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भिन्डी उत्पादन तकनीक एवं फसल सुरक्षा उपाय

भिन्डी
Written by bheru lal gaderi

साब्जियों में भिन्डी एक प्रमुख नकदी फसल हैं,जिसमे विभिन्न पोषक तत्व कैल्शियम, पोटेशियम, विटामिन्स, स्टार्च तथा खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में पाए जाते है. भिन्डी के फलों को स्वादिष्ट सब्जी व् सुप तैयार करने के लिए प्रयोग किया जाता हैं. जबकि इससे पौधों को कागज , गत्ता,तथा जड़ सहित पौधों को गुड़ बनाते समय इसकी सफाई करने के लिए प्रयोग में लाया जाता हैं।

भूमि और जलवायु 

भिन्डी प्रमुख रूप से ग्रीष्म ऋतु में उगाई जाती है, इसकी खेती दीर्घकालीन गर्म मौसम की आवश्यकता होती है। वैसे भिन्डी को लगभग सभी तरह की भूमियो में उगाया जा सकता है, परन्तु अधिक उत्पादन हेतु जल निकास एवं जीवाश्मयुक्त 6-6.8 पी. एच. वाली दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है। भूमि की तैयारी आवश्यकतानुसार 2 से 3 बार मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करने के बाद 1 से 2 बार देशी हल से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए।

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उन्नतशील जातियाँ

वर्तमान में आज भी कई स्थानीय किस्में उगाई जाती हैं जो कि न केवल काम पैदावार देती हैं, बल्कि उन पर कीटों तथा रोगों का प्रकोप अधिक होता है। भिन्डी में पिशीर , मोजैक एवं लीफकर्ल विषाणु रोगों का सक्रमण प्रमुख समस्या है। अतः इस रोग के प्रति सहनशील ओ रोगरोधी किस्मो का चयन करना चाहिए। कुछ प्रमुख किस्मों का वर्णन निम्नलिखित है।

  1. पूसा सावनी

इस किस्म की फलिया गहरी हरे नील रंग की कोमल मुलायम 5 धरियो वाली तथा 12- 15 से. मी. लंबी होती हैं। यह अपेक्षाकृत पित शिरा के रोग के प्रति काफी सहनशील हैं। यह खरीफ तथा ग्रीष्म दोनों ही ऋतुओं के लिए उपयुक्त किस्म हैं। पैदावार 120- 125 क्विंटल/हेक्टेयर होती हैं। तुड़ाई हेतु फलियॉ फसल की 40- 50 दिन बाद तैयार की जाती हैं।

  1. पूसा मखमली

फलिया नुकीली तथा हलके हरे रंग की होती हैं फलियो की औसत लंबाई 15- 18 से. मी. होती हैं .यह किस्म खरीफ तथा जायद दोनों के लिए उपयोगी हैं। परंतु इसमे पीत शिरा मोजेक रोग का प्रकोप पाया जाता हैं। उपज 80 से 100 क्विन्टल/हेक्टेयर होती हैं।

  1. परभनी क्रांति

यह किस्म पीत शिरा मोजेक विषाणु के प्रति सहनशील हैं जो की बुवाई के 50 से 60 दिन बाद फलियो की तुड़ाई योग्य हो जाती हैं। फलिया 5 धरियो वाली मुलायम चिकनी 12 से 14 से. मी. लंबी होती हैं। तथा पैदावार 85-90 क्विन्टल/हेक्टेयर तक होती हैं।

  1. पूसा ए.- 4

इस किस्म की फलिया गहरे रंग की जिनकी लंबाई 12 से 15 सेमी. होती हैं। तथा यह प्रजाति पीत शिरा मोजेक विषाणु प्रतिरोधी, एफिड व् जेसिड के प्रति सहनशील होती हैं .इसकी फलिया 45 दिनों में तुड़ाई के योग्य हो जाती हैं। औसतन उपज 140 क्विण्टल/हेक्टेयर तक होती हैं।

  1. पंजाब पदमनी

यह अधिक उत्पादन देने वाली किस्म हैं। यह किस्म पीत शिरा मोजेक विषाणु के प्रति सहनशील हैं जो की बुवाई के 50 से 60 दिन बाद फलियो की तुड़ाई योग्य हो जाती हैं। फलिया 5 धरियो वाली, गहरे हरे रंग की लंबी तथा मुलायम होती हैं। यह किस्म खरीफ तथा जायद दोनों के लिए उपयोगी हैं।

