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भारत में नीली क्रांति, मछली पालन तथा एकीकृत मछली पालन

Written by Rajesh Kumar Singh

भारत की बढ़ती जनसंख्या और घटती खेती की जमीनें खाद्यान्न संकट की ओर इशारा कर रही हैं. ऐसे में बेरोजगारी व भुखमरी बढ़ने के आसार हैं. ऐसे में मछली पालन (Fisheries) न केवल रोजगार का अच्छा साधन साबित हो सकता है, बल्कि खाद्यान्न समस्या के पूरक के तौर पर भी अच्छा साबित हो सकता है. देश में दिनोंदिन मछली खाने वालों की तादाद में इजाफा हो रहा है, इसलिए मछली की मांग में तेजी से उछाल आया है।

मछली पालन

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ऐसे में अगर बेरोजगार नौजवान और किसान मछली पालन का काम वैज्ञानिक तरीके से करें तो कम लागत में अधिक मुनाफा हो सकता है. मछली पालन उद्योग मछुआरों तक ही सीमित था कभी, किन्तु आज यह सफल और प्रतिष्ठित लघु उद्योग के रूप में स्थापित हो रहा है। नई-नई टेक्नोलॉजी ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी है। मत्स्य पालन रोजगार के अवसर तो पैदा करता ही है, खाद्य पूर्ति में वृद्धि के साथ-साथ विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

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आज भारत मत्स्य उत्पादक देश के रूप में उभर रहा है। एक समय था, जब मछलियों को तालाब, नदी या सागर के भरोसे रखा जाता था, परंतु बदलते वैज्ञानिक परिवेश में इसके लिए कृत्रिम जलाशय बनाए जा रहे हैं, जहां वे सारी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, जो प्राकृतिक रूप में नदी, तालाब और सागर में होती हैं। छोटे शहरों और गांवों के वे युवा, जो कम शिक्षित हैं, वे भी मछली पालन उद्योग लगा कर अच्छी आजीविका अर्जित कर सकते हैं।आज विश्व मछली पालन दिवस है , ईस अवसर पर ईस लेख के माध्यम से हम नीली क्रांति के साथ साथ भारत मे मछली पालन की विधि तथा संभावना पर प्रकाश डालेंगे ।

नीली क्रांति:-

भारत में मत्य्य उत्पादन में बृद्धि के लिए चलाई गई एक विशेष योजना को ‘नीली क्रांति’ का नाम दिया गया है| आर्थिक समीक्षा 2014-15 के अनुसार वर्ष 2013-14 में 95.8 लाख टन मछली का उत्पादन कर आज भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक राष्ट्र बन गया है| केंद्र सरकार ने मछली और मछली उत्पादों सेनिर्यात आय को 2014-15 के Rs 33,441 करोड़ से बढाकर अगले 5 सालों में Rs. 1,00,000 करोड़ करने का लक्ष्य रखा है।

भारत में नीली क्रांति के दौरान एक्वाकल्चर का विकास हुआ जिसके कारण मछली पालन, मछली प्रजनन, मछली विपणन और मछली निर्यात में बहुत अधिक सुधार हुआ है। नीली क्रांति के कारण भारत में झींगा मछली के उत्पादन में बहुत बृद्धि हुई है। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में झींगा का उत्पादन बहुत ही व्यापक स्तर पर होता है इसी कारण आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले को भारत की ‘झींगा मछली की राजधानी’ कहा जाता है।

नील क्रांति मिशन का उद्देश्य’ देश तथा मछुआरों एवं मछली किसानों की आर्थिक समृद्धि प्राप्तग करना तथा जैव सुरक्षा एवं पर्यावरणीय सरोकारों को ध्याथन में रखते हुए संपोषणीय ढंग से मछली पालन विकास के लिए जल संसाधनों की पूर्णक्षमता के उपयोग के माध्य‍म से खाद्य एवं पोषण सुरक्षा में योगदान देना है । इसमें मछली पालन क्षेत्र के बदलाव, अधिक निवेश, बेहतर प्रशिक्षण और अवसंरचना के विकास की परिकल्पतना है।

कनीली क्रांति मछली पकड़ने के नए बंदरगाहों के निर्माण, मछली पकड़ने की नौकाओं के आधुनिकीकरण, मछुआरों को प्रशिक्षण देने तथा स्वं-रोजगार की गतिविधि के रूप में मछली पकड़ने को बढ़ावा देने पर बल देगी । महिलाओं और उनके समूहों को प्रशिक्षण तथा क्षमता-निर्माण और परियोजनाओं के आबंटन में प्राथमिकता दी जाएगी।

