्ल के ही हो, क्योंकि एक विशेष क्षेत्र में पाली गई नस्ल में उस क्षेत्र के रोगों या बुरे प्रभावों को सहन करने की शक्ति पैदा हो जाती हैं। उत्पादन ठीक हो उनके शरीर पर ऊन एकसार तथा चमकदार हो।

भेड़ पालन में रवेडे के लिए ऐसे पशुओं का चयन करना चाहिए जो लगातार प्रतिकूल वातावरण में अपने उत्पादन तथा शरीर भार में स्थिरता बनाए रखते हो। स्वस्थ जीवन के लिए प्रतिवर्ष रेवड़ से उन पशुओं को निकाल देना चाहिए जो अक्सर बीमार रहते हो तथा उपचार के बाद भी ठीक नहीं हो रहे हो।

भेड़ पालन में प्रबंधन

भेड़ के प्रबंधन में यह बात बहुत आवश्यक हैं कि किस भेड़ को ग्याबन कराना चाहिए, कब कराना चाहिए व किस मेढ़े से कराना चाहिए। अतः इसके अंतर्गत केवल उसी भेड़ को ग्याबन कराना चाहिए, जिसकी उम्र 1 से 6 वर्ष के बीच है। 6 वर्ष से अधिक उम्र होने पर मादा की गर्भ धारण करने की क्षमता कम हो जाती है। 18 महीने से कम उम्र वाले मेढ़े को प्रयोग में नहीं लेना चाहिए तथा शुद्ध नस्ल का मेढ़ा ही प्रयोग में लेना चाहिए। एक मेढ़े का 2 वर्ष से अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए।

गर्भाशय में पल रहे मेमने की वृद्धि गर्भकाल से शुरू हो जाती हैं। यदि चारागाह में अच्छी मात्रा में चारा उपलब्ध है, तो अतिरिक्त दाना देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर भी भेड़ के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए एवं गर्भ में पल रहे बच्चे की अच्छी वृद्धि के लिए अतिरिक्त दाना देना चाहिए।

इस अतिरिक्त डेन से गर्भ काल में बच्चे की मृत्यु होने की भी आशंका कम हो जाती है। गर्भ काल के अंतिम 30 दिन प्रत्येक ग्याभिन भेड़ को 300 ग्राम धाना प्रतिदिन के हिसाब से जरूर दें। इससे मां का स्वास्थ्य ठीक रहेगा तथा बच्चा भी स्वस्थ पैदा होगा।

स्वस्थ बच्चे में रोग कम लगते हैं। यदि हरा चारा उपलब्ध हो तो भेड़ों को ब्याने के बाद खिलाना चाहिए। इस हरे चारे से पेड़ों में दूध की मात्रा बढ़ती है जो बच्चों की वृद्धि में हितकारी रहती है।

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मेमने की देखभाल

नवजात बच्चों की देखभाल बड़े ध्यान से करनी चाहिए, क्योंकि भेड़ पालक की मुख्य आमदनी का स्रोत इन्हीं से जुड़ा होता है। बच्चा पैदा होने के तुरंत बाद बच्चे का नार शरीर से 4 सेंटीमीटर दूरी से काटकर इस पर टिंचर आयोडीन का लेप करना चाहिए जिससे कोई संक्रमण ना हो।

सामान्य स्थिति में बच्चे की मां चाटकर बच्चे के ऊपर की झिल्ली साफ कर देती हैं लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है। जब मां बच्चे को नहीं चाटती। उसी स्थिति में बच्चे के मुंह की झिल्ली साफ करके बच्चे को मां के मुंह के पास ले जाना चाहिए जिससे बच्चे को चाटना शुरु कर दे और वह बाकी झिल्ली को चाट कर साफ कर दे।

जन्म के बाद भेड़ व बच्चे को 48 घंटे तक साथ रखे जिससे भेड़ अपने बच्चे को अच्छी तरह पहचान लेगी और दूध पिलाने में परेशानी परेशान नहीं करेगी।

भेड़ की मुख्य नस्लें एवं ऊन उत्पादन

राजस्थान में भेड़ों की मुख्यता 8 नस्लें पाई जाती हैं यह नस्लें हैं- मगरा, मारवाड़ी, नाली, चोकला, मालपुरा, सोनाली, जैसलमेरी व पोगल है। इन सभी नस्लों में संख्या के आधार पर मारवाड़ी नस्ल की भेड़े लगभग 50% हैं। ऊन की बारीकी के आधार पर चोकला कि ऊन सब से बारीक़ होती हैं।

