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भीमसी भाई : लिविंग लीजेंड सीरीज

भीमसी भाई
Written by bheru lal gaderi

गुजरात के जूनागढ़ जिले में एक गांव है टीटोड़ी, वहां मेरे एक मित्र रहते हैं भीमसी भाई, उम्र 72 वर्ष, पेशा किसानी शौक़ दोस्त बनांना और दोस्ती निभाना।

भीमसी भाई ने मुझे साल 2001 की कच्छ भुज की शोधयात्रा में ढूंढा फिर ये मेरे पास ग्यारवहीँ शोधयात्रा में उत्तराखण्ड आये।

सृष्टि संस्थाम की रजत जयंती के उपलक्ष्य में मेरा सपरिवार अहमदाबाद आना हुआ तो भीमसी भाई मिले पूरे 15 साल के बाद, उन्हें मेरे पिता जी माता जी और दोनो छोटे भाइयों के नाम याद थे।

भीमसी भाई

7 कक्षा तक पढ़े भीमसी भाई से ऐसी कलाकारी की उम्मीद मुझे कतई नही थी। मैंने उन्हें कहा के कल मैंने सोमनाथ दर्शनों को जाना है और आपका गांव नजदीक है मैं कल आपके पास जरूर आऊंगा।

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गुजरात मे मेरे साथी Jaimin Patel भाई जी से निवेदन किया तो उन्होंने कहा के रूट डाइवर्ट करके जुगाड़ बना लेंगे। जब हम भीमसी भाई जी के गांव टीटोड़ी पहुंचे तो वो गांव के बाहर खड़े थे। एक दम चिक पिका रिक बने।
हमें देख कर वो भावुक हो गए लेकिन तुरंत सम्भल गए।

हमे लेकर सीधे अपने घर पहुंचे, जहां उतरते ही मैंने जो सबसे पहले चीज नोटिस की वो सिंपल साधारण गत्ते के डिब्बों से बने चिड़ियों के घोंसले और उनके खाने पीने का जुगाड़, जैसे जूते के डिब्बे में चिड़िया का घर, नारियल के खोपे को बड़ी सफाई से काट कर बनाया हुआ चिड़िया का घर।

घर मे जा कर जैसे ही बैठे तो सबसे पहले तीन प्लेट्स में खूब सारे आम काट कर लाये जो पहले से फ्रिज में रखे हुए थे, हमने एक और शानदार मैंगो पार्टी कर डाली। मुझे तब तक भीमसी भाई जी की पर्सनालिटी का जरा भी आभास नही था।

मैंने स्वाभाविक तौर पर उनके काम धंधे खेती के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उनका खेत एक दम नज़दीक है और मेरे पास दो शानदार बैलों की जोड़ी है। मैंने बड़े उत्साह से कहा कि हम अभी पहले खेत मे चलेंगे। हम जैसे ही गांव से निकले तो उन्होंने बताना शुरू किया कि ये जमीन मैंने सन इतने में खरीदी थी, और मैंने कैसे कैसे बंजर जमीन को ठीक किया।

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थोड़ी देर में हम एक गेट के अंदर घुसे जहां पेड़ों के झुरमुट के नीचे एक सुंदर झूला लगा था और अगल बगल बेंच लगे थे साथ मे सुंदर छोटा सा घर किचन, और थोड़ी दूरी पर बेहद साफ सुथरा वाश रूम।

भीमसी भाई जी ने अपने उपवन के पौधों से परिचय करवाना शुरू किया हम हैरान रह गए तकरीबन 200 से अधिक प्रजातियां देश जे अलग अलग हिस्सों से लाई हुई, सबके नाम और गुण भीमसी भाई बोले जा रहे थे।

रेड डेटा बुक:-

उन्होंने बताया के उनके पास 7 प्रजातियां तो ऐसी हैं जो रेड डेटा बुक में शामिल हैं, एक कक्षा 7 तक पढ़े 72 वर्षीय युवा किसान के मुहं से रेड डाटा बुक का नाम सुन कर मुझे एक बार तो हैरानगी हुई लेकिन चूंकि भीमसी भाई हनी बी नेटवर्क और सृष्टि संस्था से जुड़े हैं इनका लेवल अलग ही होगा।

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 भीमसी भाई ने हमे अनेकों जानकारियां दी जिनमे से कुछ इस प्रकार हैं:-

सीता अशोक का पेड़ उस प्राजाति का पेड़ है जिसके नीचे लंका में सीता जी ने अपना समय बिताया था इस पेड़ के पत्तों छाल और जड़ से स्त्री रोगों की हर दवा बनती है। उन्होंने एक बात और बताई जो व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार हो और उसका आत्महत्या का जी करता हो वो यदि इस पेड़ के नीचे बैठे तो उसका मन बदल जाता है।

देसी बबूल, नौनी, शतावरी, अश्वगंधा, विसमणि, हरसाली फ़ॉर, केवड़ा, इंद्र जौ, जीवंती, विदारी कंद, केर कछला, जैन पोटैटो आदि जड़ी बूटियां आदि को इन्होंने अपने खेतों में जीवित रखा है।

भीमसी भाई जी ने एक नोट बुक मेंटेन की है जिसमे ये अपने खेत पर आने वाले सभी महानुभावों के कॉमेंट्स और हस्ताक्षर लेते हैं। उसमें मुझे चीन , कनाडा और अन्य देशों से आये महापुरुषों के अनुभव पढ़ने का अवसर मिला। Tshering Gyatso Lepcha जो हनीबी नेटवर्क सिक्कम के सदस्य हैं का अनुभव भी पढ़ने को मिला।

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हनी बी नेटवर्क:-

भीमसी भाई ने बताया कि हनी बी नेटवर्क के संयोजक प्रोफेसर Anil Gupta जी स्वयं भी इनके उपवन पर नेटवर्क की बैठक कर चुके हैं।

हालांकि यह मेरी इस इलाके में पहली विजिट थी लेकिन प्रोफेसर साहब के पेपर्स में इलाके और किरदारों का जिक्र अनेकों बार पढ़ चुका हूं। पहली शोध यात्रा भी इसी इलाके में हुई थी जहां शोध यात्री गिर के शेरों के दहाड़ें सुन सुन कर रात भर सोए नही थे।

कुल मिलाकर एक पावर पैक अनुभव रहा भीमसी भाई जी से मिलकर। भीमसी भाई जी ने बताया कि उनकी पत्नी का मायका जूनागढ़ के नज़दीक है और वो अभी अपने मायके गई हुई हैं और वो हमेशा अपनी पारंपरिक वेशभूषा में रहती हैं।(अभी फ्लाइट बोर्ड कर रहा हूँ, आगे की पोस्ट चंडीगढ़ से लिखूंगा)

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भीमसी भाई

स्रोत:-

Kamal Jeet  जी की फेसबुक वाल से
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