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मछली उत्पादन से सम्बन्षित कुछ रोचक आंकड़े इस प्रकार हैं:-

  1. चीन दुनिया का सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है इसके बाद भारत का नंबर आता है। चीन से 50 विभिन्न प्रकार की मछलियों का उत्पादन किया जाता है।
  2. ताजे जल की मछली के उत्पादन में भी चीन का स्थान प्रथम और भारत का दूसरा है।
  3. भारत से समुद्री उत्पादों का सबसे अधिक निर्यात अमेरिका (26%) को किया जाता है इसके बाद आसियान देशों (25%) और तीसरे स्थान पर यूरोपियन यूनियन (20%) का नंबर आता है।
  4. देश में कुल मछली उत्पादन में अग्रणी राज्य इस प्रकार हैं:- पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, गुजरात, केरल, एवं तमिलनाडु।
  5. देश में सागरीय मछली उत्पादन में अग्रणी राज्य इस प्रकार हैं: केरल, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, एवं आंध्र प्रदेश।
  6. आन्तरिक क्षेत्र में मछली उत्पादक बड़े उत्पादक राज्य इस प्रकार हैं:- पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु।

7. भारत का कुल मछली उत्पादन इस प्रकार है:-

  1. अंतर्देशीय मछली उत्पादन : 6.23 मिलियन टन
  2. समुद्री मछली उत्पादन : 3.35 मिलियन टन

8. भारत में नीली क्रांति का जनक अरुण कृष्णन को माना जाता है।

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मछली पालन की तैयारी:-

मछली हेतु तालाब की तैयारी बरसात के पूर्व ही कर लेना उपयुक्त रहता है। मछलीपालन सभी प्रकार के छोटे-बड़े मौसमी तथा बारहमासी तालाबों में किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त ऐसे तालाब जिनमें अन्य जलीय वानस्पतिक फसलें जैसे- सिंघाड़ा, कमलगट्‌टा, मुरार (ढ़से ) आदि ली जाती है, वे भी मत्स्यपालन हेतु सर्वथा उपयुक्त होते हैं।

मछलीपालन हेतु तालाब में जो खाद, उर्वरक, अन्य खाद्य पदार्थ इत्यादि डाले जाते हैं उनसे तालाब की मिट्‌टी तथा पानी की उर्वरकता बढ़ती है, परिणामस्वरूप फसल की पैदावार भी बढ़ती है। इन वानस्पतिक फसलों के कचरे जो तालाब के पानी में सड़ गल जाते हैं वह पानी व मिट्‌टी को अधिक उपजाऊ बनाता है, जिससे मछली के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक आहार प्लैकटान (प्लवक) उत्पन्न होता है।

इस प्रकार दोनों ही एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं और आपस में पैदावार बढ़ाने मे सहायक होते हैं। धान के खेतों में भी जहां जून जुलाई से अक्टूबर नवंबर तक पर्याप्त पानी भरा रहता है, मछली पालन किया जाकर अतिरिक्त आमदनी प्राप्त की जा सकती है। धान के खेतों में मछली पालन के लिए एक अलग प्रकार की तैयारी करने की आवश्यकता होती है।

किसान अपने खेत से अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत जोते जाते है, खेतों की मेड़ों को यथा समय आवश्यकतानुसार मरम्मत करता है, खरपतवार निकालता है, जमीन को खाद एवं उर्वरक आदि देकर तैयार करता है एवं समय आने पर बीज बोता है। बीज अंकुरण पश्चात्‌ उसकी अच्छी तरह देखभाल करते हुए निंदाई-गुड़ाई करता है, आवश्यकतानुसार नाइट्रोजन, स्फूर तथा पोटाश खाद का प्रयोग करता है। उचित समय पर पौधों की बीमारियों की रोकथाम हेतु दवाई आदि का प्रयोग करता है। ठीक इसी प्रकार मछली की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए मछली की खेती में भी इन क्रियाकलापों का किया जाना अत्यावश्यक होता है।

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तालाब की तैयारी:-

मौसमी तालाबों में मांसाहारी तथा अवाछंनीय क्षुद्र प्रजातियों की मछली होने की आशंका नहीं रहती है तथापि बारहमासी तालाबों में ये मछलियां हो सकती है। अतः ऐसे तालाबों में जून माह में तालाब में निम्नतम जलस्तर होने पर बार-बार जाल चलाकर हानिकारक मछलियों व कीड़े मकोड़ों को निकाल देना चाहिए। यदि तालाब में मवेशी आदि पानी नहीं पीते हैं तो उसमें ऐसी मछलियों के मारने के लिए 2000 से 2500 किलोग्राम प्रति हेक्टयर प्रति मीटर की दर से महुआ खली का प्रयोग करना चाहिए।