  1. वर्षा उपहार

यह पीत शिरा मोजेक एवं लीफ हाफर्स (पत्तियो से रस चूसने वाला किट) के प्रति अतयधिक रोधी किस्म पौधा मध्यम उचाई का प्रत्येक गांठ पर 2 से ३ शाखाएं तथा पत्तिया गहरे हरे रंग की होती हैं। फलियॉ चौथे गांठ से 45- ५० दिनों में प्राप्त होने लगती हैं। परिपक्व फ़लियों की लंबाई 18 से २० सेमि. तथा औसत उत्पादन लगभग १०० क्विन्टल/हेक्टेयर प्राप्त होती हैं।

  1. वि. आर. . – 5

यह किस्म पीत शिरा मोजेक एवं लीफ कर्ल विषाणु  रोग के प्रति पूर्णतः रोग रोधी हैं। जो की भिन्डी की बोनी किस्म हैं। पोधो की बढ़वार दो से ढाई फिट होती हैं। इस किस्म में फूल 40 दिनों बाद चौथे गांठ से बनने शुरू होते हैं। यह खरीफ एवं जायद दोनों ऋतुओं  के लिए उपयुक्त किस्म हैं। इसकी पैदावार गर्मी के दिनों में 120 क्विन्टल तथा बरसात में 150 क्विन्टल/हैक्टेयर प्राप्त होती हैं।

  1. वि. आर. . – 6

यह किस्म पीत शिरा मोजेक एवं लीफ कर्ल विषाणु  रोग के प्रति पूर्णतः अवरोधी हैं। इसमे फूल 35 से 40 दिनों में चौथे से छटवें गांठ पर बनने शुरू हो जाते हैं। यह किस्म जायद एवं खरीफ दोनों ही ऋतुओ के लिए उपयुक्त हैं। इसकी पैदावार गर्मी के दिनों में 130 से 150 क्विन्टल तथा बरसात में 180 से 200 क्विन्टल/हेक्टेयर तक प्राप्त होती हैं। यह किस्म भिन्डी की परभनी क्रांति किस्म से डेढ़ गुना अधिक पैदावार देती हैं।

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बीज

भिन्डी के बीजो का छिलका कठोर एवं मोटा होने से अंकुरण में अधिक समय लगता हैं इस लिए बीजो के शीघ्र एवं उचित अंकुरण हेतु बीजो को 24 से 36 घण्टे तक पानी में भिगोने के बाद छाया में सुखाकर बुवाई करनी चाहिए फफूंद जनित रोगों से बचाव एवं स्वस्थ पौधे प्राप्त करने के उद्धेश्य से बीजो को कवकनाशी दवायें जैसे कार्बेन्डाजिम या कैप्टान 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करने के बाद ही बुवाई करें।

बुवाई

भिन्डी की खेती वर्ष में दो बार ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में की जाती हैं। ग्रीष्मकालीन फसल के लिए बीजो को बोने का समय फरवरी- मार्च तथा बीज दर 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सिफारिश की जाती हैं। ऐसी प्रकार वर्षाकालीन फसल के लिए बीजो को मई- जून 10- 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की दर से बिवाई करनी चाहिए। बीजो को हमेशा लाइनों के प्रति गड्ढा दो बीजो को बोना पौध संख्या की दृष्टि से उचित रहता हैं, ग्रीषम ऋतू में लाइन से लाइन की दुरी 45 एवं वर्षा ऋतू में 60 सेमी. रखनी चाहिए।

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खाद एवं उर्वरक

खाद एवं उर्वरको की मात्रा भूमि की किस्म एवं उसकी दशा पर अलग होती हैं। सामान्य रूप से खेत की तैयारी के समय बुवाई के 15- 20 दिन पूर्व 200- 250 क्विन्टल/हेक्टेयर की दर से अच्छी खाद या कम्पोस्ट खाद भूमि में अंतिम जुताई के समय मिला देनी चाहिए। भूमि की दशा एवं किस्म के अनुसार भिन्डी के लिए प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस एवं 50 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता पड़ती हैं। जिसकी पूर्ति 215 किलोग्राम यूरिया, 315 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 85 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय भूमि में मिला देते हैं, शेष बची नत्रजन की आधी मात्रा को बराबर भागों में बाटकर 40 से 60 दिन बाद खड़ी फसल में टॉप ड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए।