हस्तकला से बनाए जाने वाले यह नवोदय पहले कम मात्रा में बनते थे तथा बाजार भी सीमित ही था। लेकिन अब ऐसा नहीं है बाजार भी पर्याप्त हैं तथा उत्पादन भी अधिक होने लगा है, क्योंकि पहले की पिंदाई हाथों से होती थी। लेकिन अब मशीनों के जरिए बिंदाई होने लगी हैं। आज मशीनों से घुटाई का काम किया जा रहा है।

जिसके परिणाम स्वरुप एक ही दिन में दर्जनों नमदों की शीट तैयार होने लगी है। शीट तैयार होने के उपरांत ओपनर मशीन से बिंदाई की जाती है तथा कार्डिंग मशीन से मिलिंग की जाती है। इस कारण नमदे में कठोरता आ जाती है।  तत्पश्चात पतले नमदे की डिजायने काट काट कर उसकी नमदे की मोटी शीट पर सिलाई कर दी जाती है।

ऊन की चमक व लचीलेपन की दृष्टि से मगरा को स्वस्थ सर्वोत्तम कहा गया है। हमारे देश में एक भेड़ से 1 वर्ष में औसतन 900 ग्राम ऊन प्राप्त होती हैं तथा राजस्थान में यह औसत लगभग 1.5 किलोग्राम हैं। देश के कुल उत्पादन का करीब 40% हिस्सा अकेले राजस्थान से ही प्राप्त होता है।

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भेड़ पालन व ऊन बढ़ाने के लिए अनुसंधान

भेड़ पालन पर अनुसंधान और विकास कार्य भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा 19वीं शताब्दी के आरम्भ में शुरू किया गया था। उस समय देसी भेड़ों से संस्करण के लिए विदेशी भेड़ों का आयात किया गया। इसके बाद भारतीय तब इंपीरियल कृषि अनुसंधान परिषद ने अनुसंधान और विकास का कार्य क्षेत्र के आधार पर शुरू किया।

भारत के स्वाधीन होने व पंचवर्षीय योजना शुरू होने पर इस ओर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। तीसरी पंचवर्षीय योजना में कई भेड़ विकास केंद्र खोले गए। ऊन वर्गीकरण का कार्य सबसे पहले राजस्थान प्रांत में शुरू किया गया। इसके पश्चात दूसरे प्रांतों में भी यह कार्य शुरू किया गया।

भेड़ पालन के महत्व को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने केंद्रीय भेड़ व ऊन अनुसंधान संस्थान की 1962 में राजस्थान प्रांत में स्थापना की। केंद्रीय भेड़ व ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर (राजस्थान) इस संस्थान का मुख्य उद्देश्य भेड़ व ऊन उत्पादन बढ़ाने के लिए अनुसंधान करना तथा भेड़ व ऊन विज्ञान में स्नातकोत्तर प्रशिक्षण देना है।

चौथी पंचवर्षीय योजना में ऑस्ट्रेलिया सरकार के सहयोग से हिसार (हरियाणा) में कोरिडेल नस्ल की भैंसों का एक बहुत बड़ा प्रजनन फार्म खोला गया। इसके अतिरिक्त जम्मू व कश्मीर, उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भेड़ प्रजनन फार्म खोले गए। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने उत्तम ऊन लिए अखिल भारतीय समन्वय परियोजना शुरू की जिसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों के लिए भारी ऊन वाली भेड़ पैदा करना है। नई नस्लें प्रति भेड़ 2.5 किलो ऊन प्रति वर्ष पैदा करेगी। उस ऊन काउंट 58-64 के बीच होगा।

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नमदा उद्योग

भेड़ की ऊन से बनता है नमदा। नमदे की लोकप्रियता का मुख्य कारण यह भी है कि यह गलीचे के मुकाबले काफी सस्ता होता है। जिसे साधारण आदमी भी अपने घर के उपयोग के लिए खरीद सकता है। टोंक देश व विदेश में नमदों के शहर के रूप में ख्यात हो गया है। टोंक के नमदों ने हिंदुस्तान के कोने कोने में अपनी पहचान बनाई।

गुणवत्ता के कारण हिंदुस्तान ही नहीं विदेशों तक में टोंक के नमदे की मांग है। नमदा उद्योग से जुड़े व्यवसाइयों भारत नमदा कला केंद्र से जुड़े निजामुद्दीन, सुशील पाटनी, निजाम भाई का कहना है कि नमदा टोंक का पारंपरिक धंधा है। इस धंधे से जुड़े लोगों का मानना है कि नमदा व्यवसाय विगत करीब 62 सालों से अधिक समय से यहां फल फूल रहा है तथा लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत भी यहीं हो गया है।