महुआ खली:-

महुआ खली के प्रयोग से पानी में रहने वाले जीव मर जाते हैं। तथा मछलियां भी प्रभावित होकर मरने के बाद पहले ऊपर आती है। यदि इस समय इन्हें निकाल लिया जाये तो खाने तथा बेचने के काम में लाया जा सकता है। महुआ खली के प्रयागे करने पर यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इसके प्रयोग के बाद तालाब को 2 से 3 सप्ताह तक निस्तार हेतु उपयोग में न लाए जावें।

खली डालने के 3 सप्ताह बाद तथा मौसमी तालाबोंमें पानी भरने के पूर्व 250 से 300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से चूना डाला जाता है जिसमें पानी में रहने वाली कीड़े मकोड़े मर जाते हैं। चूना पानी के पी.एच. को नियंत्रित कर क्षारीयता बढ़ाता है तथा पानी स्वच्छ रखता है। चूना डालने के एक सप्ताह बाद तालाब में 10,000 किलोग्राम प्रति हेक्टर प्रति वर्ष के मान से गोबर की खाद डालना चाहिए।

जिन तालाबों में खेतों का पानी अथवा गाठे ान का पानी वर्षा ऋतू में बहकर आता है उनमें गोबर खाद की मात्रा कम की जा सकती है क्योंकि इस प्रकार के पानी में वैसे ही काफी मात्रा में खाद उपलब्ध रहता है। तालाब के पानी आवक-जावक द्वार मे जाली लगाने के समुचित व्यवस्था भी अवद्गय ही कर लेना चाहिए।

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प्लैंकटान (प्राकृतिक आहार):-

तालाब में मत्स्यबीज डालने के पहले इस बात की परख कर लेनी चाहिए कि उस तालाब में प्रचुर मात्रा में मछली का प्राकृतिक आहार (प्लैंकटान) उपलब्ध है। तालाब में प्लैंकटान की अच्छी मात्रा करने के उद्देश्य से यह आवश्यक है कि गोबर की खाद के साथ सुपरफास्फेट 300 किलोग्राम तथा यूरिया 180 किलोग्राम प्रतिवर्ष प्रति हेक्टयेर के मान से डाली जाये।

अतः साल भर के लिए निर्धारित मात्रा (10000 किलो गोबर खाद, 300 किलो सुपरफास्फेट तथा 180 किलो यूरिया) की 10 मासिक किश्तों में बराबर-बराबर डालना चाहिए। इस प्रकार प्रतिमाह 1000 किला गोबर खाद, 30 किलो सुपर फास्फेट तथा 18 किलो यूरिया का प्रयोग तालाब में करने पर प्रचुर मात्रा में प्लैंकटान की उत्पत्ति होती है।

मत्स्य बीज संचयन:-

सामान्यतः तालाब में 10000 फ्राई अथवा 5000 फिंगरलिंग प्रति हैक्टर की दर से संचय करना चाहिए। यह अनुभव किया गया है कि इससे कम मात्रा में संचय से पानी में उपलब्ध भोजन का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता तथा अधिक संचय से सभी मछलियों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं होता। तालाब में उपलब्ध भोजन के समुचित उपयोग हेतु कतला सतह पर,रोहू मध्य में तथा म्रिगल मछली तालाब के तल में उपलब्ध भोजन ग्रहण करती है। इस प्रकार इन तीनों प्रजातियों के मछली बीज संचयन से तालाब के पानी के स्तर पर उपलब्ध भोजन का समुचित रूप से उपयोग होता है तथा इससे अधिकाधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

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पालने योग्य देशी प्रमुख सफर मछलियों (कतला, रोहू, म्रिगल ) के अलावा कुछ विदेशी प्रजाति की मछलियां (ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प कामन कार्प) भी आजकल बहुतायत में संचय की जाने लगी है। अतः देशी व विदेशी प्रजातियों की मछलियों का बीज मिश्रित मछलीपालन अंतर्गत संचय किया जा सकता है। विदेशी प्रजाति की ये मछलियां देशी प्रमुख सफर मछलियों से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं करती है।