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सिंचाई

ग्रीष्मकालीन भिन्डी की फसल के लिए निरंतर सिंचाई की आवश्यकता होती हैं। बीजो के अच्छे अंकुरण हेतु बुवाई पूर्व भूमि की पलेवा करनी चाहिए। बाद में पोधो के अच्छे विकास हेतु आवश्यकतानुसार 5 से 8 दिन के अंतराल पर सिचाई करनी चाहिए।

निराईगुड़ाई

खरपतवार के लिए बुवाई के 30 से 60 दिनों के दोहरान कुल 2- 3 निराई- गुड़ाई प्रयाप्त होती हैं। जहा पर खरपतवारो की अधिक समस्या हो वहाँ खरपतवारनाशी फ्लुक्लोरालिन 1.5 से 2.0 लीटर को 500- 600 लीटर पानी में घोलकर/हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई से पूर्व छिड़काव करे।

फलों की तुड़ाई 

भिन्डी की खेती मुख्य रूप से हरी सब्जी के रूप में की जाती हैं, इसलिए कोमल एवं हरे फलो की तुड़ाई 45- 60 दिनों बाद एक निश्चित समय के अंतराल से करते रहना चाहिए ऐसा करने से उत्पादन में भी वृद्धि होती हैं। बीज की दृष्टि से पके फलों की ही तुड़ाई करनी चाहिए। इस उद्धेश्य हेतु फलो की तुड़ाई एक दो बार करने के बाद फलियो को पकने देना चाहिए और फसल पकने के अंत में फलियों से बीज एकत्रित कर संग्रह करे। फलियो की तुड़ाई करने के उपरांत उनकी ग्रेडिंग करके शीघ्र बाजार में बेचने से अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त होता हैं।

उपज

फलियों की तुड़ाई के बाद चुनी हुई फलियों को कार्ड- बोर्ड ट्रे में पारदर्शी प्लास्टिक से ढककर 2- 3 दिनों तक रखा जा सकता हैं। भिन्डी फलियों को विशेषकर पूसा सावनी को 400 गेज की पॉलीथिन बेग में 70- 75% आद्रता में कमरे के तापमान पर 8- 9 दिनों तक भी रखा जा सकता हैं। ग्रीष्म ऋतू में हरी सब्जियों की कमी होने के कारण भिन्डी की बिक्री पर अच्छे दाम मिलते हैं जिससे कम उत्पादन होने के उपरांत भी अधिक लाभ अर्जित होता हैं।

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भिन्डी फसल में फसल सुरक्षात्मक उपाय

प्रमुख किट

जेसिड

यह हरे रंग के छोटे आकर के किट होते हैं जो की पत्तियो के रस को चूसते हैं जिससे उनका रंग पिला पड़ने के साथ- साथ पत्तिया ऊपर की और सिकुड़ जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए डायमेथोएड़ (30 ई. सी.) 2 मिली. प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर 10- 12 दिन के अंतराल पर यह दूसरा- तीसरा छिड़काव करे।

तना एवं फली छेदक किट

इस किट की गिडार भिन्डी के तनो तथा फलियों में छेद कर नुकसान पहुचाती हैं। इसकी रोकथाम हेतु तीन- चार परपंच (ई. वी. ल्योर के साथ) प्रति एकड़ फसल में लगाए तथा कीटनाशी क्विनालफॉस (25 ई. सी.) 2 मिली. लीटर प्रति लीटर के गोल का छिड़काव 10 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए।

प्रमुख रोग

पिला शिरा मोजेक रोग

 यह भिन्डी में लगने वाला अत्यधिक घातक रोग हैं। विषाणु के संक्रमण से फैलता हैं। यह विषाणु चूसक कीटो द्वारा एक पौधे से दूसरे में फैलता हैं। इसके प्रकोप से संक्रमित पत्तियो की नसों के बिच हरितहीनता उत्पन होती हैं। इसकी रोकथाम के लिए प्रभावित पोधो को उखाड़कर जमीन में दबा देना चाहिए। रोगवाहक कीटो की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मिली. प्रतिलीटर पानी में घोल का छिड़काव करना चाहिए। फसल की रोग प्रतिरोधी किस्म की बुवाई करनी चाहिए।

पाउडरी मिल्ड्यू

यह रोग फफूंद के द्वारा उत्पन्न होता हैं। इसमे पत्तियो की निचली सतह पर सफेद चूर्ण युक्त पदार्थ जमा होने से भूरे मटमैले रंग की होकर गिरने लगती हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए 25 किलोग्राम/ हेक्टेयर की दर से गंधक चूर्ण को 500- 600 पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

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