नमदा उद्योग को विगत 20 वर्षों में तेजी से मुकाम मिला है। नमदा की मुख्य मांग देश से ज्यादा विदेशों में है। देशी एवं विदेशी लोग इस नमदा को अपने आलीशान घरों में फर्श पर बिछाकर घरों की शोभा में चार चांद लगाते हैं।

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नमदा बनाने की प्रक्रिया

भेड़ की ऊन से बनने वाला नमदा कई प्रक्रियाओं से गुजरता है तथा बाद में अपने वास्तविक रूप में आता है। नमदा बनाने के लिए भेड़ की ऊन प्रयोग में लाई जाती हैं जिसकी पहले पिंदाई की जाती हैं। बाद में इसे नमदों की शक्ल में बिछा कर उस पर केमिकल लगाकर मजदूरों द्वारा घुटाई की जाती है।

इसके बाद उसे स्वच्छ पानी में धो कर सुखाया जाता है। सूखने के बाद इसे विभिन्न आकार में काट कर इन पर विभिन्न मनमोहक आकृतियों की डिजाइन की जाती है। बाद में उन आकृतियों को सिलाई के लिए दे दिया जाता है।

टोंक शहर में वर्तमान में करीब 3000 से अधिक गरीब परिवारों को नमदे के कार्य से रोजगार मिल रहा है और उनकी आजीविका इसी के सहारे चल रही हैं।  इन परिवार से जुड़ी महिला एक नमदे को सिलाई के जरिए तैयार करने में 5 से 6 घंटों का समय लेती है। जिसे मजदूरी पर 100 से 200 रूपये मेहनताना मिलता है।

नमदा बनाने में मशीनों का उपयोग

हस्तकला से बनाए जाने वाले यह नमदे पहले कम मात्रा में बनते थे तथा बाजार भी सीमित ही था। लेकिन अब ऐसा नहीं है बाजार भी पर्याप्त हैं तथा उत्पादन भी अधिक होने लगा है, क्योंकि पहले की  पिंदाई हाथों से होती थी। लेकिन अब मशीनों के जरिए बिंदाई होने लगी हैं। आज मशीनों से घुटाई का काम किया जा रहा है। जिसके परिणाम स्वरुप एक ही दिन में दर्जनों लोगों की शीट तैयार होने लगी है।

शीट तैयार होने के उपरांत ओपनर मशीन से बिंदाई की जाती है तथा कार्डिंग मशीन से मिलिंग की जाती है। इस कारण नमदा में कठोरता आ जाते हैं। तत्पश्चात पतले नमदा डिजाइनें काट काट कर उसकी नमदा की मोटी शीट पर सिलाई कर दी जाती है।

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ऊन का आभाव

नमदा के चारों और बॉर्डर उसकी सुंदरता बढ़ा देते हैं ताकि वह और अधिक मनमोहक लग सके। धंधे से जुड़े लोगों का कहना है कि नमदा बनाने के लिए जिले में पर्याप्त ऊन का आभाव है। इस आभाव की पूर्ति के लिए उन्हें ऊन अजमेर जिले के केकड़ी या सीकर आदि जिलों की मंडियों से थोक के भाव में खरीदना पड़ता है।

टोंक में ऐसी कोई मंडी नहीं होने से इस पर अधिक व्यय करना पड़ता है। नमदा के लिए काली एवं सफेद  ऊन खरीदी जाती हैं। एक किलो ऊन से 400 रूपये तक का नमदा तैयार होता है। मनमोहक  डिजाइनों को फैक्ट्री के मालिक या फिर बड़े शहरों में लगने वाली प्रदर्शनियों एवं मेले में दुकानों पर भेजने के लिए दुकानदार तो थोक के भाव में खरोद कर ले जाते हैं।

इस धंधे से जुड़े लोगों का यह भी कहना है यहां से दुकानदार से 100-200 रूपये के नमदे को बड़े शहरों में मेला एवं प्रदर्शनी में आने वाले पर्यटकों एवं धनाढ्य लोगों को 300 से 800 रूपये में बेच रहे हैं जो यहां की कीमत के मुकाबले तीन से चार गुना अधिक है।

टोंक में यह धंधा आज पूरे परवान पर हैं वर्तमान में नमदा बनाने के टोंक शहर में करीब 150 कारखाने संचालित हैं। हजारों लोग प्रतिदिन नमदा तैयार कर अपनी रोजी रोटी कमा रहे हैं। अब इस धन्धे से जुड़े लोगों का यह भी कहना है कि अब इस धंधे में अन्य लोगों के भी जुड़ जाने से प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई हैं जिससे मुनाफे में कमी आने लगी है।

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प्रस्तुति:-

वैज्ञानिक ब्यूरो,

विश्व कृषि संचार

कोटा

(राजस्थान)

 

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