सिल्वर कार्प मछली कतला के समान जल के ऊपरी सतह से, ग्रास कार्प रोहू की तरह स्तम्भ से तथा काँमन कार्प मृगल की तरह तालाब के तल से भाजे न ग्रहण करती है। अतः इस समस्त छः प्रजातियोंके मत्स्य बीज संचयन होने पर कतला, सिल्वरकार्प, रोहू, ग्रासकार्प, म्रिगल तथा कामन कार्प को 20:20:15:15:15:15 के अनुपात में संचयन किया जाना चाहिए। सामान्यतः मछलीबीज पाँलीथीन पैकट में पानी भरकर तथा आँक्सीजन हवा डालकर पैक की जाती है।

तालाब में मत्स्यबीज छोड़ने के पूर्व उक्त पैकेट को थोड़ी देर के लिए तालाब के पानी में रखना चाहिए। तदुपरांत तालाब का कुछ पानी पैकेट के अन्दर प्रवेद्गा कराकर समतापन (एक्लिमेटाइजेद्गान) हेतु वातावरण तैयार कर लेनी चाहिए और तब पैकेट के छलीबीज को धीरे-धीरे तालाब के पानी में निकलने देना चाहिए। इससे मछली बीज की उत्तर जीविता बढ़ाने में मदद मिलती है।

ऊपरी आहार:-

मछली बीज संचय के उपरात यदि तालाब में मछली का भोजन कम है या मछली की बाढ़ कम है तो चांवल की भूसी (कनकी मिश्रित राईस पालिस) एवं सरसो या मूगं फली की खली लगभग 1800 से 2700 किलोग्राम प्रति हेक्टर प्रतिवर्ष के मान से देना चाहिए।

इसे प्रतिदिन एक निश्चित समय पर डालना चाहिए जिससे मछली उसे खाने का समय बांध लेती है एवं आहार व्यर्थ नहीं जाता है। उचित होगा कि खाद्य पदार्थ बारे को में भरकर डण्डों के सहारे तालाब में कई जगह बांध दें तथा बारे में में बारीक-बारीक छेद कर दें।यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि बोरे का अधिकांश भाग पानी के अन्दर डुबा रहे तथा कुछ भाग पानी के ऊपर रहे।

सामान्य परिस्थिति मेंप्रचलित पुराने तरीकों से मछलीपालन करने में जहां 500-600 किलो प्रति हेक्टेयरप्रतिवर्ष का उत्पादन प्राप्त होता है, वहीं आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से मछलीपालन करने से 3000 से 5000 किलो/हेक्टर /वर्ष मत्स्य उत्पादन कर सकते हैं। आंध्रप्रदेश में इसी पद्धति से मछलीपालन कर 7000 किलो/हेक्टर/वर्ष तक उत्पादन लिया जा रहा है।

मछली पालकों को प्रतिमाह जाल चलाकर संचित मछलियों की वृद्धि का निरीक्षण करते रहना चाहिए, जिससे मछलियों कोदिए जाने वाले परिपूरक आहार की मात्रा निर्धारित करने में आसानी होगी तथा संचित मछलियों की वृद्धि दर ज्ञात हो सकेगी। यदि कोई बीमारी दिखे तो फौरन उपचार करना चाहिए।

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तालाब का चयन :-

मछली पालन के लिए सब से पहले तालाब का चयन करना पड़ता है। इस के लिए ग्रामपंचायतों नगरपालिकाओं द्वारा संरक्षित तालाबों को पट्टे पर ले कर यह काम शुरू किया जा सकता है। जिन के पास 1 बीधे से 2 हेक्टेयर तक जमीन है, वे तालाब की खुदाई करा कर मछलीपालन का काम शुरू कर सकते हैं।

तालाब का चयन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि तालाब में साल भर 1-2 मीटर पानी जरूर भरा रहे. इस के लिए तालाब में पानी भरने का इंतजाम रखना चाहिए। तालाब में मछली के बच्चे डालने से पहले यह जान लेना जरूरी होता है कि तालाब बाढ़ प्रभावित न हो और उस के किनारे कटेफटे न हों।

मछलीपालन से पहले यह जांच लेना चाहिए कि तालाब का समतलीकरण हो चुका हो। इस के अलावा तालाब में पानी आनेजाने की जगह पर जाली लगी होनी चाहिए, ताकि जलीय जीवजंतु तालाब में न आने पाएं. तालाब के सुधार का काम जून तक जरूर पूरा कर लेना चाहिए।

तालाब की सफाई :-

मछलीपालन करने से पहले ही तालाब की सफाई जांच लेनी चाहिए. जलकुंभी, लेमना, अजोला, पिस्टिया, कमल, हाईड्रिला या नजाज को तालाब से निकाल देना चाहिए, क्योंकि ये पौधे तालाब के ज्यादातर भाग को घेरे रहते हैं, जिस से मछलियों की पैदावार प्रभावित होती है।

तालाब में खरपतवार नियंत्रण के लिए रसायन का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इस से पानी जहरीला हो कर मछलियों के लिए घातक साबित हो सकता है।

तालाब से फालतू मछलियों की सफाई भी जरूरी होती है. ये मछलियां उन्नतशील मछलियों को प्रभावित करती हैं। इस के लिए मत्स्यबीज को तालाब में छोड़ने से पहले तालाब में महुए की खली डाल देनी चाहिए, जिस के असर से पढि़न, मांगुर, सौर, सिंधि जैसी मछलियां मर कर ऊपर आ जाती हैं, जिन्हें जाल से छान कर बाहर निकाल देना चाहिए।

इस के 15 से 20 दिनों बाद ही तालाब में मत्स्य बीज डालना सही होता है, क्योंकि तब तक तालाब से महुए की खली के जहर का असर खत्म हो जाता है।

मछलियों की अच्छी बढ़वार के लिए मत्स्यपालन विभाग की प्रयोगशाला में तालाब की मिट्टी की जांच जरूर कराएं, ताकि तालाब में कार्बनिक व रासायनिक खादों के इस्तेमाल को तय किया जा सके।

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चूने व उर्वरक का इस्तेमाल :-

मछलीपालन वाले तालाब में चूने का इस्तेमाल पानी की क्षारीयता में इजाफा करता है और अम्लीयता को सही करता है. चूना तालाब में मछलियों को दूसरे जलीय जीवों से भी बचाता है. इस के लिए 250 किलोग्राम बुझा हुआ चूना प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. तालाब में कार्बनिक संतुलन के लिए 10 टन गोबर प्रति हेक्टयर की दर से 1 साल में इस्तेमाल करें।

यह मात्रा 10 महीने की समान मासिक किस्तों में डालीन चाहिए. गोबर की खाद डालने के 15 दिनों बाद रासायनिक खादों का इस्तेमाल करना चाहिए, जिस में यूरिया 200 किलोग्राम, सिंगल सुपर फास्फेट 250 किलोग्राम व म्यूरिक आफ पोटाश 40 किलोग्राम प्रति हेक्टयर होना चाहिए।

प्रजातियों का चयन:-

मछलीपालन के लिए कभी भी एक तालाब में अकेली एक प्रजाति की मछली का चयन नहीं करना चाहिए, बल्कि उच्च उत्पादकता वाली 2 से 6 प्रजातियों का चयन करना चाहिए, जिस से मछलियों की बढ़वार अच्छी होती है और उत्पादन भी अच्छी मात्रा में होता है।

कतला :-

यह भारतीय मछली जिसे भाकुर भी कहा जाता है, बहुत तेजी से बढ़ती है. इस मछली में भोजन को मांस में बदलने में अच्छी कूवत पाई जाती है, इसलिए इस का बाजार भाव हमेशा अच्छा रहा है। यह मछली के शौकीनों की पसंदीदा मछली मानी जाती है।

इस मछली का सिर बड़ा होता है. इस की मूछें नहीं होती हैं। यह पानी की ऊपरी सतह पर तैरने वाले प्लवकों को भोजन के रूप में खाती है। यह मछली ज्यादातर तालाब के भोजन को खाती है, लेकिन कृत्रिम भोजन भी इसे पसंद होता है. इसी वजह से तालाब में कृत्रिम भोजन का छिड़काव भी किया जा सकता है।

कतला पहले साल में ही 12-14 इंच की लंबाई में बढ़ती है। इस का वजन 1.0 किलोग्राम से ले कर 1.25 किलोग्राम तक होता है। एक कतला मछली 1 साल में 1.2 किलोग्राम तक के वजन पर 15 रुपए की लागत लेती है, जबकि इस का बाजार भाव 100 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम होता है. इस प्रकार इस से 85 से 135 रुपए तक का लाभ लिया जा सकता है।

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सिल्वर कार्प :-

यह मछली रूस व चीन में पाई जाती है। इस का पालन भारतीय किसानों की अच्छी आमदनी का साधन है। सिल्वर कार्प लंबी व चपटे शरीर वाली मछली है। इस का सिर नुकीला व थूथन गोल होता है। यह तालाब के शैवाल व सड़ेगले पदार्थों को खाती है।

इसे अलग से मछलियों का चारा खिलाया जाना भी अच्छा होता है। सिल्वर कार्प तालाब में तेजी से बढ़ती है और 12 से 14 इंच लंबी हो जाती है। 1 साल में इस का वजन 1.5 किलोग्राम से 1.8 किलोग्राम तक हो जाता है। इस मछली को पालने में प्रति मछली मात्र 15 रुपए की लागत आती है।

रोहू:-

इस मछली का वैज्ञानिक नाम लेबियो रोहिता है। यह भारतीय प्रजाति की सब से तेज बढ़ने वाली मछलियों में गिनी जाती है। इस प्रजाति की मछलियां सब से स्वादिष्ठ मानी जाती हैं। खाने वाले इसे सब से ज्यादा पसंद करते हैं।

यह मछली तालाब के अंदर के शैवाल व जलीय पौधों की पत्तियों को खाती है। रोहू की वृद्धि दर कतला से थोड़ी कम है। यह अपने जीवनकाल में 3 फुट की लंबाई तक बढ़ सकती है, जिस का वजन 1 किलोग्राम तक पाया जाता है।

इन तमाम मछलियों के पालन के लिए 1 हेक्टेयर तालाब में 5 हजार मत्स्यबीज या अंगुलिकाएं डालने की जरूरत पड़ती है, इन के साथ तालिका में बताई जा रही अन्य प्रजातियों की मछलियों को पालना भी जरूरी होता है।

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मछलियों का आहार व देखभाल:-

मछलियों के विकास के लिए मूंगफली, सरसों या तिल की खली को चावल की कनकी या गेहूं की चोकर के साथ बराबर मात्रा में मिला कर मछलियों के भार के 1 से 2 फीसदी की दर से देना चाहिए। अगर ग्रास कार्प मछली का पालन किया गया है, तो पानी की वनस्पतियों जैसे लेमना, हाइड्रिला, नाजाज, सिरेटो फाइलम या स्थलीय वनस्पतियों जैसे नैपियर, बरसीम या मक्के के पत्ते वगैरह जितना खाएं उतनी मात्रा में रोजाना देना चाहिए।

इनके बीज तालाब में डालने के बाद हर महीने तालाब में जाल डाल कर उन के स्वास्थ्य व वृद्धि की जांच करते रहना चाहिए। अगर मछलियां परजीवी से प्रभावित हों, तो उन्हें पोटैशियम परमैगनेट यानी लाल दवा या नमक के घोल में डुबो कर तालाब में छोड़ें। मछलियों में लाल चकत्ते या घाव दिखाई दें तो अपने नजदीकी मत्स्य विभाग से जरूर संपर्क करें।

मछलियों की निकासी व बिक्री:-

मछलियों की उम्र जब 12-16 महीने की हो जाए और उन का वजन 1-2 किलोग्राम हो, तो उन्हें तालाब से निकाल कर स्थानीय मंडी या बाजार में बेचा जा सकता है, जिस से मत्स्यपालक अच्छा लाभ कमा सकते हैं।

साथ-साथ पाली जाने वाली प्रजातियां:-

प्रजाति तालाब में

फीसदी तालाब में फीसदी तालाब

 % तालाब

कतला

10

30 40
रोहू

30

25

30

नैन

15

20 30
सिल्वर कार्प

20

ग्रास कार्प

10

कामन

15 25

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सीमेंट के टैंक में मछली पालन:-

कामर्शियल रूप से मछली पालन प्राकृतिक तालाब में ही किया जाता रहा है लेकिन अब नई तकनीकी से सीमेंट के बने टैंक में मछली पालन प्रगतिशील किसानों से शुरू कर दिया है। ‘रिसर्कुलर एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस) तकनीक से बहते हुए पानी में कम जगह और कम पानी में मछली का पालन किया जा रहा है। मछली पालक 8 महीने में एक किलोग्राम की मछली इन तालाब से हासिल कर रहे हैं।

साधारण मछली पालन के लिए कम से कम एक एकड़ का तालाब चाहिए जिसमें सिर्फ 15 से 20 हजार ही पंगेशियस मछली पाली जा सकती हैं। एक एकड़ के तालाब में करीब 60 लाख लीटर पानी होता है। अगर तालाब में 20 हजार मछली है तो एक मछली को 300 लीटर पानी में रखा जाता है।

जबकि आरएएस सिस्टम में एक हजार लीटर पानी में 110-120 मछली डालते है। इस हिसाब से एक मछली को केवल 9 लीटर पानी की ही जरूरत होती है। आरएएस तकनीकी में मछली पालन के लिए 625 वर्ग फीट और 5 फीट गहराई का सीमेंट का बना टैंक चाहिए। इस टैंक में एक साथ 4000 मछली पाली जा सकती है।

यह मछली 8 माह में तैयार होती है जिससे 100 रुपये से 125 रुपये प्रतिकिलोग्राम बिक्री किया जा सकता है। भारत में मछली खाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट बताती है कि 2030 में भारत में मछली की खपत चार गुणा बढ़ जाएगी। यही वजह है कि देश में मछली पालन का बिजनेस भी तेजी से बढ़ रहा है। सरकार भी मछली पालन को बड़ी प्रमुखता दे रही है।

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एकीकृत मछली पालन:-

Aquaculture (मत्स्यपालन):-

चौर प्राकृतिक रूप से छिछला एवं कम बहाव का होता है, जो जैविक सम्पदा से सम्पन्न माना जाता है पर इन जलीय संसाधनों का अब तक समुचित उपयोग नहीं हो पाया है, जिसका मुख्य कारण इस तरह के जल में बहुत सारे लोगों की भागीदारी होना अर्थात चौर के जल का बंटवारा करना। साथ-साथ आस-पास के लोग भी अपनी आवश्यकता के लिए भी इस पर निर्भर रहते हैं।

फलस्वरूप किसी भी चौर का विकास करने के लिए उसके अगल-बगल के लोगों के लिए भी समुचित प्रबन्धन तथा भागीदार लोगों को जल का सही उपयोग करने का तरीका या तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे चौर के विकास होने के साथ-साथ आस-पास भी समन्वित विकास संभव हो सके।

चौर के बाहरी तरफ जिस तरफ पानी नहीं रहता हो वहां ऐसी फसलों का उत्पादन कर सकते हैं जिनमें पानी की कम से कम जरूरत हो जैसे की सरसों, मसूर इत्यादि, फिर थोड़ी सी जरूरत वाली फसल या फिर मवेशियों के लिए घास इत्यादि उगा सकते हैं।

इस तरह से हम बेकार पड़े खेत को बिना पानी खर्च किये उपजाऊ भी बना सकते हैं। इसके अलावा चौर के पानी वाले इलाके में 3 फीट चैड़ा ऊंची बांध बनाकर उस बांध पर बागवानी कर सकते है, फल (पपीता, केला, अमरूद, नारीयल), सब्जियां (टमाटर, बैंगन, गोभी) इत्यादि उगा सकते हैं।

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दलहन (हरा चना, अरहर, मटर) इत्यादि भी उगा सकते हैं। औशधीय पौधे (धृत कुमारी, तुलसी, कालमेध, नीम, सहजन) इत्यादि का भी उत्पादन कर सकते है। इनके अलावा मुर्गी पालन भी किया जा सकता है। 3 फीट चैड़ा तथा 25-30 फीट लम्बा घर 25-30 मुर्गियों को पालने के लिए उपयुक्त होता है, क्योंकि एक मुर्गी के लिए 1 वर्ग फीट जगह की आवश्यकता होती है। साथ ही साथ जल क्षेत्र में मछली पालन के अलग-अलग तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।

अलग-अलग तकनीकों के उपयोग में लाने से पहले, जल क्षेत्र की पारिस्थितिकी को समझने की आवश्यकता होती है। एकीकृत मत्स्य पालन का अर्थ है ‘फसल, मवेशी और मछलियों का एक साथ पालन करना।

एकीकृत पालन का मुख्य उद्देश्या है एकल पालन के अवशिष्ट पदार्थ का पुनर्चक्रण एवं संसाधनों का इश्टतम उपयोग करना। इस पालन में अवशिष्ट पदार्थों को फेंका नहीं जाता बल्कि उनका पुनर्चक्रण कर उपयोग किया जाता है। अतः यह जीविकोपार्जन एवं आय की दृश्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। एकीकृत पालन कई प्रकार से किया जाता है जैसे – कृशि सह जलकृशि, मछली सह मुर्गी पालन, मछली सह बत्तख पालन एवं मछली सह अनाज खेती।

कृशि सह जलकृशि:-

इसमें उत्पाद का दीर्घकालिक तौर पर इश्टतम उपयोग होता है और वह भी स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों और तकनीकों के उपयोग से। यह पालन छोटे व गरीब किसानों के भरण-पोशण के लिए बहुत ही लाभकारी है। एकीकृत मत्स्य पालन से अतिरिक्त आय भी प्राप्त होती है। इस तरह के पालन के लिए विभिन्न तरह की फसल उपयुक्त होती हैं। फल (पपीता, केला, अमरूद, नींबू, सीताफल, अनानास, नारीयल), सब्जियां (चुकन्दर, करेला, लौकी, बैंगन, बंदगोभी, फूलगोभी, खीरा, ककरी, खरबूजा, मटर, आलू कोहरा, मूली, टमाटर), दलहन (हरा चना, काला चना, अरहर, राजमा, मटर), तिलहन (मूंगफली, सरसों, तिल, रेडी), फूल (गेंदा, गुलाब,रजनीगंधा), औशधीय पौधे (धृतकुमारी, तुलसी, कालमेघ, नीम) आदि।

चौर के पानी वाले इलाके में 3 फीट चैड़ा ऊंचा बांध बनाकर उस बांध पर बागवानी (पपीता, केला, अमरूद, नारीयल इत्यादि ) कर सकते है। ग्रास कार्प के भोजन के लिए नेपियर घास की खेती तालाब के किनारे की जाती है। चौर से प्राप्त गाद एवं जलीय अपतृणों को खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस तरह से हम चौर के किनारे बेकार पड़े खेत को बिना पानी खर्च किये उपजाऊ भी बना सकते हैं।

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मछली सह मुर्गी पालन:-

इस पालन में मुर्गियों के अवशिष्ट को पुनः चक्रण कर खाद के रूप में उपयोग किया जाता है। एक मुर्गी के लिए 0.3-0.4 वर्ग मी. जगह की आवश्यकता होती है। 50-60 पक्षियों से एक टन उर्वरक प्राप्त होता है। अतः ऐसे पालन में 500-600 पक्षियों से प्राप्त खाद एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त होती है। इस पालन द्वारा 4.5-5.0 टन मछली, 70000 अण्डे और 1250 कि.ग्रा. मुर्गी के मांस का उत्पादन होता है। इसमें किसी अन्य संपूरक आहार और अतिरिक्त उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है। इस दृश्टिकोण से यह बहुत लाभदायक सिद्ध होता है।

मछली सह बत्तख पालन:-

इस पालन में मछली और बत्तख एक साथ पाली जाती है। जिस जल क्षेत्र में बत्तखों का पालन किया जाता है वह मछलियों के लिए आदर्श जलक्षेत्र हाता है, क्योंकि पारिस्थितिकी रोगमुक्त होती है। बत्तख जल क्षेत्र में उपस्थित घोंघा, टैडपोल एवं पतगों के लार्वा ग्रहण करती है। इसके अलावा बत्तखों के अवशिष्ट के सीधा तालाब में गिरने से मछलियों के लिए आवश्यक पोशक पदार्थ की पूर्ति होती है।

प्रत्येक बत्तख से 40-50 कि.ग्रा. खाद प्राप्त होता है। जिससे लगभग 3 कि. ग्रा. मछली उत्पादन होता है। बत्तख की औसत पालन दर 4 बत्तख प्रति वर्ग मी. होती है। एक बत्तख औसतन 200 अण्डे प्रति वर्श देती है।

मछली सह मवेशी खेती:-

इस तरह के पालन से बहुत सारी संभावनाएं है। इसमें मछली के साथ गाय, बैल, भैंस तथा बकरी पालन किया जा सकता है। साधारणतः एक गाय, बैल या भैंस से 6 कि.ग्रा. एवं बकरी से 0.5 कि.ग्रा. खाद प्राप्त होती है। अतः एक वर्श में एक मवेशी से 9000 कि.ग्रा. अवशिष्ट निकलता है। अनुमानतः 6.4 कि.ग्रा. गोबर से एक कि.ग्रा. मछली उत्पादन होता है। आठ गायों से प्राप्त गोबर एक हेक्टेयर जल क्षेत्र के लिए पर्याप्त होता है और इससे बिना किसी संपूरक आहार के 3-5 टन मछली का उपज ली जा सकती है। साथ ही गाय का दूध भी प्राप्त होता है।

मछली सह अनाज खेती:-

इस पालन में मछली के साथ अनाज की खेती होती है। इस तरह के पालन में मछली के साथ धान की खेती सर्वाधिक उपयुक्त होती है। धान का खेत पानी से भरा रहता है इसलिए इसमें धान के साथ कम खर्च में मछली पालान किया जाता है।

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Rajesh Kumar Singh

I am a Veterinary Doctor presently working as vet officer in Jharkhand gov.
, graduated in 2000, from Veterinary College-BHUBANESWAR. Since October-2000 to 20O6 I have worked for Poultry Industry of India. During my job period, I have worked for, VENKYS Group, SAGUNA Group Coimbatore & JAPFA Group.
I work as a freelance consultant for integrated poultry, dairy, sheep n goat farms ... I prepare project reports also for bank loan purpose.
JAMSHEDPUR, JHARKHAND, INDIA
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